Tuesday, December 9, 2025

शैक्षिक मनोविज्ञान की विधियाँ (Methods of Educational Psychology)

 शैक्षिक मनोविज्ञान की विधियाँ (Methods of Educational Psychology)



शैक्षिक मनोविज्ञान में विद्यार्थियों के व्यवहार (Behaviour), सीखने की प्रक्रिया (Process of learning) और कक्षा की स्थितियों (Classroom conditions) को वैज्ञानिक ढंग से समझने के लिए कई विधियों का प्रयोग किया जाता है। इन विधियों की सहायता से शिक्षक बालक को समझकर उसके सर्वांगीण विकास के लिए उचित शिक्षण‑व्यवस्था कर सकता है।

प्रमुख विधियाँ (Main Methods): 

  • अंतःदर्शन विधि (Introspective Method)
  • बहिर्निरीक्षण विधि (Extrospection/Observational Method)
  • तुलनात्मक विधि (Comparative Method)
  • मनो-भौतिकी विधि (Psycho-physical Method)
  • मनोविश्लेषण विधि (Psychoanalytic Method)
  • चिकित्सीय  विधि (Clinical Method)
  • प्रायोगिक  विधि (Experimental Method)
  • केस‑स्टडी विधि (Case Study Method)
  • आनुवंशिक या विकासात्मक विधि (Genetic or Developmental Method)
  • परीक्षण या मनोवैज्ञानिक मापन विधि (Test or Psychological Measurement Method)
  • सांख्यिकीय एवं सर्वेक्षण  विधियाँ (Statistical and Survey Methods)



अंतःदर्शन विधि (Introspective Method)



अन्तःदर्शन विधि (Introspection Method) मनोविज्ञान की सबसे प्राचीन और आत्मनिष्ठ (subjective) विधि मानी जाती है, जिसमें व्यक्ति स्वयं अपने मन की क्रियाओं, भावनाओं और विचारों का निरीक्षण और विश्लेषण (Observation & Analysis) करता है। इसे आत्मनिरीक्षण या स्व‑अवलोकन की विधि भी कहा जाता है।

‘अन्तःदर्शन ((Introspection)’ का शाब्दिक अर्थ है – अपने भीतर झाँककर देखना या अपने मन का निरीक्षण करना।

इस विधि में व्यक्ति किसी स्थिति में उत्पन्न हो रही अपनी मानसिक प्रक्रियाओं (Mental Process) (विचार, भाव, कल्पना, निर्णय आदि) को उसी समय भीतर ही भीतर देखकर, समझकर उनका वर्णन करता है।


अपने मस्तिष्क के क्रियाकलापों का क्रमबद्ध ढंग से अध्ययन करना ही अन्तर्दर्शन है।-   स्टाउट
(To introspect is to attend to the working of one's own mind in a systematic way. -  Stout)

प्रक्रिया(Process)- व्यक्ति किसी विशेष अनुभव या क्रिया के समय अपने मन पर ध्यान केन्द्रित करता है और उस क्षण में उत्पन्न हो रहे विचारों, भावनाओं और मानसिक अवस्थाओं (Thoughts, feelings and mental states) का सजग अवलोकन करता है। बाद में वह इन आन्तरिक अनुभवों को शब्दों में व्यक्त करता है; यही वर्णित सामग्री अन्तःदर्शन ((Introspection) के रूप में अध्ययन का आधार बनती है।

इस विधि के दो रूप हैं एक विषयी द्वारा स्वयं अपने व्यवहार का अध्ययन करना और दूसरा अध्ययनकर्ता द्वारा विषयी जिस व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन करना होता है वे उसी व्यक्ति (Subject) से अपने व्यवहार का अध्ययन स्वयं करने को अपने व्यवहार का अध्ययन करने के लिए कहना। 



मुख्य विशेषताएँ (Main Features):


  • प्रेक्षक और अनुभवकर्ता (observer and the experiencer) दोनों वही व्यक्ति होता है, यानी जो अनुभव कर रहा है वही निरीक्षण भी कर रहा है।
  • यह विधि प्रत्यक्ष (direct), तात्कालिक (immediate) और निजी (personal) मानसिक अनुभवों तक पहुँचने का साधन देती है, जिन्हें बाह्य प्रेक्षण (external observation) से देख पाना सम्भव नहीं होता।



गुण (Merits):


  • व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं, कल्पनाओं, संकल्पों (thoughts, feelings, imaginations, resolutions) आदि अत्यन्त सूक्ष्म तथा आन्तरिक मानसिक प्रक्रियाओं को सीधे अनुभव और व्यक्त कर सकता है, जिन्हें बाह्य प्रेक्षण (external observation) से समझना कठिन होता है। इस कारण अन्तःदर्शन विधि (Introspection Method) से मन की आन्तरिक दुनिया की ऐसी जानकारी मिलती है जो अन्य विधियों से प्रायः उपलब्ध नहीं हो पाती।
  • यह विधि व्यक्ति में आत्मनिरीक्षण, आत्म‑चिन्तन और आत्म‑मूल्यांकन (introspection, self-reflection and self-evaluation) की आदत विकसित करती है, जिससे वह अपने गुण‑दोष पहचानकर स्वयं को सुधारने का प्रयास कर सकता है। शिक्षक और विद्यार्थी दोनों के लिए यह आत्म‑समझ, आत्म‑नियंत्रण और व्यक्तित्व विकास (self-understanding, self-control and personality development) का महत्वपूर्ण साधन बन सकती है।
  • अन्तःदर्शन विधि के लिए किसी विशेष यंत्र, प्रयोगशाला या तकनीकी साधन (special instruments, laboratories or technical equipment) की आवश्यकता नहीं होती; व्यक्ति स्वयं अपने अनुभवों का निरीक्षण और वर्णन करता है। इस वजह से यह विधि सरल, समय और धन दोनों की दृष्टि से किफायती तथा व्यावहारिक स्थितियों में आसानी से प्रयोज्य मानी जाती है।
  • इस विधि में निष्कर्ष तत्काल घटित हो रहे प्रत्यक्ष अनुभवों पर आधारित होते हैं, इसलिए व्यक्ति की वर्तमान मानसिक स्थिति का जीवंत चित्र प्राप्त किया जा सकता है। किसी स्थिति में व्यक्ति वास्तव में क्या सोच रहा है या क्या महसूस कर रहा है, यह उसी के कथन से सीधे ज्ञात होता है, मध्यस्थ कम होते हैं।
  • अन्तःदर्शन (Introspection) में वर्तमान क्षण के ‘जैसे घटित हो रहे’ मानसिक अनुभवों का निरीक्षण किया जाता है, बाद की स्मृति पर अधिक निर्भर नहीं रहा जाता।​ विचार, भावना, कल्पना, संकल्प (thought, emotion, imagination and resolution) आदि सूक्ष्म प्रक्रियाएँ प्रत्यक्ष बाह्य प्रेक्षण (direct external observation) से नहीं, बल्कि सीधे व्यक्ति के अंतर्मन (inner) के अवलोकन से जानी जाती हैं।​



दोष (Limitations):


  • इस विधि में व्यक्ति स्वयं ही प्रेक्षक भी है और अध्ययन का विषय भी, इसलिए उसके व्यक्तिगत पूर्वाग्रह, इच्छा‑अनिच्छा और स्व‑रक्षा की प्रवृत्ति (personal biases, desires and self-preservation) परिणामों को प्रभावित कर सकती है। एक ही मानसिक अनुभव के बारे में दो व्यक्तियों के विवरण अलग‑अलग हो सकते हैं, जिससे निष्कर्षों की स्थिरता और सामान्यीकरण कठिन हो जाता है।
  • अनुभव केवल व्यक्ति के कथन पर आधारित होते हैं; इन्हें बाहरी रूप से जाँचना या दोहराकर सत्यापित करना लगभग असंभव होता है, इसलिए विधि की विश्वसनीयता कम मानी जाती है। मापन न तो मानकीकृत होता है और न ही सांख्यिकीय रूप से नियंत्रित, इस कारण यह आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान की कसौटी पर पूर्णतः खरा नहीं उतरता।
  • छोटे बच्चों, मानसिक रूप से अविकसित, असामान्य अथवा अशिक्षित व्यक्तियों (young children, mentally retarded, abnormal, or uneducated individuals) से सही अन्तःदर्शन कराना लगभग असंभव होता है, क्योंकि वे अपने आन्तरिक अनुभवों को भाषा में ठीक से व्यक्त नहीं कर पाते। जिन व्यक्तियों में आत्म‑चिन्तन की क्षमता या ईमानदारी कम है, उनके द्वारा दी गई आत्म‑रिपोर्ट व्यवहार की वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाती।
  • जिस समय व्यक्ति किसी मानसिक क्रिया में लीन होता है, उसी क्षण उस पर सजग ध्यान केन्द्रित करके उसका वर्णन करने से मूल प्रक्रिया टूट जाती है या उसका स्वरूप बदल जाता है। परिणामतः जो अनुभव बाद में बताया जाता है, वह अक्सर अपूर्ण या परिवर्तित रूप होता है, न कि वास्तविक और प्राकृतिक मानसिक प्रवाह।
  • अन्तःदर्शन केवल चेतन अनुभवों पर लागू होता है; अचेतन या अर्ध‑चेतन मानसिक प्रक्रियाएँ (दबी इच्छाएँ, गहरे संवेग आदि) इस विधि से उपलब्ध नहीं हो पातीं। आधुनिक मनोविज्ञान में जहाँ अचेतन की भूमिका महत्त्वपूर्ण मानी जाती है, वहाँ यह विधि अपनी सीमा में बँधी प्रतीत होती है।



Tuesday, December 2, 2025

अधिगम का ज्ञानात्मक क्षेत्रीय सिद्धान्त (Cognitive Field Theory of Learning)

 अधिगम का ज्ञानात्मक क्षेत्रीय सिद्धान्त (Cognitive Field Theory of Learning)


अधिगम का ज्ञानात्मक क्षेत्रीय सिद्धान्त मुख्यतः मनोवैज्ञानिक कर्ट लेविन (Kurt Lewin) द्वारा प्रतिपादित किया गया था। इस सिद्धान्त को अधिगम का क्षेत्रीय सिद्धान्त (Field Theory of Learning) या अधिगम का तलरूप सिद्धान्त (Topological Theory of Learning) के नाम से जाना जाता है। इस सिद्धान्त के प्रतिपादक कर्ट लेविन (Kurt Lewin) हैं, जिन्होंने वर्दीमर, कोहलर, कोफ्का आदि समग्राकृति सिद्धान्तवादियों के साथ बर्लिन में कार्य किया। यह सिद्धांत गेस्टाल्ट मनोविज्ञान से प्रेरित है और 1940 के दशक में विकसित हुआ, जो व्यक्ति के संपूर्ण जीवन क्षेत्र को ध्यान में रखता है । लेविन के अनुसार, किसी भी व्यक्ति का व्यवहार उसके व्यक्तिगत गुणों (Person) और उसके वातावरण (Environment) के आपसी प्रभाव का परिणाम होता है, जिसे सूत्र के रूप में इस प्रकार लिखा जाता है: 

B = f (P, E)

B = f (P, E) अर्थात व्यवहार व्यक्ति और वातावरण का फलन है ।

कर्ट लेविन (Kurt Lewin) ने  मनोविज्ञान को एक ऐसे विज्ञान के रूप में माना जिसका सम्बन्ध नित्य के जीवन से है। उसकी रुचि शिक्षण अधिगम से सम्बन्धित समस्याओं का अध्ययन करने में अधिक थी। उसके मनोविज्ञान का मुख्य केन्द्र व्यक्ति, वातावरण, परिस्थितियों (Person, Environment, Situations) की अभिप्रेरित दशायें थी। इसके अतिरिक्त वह समस्याओं के समाधान में रुचि रखता था।


इस सिद्धान्त के 4 प्रमुख तत्त्व हैं-

  • जीवन-स्थल (Life-Space):-  
यह किसी व्यक्ति का वह संपूर्ण मनोवैज्ञानिक परिवेश होता है, जिसमें उसकी इच्छाएँ, लक्ष्य, अनुभव, संज्ञानात्मक संरचना और बाधाएँ शामिल होती हैं—अर्थात् वह वातावरण और आंतरिक मनोदशा जिसमें व्यक्ति किसी समय विशेष पर कार्य करता तथा निर्णय लेता है ।  वास्तव में जीवन स्थल का अर्थ है "व्यक्तित्त्व और वातावरण में पारस्परिक सम्बन्ध"। 

  1. यह व्यक्ति के चेतन अनुभव से जुड़ा होता है—यानि जिन घटनाओं, अनुभवों या उद्देश्यों के प्रति व्यक्ति सचेत रूप से प्रतिक्रियाशील होता है, वे उसके जीवन क्षेत्र का हिस्सा होते हैं ।​​
  2. इसमें व्यक्ति (Person) तथा मनोवैज्ञानिक वातावरण (Environment) शामिल होता है, जिनके बीच की क्रिया-प्रतिक्रिया व्यवहार को निर्धारित करती है।
  3. जीवन क्षेत्र सीमित नहीं होता—यह समय, परिस्थिति और अनुभव अनुसार बदलता रहता है, जैसे-जैसे व्यक्ति नया ज्ञान अर्जित करता है या नई चुनौतियों का सामना करता है ।​​ जो चीज़ें व्यक्ति के सीधे अनुभव में नहीं आईं, वे उसके जीवन क्षेत्र से बाहर मानी जाती हैं।
जीवन क्षेत्र की यह अवधारणा दर्शाती है कि व्यवहार केवल बाहरी घटनाओं से प्रभावित नहीं होता, बल्कि व्यक्ति की आंतरिक संज्ञानात्मक स्थिति और उसके द्वारा अनुभूत वातावरण का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है ।​​


  • मनोवैज्ञानिक क्षेत्र (Psychological Field) : 
कर्ट लेविन के क्षेत्र सिद्धांत का व्यापक ढाँचा है, जिसके भीतर जीवन क्षेत्र (Life Space), व्यक्ति और उसका वातावरण, सभी शक्ति-प्रभाव और संबंध शामिल होते हैं। सरल शब्दों में, यह वह पूरा “मानसिक-सामाजिक परिदृश्य” है जिसमें किसी समय विशेष पर व्यक्ति सोचता, महसूस करता और व्यवहार करता है। मनोवैज्ञानिक क्षेत्र उस संपूर्ण मनोवैज्ञानिक जगत को कहते हैं जिसमें व्यक्ति और उससे संबंधित सभी आंतरिक (इच्छाएँ, भावनाएँ, धारणाएँ, लक्ष्य) तथा बाह्य (परिवार, साथियों, सामाजिक परिस्थितियाँ, कार्य–परिस्थिति आदि) कारक एक साथ मौजूद होते हैं और आपस में क्रिया–प्रतिक्रिया करते हैं।

  1. मनोवैज्ञानिक क्षेत्र हमेशा “समग्र” (holistic) माना जाता है; किसी एक तत्व को अलग करके पूरी तरह नहीं समझा जा सकता, क्योंकि हर भाग अन्य भागों से जुड़ा होता है।
  2. यह समयानुसार बदलता रहता है; नई जानकारी, अनुभव, सफलता–असफलता, सामाजिक परिवर्तन आदि के साथ क्षेत्र की संरचना और उसमें मौजूद वेक्टर (शक्तियाँ) और कर्षण (आकर्षण/विकर्षण) भी बदलते हैं।
  3. इसमें जीवन क्षेत्र के भीतर की चीजें (जिनसे व्यक्ति मनोवैज्ञानिक रूप से जुड़ा है) और जीवन क्षेत्र के बाहर की चीजें (जो अभी उसके अनुभव का हिस्सा नहीं हैं और उसके व्यवहार पर प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं डालतीं) – दोनों के बीच स्पष्ट सीमा (boundary) मानी जाती है।
  4. जब किसी नई समस्या, संघर्ष या लक्ष्य के कारण मनोवैज्ञानिक क्षेत्र की संरचना बदलती है (जैसे नई राहें खुलना, पुरानी बाधाओं का हटना, नए लक्ष्यों का बनना), तब उसे अधिगम और अनुकूलन (adjustment) का संकेत माना जाता है।

  • वेक्टर (Vectors): - 
कर्ट लेविन के क्षेत्र सिद्धांत में “वेक्टर” (Vectors) को मनोवैज्ञानिक बल या प्रेरक शक्ति माना जाता है, जो व्यक्ति के व्यवहार की दिशा और तीव्रता को निर्धारित करती है। ये वे शक्तियाँ हैं जो व्यक्ति को किसी लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने या उससे दूर हटने के लिए प्रेरित करती हैं ।​  वेक्टर वह मनोवैज्ञानिक बल है जो जीवन क्षेत्र में व्यक्ति की “गति” (movement) को किसी दिशा में मोड़ता है, अर्थात किस दिशा में, कितनी शक्ति और किस प्रकार से व्यक्ति कार्य करेगा, यह वेक्टर से निर्धारित होता है ।​  यदि केवल एक वेक्टर कार्य कर रहा हो, तो व्यक्ति उसी दिशा में अग्रसर होता है; यदि दो या अधिक विपरीत वेक्टर हों, तो संघर्ष (conflict) या संतुलन (equilibrium) की स्थिति बन सकती है ।​
  1. दिशा (Direction) व्यक्ति को किस ओर ले जा रहा है – लक्ष्य की ओर या उससे दूर।
  2. बल कितना प्रबल या कमजोर है, इससे व्यवहार की तीव्रता पता चलती है।
  3. यह बल व्यक्ति के भीतर से (जैसे इच्छा, अभिप्रेरणा) या बाह्य परिस्थितियों से (जैसे सामाजिक दबाव, पुरस्कार, दंड) उत्पन्न हो सकता है ।​
  4. सकारात्मक कर्षण होने पर वेक्टर व्यक्ति को लक्ष्य की ओर खींचता है (Approach tendency) और नकारात्मक कर्षण होने पर वेक्टर व्यक्ति को उस वस्तु या लक्ष्य से दूर ले जाता है (Avoidance tendency) ।​

  • कर्षण (Valence):

कर्ट लेविन के क्षेत्र सिद्धांत में “कर्षण” (Valence) किसी वस्तु, लक्ष्य, व्यक्ति या स्थिति की वह मनोवैज्ञानिक आकर्षण‑या‑विकर्षण शक्ति है, जो उस ओर जाने या उससे दूर रहने की प्रवृत्ति पैदा करती है। यह बताता है कि जीवन क्षेत्र में कौन‑सी चीज़ व्यक्ति के लिए “पसंदीदा/लुभावनी” है और कौन‑सी “अप्रिय/टालने योग्य” महसूस होती है ।​
कर्षण वह गुण है जिसके कारण कोई वस्तु या स्थिति व्यक्ति के लिए सकारात्मक (positive valence) या नकारात्मक (negative valence) बन जाती है। सकारात्मक कर्षण होने पर व्यक्ति की ओर जाने वाली प्रवृत्ति (approach) और नकारात्मक कर्षण होने पर दूर जाने वाली प्रवृत्ति (avoidance) उत्पन्न होती है ।​

  1. जो चीज़ें आवश्यकता की पूर्ति, आनंद, सफलता या सुरक्षा का अनुभव कराएँ, उनका कर्षण सकारात्मक होता है, जैसे पुरस्कार, प्रशंसा, वांछित लक्ष्य आदि। 
  2. जो चीज़ें भय, दर्द, विफलता, दंड या असुरक्षा से जुड़ी हों, उनका कर्षण नकारात्मक माना जाता है, जैसे कड़ी फटकार, अप्रिय कार्य, शर्मिंदा करने वाली स्थिति आदि ।​
  3. यदि किसी छात्र के लिए “अच्छे अंक और शिक्षक की प्रशंसा” का कर्षण सकारात्मक है, तो पढ़ाई की दिशा में मजबूत वेक्टर बनेगा (अधिक अध्ययन, नियमित उपस्थिति)।
  4. यदि “कक्षा में प्रश्न पूछना” शर्म, उपहास या घबराहट से जुड़ा हो और उसका कर्षण नकारात्मक लगे, तो छात्र प्रश्न पूछने से बचेगा, भले ही उसे शंका हो ।​

  • बाधाएँ, लक्ष्य और खतरे (Barriers, Goals, Threats):
लेविन के क्षेत्र सिद्धांत में “बाधाएँ, लक्ष्य और खतरे” जीवन क्षेत्र के ऐसे मुख्य घटक हैं जो वेक्टरों और कर्षण के माध्यम से व्यक्ति के व्यवहार और अधिगम की दिशा तय करते हैं। संक्षेप में, लक्ष्य आकर्षण पैदा करते हैं, बाधाएँ उस लक्ष्य तक पहुँचने की राह रोकती हैं, और खतरे भय या तनाव उत्पन्न करके व्यवहार को प्रभावित करते हैं ।​

लक्ष्य (Goals): लक्ष्य वह वांछित अवस्था, वस्तु या उपलब्धि है, जिसकी ओर व्यक्ति के जीवन क्षेत्र में सकारात्मक कर्षण (positive valence) और अग्रसर वेक्टर (approach vectors) काम करते हैं, जैसे परीक्षा में उत्तीर्ण होना, नौकरी पाना, किसी कौशल में दक्ष होना ।​

बाधाएँ (Barriers): बाधा वह गतिशील अवरोध है जो व्यक्ति और उसके लक्ष्य के बीच स्थित होता है और लक्ष्य की ओर गति (locomotion) को रोकता या धीमा करता है; यह शारीरिक भी हो सकती है (संसाधनों की कमी, दूरी) और मनोवैज्ञानिक भी (भय, हीनभावना, नकारात्मक अपेक्षाएँ) ।​

खतरे (Threats):  खतरा वह स्थिति या संकेत है जो व्यक्ति के लिए संभावित हानि, विफलता, अपमान, दंड या हानि की आशंका पैदा करता है, और इस कारण जीवन क्षेत्र में नकारात्मक कर्षण तथा परिहार वेक्टर (avoidance vectors) उत्पन्न करता है ।​

जब खतरा बहुत प्रबल महसूस होता है, तो व्यक्ति अक्सर लक्ष्य से दूर भागता, बचावात्मक व्यवहार करता या वैकल्पिक, अपेक्षाकृत सुरक्षित लक्ष्यों की ओर मुड़ जाता है, जिससे अधिगम और सकारात्मक प्रयास बाधित हो सकते हैं ।​


लेविन के अनुसार अधिगम की स्थिति में प्रायः यह पैटर्न मिलता है: 
  1. व्यक्ति के पास कोई लक्ष्य होता है → लक्ष्य की ओर सकारात्मक कर्षण और अग्रसर वेक्टर बनते हैं।
  2. लक्ष्य तक पहुँचने के रास्ते में बाधा आती है → यही बाधा, यदि पार न हो सके, तो “खतरे” की अनुभूति (विफलता, दंड, हानि का डर) को जन्म दे सकती है ।
  3. यदि शिक्षक या वातावरण बाधाओं को कम करें (सहयोग, संसाधन, मार्गदर्शन देकर) और खतरे‑भावना को घटाएँ (समर्थनकारी वातावरण, त्रुटि को सीखने का अवसर मानना), तो अधिगम के लिए सकारात्मक कर्षण और प्रभावी वेक्टर मज़बूत हो जाते हैं ।


Monday, December 1, 2025

ब्रूनर का संज्ञानात्मक अधिगम सिद्धान्त (Bruner's Theory of Cognitive Learning)

 ब्रूनर का संज्ञानात्मक अधिगम सिद्धान्त 
(Bruner's Theory of Cognitive Learning)


जीरोम ब्रुनर (Jerome Bruner, 1960) के द्वारा प्रतिपादित अधिगम सिद्धान्त को आधुनिक संज्ञानात्मक सिद्धान्त (Modern Cognitive Theory) कहा जाता है।  ब्रुनर ने बालकों को संज्ञानात्मक व्यवहार का विस्तृत अवलोकन करके संज्ञानात्मक विकास को उसकी विशेषताओं के आधार पर तीन स्तरों- क्रियात्मक, प्रतिबिम्बात्मक तथा संकेतात्मक (functional, reflective and symbolic)  में विभक्त करके स्पष्ट करने का महत्वपूर्ण कार्य किया था। शिक्षा के क्षेत्र में इस सिद्धान्त को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है। संज्ञानात्मक विकास को विस्तृत करते हुए तथा कक्षा में छात्रों के द्वारा सीखने से सम्बन्धित किये जाने वाले व्यवहारों को ध्यान में रखकर उसने सीखने के संज्ञानात्मक सिद्धान्त की अवधारणा प्रस्तुत की है। ब्रुनर के सीखने के सिद्धान्त को निम्न भागों में विभक्त करके प्रस्तुत किया जा सकता है-


मूल धारणाएँ (Main Concept):

  • अधिगम एक सक्रिय, उद्देश्यपूर्ण तथा समस्या–समाधान की प्रक्रिया है; बच्चा पर्यावरण से जानकारी लेकर उसे वर्गीकृत व संगठित करके संप्रत्यय (concepts) बनाता है।​

  • अर्थपूर्ण अधिगम तब होता है जब बालक स्वयं चीज़ों की खोज करता है (अन्वेषण/डिस्कवरी लर्निंग) और विषय की “संरचना” (basic concepts, principles) को समझ लेता है।​
  • नया ज्ञान हमेशा पूर्व ज्ञान से जोड़ा जाता है; इसलिए अधिगम प्रगतिशील पुनर्गठन (reorganization) की प्रक्रिया है।
ब्रूनर ने बताया कि बच्चा अनुभवों को मानसिक रूप से तीन तरीकों से प्रस्तुत करता है:

  • सक्रियता विधि (Enactive mode) : 

यह वह स्थिति है जिसमें बच्चा या कोई भी व्यक्ति करके (action) के माध्यम से सीखता है, यानी ज्ञान शारीरिक क्रिया या “मसल मेमोरी” के रूप में संग्रहीत रहता है। उदाहरण: बच्चा खिलौना पकड़ना सीखता है, या किसी चीज़ को छूकर, मोड़कर समझता है – उसके लिए अनुभव करना सीखने का सबसे बड़ा तरीका है।
  1. जन्म से 3 वर्ष तक। 
  2. बालक गामक क्रिया/शारीरिक क्रिया द्वारा सीखता है। जैसे- वस्तुु को पकड़ना, चलना आदि।
  3. इस अवस्था में शिशु अपनी अनुभूतियों को शब्दविहीन क्रियाओं द्वारा व्यक्त करता है। उदा0- भूख लगने पर रोना, हाथ-पैर हिलाना आदि। इन क्रियाओं द्वारा बालक बाह्य वातावरण से सम्बन्ध स्थापित करता है। 
  4. इस अवस्था में भाषा का महत्व न के बराबर होता है, यदि कोई मानसिक क्रिया का महत्व है तो वह भी नगण्य है।
  5. किसी वस्तु को समझने के लिये बालक उसे पकड़ता है, मोड़ता है, काटता है।
  6. इस अवस्था में शिशु प्रत्यक्ष अनुभव एवं कार्य स्वयं करके ही सीखता है। इस अवस्था के बालकों में बोध विकसित करने हेतु क्रिया को सबसे प्रमुख साधन माना गया है। अतः बालकों को विषय-वस्तु को क्रिया के माध्यम से सीखाना चाहिए।
  7. किसी वस्तु या क्रिया को उसके भौतिक रूप में बार-बार जोड़-तोड़ करके सीखने में मदद करता है।

  • दृश्य–प्रतिमा विधि (Iconic mode):
बच्चा चित्रों, आकृतियों, मानसिक प्रतिमाओं के रूप में अनुभवों का प्रतिनिधित्व करता; प्रत्यक्षीकरण द्वारा सीखना प्रमुख रहता है।​
  1. 4 से 8 वर्ष तक।
  2. इस अवस्था में बालक अपनी अनुभूति को अपने मन में कुछ दृश्य प्रतिमाएं प्रकट करता है और प्रत्यक्षीकरण के माध्यम से सीखता है।
  3. इसमें सूचनाएं प्रतिबिंबों की सहायता से बालक तक पहुंचती है और बालक किसी चमक एवं शोर से प्रभावित होता है। 
  4. यह वास्तविकता का चरण होता है।
  5. प्रत्यक्षीकरण, स्वयं करके सीखना एवं दृश्य स्मृति का विकास इस अवस्था की मुख्य विशेषता है।
  6. यह बोधात्मक क्षेत्र की प्रतिमाओं का चरण है।
  7. इस अवस्था में बालक अपनी स्वयं की मानसिक छवि बनाने और उस आधार पर स्वयं को अभिव्यक्त करने में सक्षम होते हैं।
  8. बालकों में बौद्धिक क्षमता इतनी विकसित हो जाती है कि मूर्त रूप से सोचने एवं समझने लगता है। अतः बालकों में बोध को विकसित करने हेतु चित्रों, मॉडलों, चार्ट, मूर्तियों आदि का प्रयोग किया जा सकता है। इसे छायात्मक अवस्था भी कहते हैं।

  • सांकेतिक विधि (Symbolic mode):

भाषा, चिन्ह, प्रतीकों के माध्यम से सोच व अधिगम; शब्दों और सूत्रों से जटिल संकल्पनाओं को व्यक्त करता है।​
  1. 8 से 13 वर्ष तक।
  2. इस अवस्था में बालक अपने अनुभवों को शब्दों में व्यक्त करता है।
  3. इस अवस्था में बालक गणित तथा तर्क का उपयोग करना सीखते हैं। 
  4. बौद्धिक विकास की यह सर्वोच्च अवस्था है। इसे शब्द चरण भी कहते हैं। 
  5. प्राप्त अनुभवों को शब्दों के माध्यम से प्रकट करना, अमूर्त चिन्तन करना, उच्च-स्तरीय विमर्शी चिन्तन करना सांकेतिक अवस्था की विशेषता है।
  6. भाषा एवं प्रतीकों के माध्यम से अनुभवों के संसार का संप्रेषण किया जा सकता है।
  7. अन्वेषण विधि का प्रयोग किया जाता है।
  8. इस अवस्था में अध्यापक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।



शैक्षिक निहितार्थ (Educational Implication)



  • ब्रुनर ने कक्षा शिक्षण को अर्थपूर्ण बनाने पर बल दिया है।
  • विषय के तात्कालिक ज्ञान पर बल दिया है। तत्परता और शिक्षार्थी द्वारा स्वयं कार्य करने को महत्व दिया।
  • अन्वेषणात्मक विधि पर बल दिया।
  • सीखने में सामाजिक एवं व्यक्तिगत संबद्धता पर बल दिया।
  • आगमनात्मक विधि पर बल दिया।
  • शिक्षा का उद्देश्य स्वायत्त शिक्षार्थी (सीखने के लिए सीखना) होना चाहिए। जिसे बाद में कई स्थितियों में स्थानांतरित किया जा सकता है। विशेष रूप से शिक्षा से बच्चों में प्रतीकात्मक सोच भी विकसित होनी चाहिए।
  • ब्रूनर के मानसिक अवस्थाओं के चरणों के अनुसार शिक्षण में योग्यता व प्रविधियों का प्रयोग करना चाहिए।
  • इस सिद्धान्त के माध्यम से छात्रों द्वारा समस्या समाधान की क्षमता का विकास किया जा सकता है।
  • ब्रूनर ने सम्प्रत्यय को समझने पर बल दिया। जिससे शिक्षक वर्तमान संचार को पूर्व ज्ञान एवं अनुभवों से जोड़ सकता है। इससे छात्रों के ज्ञान को समृद्ध बनाया जा सकता है।
  • शिक्षाविदों, शिक्षकों और माता-पिता को बालक के विचारों को बुनर द्वारा दिये तीनों चरणों के माध्यम से जानकर उसकी क्षमता का विकास करना चाहिये।


Sunday, November 30, 2025

टॉलमैन का अधिगम सिद्धान्त (Tolman's Theory of Learning)

 टॉलमैन का अधिगम सिद्धान्त (Tolman's Theory of Learning)

टॉलमैन का अधिगम सिद्धान्त “चिन्ह–पूर्णाकार (Sign–Gestalt / Sign Learning)” या “प्रयोजनवादी व्यवहारवाद (Purposive Behaviorism)” के नाम से जाना जाता है। इसका मुख्य विचार यह है कि अधिगम केवल यांत्रिक आदत बनाना नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण (purposeful), संज्ञानात्मक (cognitive) और अर्थपूर्ण (meaningful) प्रक्रिया है।

व्यवहार  को उद्दीपक से उत्पन्न होने वाला स्वीकार करने, व्यवहार का मापन करने के लिए वस्तुनिष्ठ विधियों पर जोर देने तथा व्यवहार के परिमार्जन पर बल देने से स्पष्ट है कि टॉलमैन का सिद्धांत व्यवहारवादी दृष्टिकोण रखता है परन्तु  टॉलमैन ने व्यवहारवादियों के सामान व्यवहार यंत्रवत मानने का विरोध किया। 


टॉलमैन के सिद्धान्त का मूल विचार


  • टॉलमैन के अनुसार प्राणी (मानव–पशु) का व्यवहार उद्देश्यपूर्ण होता है; वह किसी लक्ष्य (goal) की ओर निर्देशित होता है, केवल उद्दीपन–प्रतिक्रिया की जंजीर नहीं होता।

  • अधिगम में व्यक्ति अपने वातावरण के बारे में “संज्ञानात्मक मानचित्र (Cognitive map)बनाता है; अर्थात् विभिन्न रास्तों, संकेतों, स्थानों व परिणामों का मानसिक नक्शा तैयार करता है, केवल प्रतिक्रियाओं का क्रम याद नहीं करता।
  • टॉलमैन के अनुसार अधिगम का तत्त्व “चिन्ह” है, अर्थात ऐसे संकेत या प्रतीक जिनके आधार पर व्यक्ति यह “अपेक्षा” करता है कि यदि वह ऐसा करेगा तो ऐसा परिणाम मिलेगा।
  • अधिगम का अर्थ है विभिन्न उद्दीपनों व परिस्थितियों के बीच संबंधों को समझना और उनके आधार पर भविष्य के परिणामों की भविष्यवाणी करना; इसलिए यह “अपेक्षाओं का अधिगम” है, न कि केवल मांसपेशीय प्रतिक्रियाओं का।

प्रमुख अवधारणाएँ (Main Concept):

  • प्रयोजन (Purpose): हर सीखी गई क्रिया के पीछे कोई न कोई उद्देश्य, जरूरत या लक्ष्य होता है; यदि लक्ष्य न हो तो व्यवहार स्थिर नहीं रहता।
  • मध्यवर्ती चरों (Intervening Variables): उद्दीपन और प्रतिक्रिया के बीच प्रेरणा, लक्ष्य, पूर्व-अनुभव, जैविक दशा, व्यक्तित्व आदि ऐसे छिपे हुए तत्त्व हैं जो व्यवहार को प्रभावित करते हैं; इन्हीं को टॉलमैन ने मध्यवर्ती चर कहा।
  • अव्यक्त अधिगम (Latent Learning): प्राणी बिना तात्कालिक पुरस्कार के भी वातावरण का नक्शा सीख लेता है; जब बाद में पुरस्कार मिलता है तभी वह सीखा हुआ ज्ञान व्यवहार में प्रकट होता है।


टालमैन द्वारा प्रस्तुत सैद्धान्तिक सम्प्रत्यय
(Tolman's Theoritical Concepts)


सीखने की प्रक्रिया को समझने के लिए विभिन्न प्रकार की भूल-भूलैयों में किये गये अपने प्रयोगों के आधार पर टालमैन ने सीखने के निम्न सैद्धान्तिक संप्रत्ययों को प्रस्तुत किया-


  • चिन्ह (Sign) या संकेत: अधिगम में व्यक्ति अपने वातावरण के संकेतों (जैसे रास्ता, चिन्ह, संकेत-चिह्न, प्रतीक) के बीच संबंध को पहचानता है, न कि सिर्फ क्रमबद्ध प्रतिक्रियाओं को।

  • संज्ञानात्मक मानचित्र (Cognitive Map): अधिगम के दौरान व्यक्ति दिमाग़ में खुद-ब-खुद एक मानसिक नक्शा या संरचना बनाता है, जिससे स्थान, रास्ते और संभावित परिणामों का ज्ञान होता है।​

  • उद्देश्यपूर्ण व्यवहार (Purposive Behaviour): हर व्यवहार और अधिगम के पीछे कोई-न-कोई लक्ष्य/उद्देश्य होता है — अनायास की गई प्रतिक्रियाएँ नहीं होतीं।​​

  • अपेक्षा (Expectancy): व्यक्ति ‘अपेक्षा’ बना लेता है कि किसी विशेष संकेत के बाद कौन सा परिणाम आएगा; यानी वह अनुभव के आधार पर अपने व्यवहार की योजना बनाता है।​

  • मध्यवर्ती चर (Intervening Variables): उद्दीपन और प्रतिक्रिया के बीच कुछ छिपे कारक जैसे प्रेरणा, उद्देश्य, भूख आदि अभिनय करते हैं, जो अधिगम को प्रभावित करते हैं।​​

  • अव्यक्त अधिगम (Latent Learning): बिना प्रत्यक्ष इनाम के भी अधिगम संभव है; अनुभव बाद में व्यवहार में दिख सकता है। टालमैन ने अधिगम के एक ऐसे प्रकार की चर्चा भी की है जो व्यवहार  के रूप में परिलक्षित होने से पूर्व काफी समय तक सुप्तावस्था (Dormant) में रहता है। परन्तु प्राणी को उपयुक्त परिस्थिति अथवा अभिप्रेरणा मिलने पर वह इस प्रकार के लुप्त अधिगम प्रदर्शन करने में सक्षम रहता है। टालमैन के लुप्त अधिगम संप्रत्यय के अनुसार कभी-कभी अधिगम तो होता है परन्तु पुरस्कार अथवा पुनर्बलन में मिलने के कारण ऐसा अधिगम निष्पादन के रूप में अभिव्यक्त नहीं हो पाता है। वस्तुतः लुप्त अधिगम का संप्रत्यय इंगित करता है कि सीखने के लिए पुरस्कार / पुनर्बलन का होना अपरिहार्य (Indispensable) नहीं है। 


1930 में टालमैन तथा  उनके सहयोगी ने लुप्त अधिगम (Latent Learning) के सन्दर्भ में किये गए एक प्रयोग में देखा गया कि भोजन (पुरस्कार/पुनर्बलन) पाये बिना भी चूहों ने भुलभुलैया में सही मार्ग सीख लिया। 17  दिन तक चल रहे इस प्रयोग में चूहों को तीन समूहों में विभक्त करके तीन समरूप भूलभुलैया (Identical Maze) में दौड़ने का प्रशिक्षण दिया गया।  एक समूह को लक्ष्य पर पहुंचने पर सदैव ही पुनर्बलन दिया गया, दुसरे समूह को लक्ष्य पर पहुंचने पर कभी-भी पुनर्बलन नहीं दिया गया एवं तीसरे समूह को दस दिन तक कोई पुनर्बलन नहीं दिया गया परन्तु  ग्यारहवें दिन से लक्ष्य पर पहुँचने पर पुनर्बलन दिया गया। देखा गया कि- 

  • लगातार पुनर्बलन पाने वाले समूह के निष्पादन में धीरे-धीरे पर्याप्त उन्नति हुई । 
  • पुनर्बलन न पाने वाले समूह में निष्पादन में बहुत थोड़ी उन्नति हुए। 
  • ग्यारहवें दिन से पुनर्बलन पाने वाले समूह के निष्पादन में बारहवें दिन से अप्रत्याशित वृद्धि हुई एवं इस समूह के निष्पादन का स्तर शीघ्र ही लगातार पुनर्बलन पाने वाले समूह के निष्पादन के बराबर हो गया।

टालमैन के अनुसार तीसरे समूह ने प्रथम दस दिनों में भूलभुलैया सीख ली थी, परन्तु  इसकी अभिव्यक्ति (Expression)नहीं हो रही थी। जब ग्यारहवें दिन से उन्हें पुनर्बलन दिया गया तो अधिगम की अभिव्यक्ति (Expression) हो गयी। यही कारण था कि पुनर्बलन पाने के बाद इस समूह के निष्पादन में अचानक वृद्धि हो गयी। दूसरे शब्दों में अधिगम विद्यमान होते हुए भी लुप्त था जो अनुकूल परिस्थिति उत्पन्न होने पर प्रत्यक्षतः हो गया।



Wednesday, November 26, 2025

आसुबेल का अधिगम सिद्धांत (Ausubel's Theory of Learning)

आसुबेल का अधिगम सिद्धांत (Ausubel's Theory of Learning)

  आसुबेल ने यह सिद्धांत 1978 में दिया था। इस अधिगम सिद्धांत इसे आधुनिक संज्ञानात्मक सिद्धांत (Modern Cognitive Theory) भी कहा जाता है।  संज्ञानात्मक सिद्धांत इसलिए कहा जाता है कि सीखते समय व्यक्ति के मस्तिष्क में होने वाली प्रक्रिया का वर्णन किया जाता है। आसुबेल के अनुसार व्यक्ति जब किसी विषय वस्तु/पूर्व ज्ञान/ अनुभव को अपनी संज्ञानात्मक संरचना (Cognitive Structure) से सार्थक रूप से जोड़ लेता है तो उसे आत्मसात (Assimilation) करना कहते हैं 

इनके द्वारा लक्ष्य तथा शिक्षण सामग्री (Aims & Teaching Content) के प्रस्तुतीकरण की विधि के सुधार पर अधिक बल दिया गया  इनका मत है कि व्यक्ति अधिग्रहण (Acquisition) के द्वारा सीखता है ना की अन्वेषण के द्वारा  इनका कहना था कि सिद्धांत तथा विचार प्रस्तुत किए जाते हैं ना की खोज जाते हैं  

व्याख्यात्मक शिक्षण प्रतिमान (Explanatory Teaching Model) अर्थपूर्ण शाब्दिक अधिगम (Meaningful Verbal learning) पर अधिक बल देता है इसमें मौखिक सूचनाओं, विचार तथा विचारों में संबंध साथ-साथ चलते हैंआसुबेल का मानना है की ब्रूनर द्वारा बताई गई आगमन विधि (Inductive Method) न होकर निगमन चिंतन (Deductive Thinking) अधिगम की प्रगति में होनी चाहिए इन्होंने निगमनात्मक चिंतन पर जोर  दिया है 


आसुबेल  ने अधिगम के चार प्रकार बताएं  हैं -

  • रटन्त अधिगम (Rote Learning): विषय सामग्री को बिना समझे सीखना और ज्यों का त्यों प्रस्तुत करना। 
  • अर्थपूर्ण अधिगम (Meaningful Learning):  सीखने वाली सामग्री के सार तत्व को समझना व उसे  पूर्व ज्ञान से जोड़ना।  आसुबेल  के अनुसार अर्थपूर्ण अधिगम (Meaningful learning) तीन बातों पर निर्भर करता है -
  1. अधिगम सामग्री को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है की अगला  प्रथम अध्याय दूसरे अध्याय को समझने में सहायक हो। 
  2. नए ज्ञान को अर्जित करते समय व्यक्ति का मस्तिष्क किस प्रकार कार्य कर रहा है वह उसके प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति (Positive Attitude) रखता है या नहीं। 
  3. अध्यापक नए विषय को सीखाने के लिए अधिगम संबंधी विचारों को किस प्रकार प्रस्तुत करता है। 

अतः शिक्षकों को पढ़ाए जाने वाली सामग्री का चयन, संगठन व प्रस्तुतीकरण (Selection, Organization and Presentation) इस प्रकार किया जाए कि वह छात्रों के लिए अधिक अर्थपूर्ण बन जाए। 

  • अधिग्रहण अधिगम (Acquisition Learning): छात्रों के समक्ष सीखने वाली सामग्री बोलकर या लिखकर प्रस्तुत की जाती है, छात्र उन सामग्रियों का आत्मसात (Assimilation) करने का प्रयास करता है।परंतु यह रटंत  न होकर समझकर होता है।  यह दो प्रकार का होता है -

  1. रटंत अधिग्रहण अधिगम (Rote Acquisition Learning)-   मंद, संकुचित तथा नीरस (dull, compact and boring) ।  
  2. अर्थपूर्ण अधिग्रहण अधिगम (Meaningful Acquisition Learning)-  व्यापक, तीव्र व अर्थपूर्ण (comprehensive, intense and meaningful) । 

  • अन्वेषण अधिगम (Discovery Learning): खोज करके सीखना (Learning by Discovering)।  अन्वेषण अधिगम भी दो प्रकार का होता है-  

  1. रटंत अन्वेषण अधिगम (Rote Discovery Learning)-   विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति हेतु अनुक्रिया करना। 
  2. अर्थपूर्ण अन्वेषण अधिगम (Meaningful Discovery Learning)- सीखे गए तथ्यों के आधार पर किसी नए नियम का उपयोग करके नए नियम का प्रतिपादन करना और तथ्यों को आत्मसात  (Assimilation)  करके अपने अनुसार नवीन प्रकार से उनका उपयोग करना। 

अर्थपूर्ण अधिगम में आत्मसात को महत्वपूर्ण स्थान दिया है ।  उसने अधिगम में आत्मसात के चार प्रकार बताए हैं -

  1. योगात्मक अधिगम (Combinational Learning):  छात्र सामान्य समरूपता के आधार पर सीखे गए विचारों को सार्थक ढंग से अपनी वर्तमान संज्ञानात्मक संरचना के महत्वपूर्ण तत्वों के साथ आत्मसात करके  जोड़ता है ।  जैसे- आवश्यकता तथा पूर्ति, ताप तथा आयतन आदि । 
  2. अधीनस्थ अधिगम (Subordinate learning):  अधिक प्रचलित शब्द की कम प्रचलित समानार्थी शब्दों को सीखना। जैसे - पानी के लिए कम प्रचलित शब्द वारि,  सलिल व नीर आदि। 
  3. सहसंबंध अधिगम (Corelation Learning):  छात्र पहले सीखे हुए ज्ञान को नवीन ज्ञान से संबंधित करके उसमें परिमार्जन (Modification) या संवर्धन (Elaboration) करता है जैसे- कोई व्यक्ति अपने राष्ट्रीय ध्वज, चिन्ह व पर्वों का बहुत सम्मान करता है । उसके लिए राष्ट्रभक्ति शब्द प्रयोग किया जाता है। 
  4. उच्च कोटि अधिगम (Superordinate Learning): कई संप्रत्ययों (Concepts)  को मिलाकर किसी नई संप्रत्यय का निर्माण करना।  जैसे- गौरैया, तोता, कबूतर, मैना आदि की जानकारी के आधार पर पक्षी संप्रत्यय का विकास होता है। 

Saturday, November 22, 2025

सामाजिक अधिगम सिद्धांत (Social Learning Theory)

 सामाजिक अधिगम सिद्धांत (Social Learning Theory)


प्रतिपादक - अल्बर्ट बंडूरा  (Albert Bandura), सहयोगी - वाल्टर (Walters)

सिद्धांत के अन्य नाम - प्रत्यक्ष अधिगम सिद्धांत (Direct Learning Theory), प्रतिरूप अधिगम सिद्धांत (Vicarious Learning Theory), अवलोकन अधिगम सिद्धांत (Observational Learning Theory), अनुकरण सिद्धांत (Imitation Theory), सामाजिक संज्ञानात्मक सिद्धांत (Social Cognitive Theory), निर्देशन का सिद्धांत (Theory of Guidance)। 

पुस्तक - Principles of Behaviour Modification (1969)

आधार वाक्य - व्यक्ति दूसरे के व्यवहार को देखकर सीखते हैं। 

प्रयोग - अल्बर्ट नाम का बालक, बोबो  डॉल एवं जोकर। 

  • यह सिद्धांत इस बात पर विचार करता है कि कैसे पर्यावरण और संज्ञानात्मक कारक मानव अधिगम व व्यवहार को प्रभावित करने के लिए परस्पर क्रिया करते हैं। 
  • व्यक्ति का व्यवहार संज्ञान व प्रत्याशा (Expectation) द्वारा प्रमाणित होते हैं प्रत्याशा दो प्रकार की होती है परिणाम प्रत्याशा (Outcome Expectation)  और प्रभावोत्पादकता प्रत्याशा (Efficacy Expectation) । 
  • इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्यक्ष अनुभवों पर आधारित अधिगम के स्थान पर अप्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित अधिगम /अवलोकनात्मक अधिगम का सीखने की प्रक्रिया में अधिक सार्थक स्थान है । 
  • जन्म से बालक अपने वातावरण में उपस्थित व्यक्तियों, परिवार के सदस्यों के व्यवहार का अवलोकन करता है एवं कुछ की व्यवहारों का अनुकरण कर अपनी व्यवहार में लाता है ।  जिन व्यक्तियों के व्यवहारों का वह अनुकरण करते हैं उन्हें निदर्श (Model) कहा जाता है किसी निदर्श (Model) के  व्यवहार का अनुकरण करके किया गया अवलोकनात्मक अधिगम को निदर्शन (Modeling)  कहा जाता है

सामाजिक अधिगम के सोपान (Steps of Social Learning Theory)




  • अवधान (Attention):-  देखना ध्यान देने योग्य प्रक्रिया महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी मॉडल के संपर्क में आने से यह सुनिश्चित नहीं होता है कि पर्यवेक्षक (Observer) ध्यान देंगे।  मॉडल को पर्यवेक्षक की रुचि जाना चाहिए और पर्यवेक्षक को मॉडल के व्यवहार को अनुकरण के लायक समझना चाहिए। यह तय करता है कि व्यवहार को मॉडल किया जाएगा या नहीं । व्यक्ति को व्यवहार और परिणामो पर ध्यान देने और व्यवहार का मानसिक प्रतिनिधित्व बनाने की आवश्यकता है । किसी व्यवहार का अनुकरण करने के लिए उसे हमारा ध्यान खींचना होगा । हम दैनिक आधार पर कई व्यवहार देखते हैं और उनमें से कई उल्लेखनीय नहीं है, इसलिए इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि क्या कोई व्यवहार दूसरों को उसका अनुकरण करने के लिए प्रभावित करता है
  • धारण करना (Retention):-  व्यवहार को धारण करना सफल अनुकरण के लिए पर्यवेक्षकों (Observer) को इन व्यवहारों को प्रतीकात्मक रूप से सहेजना होगा सक्रिय रूप से उन्हें आसानी से याद किये जाने वाले पैटर्न की व्यवस्थित करना होगा। आचरण कितना याद रहते हैं व्यवहार पर  ध्यान दिया जा सकता है लेकिन इसे हमेशा याद नहीं रखा जा सकता । जो स्पष्ट रूप से नक़ल रोकता है,  इसलिए महत्वपूर्ण है कि व्यवहार की एक स्मृति पर्यवेक्षक द्वारा बाद में निष्पादित किया जाए अधिकांश सामाजिक अधिगम तुरंत नहीं होता इसलिए यह प्रक्रिया उन मामलों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।  इसको संदर्भित करने के लिए एक स्मृति की आवश्यकता होती है
  • पुनः प्रस्तुतीकरण (Re-production) :-  उत्पादन दूसरों के सामने प्रस्तुत करना। यह उस व्यवहार को निष्पादित करने की क्षमता है जिसे मॉडल द्वारा अभी प्रदर्शित किया गया है। हम प्रतिदिन बहुत सारे व्यवहार देखते हैं जिनका हम अनुकरण करने में सक्षम होना चाहते हैं लेकिन हमेशा यह संभव नहीं हो पता क्योंकि हमारी शारीरिक क्षमता हमें सीमित करती है। यह हमारे निर्णय को प्रभावित करता है कि हमें इसका अनुकरण करने का प्रयास करना चाहिए या नहीं।
  • पुनर्बलन/ अभिप्रेरणा (Reinforcement/Motivation):  प्रेरणा और पुनर्बलन की प्रक्रिया मॉडल के कार्यों की नकल करने के अनुकूल या प्रतिकूल परिणाम को संदर्भित करती हैं जो नकल की संभावना को बढ़ाने या घटाने की रखते हैं । यदि अनुमानित पुरस्कार अनुमानित लागत से अधिक है तो पर्यवेक्षक की नकल करने की संभावना अधिक रहेगी परंतु यदि पुनर्बलन पर्यवेक्षक के लिए महत्वहीन है तो वह व्यवहार की नकल नहीं करेंगे।



Thursday, November 20, 2025

व्यक्तित्व का मापन (Measurement of Personality)

 व्यक्तित्व का मापन (Measurement of Personality)

व्यक्तित्व मापन की विधियां (Methods of Personality Measurement)

  1. अप्रक्षेपी विधियां (Non-Projectives Methods)
  2. प्रक्षेपी विधियां (Projective Method)

अप्रक्षेपी विधियां (Non-Projective Methods):

मुख्य रूप से व्यक्तित्व मापन की उन विधियों को कहते हैं जिनमें व्यक्ति के बाहरी व्यवहार या स्वयं द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर मूल्यांकन किया जाता है। इनमें दो प्रमुख प्रकार की विधियां होती हैं: वस्तुनिष्ठ विधि और आत्मनिष्ठ विधि
  • व्यक्तिनिष्ठ विधियाँ (Subjective Methods):- व्यक्तिनिष्ठ विधियों से तात्पर्य उन विधियों से है जिनमे परिणाम मापनकर्ता की अपनी पसंद- नापसंद और व्यक्तिगत मानदंडों से प्रभावित होते हैं।  अवलोकन विधि (Observation Method), साक्षात्कार विधि (Interview Method), प्रश्नावली विधि (Questionnaire Method),  व्यक्ति इतिहास विधि (Case History Method), आत्मकथा विधि (Autobiography Method) आदि इसके अंतर्गत आते हैं । 
  • वस्तुनिष्ठ विधियां (Objectives Methods): - वास्तुनिष्ठ विधियों से तात्पर्य उन विधियों से है जिनमे परिणाम मापनकर्ता की अपनी पसंद- नापसंद और व्यक्तिगत मानदंडों से प्रभावित नहीं होते हैं। नियन्त्रित निरीक्षण विधि (Controlled Observation Method), श्रेणी मापनी (Rating Scale), शारीरिक परीक्षण (Physiological Tests), परिस्थिति परीक्षण (Situation Tests) - समाजमिति (Sociometry), मनोनाटक (Psycho Drama) आदि। 

प्रक्षेपी विधियां (Projective Methods):-

व्यक्तित्व मापन की ऐसी विधियां हैं जिनमें व्यक्ति के अचेतन मन में छिपे पहलुओं, भावनाओं, विचारों और मानसिक स्थितियों  (unconscious mind, feelings, thoughts, and mental states) को प्रकट करने का प्रयास किया जाता है। इन विधियों में व्यक्ति को अस्पष्ट, अनिर्दिष्ट और संवेदी उत्तेजनाएं (vague, unspecific, and sensory stimuli) दी जाती हैं, जिनके प्रति उसके प्रतिक्रिया से उसके अंतर्निहित व्यक्तित्व (Internal Personality) पहलुओं का मूल्यांकन होता है।
प्रक्षेपी  विधि मनुष्य की दमित इच्छाओं पर बाह्य जगत पर आरोपित करने की विधि है। - वारेन (Warren)

साहचर्य प्रविधि (Association Technique), रचना प्रविधि (Construction Technique), पूर्ति प्रविधि (Completion Technique), चयन प्रविधि (Ordering Technique), अभिव्यक्ति परीक्षण (Expression Tests)- रोर्शा स्याही धब्बा परीक्षण (Rorsacharch Ink Blot Test), प्रासंगिक अन्तर्बोध परीक्षण (Thematic Apperception Test), बाल अन्तर्बोध परीक्षण (Children Apperception Test)

नियन्त्रित निरीक्षण विधि (Controlled Observation Method)

यह एक ऐसी अनुसंधान विधि है जिसमें अवलोकनकर्ता विशेष नियमों एवं नियंत्रणों के तहत किसी घटना या व्यवहार का अध्ययन करता है। इसमें अवलोकन की प्रक्रिया पूर्व नियोजित होती है और घटना या प्रतिभागियों पर नियंत्रण रखा जाता है ताकि अध्ययन अधिक विश्वसनीय और वैज्ञानिक हो। इस विधि में किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का मापन नियन्त्रित परिस्थितियों में उसके बौद्धिक कार्यों, संवेगात्मक विकास, रुचियों, अभिवृत्तियों एवं आदतों आदि का निरीक्षण करके किया जाता है। प्रयोज्य को विभिन्न नियन्त्रित परिस्थितियों में रखकर उसका निरन्तर निरीक्षण किया जाता है और वस्तुनिष्ठ ढंग से किया जाता है और उसके बाद निष्कर्ष निकाले जाते हैं।

इस अवलोकन का उद्देश्य होता है घटना या व्यवहार को नियंत्रित परिस्थितियों में समझना और विश्लेषण करना, जिससे शोधकर्ता को कार्य के कारण और प्रभावों का पता चल सके। इस प्रकार का सही निरीक्षण योग्य एवं प्रशिक्षित व्यक्ति ही कर सकते हैं। यद्यपि यह विधि सामान्य अवलोकन की अपेक्षा तो वस्तुनिष्ठ होती है परन्तु पूर्णरूप से वस्तुनिष्ठ नहीं होती।

श्रेणी मापनी (Rating Scale)

व्यक्तित्व मापन में रेटिंग स्केल एक ऐसी वस्तुनिष्ठ विधि है जिसमें किसी व्यक्ति के विशिष्ट गुणों, व्यवहारों या लक्षणों को पूर्व निर्धारित मानकों (Norms) या बिंदुओं के आधार पर मापा और मूल्यांकन किया जाता है। इस स्केल पर किसी गुण की तीव्रता या मात्रा को अंकित किया जाता है जिससे व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं का मापन सरल और संगठित हो जाता है। इस विधि का प्रयोग सर्वप्रथम मनोभौतिकी में फैक्नर (Fecner) ने किया था परन्तु इस प्रकार की श्रेणी मापनी कर प्रकाशन सर्वप्रथम गाल्टन ने 1889 में किया था।
रेटिंग स्केल में प्रतिभागी या पर्यवेक्षक (Participant or observer) को व्यक्ति के व्यवहार या गुणों के बारे में एक मापदंड या अंक देना होता है, जैसे कि 1 से 5 या 1 से 10 तक की संख्या, जो उस गुण की उपस्थिति या तीव्रता को दर्शाती है। यह स्केल शिक्षकों, परिवार के सदस्यों या स्वयं प्रतिभागी द्वारा भरी जा सकती है। यह तरीका व्यक्तित्व के आँकड़ों को संख्यात्मक रूप में प्रस्तुत करता है जिससे विश्लेषण करना आसान होता है। वर्तमान में कई प्रकार की श्रेणी मापनियों का प्रयोग किया जाता है। इनमें मुख्य हैं - लिकर्ट मापनी (Likert Scale), चैक लिस्ट (Check List), आँकिक मापनी (Numerical Scale), ग्राफिक मापनी (Graphic Scale), क्रमिक मापनी (Ordering Scale), बाध्य चयन मापनी (Forced Choice Scale) आदि। 

शारीरिक परीक्षण (Physiological Tests)


व्यक्तित्व मूल्यांकन की वह विधि है जिसमें व्यक्ति के शारीरिक और जैविक प्रतिक्रियाओं (physiological and biological responses) को मापा जाता है। इस प्रकार के परीक्षणों में मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि, हृदय की धड़कन, रक्तचाप , त्वचा की अंतःस्रावी प्रतिक्रिया और मांसपेशियों की गतिविधि (electrical activity, heart rate, blood pressure, skin endocrine response, and muscle activity) जैसे शारीरिक संकेतों का अध्ययन किया जाता है।

ये परीक्षण इस आधार पर काम करते हैं कि व्यक्तित्व की कुछ विशेषताएं, जैसे भावात्मक प्रतिक्रिया (emotional reactivity), तनाव स्तर (stress level) और मानसिक स्थिति (mental state), व्यक्ति के शारीरिक प्रतिक्रियाओं में परिलक्षित होती हैं। फिजियोलॉजिकल टेस्ट में EEG (electroencephalograph), ECG (electrocardiograph), प्लेथिस्मोग्राफ (plethysmograph), और मांसपेशियों की गतिविधि मापने वाले उपकरणों का उपयोग किया जाता है।

यह विधि अधिक वस्तुनिष्ठ और तकनीकी है, और व्यक्तित्व के जैविक आधारों को समझने में सहायक होती है। हालांकि, इसके लिए विशेष उपकरणों और तकनीकी माहिरता की आवश्यकता होती है, इसलिए यह आम तौर पर प्रयोगशाला और शोध केंद्रों में उपयोग की जाती है।

Wednesday, November 19, 2025

आइजेंक का व्यक्तित्व का मानवतावादी सिद्धांत (Eysenck's Humanistic theory of Personality)

आइजेंक का व्यक्तित्व का मानवतावादी सिद्धांत (Eysenck's Humanistic theory of Personality)

एच० जे० आइजेंक (H. J. Eysenck) के द्वारा प्रतिपादित व्यक्तित्व सिद्धान्त को जैविक शीलगुण सिद्धान्त (Biological Trait Theory) के नाम से जाना जाता है। आइजेंक ने व्यक्तित्व के विकास में वंशानुक्रम एवं वातावरण दोनों के प्रभाव को महत्वपूर्ण स्वीकार किया तथा कहा कि व्यक्तित्व में एक प्रकार की स्थिरता पाई जाती है। उसने मानव व्यवहार प्रतिमानों के संज्ञानात्मक (Cognitive), क्रियात्मक (functional), भावात्मक एवं दैहिक क्षेत्रों (emotional and physical areas) को बौद्धिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक एवं जैविक कारकों से जोड़कर प्रस्तुत किया।

आइजेंक की व्यक्तित्व संरचना  हिप्पोक्रेटस एवं जुंग के विचारों से प्रभावित प्रतीत होती है। हिप्पोक्रेटस ने शारीरिक द्रवों के आधार पर चार प्रकार के व्यक्तित्व- आशावादी (Sanguine), क्रोधी (Choleric), विषादी (Melancholic) तथा भावशून्य (Plegmatic) वाले व्यक्तियों का उल्लेख किया था जबकि जुंग ने अन्तर्मुखी (Introversion) तथा बहिर्मुखी (Extroversion) दो प्रकार के व्यक्तित्वों की चर्चा की थी। आइजेंक द्वारा प्रतिपादित व्यक्तित्व संरचना का संप्रत्यय व्यक्तित्व को प्रकार- शीलगुण संप्रत्यय (Types-Traits Concept) के रूप में प्रस्तुत करता है। 
आइजेंक ने कारक विश्लेषण प्रविधि (Factor Analysis Method) के द्वारा व्यक्तित्व की कुछ विमाओं (Dimensions) को ज्ञात करके उनके आधार पर व्यक्तित्व की संरचना को स्पष्ट करने का प्रयास किया है।
हंस आइजेंक  का व्यक्तित्व सिद्धांत मुख्यतः एक जैविक और गुण-प्रकार (Trait-type) का सिद्धांत है जो व्यक्तित्व के तीन प्रमुख आयामों  पर ज़ोर देता है: बहिर्मुखता बनाम अंतर्मुखता (Extraversion vs Introversion), विक्षिप्तता बनाम भावनात्मक स्थिरता (Neuroticism vs Emotional stability) और मनोविकृति बनाम समाजीकरण (Psychoticism vs Socialization)। उनका मानना ​​था कि ये व्यक्तित्व लक्षण मुख्यतः आनुवंशिक और जैविक कारकों द्वारा नियंत्रित होते हैं, और स्वभाव जन्मजात होता है।

(1) अंतर्मुखता - बहिर्मुखता (Introversion - Extroversion):- 

अंतर्मुखता- आसानी से प्रभावित, निराशावादी, चिंताग्रस्त, कम उत्तेजित, कम महत्वाकांक्षी, आत्मनिष्ठ, कल्पनाशील, अनुशासनप्रिय एवं गंभीर।

बहिर्मुखता- आवेगशीलपरिवर्तनशील, क्रियाशील, सामाजिक आदि।

(2) स्नायुविकता स्थिरता बनाम अस्थिरता (Neuroticism Stability vs Unstability):- इसका आयाम लिम्बिक सिस्टम से जुड़ा है, जो भावनाओं और प्रेरणा को नियंत्रित करता है। उच्च न्यूरोटिसिज्म भावनात्मक अस्थिरता, चिंता और मनोदशा से संबंधित है। यह मनमौजी (Moody)अति संवेदनशील, बैचेन, उग्र स्वभाव, करुणामय एवं दुश्चिंता से ग्रस्त होते हैं ।

(3) मनोविकारिता बनाम सामाजिकता (Psychoticism vs Socialization):- एकांतप्रिय, कम क्रियाशील, अहंकारी, सामाजिक मर्यादाओं का विरोधी होता है जबकि सोशलाइज़ेशन में ज़्यादा लोग हमदर्द, कोऑपरेटिव और कन्फर्मिंग होते हैं। 

आइजेंक के अनुसार अंतर्मुखी, बहिर्मुखी तथा स्नायुविकता के कारण व्यक्तियों में जो विभिन्नताएं पाई जाती हैं उनमें से 75% वंशानुक्रम से निर्धारित होती हैं।

आइजेंक ने व्यवहार संगठन के चार स्तर बताये हैं - 
  • विशिष्ट अनुक्रिया स्तर (Specific Response Level):- ये किसी परिस्थिति में अलग-अलग, ठोस काम होते हैं—जैसे, लक झपकाना, आँखें झुकाना, किसी दोस्त से किसी एक मौके पर बात करना। ऐसे व्यवहार बदलते रहते हैं और परिस्थिति के हिसाब से होते हैं।
  • आदतजन्य अनुक्रिया स्तर (Habitual Response Level):- जब एक खास जवाब को एक जैसी स्थितियों में दोहराया जाता है, तो यह एक आदत बन जाती है—जैसे रेगुलर तौर पर ग्रुप में पढ़ाई करना। ये आदतें समय के साथ कुछ स्थिरता दिखाती हैं।
  • शीलगुण स्तर (Trait Level) : - शीलगुण हमेशा रहने वाले गुण होते हैं जो आदतन प्रतिक्रिया के समूह से मिलते हैं। उदाहरण के लिए, जो कोई अक्सर समूह में पढ़ता है, अक्सर मिलता-जुलता है, और समूह क्रियाएं करना  पसंद करता है, उसमें समाजशीलता   शीलगुण  हो सकता है।
  • प्रकार स्तर (Type Level) :- ये पर्सनैलिटी के बड़े पहलू हैं जो एक-दूसरे से जुड़े गुणों से बने होते हैं। आइसेनक ने तीन मुख्य प्रकार बताए: एक्स्ट्रावर्जन, न्यूरोटिसिज़्म और साइकोटिसिज़्म। हर प्रकार एक हायर-ऑर्डर फैक्टर दिखाता है जिसमें कई गुण शामिल होते हैं।


मरे का व्यक्तित्व आवश्यकता सिद्धांत (Murray's Need Theory of Personality)

 मरे का व्यक्तित्व आवश्यकता सिद्धांत
(Murray's Need Theory of Personality)

हेनरी मरे का व्यक्तित्व आवश्यकता सिद्धांत, जिसे मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं के सिद्धांत (Theory of Psychogenic Needs) के रूप में भी जाना जाता है, व्यक्तित्व को मूलभूत मानवीय उद्देश्यों और आवश्यकताओं के इर्द-गिर्द संगठित बताता है, जो सचेतन और अचेतन (Consciously and Unconsciously) दोनों रूपों में कार्य करता है।

मरे ने इस तथ्य पर बल दिया कि मानव एक प्रेरित जीव (Inspired creatures) है, जो अपनी अन्तर्निहित आवश्यकताओं (Internal Needs) और बाहरी दबावों (External pressures) के कारण उत्पन्न तनावों को कम करने का प्रयत्न करता है। उन्होंने व्यक्ति के व्यक्तित्व की व्याख्या उसकी आन्तरिक आवश्यकताओं (Internal Needs) के आधार पर की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मनुष्य जिस वातावरण में रहता है उस वातावरण के दबावों का समग्र रूप उस मनुष्य के अन्दर कुछ आवश्यकताओं को उत्पन्न कर देता है। उनके अनुसार ये आवश्यकतायें ही उसके व्यवहार को निश्चित करती हैं। मरे ने इस प्रकार की 24 आवश्यकताओं का पता भी लगाया और उन्हें व्यक्तित्व आवश्यकता (Personality Needs) कहा। उनके द्वारा खोजी गई कुछ आवश्यकतायें हैं- निष्पति (Achievement) की आवश्यकता , स्वायत्तता (Autonomy) की आवश्यकता, प्रभुत्व (Dominance) की आवश्यकता, सानिध्य (Affiliation) की आवश्यकता, प्रदर्शन (Exhibition) की आवश्यकता, परोपकार (Nurturance) की आवश्यकता और आक्रामकता (Aggression) की आवश्यकता

मरे ने प्रस्तावित किया कि -

  • व्यक्तियों की सार्वभौमिक आवश्यकताओं (Universal Needs) का एक समूह होता है, लेकिन इन आवश्यकताओं की तीव्रता और प्राथमिकता प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग-अलग होती है, जिससे अद्वितीय व्यक्तित्व (Unique Personality) का निर्माण होता है।
  • आवश्यकताओं को आंतरिक शक्तियों (Internal Powers) या "विशिष्ट परिस्थितियों में एक निश्चित तरीके से प्रतिक्रिया करने की तत्परता" के रूप में देखा जाता है।
  • व्यवहार इन आवश्यकताओं से प्रेरित होता है, और अपूर्ण आवश्यकताओं के कारण उत्पन्न तनाव को कम करने से मानव क्रियाएँ बहुत प्रभावित होती हैं।

मरे ने आवश्यकताओं को दो मुख्य प्रकारों में विभाजित किया:-

  • प्राथमिक आवश्यकताएँ (Primary needs): ये जैविक या शारीरिक होती हैं, जैसे भोजन, पानी या ऑक्सीजन की आवश्यकता।
  • द्वितीयक (मनोवैज्ञानिक) आवश्यकताएँ (Secondary Needs): ये मनोवैज्ञानिक होती हैं और कल्याण के लिए आवश्यक होती हैं, जैसे उपलब्धि, संबद्धता, शक्ति और सूचना प्राप्ति। उन्होंने लगभग 24 मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की एक सूची तैयार की, जिनमें उपलब्धि, संबद्धता, प्रभुत्व, स्वायत्तता, पोषण, आदि शामिल हैं।

Tuesday, September 23, 2025

राष्ट्रीय शैक्षिक योजना और प्रशासन संस्थान (National Institute of Educational Planning and Administration, NIEPA)

 राष्ट्रीय शैक्षिक योजना और प्रशासन संस्थान 
(National Institute of Educational Planning and Administration, NIEPA)


NIEPA का अर्थ है राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन संस्थान, जो भारत में एक प्रमुख स्वायत्त संस्थान है जो शैक्षिक योजना एवं प्रशासन के क्षेत्र में अनुसंधान, प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और नीति समर्थन पर केंद्रित है। शैक्षिक राष्ट्रीय प्रणाली में इस संस्थान का महत्त्वपूर्ण स्थान है। गत बीस वर्षों में देश के अन्तर्गत यह एक उच्च स्तरीय संगठन है। इसने शैक्षिक नियोजन एवं प्रशासन के क्षेत्र में व्यापक रूप में विकास एवं प्रशिक्षण का कार्य किया है
इसकी स्थापना मूलतः 1962 में यूनेस्को द्वारा एशियाई क्षेत्रीय शैक्षिक योजनाकारों एवं प्रशासकों के केंद्र के रूप में की गई थी। यह कई चरणों से गुज़रते हुए 1973 में राष्ट्रीय शैक्षिक योजनाकारों एवं प्रशासकों का स्टाफ कॉलेज बना और 1979 में इसका नाम बदलकर NIEPA  कर दिया गया। वर्ष 2006 में, भारत सरकार ने इसे मानद विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान किया, जिससे इसे अपनी डिग्रियाँ प्रदान करने की अनुमति मिल गई।

Monday, September 22, 2025

राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (National Council for Teacher Education, NCTE)

राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद 
(National Council for Teacher Education, NCTE)

  राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) भारत सरकार का एक सांविधिक निकाय है। राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद, 1973 से अपनी पूर्व स्थिति में, केंद्र और राज्य सरकारों के लिए शिक्षक शिक्षा से संबंधित सभी मामलों पर एक सलाहकार निकाय थी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NPE) 1986 और उसके अंतर्गत कार्ययोजना में शिक्षक शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन हेतु एक प्रारंभिक कदम के रूप में एक वैधानिक दर्जा और आवश्यक संसाधनों से युक्त राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद की परिकल्पना की गई थी। राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद अधिनियम, 1993 (1993 का संख्या 73) के अनुसरण में 17 अगस्त, 1995 को अस्तित्व में आया। यह परिषद केंद्र और राज्य सरकारों के लिए शिक्षक शिक्षा से संबंधित सभी मामलों में कार्य करती है। इसका उद्देश्य पूरे देश में शिक्षक शिक्षा का नियोजित और समन्वित विकास करना और शिक्षक शिक्षा के मानदंडों एवं मानकों के नियमन एवं उचित रखरखाव का प्रबंधन करना है। यह संगठन अखिल भारतीय स्तर पर कार्यरत है और इसमें विभिन्न प्रभागों के साथ-साथ 4 क्षेत्रीय समितियाँ शामिल हैं। उत्तरी क्षेत्रीय समिति, पूर्वी क्षेत्रीय समिति, दक्षिणी क्षेत्रीय समिति और पश्चिमी क्षेत्रीय समिति, जो सभी नई दिल्ली में स्थित हैं। एन0सी0टी0ई0 द्वारा निष्पादित कार्यों का दायरा बहुत व्यापक है, जिसमें सभी शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम शामिल हैं, जैसे- प्रारंभिक शिक्षा में डिप्लोमा (D. El. Ed.), शिक्षा स्नातक (B.Ed.), शिक्षा स्नातकोत्तर (M.Ed.) आदि। इसमें छात्र-शिक्षकों का अनुसंधान और प्रशिक्षण शामिल है।

NCTE को एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका सौंपी गई है और इसने एकीकृत शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम (ITEP), शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक (NPST) और राष्ट्रीय मार्गदर्शन मिशन (NMM) जैसे विभिन्न राष्ट्रीय अधिदेशों को अपने हाथ में लिया है। NCTE द्वारा अन्य शिक्षक शिक्षा कार्यक्रमों, जैसे विनियमन, पाठ्यक्रम और डिजिटल संरचना, का संशोधन भी NEP 2020 के अनुरूप किया जा रहा है। ऐसी पहलों के साथ, NCTE न केवल शिक्षकों के व्यावसायिक विकास के लिए प्रयासरत है, बल्कि हमारे देश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षक शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने का भी लक्ष्य रखता है। NEP 2020 शिक्षकों की भूमिका में एक व्यापक बदलाव की परिकल्पना करता है, जिसमें सेवा-पूर्व शिक्षक शिक्षा और सेवाकालीन शिक्षक क्षमता निर्माण पर विशेष जोर दिया गया है। NCTE का मुख्यालय जी-7, सेक्टर-10, द्वारका, मेट्रो स्टेशन के पास, नई दिल्ली-110075 में स्थित है। 

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (University Grant Commission, UGC)


Sunday, September 21, 2025

शिक्षक शिक्षा की एजेंसियाँ (Agencies of Teacher Education)

 शिक्षक शिक्षा की एजेंसियाँ

(Agencies of Teacher Education)


भारत में शिक्षक शिक्षा एजेंसियाँ राष्ट्रीय, राज्य और ज़िला स्तर पर कार्यरत हैं, और प्रत्येक शिक्षक प्रशिक्षण, पाठ्यक्रम और शैक्षिक मानकों को बेहतर बनाने में अपनी विशिष्ट भूमिका निभाती है।

Friday, September 19, 2025

पाठ्यक्रम विकास का व्यावसायिक/प्रशिक्षण मॉडल (Vocational/Training Model of Curriculum Development)

 

पाठ्यक्रम विकास का व्यावसायिक/प्रशिक्षण मॉडल (Vocational/Training Model of Curriculum Development)


पाठ्यक्रम विकास का व्यावसायिक/प्रशिक्षण मॉडल एक व्यावहारिक, करियर-उन्मुख दृष्टिकोण है जो शिक्षार्थियों को विशिष्ट व्यवसायों या उद्योगों के लिए आवश्यक विशिष्ट कौशल और ज्ञान से लैस करने पर केंद्रित है। यह मॉडल व्यावहारिक प्रशिक्षण (Hands-on training), वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोगों (Real-world Applications), नियोक्ताओं और उद्योग विशेषज्ञों (Collaboration with Employers and Industry experts) के साथ सहयोग पर ज़ोर देता है ताकि प्रासंगिकता और नौकरी की तत्परता सुनिश्चित हो सके। यह अक्सर तकनीकी कौशल को संचार और टीमवर्क जैसे आवश्यक सॉफ्ट स्किल्स के साथ एकीकृत करता है और इसमें लचीली कार्यक्रम संरचनाएँ और इंटर्नशिप या नौकरी के अवसर शामिल हो सकते हैं।

इस मॉडल का आधार नौकरी विश्लेषण और कार्यस्थल की आवश्यकताओं पर आधारित है। पाठ्यक्रम योजनाकार (Curriculum planners)  विभिन्न व्यवसायों और उद्योगों में आवश्यक कौशलों का अध्ययन करते हैं, फिर संरचित शिक्षण अनुभव तैयार करते हैं जो शिक्षार्थियों को वे दक्षताएँ प्रदान करते हैं। सीखने की प्रक्रिया अक्सर दक्षता-आधारित होती है, जहाँ प्रगति मानकीकृत परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने के बजाय विशिष्ट कौशल में निपुणता प्रदर्शित करने पर निर्भर करती है।


Wednesday, September 17, 2025

पाठ्यक्रम विकास का भविष्योन्मुखी मॉडल (Futuristic Model of curriculum Development)

 

पाठ्यक्रम विकास का भविष्योन्मुखी मॉडल 

(Futuristic Model of curriculum Development)

पाठ्यक्रम विकास का एक भविष्योन्मुखी मॉडल, शिक्षार्थियों को एक अप्रत्याशित (unexpected), प्रौद्योगिकी-संचालित (Technology-driven) और वैश्वीकृत (Globalized) दुनिया में फलने-फूलने के लिए तैयार करने पर केंद्रित है। यह मॉडल कौशल-केंद्रित, प्रौद्योगिकी-एकीकृत और लचीला है, जो अनुकूलनशीलता (adaptability), वास्तविक दुनिया में अनुप्रयोग और आजीवन सीखने पर ज़ोर देता है। 


एक भविष्योन्मुखी पाठ्यक्रम लचीला और मॉड्यूलर होता है, जो शिक्षार्थियों को अपनी रुचियों के अनुरूप मार्ग चुनने की अनुमति देता है, चाहे वे शैक्षणिक, व्यावसायिक, उद्यमशीलता (entrepreneurship) या कलात्मक हों। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म व्यक्तिगत, अनुकूली शिक्षण अनुभव प्रदान करके एक प्रमुख भूमिका निभाते हैं। उदाहरण के लिए, AI शिक्षार्थी की क्षमताओं का विश्लेषण कर सकता है और उसके अनुरूप संसाधन प्रदान कर सकता है, जबकि आभासी और संवर्धित वास्तविकता आभासी विज्ञान प्रयोगशालाओं (Virtual Science Labs) या ऐतिहासिक पुनर्निर्माण जैसे आकर्षक वातावरण का निर्माण करती है।

यह शिक्षार्थी की आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता, समस्या-समाधान, सहयोग, डिजिटल साक्षरता और भावनात्मक बुद्धिमत्ता विकसित करते हैं। कोडिंग, डेटा साक्षरता, डिज़ाइन थिंकिंग और स्थिरता प्रथाओं जैसे भविष्य के लिए तैयार कौशल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। मूल्यांकन भी रटने पर आधारित परीक्षाओं से विकसित होकर योग्यता-आधारित मूल्यांकन में बदल जाता है, जिसमें परियोजनाओं, पोर्टफोलियो, सिमुलेशन और AI-संचालित रीयल-टाइम फीडबैक का उपयोग किया जाता है। छात्र स्थानीय विरासत, समुदाय और भाषा से जुड़े रहते हुए वैश्विक मुद्दों—जलवायु परिवर्तन, प्रौद्योगिकी, सांस्कृतिक विविधता से जुड़ते हैं। पाठ्यक्रम को डेटा विश्लेषण और भविष्य के पूर्वानुमान के माध्यम से निरंतर अद्यतन किया जाता है, जिससे बदलती दुनिया में इसकी प्रासंगिकता सुनिश्चित होती है।

इस मॉडल के गुणों में भविष्य की नौकरियों के साथ बेहतर तालमेल, आजीवन सीखने को प्रोत्साहन और नैतिक एवं वैश्विक रूप से ज़िम्मेदार नागरिकों का पोषण शामिल है। हालाँकि, लागत, डिजिटल असमानता और पारंपरिक प्रणालियों के प्रतिरोध जैसी चुनौतियों का समाधान किया जाना आवश्यक है।

 

पाठ्यक्रम का आवश्यकता मूल्यांकन मॉडल (Need assessment Model of Curriculum)

पाठ्यक्रम का आवश्यकता मूल्यांकन मॉडल

(Need assessment Model of Curriculum)


पाठ्यक्रम विकास में आवश्यकता मूल्यांकन मॉडल मौजूदा शैक्षिक प्रावधानों और वांछित परिणामों के बीच अंतराल की पहचान करने के लिए एक व्यवस्थित, डेटा-संचालित प्रक्रिया है, जो फिर पाठ्यक्रम के डिजाइन या संशोधन का मार्गदर्शन करती है।


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