Tuesday, December 9, 2025

शैक्षिक मनोविज्ञान की विधियाँ (Methods of Educational Psychology)

 शैक्षिक मनोविज्ञान की विधियाँ (Methods of Educational Psychology)



शैक्षिक मनोविज्ञान में विद्यार्थियों के व्यवहार (Behaviour), सीखने की प्रक्रिया (Process of learning) और कक्षा की स्थितियों (Classroom conditions) को वैज्ञानिक ढंग से समझने के लिए कई विधियों का प्रयोग किया जाता है। इन विधियों की सहायता से शिक्षक बालक को समझकर उसके सर्वांगीण विकास के लिए उचित शिक्षण‑व्यवस्था कर सकता है।

प्रमुख विधियाँ (Main Methods): 

  • अंतःदर्शन विधि (Introspective Method)
  • बहिर्निरीक्षण विधि (Extrospection/Observational Method)
  • तुलनात्मक विधि (Comparative Method)
  • मनो-भौतिकी विधि (Psycho-physical Method)
  • मनोविश्लेषण विधि (Psychoanalytic Method)
  • चिकित्सीय  विधि (Clinical Method)
  • प्रायोगिक  विधि (Experimental Method)
  • केस‑स्टडी विधि (Case Study Method)
  • आनुवंशिक या विकासात्मक विधि (Genetic or Developmental Method)
  • परीक्षण या मनोवैज्ञानिक मापन विधि (Test or Psychological Measurement Method)
  • सांख्यिकीय एवं सर्वेक्षण  विधियाँ (Statistical and Survey Methods)



अंतःदर्शन विधि (Introspective Method)



अन्तःदर्शन विधि (Introspection Method) मनोविज्ञान की सबसे प्राचीन और आत्मनिष्ठ (subjective) विधि मानी जाती है, जिसमें व्यक्ति स्वयं अपने मन की क्रियाओं, भावनाओं और विचारों का निरीक्षण और विश्लेषण (Observation & Analysis) करता है। इसे आत्मनिरीक्षण या स्व‑अवलोकन की विधि भी कहा जाता है।

‘अन्तःदर्शन ((Introspection)’ का शाब्दिक अर्थ है – अपने भीतर झाँककर देखना या अपने मन का निरीक्षण करना।

इस विधि में व्यक्ति किसी स्थिति में उत्पन्न हो रही अपनी मानसिक प्रक्रियाओं (Mental Process) (विचार, भाव, कल्पना, निर्णय आदि) को उसी समय भीतर ही भीतर देखकर, समझकर उनका वर्णन करता है।


अपने मस्तिष्क के क्रियाकलापों का क्रमबद्ध ढंग से अध्ययन करना ही अन्तर्दर्शन है।-   स्टाउट
(To introspect is to attend to the working of one's own mind in a systematic way. -  Stout)

प्रक्रिया(Process)- व्यक्ति किसी विशेष अनुभव या क्रिया के समय अपने मन पर ध्यान केन्द्रित करता है और उस क्षण में उत्पन्न हो रहे विचारों, भावनाओं और मानसिक अवस्थाओं (Thoughts, feelings and mental states) का सजग अवलोकन करता है। बाद में वह इन आन्तरिक अनुभवों को शब्दों में व्यक्त करता है; यही वर्णित सामग्री अन्तःदर्शन ((Introspection) के रूप में अध्ययन का आधार बनती है।

इस विधि के दो रूप हैं एक विषयी द्वारा स्वयं अपने व्यवहार का अध्ययन करना और दूसरा अध्ययनकर्ता द्वारा विषयी जिस व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन करना होता है वे उसी व्यक्ति (Subject) से अपने व्यवहार का अध्ययन स्वयं करने को अपने व्यवहार का अध्ययन करने के लिए कहना। 



मुख्य विशेषताएँ (Main Features):


  • प्रेक्षक और अनुभवकर्ता (observer and the experiencer) दोनों वही व्यक्ति होता है, यानी जो अनुभव कर रहा है वही निरीक्षण भी कर रहा है।
  • यह विधि प्रत्यक्ष (direct), तात्कालिक (immediate) और निजी (personal) मानसिक अनुभवों तक पहुँचने का साधन देती है, जिन्हें बाह्य प्रेक्षण (external observation) से देख पाना सम्भव नहीं होता।



गुण (Merits):


  • व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं, कल्पनाओं, संकल्पों (thoughts, feelings, imaginations, resolutions) आदि अत्यन्त सूक्ष्म तथा आन्तरिक मानसिक प्रक्रियाओं को सीधे अनुभव और व्यक्त कर सकता है, जिन्हें बाह्य प्रेक्षण (external observation) से समझना कठिन होता है। इस कारण अन्तःदर्शन विधि (Introspection Method) से मन की आन्तरिक दुनिया की ऐसी जानकारी मिलती है जो अन्य विधियों से प्रायः उपलब्ध नहीं हो पाती।
  • यह विधि व्यक्ति में आत्मनिरीक्षण, आत्म‑चिन्तन और आत्म‑मूल्यांकन (introspection, self-reflection and self-evaluation) की आदत विकसित करती है, जिससे वह अपने गुण‑दोष पहचानकर स्वयं को सुधारने का प्रयास कर सकता है। शिक्षक और विद्यार्थी दोनों के लिए यह आत्म‑समझ, आत्म‑नियंत्रण और व्यक्तित्व विकास (self-understanding, self-control and personality development) का महत्वपूर्ण साधन बन सकती है।
  • अन्तःदर्शन विधि के लिए किसी विशेष यंत्र, प्रयोगशाला या तकनीकी साधन (special instruments, laboratories or technical equipment) की आवश्यकता नहीं होती; व्यक्ति स्वयं अपने अनुभवों का निरीक्षण और वर्णन करता है। इस वजह से यह विधि सरल, समय और धन दोनों की दृष्टि से किफायती तथा व्यावहारिक स्थितियों में आसानी से प्रयोज्य मानी जाती है।
  • इस विधि में निष्कर्ष तत्काल घटित हो रहे प्रत्यक्ष अनुभवों पर आधारित होते हैं, इसलिए व्यक्ति की वर्तमान मानसिक स्थिति का जीवंत चित्र प्राप्त किया जा सकता है। किसी स्थिति में व्यक्ति वास्तव में क्या सोच रहा है या क्या महसूस कर रहा है, यह उसी के कथन से सीधे ज्ञात होता है, मध्यस्थ कम होते हैं।
  • अन्तःदर्शन (Introspection) में वर्तमान क्षण के ‘जैसे घटित हो रहे’ मानसिक अनुभवों का निरीक्षण किया जाता है, बाद की स्मृति पर अधिक निर्भर नहीं रहा जाता।​ विचार, भावना, कल्पना, संकल्प (thought, emotion, imagination and resolution) आदि सूक्ष्म प्रक्रियाएँ प्रत्यक्ष बाह्य प्रेक्षण (direct external observation) से नहीं, बल्कि सीधे व्यक्ति के अंतर्मन (inner) के अवलोकन से जानी जाती हैं।​



दोष (Limitations):


  • इस विधि में व्यक्ति स्वयं ही प्रेक्षक भी है और अध्ययन का विषय भी, इसलिए उसके व्यक्तिगत पूर्वाग्रह, इच्छा‑अनिच्छा और स्व‑रक्षा की प्रवृत्ति (personal biases, desires and self-preservation) परिणामों को प्रभावित कर सकती है। एक ही मानसिक अनुभव के बारे में दो व्यक्तियों के विवरण अलग‑अलग हो सकते हैं, जिससे निष्कर्षों की स्थिरता और सामान्यीकरण कठिन हो जाता है।
  • अनुभव केवल व्यक्ति के कथन पर आधारित होते हैं; इन्हें बाहरी रूप से जाँचना या दोहराकर सत्यापित करना लगभग असंभव होता है, इसलिए विधि की विश्वसनीयता कम मानी जाती है। मापन न तो मानकीकृत होता है और न ही सांख्यिकीय रूप से नियंत्रित, इस कारण यह आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान की कसौटी पर पूर्णतः खरा नहीं उतरता।
  • छोटे बच्चों, मानसिक रूप से अविकसित, असामान्य अथवा अशिक्षित व्यक्तियों (young children, mentally retarded, abnormal, or uneducated individuals) से सही अन्तःदर्शन कराना लगभग असंभव होता है, क्योंकि वे अपने आन्तरिक अनुभवों को भाषा में ठीक से व्यक्त नहीं कर पाते। जिन व्यक्तियों में आत्म‑चिन्तन की क्षमता या ईमानदारी कम है, उनके द्वारा दी गई आत्म‑रिपोर्ट व्यवहार की वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाती।
  • जिस समय व्यक्ति किसी मानसिक क्रिया में लीन होता है, उसी क्षण उस पर सजग ध्यान केन्द्रित करके उसका वर्णन करने से मूल प्रक्रिया टूट जाती है या उसका स्वरूप बदल जाता है। परिणामतः जो अनुभव बाद में बताया जाता है, वह अक्सर अपूर्ण या परिवर्तित रूप होता है, न कि वास्तविक और प्राकृतिक मानसिक प्रवाह।
  • अन्तःदर्शन केवल चेतन अनुभवों पर लागू होता है; अचेतन या अर्ध‑चेतन मानसिक प्रक्रियाएँ (दबी इच्छाएँ, गहरे संवेग आदि) इस विधि से उपलब्ध नहीं हो पातीं। आधुनिक मनोविज्ञान में जहाँ अचेतन की भूमिका महत्त्वपूर्ण मानी जाती है, वहाँ यह विधि अपनी सीमा में बँधी प्रतीत होती है।



बहिर्निरीक्षण /निरीक्षण विधि (Extrospection /Observation Method)


बहिर्निरीक्षण विधि (Extrospection Method) (जिसे निरीक्षण या Observation Method भी कहा जाता है) में किसी अन्य व्यक्ति के बाह्य (visible) व्यवहार का व्यवस्थित अवलोकन करके उसकी मानसिक अवस्था और व्यक्तित्व के बारे में निष्कर्ष निकाले जाते हैं। यह अन्तःदर्शन के विपरीत बाहरी व्यवहार पर आधारित वस्तुनिष्ठ विधि (objective method) मानी जाती है।
‘बहिर्निरीक्षण’ का शाब्दिक अर्थ है – बाहर की चीजों को देखकर उनका निरीक्षण करना; अर्थात किसी व्यक्ति या समूह के बाह्य व्यवहार को देखकर अध्ययन करना।
जैसे किसी बच्चे के बोलने, खेलने, झगड़ने, सहयोग करने, ध्यान देने (speaking, playing, fighting, cooperation, attention) आदि व्यवहारों को देखकर उसकी रुचि, स्वभाव, अनुशासन, समायोजन आदि के बारे में अनुमान लगाना।
कॉलेसनिक (Kolesnik) के अनुसार यह निरीक्षण दो रूपों में किया जाता है- औपचारिक (Formal) रूप में और अनौपचारिक (Informal) रूप में।
 
औपचारिक निरीक्षण (Formal Observation) - औपचारिक निरीक्षण उस निरीक्षण को कहते हैं जिसमें निरीक्षणकर्ता विषयी (Subject) के व्यवहार का निरीक्षण नियन्त्रित परिस्थितियों (Controlled Situations) में योजनावद्ध तरीके से करता है। इस प्रकार के निरीक्षण में विषयी को यह जानकारी रहती है कि उसके व्यवहार का निरीक्षण किया जा रहा है एवं निरीक्षण के लिए किसी निरीक्षण अनुसूची (Observation Schedule) का प्रयोग करते हैं।

अनौपचारिक निरीक्षण (Informal Observation)- अनौपचारिक निरीक्षण उस निरीक्षण को कहते हैं जिसमें निरीक्षणकर्त्ता विषयी के व्यवहार का निरीक्षण बिना निर्धारित योजना के अनियन्त्रित परिस्थितियों (Controlled Situations) में करता है। इस प्रकार के निरीक्षण में विषयी को यह जानकारी नहीं होती कि उसके व्यवहार का निरीक्षण किया जा रहा है। उस स्थिति में विषयी स्वाभाविक व्यवहार (Natural Behaviour) करता है; उसके द्वारा कृत्रिम व्यवहार करने का प्रश्न ही नहीं उठता। 


मुख्य विशेषताएँ  (Key Features): 


  • इस विधि में व्यक्ति के केवल बाह्य, प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने वाले व्यवहार (क्रियाएँ, हाव‑भाव, बोल‑चाल, चेहरे की भाव‑भंगिमा आदि) का निरीक्षण किया जाता है। 
  • अन्तःदर्शन के विपरीत, बहिर्निरीक्षण में प्रेक्षक (observer) और जिसका अध्ययन किया जा रहा है (observed) अलग‑अलग व्यक्ति होते हैं। प्रेक्षक स्वयं अनुभव का केन्द्र नहीं होता, वह केवल दूसरों के व्यवहार को देखकर तटस्थ रूप से लिखित रूप में दर्ज करता है।
  • बहिर्निरीक्षण विधि (Extrospection Method) का प्रयोग स्वाभाविक परिस्थितियों (कक्षा, घर, खेल का मैदान आदि) में भी किया जाता है और प्रयोगशाला या योजनाबद्ध (controlled) परिस्थितियों में भी। 


गुण (Merits): 


  • यह विधि बाह्य, प्रत्यक्ष रूप से देखे जा सकने वाले व्यवहार पर आधारित होने के कारण अपेक्षाकृत अधिक वस्तुनिष्ठ (objective) मानी जाती है; निष्कर्ष केवल दिखाई देने वाले तथ्यों पर टिके होते हैं, न कि व्यक्ति की आत्म‑रिपोर्ट पर। एक ही व्यवहार को एक से अधिक प्रेक्षक देख और दर्ज कर सकते हैं, जिससे निष्कर्षों की विश्वसनीयता और वैधता बढ़ जाती है।
  • शिशु, छोटे बच्चे, अशिक्षित, मूक‑बधिर, मानसिक रूप से अविकसित या असामान्य व्यक्तियों (infants, young children, illiterates, deaf-mute, mentally retarded, or abnormal individuals) का भी अध्ययन इस विधि से सम्भव है, क्योंकि यहाँ केवल उनके व्यवहार को देखना और नोट करना होता है। भाषा‑अभाव, अभिव्यक्ति‑कौशल की कमी या आत्म‑रिपोर्ट देने की अक्षमता इस विधि के प्रयोग में बाधा नहीं बनती।
  • स्वाभाविक परिस्थितियों (कक्षा, घर, खेल का मैदान, सह‑शैक्षिक गतिविधियाँ) में निरीक्षण करने पर बालक के सामान्य, वास्तविक और रोजमर्रा के व्यवहार का सजीव चित्र प्राप्त होता है। एक ही बालक के बार‑बार निरीक्षण से उसके व्यवहार के पैटर्न, आदतें, सामाजिक सम्बन्ध, नेतृत्व, अनुशासन (patterns, habits, social relationships, leadership, discipline) आदि के बारे में व्यापक जानकारी मिलती है।
  • शिक्षक कक्षा‑व्यवस्थापन, अनुशासन, समूह‑निर्माण, भिन्न‑भिन्न क्षमताओं वाले विद्यार्थियों की पहचान (classroom management, discipline, group formation, identification of students with different abilities)  तथा समस्या‑ग्रस्त/प्रतिभाशाली बालकों के चयन (selection of problem-prone/talented children) में इस विधि से बहुत लाभ उठा सकता है। निरीक्षण के आधार पर शिक्षक शिक्षण‑रणनीतियों, अनुशासन‑नीति, मार्गदर्शन एवं परामर्श (teaching strategies, disciplinary policies, guidance and counseling) आदि में आवश्यक परिवर्तन कर सकता है, जिससे शिक्षण अधिक प्रभावी बनता है।
  • बहिर्निरीक्षण से प्राप्त सूचनाएँ परीक्षण, केस‑स्टडी, क्लिनिकल या प्रायोगिक विधि से प्राप्त आंकड़ों की पुष्टि और व्याख्या में सहायक होती हैं। इस प्रकार यह विधि अकेले भी उपयोगी है और अन्य अनुसंधान‑विधियों की विश्वसनीयता बढ़ाने वाली सहायक विधि के रूप में भी महत्त्व रखती है।


दोष (Limitations):


  • प्रेक्षक प्रायः अपने पूर्व अनुभव, धारणाओं और पसंद‑नापसंद (prior experiences, perceptions and likes and dislikes) के आधार पर व्यवहार की व्याख्या करता है, जिससे निष्कर्ष पक्षपाती हो सकते हैं। किसी बच्चे को पहले से “शरारती” मानने वाला शिक्षक उसी के प्रत्येक व्यवहार को नकारात्मक अर्थ में ले सकता है, भले ही वह सामान्य हो।
  • एक ही बाह्य व्यवहार (जैसे चुप रहना, हँसना, जोर से बोलना) के पीछे अनेक मानसिक कारण हो सकते हैं; केवल देखकर सही मानसिक स्थिति बताना हमेशा सम्भव नहीं। इस कारण निकाले गए निष्कर्ष वास्तविक मानसिक दशा से भटक सकते हैं और गलत निर्णय का आधार बन सकते हैं।
  • औपचारिक निरीक्षण (formal observation) में जब व्यक्ति को पता चल जाता है कि उसका अवलोकन हो रहा है, तो वह अपना स्वाभाविक व्यवहार बदलकर बनावटी या आदर्श जैसा व्यवहार दिखा सकता है। इस स्थिति में प्रेक्षक जो नोट करता है वह ‘प्रदर्शित’ व्यवहार होता है, वास्तविक स्वभाव और सामान्य व्यवहार नहीं।
  • एक साथ देखना, सुनना, नोट करना, संकेतों की व्याख्या करना (watching, listening, noting and interpreting signals) आदि कई कार्य करने पड़ते हैं; थोड़ी‑सी चूक से महत्वपूर्ण व्यवहार छूट सकते हैं। यदि प्रेक्षक (observer) पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित, सजग और अनुशासित न हो तो अवलोकन में स्वाभाविक त्रुटियाँ हो जाती हैं, जिससे परिणाम अविश्वसनीय हो सकते हैं।
  • यह विधि केवल बाह्य क्रियाओं को देखती है; विचार, कल्पना, संकल्प, दबी इच्छाएँ  (thoughts, imagination, resolutions and suppressed desires) जैसी आन्तरिक मानसिक प्रक्रियाएँ प्रत्यक्ष रूप से दिखाई नहीं देतीं। अतः केवल निरीक्षण पर निर्भर रहकर व्यक्तित्व का सम्पूर्ण और गहन चित्र प्राप्त करना कठिन होता है; अन्य विधियों की भी सहायता लेनी पड़ती है।



तुलनात्मक विधि (Comparative Method)



तुलनात्मक विधि (Comparative Method) में दो या दो से अधिक वस्तुओं, व्यक्तियों, स्थितियों, समूहों या घटनाओं की व्यवस्थित तुलना करके उनके बीच समानता‑असमानता ज्ञात की जाती है। यह विधि सामाजिक विज्ञानों, शिक्षा, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र आदि में शोध‑अभिकल्पना (research design)  के रूप में व्यापक रूप से प्रयुक्त होती है।

  • तुलनात्मक विधि (Comparative Method) वह शोध‑विधि है जिसमें विभिन्न मामलों/संस्थाओं/घटनाओं (cases/institutions/events) का समान मानदण्डों पर समानांतर अध्ययन किया जाता है ताकि उनके गुण‑दोष, विशेषताएँ, अंतर और समानताएँ स्पष्ट हों।
  • इसका उद्देश्य केवल यह बताना नहीं होता कि क्या समान या भिन्न है, बल्कि इन समानताओं‑भिन्नताओं के कारणों और परिणामों की भी व्याख्या करना होता है।


मुख्य विशेषताएँ (Main Features):

  • इसमें दो या अधिक इकाइयों (जैसे दो शिक्षा‑प्रणालियाँ, दो पाठ्यक्रम, दो शिक्षण‑पद्धतियाँ, दो समूहों के उपलब्धि‑अंक आदि) का एक ही समय में या समान ढाँचे के भीतर विश्लेषण किया जाता है।
  • तुलना के लिए पहले स्पष्ट मानदण्ड (variables) निर्धारित किए जाते हैं; जैसे – उपलब्धि, रुचि, दृष्टिकोण, ड्रॉप‑आउट दर, अनुशासन, मूल्य‑मान्यताएँ (achievement, interest, attitude, drop-out rate, discipline, values) आदि, ताकि तुलना वैज्ञानिक और तटस्थ रहे।



तुलनात्मक विधि के मुख्य चरण (Main Steps of the Comparative Method):


  • समस्या और उद्देश्य का निर्धारण (Determining the Problem and Objective): सबसे पहले शोध‑समस्या स्पष्ट की जाती है, जैसे – “परंपरागत व्याख्यान पद्धति और गतिविधि‑आधारित पद्धति की उपलब्धि में क्या अन्तर है?” अध्ययन का उद्देश्य तय किया जाता है: किस आधार पर तुलना करनी है (उपलब्धि, रुचि, दृष्टिकोण आदि)।
  • तुलना योग्य इकाइयों का चयन (Selection of Comparable Units): दो या अधिक समूह/संस्थाएँ/परिस्थितियाँ चुनी जाती हैं जो मोटे तौर पर तुलनीय हों (जैसे एक ही कक्षा स्तर, समान सामाजिक‑आर्थिक पृष्ठभूमि, समान विषय आदि)। यह ध्यान रखा जाता है कि असम्बद्ध भिन्नताएँ (जैसे बहुत अलग पाठ्यचर्या, भाषा, संसाधन) तुलना को भ्रामक न बना दें।
  • मानदण्डों और सूचकों का निर्धारण (Determining Variables and Indicators): किन‑किन बिन्दुओं पर तुलना करनी है, यह पहले से तय किया जाता है, जैसे – परीक्षा‑अंक, उपस्थिति, रुचि‑स्केल स्कोर, आत्म‑विश्वास, अनुशासन, ड्रॉप‑आउट आदि। प्रत्येक मानदण्ड के लिए उपयुक्त माप‑उपकरण (टेस्ट, स्केल, प्रश्नावली, चेक‑लिस्ट, प्रेक्षण‑सूची आदि) निश्चित किए जाते हैं।
  • डेटा  का संग्रह (Collection of Data): चुनी गई इकाइयों से नियोजित साधनों के माध्यम से डेटा एकत्र किया जाता है; उदाहरण के लिए दोनों समूहों को समान उपलब्धि‑परीक्षा देना। आवश्यक हो तो पूर्व‑परीक्षा (pre‑test) और पश्च‑परीक्षा (post‑test) दोनों से आँकड़े लिए जाते हैं, ताकि वास्तविक अन्तर स्पष्ट हो सके।
  • तुलना एवं विश्लेषण (Comparison and Analysis):  प्राप्त अंकों/तथ्यों को सारणीबद्ध (tabulated) करके दोनों या अधिक समूहों के बीच समानता‑असमानता (similarities or differences) देखी जाती है। औसत, प्रतिशत, मानक विचलन (averages, percentages, standard deviations), ‘t‑test’ आदि सांख्यिकीय तकनीकों की सहायता से यह विश्लेषण किया जाता है कि पाया गया अन्तर महत्वपूर्ण है या केवल संयोगवश है।
  • निष्कर्ष और सामान्यीकरण (Conclusions and Generalizations): तुलना के परिणामों से यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि कौन‑सी पद्धति/कार्यक्रम/नीति अधिक प्रभावी है या किन परिस्थितियों में कौन‑सा विकल्प बेहतर है। सम्भव हो तो इन निष्कर्षों को सीमित सीमा में सामान्यीकृत करके व्यावहारिक सुझाव दिए जाते हैं (जैसे – “गतिविधि‑आधारित पद्धति ग्रामीण उच्च प्राथमिक स्तर पर गणित के लिए अधिक प्रभावी पाई गई”)।




गुण (Merits): 


  • यह विधि शोधकर्ता को एक ही घटना/समस्या को विभिन्न संदर्भों, समूहों या प्रणालियों में देखकर समझने का अवसर देती है, जिससे दृष्टि अधिक व्यापक और गहरी बनती है। समानता‑असमानता तथा उनके कारणों का विश्लेषण करके विषय के स्वरूप, सीमा और जटिलताओं (nature, extent and complexities) को अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है।
  • दो या अधिक शिक्षण‑पद्धतियों, कार्यक्रमों, शिक्षा‑प्रणालियों या नीतियों  (teaching methods, programs, education systems or policies) की तुलना करके उनकी सापेक्षिक उपयोगिता, प्रभावशीलता और सीमाएँ (relative usefulness, effectiveness and limitations) सामने आती हैं, जो व्यावहारिक निर्णय (policy decisions) के लिए आधार बनती हैं। इससे किसी विशेष पद्धति/नीति को अपनाने, संशोधित करने या छोड़ने के लिए प्रमाण‑आधारित तर्क मिलते हैं, इसलिए यह शिक्षा‑सुधार और नवाचार के लिए उपयोगी है।
  • विभिन्न संदर्भों में एक जैसी प्रवृत्तियाँ या सम्बन्ध दिखने पर शोधकर्ता अधिक विश्वसनीय सामान्यीकरण कर सकता है। तुलनात्मक निष्कर्षों के आधार पर व्यापक सिद्धांत, मॉडल या प्रवृत्तियाँ निर्मित की जा सकती हैं, जो केवल एक ही संदर्भ पर आधारित शोध से संभव नहीं होतीं।
  • केवल अपने देश/संस्था/समूह तक सीमित रहने की बजाय अन्य इकाइयों से तुलना करने पर स्थानीय धारणाओं और पूर्वाग्रहों की सीमाएँ सामने आती हैं, जिससे अधिक आलोचनात्मक और वस्तुनिष्ठ दृष्टि (more critical and objective view) विकसित होती है। इस प्रक्रिया में शोधकर्ता अपने संदर्भ की शक्तियों और कमजोरियों दोनों को अधिक निष्पक्षता से देख पाता है, जो आत्म‑सुधार का आधार बनती है।
  • कक्षा‑स्तर पर शिक्षक यदि दो‑तीन शिक्षण‑रणनीतियों, मूल्यांकन‑प्रणालियों या सामग्री‑उपयोग (teaching strategies, assessment systems or material) की तुलना करता है, तो उसे यह समझने में मदद मिलती है कि उसके विद्यार्थियों के लिए कौन‑सा विकल्प अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी है। इससे शिक्षण‑कार्य अधिक तर्कसंगत, प्रमाण‑आधारित और लचीला (more rational, evidence-based and flexible) बनता है।



दोष (Limitations): 


  • जिन दो या अधिक इकाइयों की तुलना की जाती है, वे दिखाई तो समान देती हैं, पर सामाजिक‑सांस्कृतिक, आर्थिक, प्रशासनिक या ऐतिहासिक दृष्टि (socio-cultural, economic, administrative, or historical perspective) से बहुत भिन्न हो सकती हैं; ऐसे में तुलना भ्रामक निष्कर्ष दे सकती है। यदि संदर्भों का समुचित मिलान न हो (जैसे बहुत अलग पाठ्यचर्या, संसाधन, भाषा, परीक्षा‑प्रणाली), तो प्राप्त अन्तर वास्तव में उन पृष्ठभूमि‑भेदों के कारण हो सकते हैं, न कि अध्ययन किए जा रहे कारक के कारण।
  • विभिन्न देशों/संस्थाओं/समूहों से प्राप्त आँकड़े प्रायः अलग‑अलग परिभाषाओं, वर्गीकरणों, मापन‑पद्धतियों और सूचकों (different definitions, classifications, measurement methods, and indicators) पर आधारित होते हैं; इन्हें सीधे तुलना योग्य बनाना कठिन होता है। यदि प्रयुक्त संकल्पनाएँ और मापन‑मानदण्ड (concepts and measurement criteria)  समान न हों, तो तुलनात्मक निष्कर्षों की विश्वसनीयता और वैधता (reliability and validity)  संदिग्ध हो जाती है।
  • तुलनात्मक अध्ययन में एक से अधिक इकाइयों की पृष्ठभूमि, संरचना, नीतियों, प्रक्रियाओं (background, structure, policies, processes) आदि का विस्तार से वर्णन और विश्लेषण करना पड़ता है; इससे शोध अत्यधिक व्यापक और जटिल हो जाता है। विभिन्न स्रोतों से सामग्री जुटाने, उसे समरूप बनाने, और फिर विश्लेषण करने में बहुत समय, श्रम और संसाधन लगते हैं; प्रारम्भिक शोधकर्ताओं के लिए यह व्यावहारिक रूप से कठिन हो सकता है।
  • तुलनात्मक विधि मुख्यतः सहसंबंधी (correlational) प्रकृति की होती है; यह दिखा सकती है कि दो इकाइयों में क्या समान/भिन्न है, पर सीधे‑सीधे कारण‑कार्य सम्बन्ध सिद्ध करना कठिन होता है। अनेक बाह्य चर (extraneous variables) जैसे संस्कृति, राजनीति, अर्थ‑व्यवस्था, नेतृत्व‑शैली (culture, politics, economy, leadership style) आदि साथ‑साथ प्रभाव डालते हैं, जिन्हें पूरी तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता; इससे “किस कारण से फर्क पड़ा” यह साफ‑साफ बताना मुश्किल होता है।
  • तुलनात्मक निष्कर्षों की व्याख्या में शोधकर्ता के अपने वैचारिक, सांस्कृतिक या वैल्यू‑बायस (ideological, cultural, or value biases) का प्रभाव पड़ सकता है; वह अपने संदर्भ को मानक मानकर दूसरों को कमतर/उत्तम साबित करने की ओर झुक सकता है। यदि शोधकर्ता उस बाह्य संदर्भ से पर्याप्त रूप से परिचित न हो, तो सतही समानताओं या सूचनाओं के आधार पर गलत सामान्यीकरण या रूढ़ धारणाएँ (inaccurate generalizations or stereotypes)  बन सकती हैं।


मनो-भौतिकी विधि (Psycho-physical Method)




मनो‑भौतिकी विधि (Psycho‑physical / Psychophysics Method) संवेदना और प्रत्यक्षण (sensation and perception)  के अध्ययन की एक विशिष्ट वैज्ञानिक विधि है। इसमें बाह्य भौतिक उद्दीपक (जैसे रोशनी, ध्वनि, भार, स्वाद आदि) और उनसे उत्पन्न होने वाले मनोवैज्ञानिक अनुभव (संवेदना‑प्रत्यक्षण) के बीच मात्रात्मक सम्बन्ध (quantitative relationship) खोजा जाता है।
मनुष्य का व्यवहार उसकी शारीरिक एवं मानसिक आवश्यकताओं और भौतिक जगत में उपस्थित विभिन्न उद्दीपकों (Stimuli) द्वारा प्रभावित होता है। मनोवैज्ञानिक जिन विधियों द्वारा मनुष्य के शरीर और मन की अन्तर्निर्भरता के क्रियात्मक सम्बन्धों और उनके ऊपर विभिन्न उद्दीपकों के प्रभाव का अध्ययन करते हैं, उन्हें मनोभौतिकी विधि (Psychophysics Method) कहते हैं। इस विधि में शोधकर्ता उद्दीपक के स्तर (Levels of stimulus) तथा उनसे व्यक्ति में होने वाली अनुभूतियों (Experiences) के बीच मात्रात्मक सम्बन्धों का अध्ययन करता है। ‘Psychophysics’ शब्द जर्मन वैज्ञानिक गुस्ताव थियोडोर फेकनर (Fechner, 1860) ने गढ़ा, जिन्होंने वैबर (Weber) के कार्य पर आगे बढ़ते हुए उद्दीपक की तीव्रता और संवेदना की तीव्रता के बीच गणितीय सम्बन्ध प्रस्तावित किया।

वैबर ने “Just Noticeable Difference (JND)” की संकल्पना दी और दिखाया कि दो भारों/रोशनी/ध्वनियों के बीच पहचानने योग्य न्यूनतम अंतर, मूल उद्दीपक के एक नियत अनुपात के बराबर होता है (Weber’s law)।


  • मनो‑भौतिकी उस विधि/शाखा को कहा जाता है जो किसी उद्दीपक के भौतिक गुणों (तीव्रता, अवधि, आवृत्ति, भार, ताप आदि) और व्यक्ति के मनोवैज्ञानिक अनुभव (संवेदना, प्रत्यक्षण, JND आदि) के बीच संबंध को मापती है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य यह जानना है कि बाह्य उद्दीपक की तीव्रता में कितने परिवर्तन पर व्यक्ति “कुछ महसूस करना शुरू करता है” (निरपेक्ष देहली absolute threshold) या “दो उद्दीपकों के बीच न्यूनतम अंतर पहचान पाता है” (भेद देहली difference threshold) तथा इस संबंध को गणितीय रूप में व्यक्त करना (to express this relationship mathematically)


गुण (Merits): 



  • मनो‑भौतिकी में उद्दीपक की तीव्रता (जैसे रोशनी, ध्वनि, भार) और संवेदना/प्रत्यक्षण (sensation/perception) के बीच संबंध को मात्रात्मक रूप से मापा जाता है, जिससे बहुत सूक्ष्म अंतर भी विश्वसनीय ढंग से पकड़ में आ जाते हैं।​ देहली (निरपेक्ष सीमा, भेद सीमा) thresholds (absolute threshold, difference threshold) के मापन के लिए मानकीकृत प्रक्रियाएँ और गणितीय नियम (जैसे वैबर‑फैकनर सिद्धांत) उपयोग में आते हैं, जिससे निष्कर्षों की परिशुद्धता और वैज्ञानिकता  (precision and scientific validity) बढ़ती है।​
  • यह विधि सीधे‑सीधे दिखाती है कि बाह्य भौतिक परिवर्तन (उद्दीपक की तीव्रता में वृद्धि/कमी) व्यक्ति के अनुभव में किस अनुपात से परिवर्तन उत्पन्न करते हैं, अर्थात “कितना बाह्य परिवर्तन = कितना आंतरिक अनुभव परिवर्तन” ("how much external change = how much internal experience change)।​ इससे संवेदना और प्रत्यक्षण की प्रकृति, देहली‑स्तर, संवेदनशीलता और अनुकूलन (sensation and perception, threshold levels, sensitivity and processes) जैसी प्रक्रियाएँ अधिक स्पष्ट रूप से समझी जा सकती हैं।​
  • मनो‑भौतिकी के निष्कर्षों का उपयोग प्रकाश व्यवस्था, ध्वनि‑स्तर, अक्षर‑आकार, कॉन्ट्रास्ट, संकेत‑पटों, अलार्म, उपकरण‑डिज़ाइन (optimize lighting, sound levels, font size, contrast, signage, alarms, equipment design0 आदि को मानव‑अनुकूल बनाने में किया जाता है, जो शिक्षण‑सामग्री तथा कक्षा‑पर्यावरण डिज़ाइन में भी सहायक है।​ संवेदनशीलता में आयु, थकान, रोग, दवाओं, प्रशिक्षण (age, fatigue, disease, medications, training) इत्यादि के प्रभावों को मापकर क्लिनिकल, औद्योगिक, ट्रैफिक‑सेफ़्टी, स्पोर्ट्स तथा शैक्षिक सेटिंग्स (clinical, industrial, traffic safety, sports, and educational settings) में व्यावहारिक निर्णय लिए जा सकते हैं।​
  • मनो‑भौतिकी की क्लासिकल विधियाँ (सीमा विधि, सतत उद्दीपक विधि, समायोजन विधि method of limits, method of constant stimuli, method of adjustment) नियंत्रित प्रयोगात्मक परिस्थितियों में चलती हैं, जिससे बाहरी बाधक चर (noise, distraction आदि) को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।​ नियंत्रित सेट‑अप और पुनरावृत्ति (replication) की सुविधा के कारण परिणामों की विश्वसनीयता जाँचने और अलग‑अलग व्यक्तियों/समूहों की तुलना करने में सुविधा रहती है।​


दोष (Limitations): 


  • मनो‑भौतिकी के अधिकांश प्रयोग अत्यधिक नियंत्रित, प्रयोगशाला‑आधारित सेट‑अप (highly controlled, laboratory-based setup) में किए जाते हैं; वास्तविक जीवन की जटिल, परिवर्तित होती परिस्थितियाँ वहाँ उपस्थित नहीं रहतीं।​  परिणामस्वरूप प्राप्त देहली‑स्तर (thresholds) को सीधे‑सीधे दैनिक स्थितियों (कक्षा, सड़क, बाज़ार, उद्योग आदि) पर लागू करना हमेशा उपयुक्त नहीं होता; बाह्य वैधता सीमित रहती है।​
  • यह विधि मुख्यतः इंद्रिय‑संवेदना और प्रत्यक्षण (sensory perception and the initial levels of sensation)  के प्रारम्भिक स्तरों (जैसे रोशनी, ध्वनि, भार) पर केंद्रित रहती है; जटिल संज्ञानात्मक प्रक्रियाएँ, भावनाएँ, प्रेरणा, अर्थ‑निर्माण (complex cognitive processes, emotions, motivation, meaning-making) आदि इसके दायरे से बाहर रह जाते हैं।​ इसलिए मनुष्य के समग्र मनोवैज्ञानिक व्यवहार (जैसे निर्णय‑निर्माण, सामाजिक व्यवहार, कक्षा‑सीखना) की व्याख्या केवल मनो‑भौतिकीय आँकड़ों से करना संभव नहीं है।​
  • देहली‑स्तर थकान, ध्यान, अभ्यास, प्रेरणा, दवाओं, उम्र, स्वास्थ्य (Thresholds vary with fatigue, attention, practice, motivation, medication, age, health) आदि से बदलते रहते हैं; एक ही व्यक्ति के अलग‑अलग समय के परिणाम भी भिन्न हो सकते हैं।​ यदि इन सभी स्थितिगत कारकों को ठीक से नियंत्रित या रिकॉर्ड न किया जाए, तो मापी गई देहली उस व्यक्ति की स्थायी संवेदनशीलता का सही प्रतिनिधित्व नहीं कर पाती।​
  • सतत उद्दीपक विधि (constant stimuli), सीमा विधि आदि में बहुत अधिक ट्रायल, सूक्ष्म उपकरण, सटीक नियंत्रण और कई बार विषय के सहयोग की लम्बी अवधि (large number of trials, sophisticated equipment, precise control, and often a long period of subject cooperation) की आवश्यकता होती है।​  बड़े नमूने (large samples) पर काम करना कठिन और महँगा हो जाता है, इसलिए प्रायः छोटे नमूनों पर अध्ययन किए जाते हैं, जिससे निष्कर्षों के सामान्यीकरण की सीमा और बढ़ जाती है।​
  • यद्यपि उद्दीपक की तीव्रता वस्तुनिष्ठ रूप से नियंत्रित की जाती है, फिर भी “हाँ/नहीं”, “महसूस हुआ/नहीं हुआ”, “समान/भिन्न” जैसी प्रतिक्रियाएँ विषय के निर्णय‑मानदण्ड, सावधानी या अनुमान‑व्यवहार से प्रभावित हो सकती हैं।​ कुछ व्यक्ति ‘सुरक्षित’ रहने के लिए कम ही “हाँ” कहते हैं, कुछ अधिक; इस निर्णय‑मानदण्ड (response bias) के कारण वास्तविक संवेदनशीलता और प्रतिक्रिया‑शैली का मिश्रित प्रभाव मिलता है, जिसे अलग‑अलग करना सरल नहीं होता।



मनोविश्लेषण विधि (Psychoanalytic Method) 



मनोविश्लेषण विधि (Psychoanalytic Method) मुख्यतः सिग्मंड फ्रायड (Sigmund Freud) द्वारा विकसित वह चिकित्सीय‑अनुसंधानात्मक पद्धति है, जिसके माध्यम से व्यक्ति के अचेतन मन, दमित इच्छाओं तथा बचपन के अनुभवों (unconscious mind, repressed desires, and childhood experiences) का विश्लेषण करके उसके वर्तमान व्यवहार और मानसिक समस्याओं को समझने और बदलने का प्रयास किया जाता है।​

  • मनोविश्लेषण विधि वह प्रक्रिया है जिसमें रोगी/व्यक्ति को बोलने, याद करने, सपनों और कल्पनाओं (speak, recall memories and express dreams and imaginations) को व्यक्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, ताकि उसके अचेतन में दबे संघर्ष, इच्छाएँ और भावनाएँ (conflicts, desires and emotions) सामने आ सकें।​
  • इसका मुख्य उद्देश्य छिपी हुई (अवचेतन) मानसिक शक्तियों को सचेत स्तर पर लाना, उनके बारे में अंतर्दृष्टि विकसित करना और इस प्रकार मानसिक तनाव, न्यूरोटिक लक्षण, फोबिया (reduce mental stress, neurotic symptoms, phobias) आदि को कम करना है।​

प्रमुख विचार: 

  • फ्रायड के अनुसार मानव व्यक्तित्व चेतन, अचेतन तथा पूर्व‑चेतन (conscious, unconscious and preconscious) स्तरों पर कार्य करता है; अचेतन में दमित काम‑इच्छाएँ, आक्रामक भाव, दबी स्मृतियाँ (repressed sexual desires, aggressive impulses, suppressed memories) आदि संग्रहित रहती हैं, जो व्यवहार को अप्रत्यक्ष रूप से संचालित करती हैं।​
  • इड (Id), इगो (Ego) और सुपरइगो (Superego) के बीच संघर्ष तथा बचपन के अनुभव (विशेषकर परिवार, माता‑पिता से सम्बन्ध) व्यक्ति के व्यक्तित्व‑निर्माण और मानसिक विकार (mental disorders) दोनों में निर्णायक माने जाते हैं।

प्रमुख तकनीकें (Main Techniques):

  • फ्री एसोसिएशन (Free Association): रोगी को बिना रोक‑टोक जो भी बात मन में आये, वैसा ही बोलने के लिए कहा जाता है, ताकि उसके कथनों के बीच से दबी हुई इच्छाएँ और संघर्ष प्रकट हो सकें।​
  • स्वप्न‑विश्लेषण (Dream Analysis): सपनों को इच्छा‑पूर्ति का रूप मानते हुए, उनमें प्रयुक्त प्रतीकों (symbols) और घटनाओं की व्याख्या की जाती है, जिससे अचेतन सामग्री का पता लगता है।​
  • ट्रांसफ़रेंस / प्रत्यारोपण (Transference): रोगी अपने जीवन की महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों (जैसे माता‑पिता) से जुड़ी भावनाएँ चिकित्सक पर स्थानान्तरित करता है; इन प्रतिक्रियाओं का विश्लेषण करके उसके गहरे सम्बन्ध‑संघर्ष समझे जाते हैं।


मनोविश्लेषणात्मक विधि के चरण (Steps of Psychoanalytic Method):-



  • प्रारम्भिक चरण: समस्या‑समझ और विश्वास स्थापना (Initial Phase: Problem Understanding and Trust Building):  सबसे पहले चिकित्सक/परामर्शदाता रोगी से प्रारम्भिक साक्षात्कार (initial interview) करता है, पारिवारिक‑पृष्ठभूमि, जीवन‑इतिहास, वर्तमान कठिनाइयों (background, life history, current difficulties) आदि की जानकारी लेता है और लक्ष्य स्पष्ट करता है। फिर नियमित सत्रों के माध्यम से विश्वास, गोपनीयता और सुरक्षा‑बोध (trust, confidentiality and security) का वातावरण बनाया जाता है, ताकि रोगी खुलकर अपने विचार, भावनाएँ और अनुभव व्यक्त कर सके।

  • अन्वेषण चरण: फ्री एसोसिएशन और सामग्री संग्रह (Exploration Phase: Free Association and Material Collection):  इस चरण में रोगी को “मुक्त सहचारी” (Free Association) के लिए प्रोत्साहित किया जाता है – जो भी बात, स्मृति, कल्पना, सपना, घटना (thoughts, memories, fantasies, dreams, or events) मन में आये, बिना सेंसर के कहने के लिए कहा जाता है। इसी के साथ‑साथ स्वप्न‑वर्णन, दैनिक घटनाएँ, बचपन की यादें, कल्पनाएँ, भय, अपराध‑भाव (dreams, daily events, childhood memories, fantasies, fears, guilt) आदि का विस्तृत वर्णन लिया जाता है; यही विश्लेषण की मूल सामग्री (raw material) बनती है।

  • विश्लेषण चरण: अचेतन सामग्री का अनावरण (Analysis Phase: Uncovering Unconscious Material):  एकत्र सामग्री में आवर्ती थीम, प्रतीक, चूक (slips), मज़ाक, विरोधाभास, भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ (recurring themes, symbols, slips of the tongue, jokes, contradictions, and emotional reactions) आदि को पहचानकर चिकित्सक अचेतन इच्छाओं, संघर्षों, दबी यादों और रक्षा‑तंत्रों (unconscious desires, conflicts, repressed memories, and defense mechanisms)  की पहचान करता है। इस चरण में स्वप्न‑विश्लेषण, फ्री‑एसोसिएशन की व्याख्या, ट्रांसफ़रेंस (रोगी की भावनाओं का चिकित्सक पर आरोपण) और प्रतिरोध (थैरपी से बचने की सूक्ष्म प्रवृत्तियाँ) की गहरी व्याख्या की जाती है।
  • अंतर्दृष्टि (Insight) और पुनर्गठन चरण (Insight and Restructuring Phase): धीरे‑धीरे रोगी को यह समझने में मदद दी जाती है कि वर्तमान लक्षण (भय, चिंता, आक्रोश, दोष‑भाव आदि) उसके बचपन के अनुभवों, रिश्तों और दमित इच्छाओं से कैसे जुड़े हैं। इस बोध (insight) के साथ‑साथ रोगी को अधिक यथार्थवादी दृष्टि, स्वीकार्यता और परिपक्व रक्षा‑तंत्र (जैसे दमन के स्थान पर रूपांतरण/सब्लिमेशन) विकसित करने की दिशा में सहायता दी जाती है।
  • समापन (Termination) और फॉलो‑अप चरण (Termination and Follow-up Phases):  जब रोगी अपने लक्षणों में स्पष्ट कमी, संबंधों में सुधार और आत्म‑समझ में वृद्धि  (symptoms, improved relationships and increased self-understanding) का अनुभव करने लगता है, तब सत्रों की आवृत्ति धीरे‑धीरे कम की जाती है और उपचार की समाप्ति पर चर्चा होती है। समापन के बाद आवश्यक हो तो निर्धारित अंतराल पर फॉलो‑अप सत्र रखे जाते हैं, ताकि यह देखा जा सके कि प्राप्त परिवर्तन स्थायी हैं या नहीं और यदि नई समस्याएँ उभरें तो समय रहते सहायता दी जा सके।



गुण (Merits): 



  • यह विधि केवल सतही लक्षणों (Surface Traits) (जैसे डर, क्रोध, अनुशासन‑भंग) पर नहीं रुकती, बल्कि अचेतन में छिपी इच्छाओं, संघर्षों, बचपन की स्मृतियों और संबंधों (Unconscious desires, conflicts, childhood memories and relationships) की गहराई तक जाने का प्रयास करती है।​ इस प्रकार व्यक्ति के व्यवहार के “क्यों (why)” को समझने में मदद मिलती है, जिससे दीर्घकालिक व्यक्तित्व‑परिवर्तन और स्थायी सुधार (long-term personality change and lasting improvement) की संभावना बढ़ती है, केवल लक्षण‑नियंत्रण तक सीमित नहीं रहती।​
  • मनोविश्लेषण में जीवन‑इतिहास, पारिवारिक‑परिप्रेक्ष्य, स्वप्न, कल्पनाएँ, संबंध‑धारा, भावनात्मक संघर्ष (life history, family perspective, dreams, fantasies, relationship patterns, and emotional conflicts) सबको साथ लेकर व्यक्तित्व को समग्र रूप से समझा जाता है।​ यह दृष्टिकोण शिक्षकों/परामर्शदाताओं को विद्यार्थियों की समस्याओं के पीछे के व्यापक संदर्भ (घर का माहौल, दबाव, अपराध‑भाव, हीन‑भावना आदि) को पहचानने में सहायक होता है।​​
  • मनोविश्लेषणात्मक प्रक्रिया व्यक्ति को अपनी अनजानी भावनाओं, बार‑बार दोहराए जाने वाले व्यवहार‑पैटर्न और संबंधों में होने वाली गलतियों ((emotions, repetitive behavior patterns, and mistakes in relationships) को पहचानने में मदद करती है।​ इस प्रकार विकसित अंतर्दृष्टि (insight) से आत्म‑जागरूकता, आत्म‑स्वीकार और परिपक्व भावनात्मक नियमन (self-awareness, self-acceptance and mature emotional regulation)  बढ़ता है, जो दीर्घकालीन मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।​
  • शोधों में पाया गया है कि गहरी, लम्बे समय से चली आ रही समस्याएँ (जैसे व्यक्तित्व विकार, क्रॉनिक अवसाद, जटिल चिंता, संबंध‑समस्याएँ personality disorders, chronic depression, complex anxiety, and relationship problems) में मनोविश्लेषणात्मक चिकित्सा अपेक्षाकृत अधिक सहायक हो सकती है।​ अन्य अल्पकालिक या सतही उपचारों से लाभ न पाने वाले व्यक्तियों के लिए यह पद्धति मूल अंतर्द्वन्द्वों (core conflicts) पर काम करके अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन ला सकती है।​
  • परामर्श, क्लिनिकल मनोविज्ञान, बाल‑विकास, प्रेरणा, रक्षा‑तंत्र, ट्रांसफ़रेंस, अचेतन (counseling, clinical psychology, child development, motivation, defense mechanisms, transference and unconscious) आदि अनेक अवधारणाएँ आज भी मनोविश्लेषणात्मक परिप्रेक्ष्य (psychoanalytic perspective)  से गहराई से प्रभावित हैं।​ शिक्षकों और काउंसलर्स के लिए यह दृष्टिकोण उपयोगी है, क्योंकि यह उन्हें व्यवहार के पीछे छिपे मनोबलों (unconscious motives) और पारिवारिक/बाल्यकालीन अनुभवों को ध्यान में रखकर अधिक संवेदनशील हस्तक्षेप करने की दिशा दिखाता है।


दोष (Limitations): 


  • पारंपरिक मनोविश्लेषण (Traditional psychoanalysis) में सप्ताह में कई सत्र और वर्षों तक लम्बा उपचार चलता है, इस कारण यह अत्यन्त समय‑खर्चीला और आर्थिक रूप से महँगा (time-consuming and financially expensive) पड़ता है; सामान्य शैक्षिक या स्कूल‑काउंसलिंग सेटिंग में इसे लागू करना कठिन है। रोगी और मनोविश्लेषक दोनों से अत्यधिक धैर्य, नियमितता और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता (immense patience, regularity and long-term commitment) अपेक्षित होती है, जो अधिकांश लोगों के लिए व्यावहारिक नहीं हो पाती।
  • इस विधि का प्रभाव काफी हद तक विश्लेषक की दक्षता, अनुभव, अपनी व्यक्तित्व‑विशेषताओं और व्याख्यात्मक कौशल (competence, experience, personality traits and interpretive skills) पर निर्भर रहता है। प्रशिक्षित और प्रमाणित मनोविश्लेषक (Trained and certified psychoanalysts) कम संख्या में होते हैं; गलत या अपर्याप्त रूप से प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा किया गया विश्लेषण रोगी के लिए हानिकारक भी हो सकता है।
  • फ्री‑एसोसिएशन, स्वप्न‑विश्लेषण, ट्रांसफ़रेंस (free-association, dream analysis, transference) आदि की व्याख्या काफी हद तक विश्लेषक के निजी दृष्टिकोण और विश्वासों पर आधारित होती है, इसलिए निष्कर्षों की वस्तुनिष्ठता और पुनरावृत्ति (replication) पर प्रश्न उठते हैं। अनेक अवधारणाएँ (जैसे इड, सुपरइगो, ओडिपस कॉम्प्लेक्स आदि) को प्रत्यक्ष रूप से मापना या प्रायोगिक रूप से जाँचना कठिन है, इसलिए आधुनिक वैज्ञानिक कसौटियों (empirical validation) पर यह पद्धति सीमित मानी जाती है।
  • फ्रायड के पारंपरिक सिद्धांत को अत्यधिक यौन‑प्रेरणा‑केन्द्रित और पश्चिमी मध्यवर्गीय सांस्कृतिक अनुभवों से प्रभावित (overly sex-centered and influenced by Western middle-class cultural experiences) माना गया; हर व्यवहार को काम‑इच्छा और दमन (sexual desire and repression)  से जोड़ना सभी संस्कृतियों और परिस्थितियों पर लागू नहीं होता। विशेष रूप से स्त्री‑पुरुष संबंधों और बाल्यकाम (infantile sexuality) से जुड़े विचारों को कई विद्वानों ने पक्षपाती, एकांगी और आधुनिक लैंगिक‑सम्वेदनशीलता (biased, one-sided and contrary to modern gender sensitivities) के प्रतिकूल बताया है।
  • सभी प्रकार की मानसिक समस्याएँ (जैसे तीव्र मनोविकृति, नशा‑निर्भरता, आपात संकट, कम बौद्धिक स्तर, अत्यधिक व्यावहारिक/संज्ञानात्मक समस्याएँ psychosis, drug dependence, emergencies, low IQ and severe behavioral/cognitive problems) मनोविश्लेषण के लिए उपयुक्त नहीं होतीं; कई मामलों में अन्य संरचित, अल्पकालिक उपचार अधिक लाभकारी साबित हुए हैं। यह पद्धति प्रायः गहरे व्यक्तित्व‑स्तर के परिवर्तन (deep personality-level change) पर केन्द्रित रहती है, इसलिए तात्कालिक लक्षण‑राहत या त्वरित समस्या‑समाधान (immediate symptom relief or quick problem resolution) की अपेक्षा रखने वाले रोगियों के लिए यह संतोषजनक नहीं लगती।



चिकित्सीय  विधि (Clinical Method)




चिकित्सीय विधि (Clinical Method) में किसी एक या कुछ व्यक्तियों की समस्या का गहन निदान (diagnosis) कर, उसके अनुरूप उपचारात्मक उपायों (therapeutic interventions) द्वारा व्यवहार में परिवर्तन लाने का प्रयास किया जाता है। यह विधि शैक्षिक मनोविज्ञान में विशेषतः समस्या‑ग्रस्त विद्यार्थियों (learning difficulties) के अध्ययन के लिए प्रयुक्त होती है। यह विधि अनेक विधियों का योग होती है। यह व्यक्तिगत समस्याओं (Personal problems) के समाधान की विधि है। इस विधि में विषयी की मनोशारीरिक समस्याओं (psychosomatic problems) को समझने के लिए शारीरिक परीक्षण, मानसिक परीक्षण, साक्षात्कार और जीवन इतिहास (physical examination, psychological testing, interviews and life history analysis) आदि विधियों का प्रयोग किया जाता है और साथ ही उसकी इन समस्याओं के कारणों का पता लगाया जाता है। अन्त में शारीरिक चिकित्सा तथा इन मनोवैज्ञानिक विधियों द्वारा ही उसके यथा कारणों को दूर किया जाता हैं। इस विधि में निदान एवं उपचार दोनों किए जाते हैं इसलिए इसे उपचारात्मक विधि (Therapeutic method) कहा जाता है।


चिकित्सीय विधि वह पद्धति है जिसमें किसी बालक/व्यक्ति की भावनात्मक, व्यवहारिक, बौद्धिक या सामाजिक समस्या (emotional, behavioral, intellectual or social problems)  की पहचान कर, व्यवस्थित निदान (diagnosis) और उपचार (treatment) की प्रक्रिया अपनाई जाती है।

उद्देश्य केवल समस्या का वर्णन करना नहीं, बल्कि कारणों की खोज कर उपयुक्त परामर्श, उपचार, शिक्षण‑संशोधन, पारिवारिक परामर्श (appropriate counseling, therapy, educational interventions, family counseling) आदि के माध्यम से स्थायी सुधार लाना होता है।



चिकित्सीय विधि के चरण (Steps of Clinical Methods): 

  • समस्या की पहचान और प्राथमिक जानकारी (Problem Identification and Preliminary Information):  सबसे पहले शिक्षक/माता‑पिता या अन्य स्रोतों से यह स्पष्ट किया जाता है कि बच्चे/व्यक्ति की विशिष्ट समस्या क्या है, जैसे अत्यधिक डर, चोरी, आक्रामकता, पढ़ाई से घबराहट, लगातार असफलता (excessive fear, stealing, aggression, anxiety about studies, persistent failure) आदि।​ इसके आधार पर केस की “प्रारम्भिक रूपरेखा (preliminary outline)” तैयार की जाती है – उम्र, कक्षा, पारिवारिक स्थिति, समस्या कब से है, किन परिस्थितियों में ज्यादा दिखती है, पहले क्या‑क्या प्रयास किए गए आदि।​
  • डेटा / जानकारी का व्यवस्थित संग्रह (Systematic Collection of Data/Information):  इस चरण में विस्तृत केस‑हिस्ट्री ली जाती है: पारिवारिक पृष्ठभूमि, विकास‑इतिहास, स्वास्थ्य, पूर्व रोग, स्कूल‑रिकॉर्ड, मित्र‑सम्बन्ध, अनुशासन‑इतिहास (Family background, developmental history, health, previous illnesses, school records, peer relationships, disciplinary history) आदि।​ साक्षात्कार (interviews) (बच्चे, माता‑पिता, शिक्षक), प्रेक्षण (observation) (कक्षा, घर, खेल), मनोवैज्ञानिक परीक्षण (psychological tests) (बुद्धि, उपलब्धि, व्यक्तित्व, अभिवृत्ति आदि) और आवश्यक हो तो चिकित्सकीय जाँच (medical examination) के माध्यम से अधिकतम प्रासंगिक जानकारी जुटाई जाती है।​
  • परिकल्पना‑निर्माण (Hypothesis formation): संकलित तथ्यों (collected facts) के आधार पर यह अनुमान (परिकल्पना) लगाया जाता है कि समस्या के सम्भावित कारण क्या हो सकते हैं; जैसे – पारिवारिक कलह, हीन‑भावना, विशिष्ट अधिगम अक्षमता, भावनात्मक विकार, साथियों का नकारात्मक प्रभाव (family conflict, feelings of inferiority, specific learning disabilities, emotional disorders, negative peer influence)  आदि।​ एक से अधिक सम्भावित कारण (possible cause) भी चिह्नित किए जा सकते हैं, जिन्हें आगे के विश्लेषण में जाँचकर पुष्ट या खंडित (confirmed or refuted)  किया जाता है।​
  • निदान (Diagnosis): उपलब्ध सभी सूचनाओं की आपसी तुलना और विश्लेषण (comparing and analyzing all available information) करके यह निर्धारित किया जाता है कि प्रमुख समस्या क्या है (जैसे – पढ़ने‑लिखने की विशिष्ट कठिनाई, अवसाद, तीव्र चिंता, आचरण‑समस्या, सामाजिक अनसमायोजन specific reading/writing difficulties, depression, severe anxiety, conduct problems, social maladjustment आदि)।​ साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाता है कि समस्या की तीव्रता कितनी है, किन परिस्थितियों में ज़्यादा दिखती है, किन सहायक/जोखिम कारकों (protective & risk factors) की भूमिका है।​
  • उपचार / हस्तक्षेप योजना (Treatment/Intervention planning): निदान (diagnosis) के आधार पर व्यक्तिगत उपचार‑योजना (individualized treatment plan) बनाई जाती है, जिसमें व्यवहार‑संशोधन तकनीकें, रेमेडियल शिक्षण, व्यक्तिगत/समूह परामर्श, खेल‑चिकित्सा, माता‑पिता परामर्श, समय‑सारिणी में परिवर्तन, दवा‑उपचार के लिए चिकित्सकीय रेफ़रल  (Behavior modification techniques, remedial teaching, individual/group counseling, play therapy, parent counseling, schedule changes, medical referral for medication) आदि शामिल हो सकते हैं।​ योजना में “लघु‑कालीन” तथा “दीर्घ‑कालीन” लक्ष्य, अपेक्षित बदलाव, उपयोग की जाने वाली तकनीकें और उनकी आवृत्ति/अवधि (short-term and long-term goals, expected changes, the techniques to be used, and their frequency/duration) स्पष्ट रूप से लिखी जाती है।​

  • कार्यान्वयन और प्रगति‑निगरानी (Implementation and Progress Monitoring): निर्धारित उपचार‑योजना को व्यवहार में लागू किया जाता है; नियमित सत्रों, कक्षा‑व्यवहार में परिवर्तन, घर की दिनचर्या में संशोधन (regular sessions, changes in classroom behavior, modifications to home routines) आदि के माध्यम से हस्तक्षेप चलाया जाता है।​ समय‑समय पर प्रगति का मूल्यांकन (फिर से परीक्षण, निरीक्षण, फीडबैक retesting, observation, feedback) करके देखा जाता है कि समस्या में कितनी कमी आई, और आवश्यकता अनुसार योजना में संशोधन (modified) किया जाता है।​
  • अनुवर्ती (Follow‑up): जब प्रमुख लक्षणों (symptoms) में कमी और अनुकूलन में सुधार (adaptation has improved) दिखने लगे, तब भी कुछ समय तक अनुवर्ती मुलाक़ातें (follow-up appointments) रखी जाती हैं, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सुधार स्थायी है और पुनः‑उद्भव (relapse) न हो।​ यदि नई परिस्थितियों (जैसे स्कूल‑बदली, परीक्षा‑दबाव, पारिवारिक परिवर्तन) में फिर से कठिनाई दिखे तो समय रहते  सहायता/समर्थन दिया जा सके।


प्रमुख विशेषताएँ (Main Features)


  • व्यक्ति‑केन्द्रित, गहन और विस्तृत अध्ययन (Person-centered, in-depth and comprehensive study); एक‑एक मामले को “केस” की तरह लेकर समग्र रूप (holistically) से समझा जाता है।
  • बहु‑अनुशासनिक दृष्टि (Multidisciplinary approach) में शिक्षक, परामर्शदाता, मनोवैज्ञानिक, चिकित्सक और परिवार (teachers, counselors, psychologists, doctors and family members) सब मिलकर समाधान की दिशा में कार्य कर सकते हैं।



गुण (Merits): 



  • यह विधि किसी एक बच्चे/व्यक्ति की समस्या, पृष्ठभूमि, भावनात्मक दशा और व्यक्तिगत आवश्यकताओं (problems, background, emotional state and individual needs) का गहराई से, केस‑स्तर पर अध्ययन करती है, जिससे सतही नहीं बल्कि वास्तविक स्थिति स्पष्ट होती है। सामान्य कक्षा‑स्तर की जानकारी से छिपी रह जाने वाली बातें (जैसे पारिवारिक तनाव, स्वास्थ्य‑समस्या, विशिष्ट अधिगम अक्षमता, हीन‑भावना (family stress, health problems, specific learning disabilities, feelings of inferiority) आदि) भी सामने आ जाती हैं, जो प्रभावी समाधान के लिए आवश्यक हैं।
  • चिकित्सीय विधि केवल “समस्या का वर्णन (describe the problem)” नहीं करती, बल्कि व्यवस्थित निदान के बाद उसके अनुरूप उपचारात्मक योजना {परामर्श, रेमेडियल शिक्षण, व्यवहार‑संशोधन, माता‑पिता परामर्श (counseling, remedial teaching, behavior modification, parent counseling)आदि} तैयार करती है। इस प्रकार यह विधि शोध‑अध्ययन के साथ‑साथ व्यावहारिक हस्तक्षेप और सुधार (intervention and improvement), दोनों को जोड़ती है; परिणाम छात्र के व्यवहार और उपलब्धि में प्रत्यक्ष परिवर्तन के रूप में देखे जा सकते हैं।
  • केस‑स्टडी, प्रेक्षण, साक्षात्कार, मनोवैज्ञानिक परीक्षण, चिकित्सकीय जाँच (Case studies, observations, interviews, psychological tests, medical examinations and other techniques) आदि कई तकनीकों को मिलाकर समग्र निष्कर्ष निकाले जाते हैं, जिससे निदान अधिक विश्वसनीय बनता है। शिक्षक, काउंसलर, मनोवैज्ञानिक, चिकित्सक और अभिभावक (Teachers, counselors, psychologists, doctors, and parents)—सब मिलकर काम कर सकते हैं, इसलिए समाधान बहु‑आयामी और व्यावहारिक होता है, केवल एक दृष्टि पर निर्भर नहीं रहता।
  • पढ़ने‑लिखने की गंभीर कठिनाई, हकलाना, बार‑बार अनुशासन‑भंग, चोरी, गहरी भावनात्मक समस्याएँ, गंभीर संवेगात्मक विकार (writing difficulties, stuttering, repeated disciplinary problems, theft, deep emotional problems and serious emotional disorders) आदि जैसे जटिल मामलों के लिए यह विधि विशेष रूप से उपयुक्त मानी जाती है। साधारण अनुशासनात्मक दंड या सामान्य सलाह जहाँ असफल हो जाती है, वहाँ क्लिनिकल विधि के माध्यम से व्यक्ति की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुसार व्यक्तिगत सहायता दी जा सकती है।
  • इस विधि से शिक्षक को यह समझ मिलती है कि हर समस्या केवल “जिद (stubbornness)” या “शरारत (naughtiness)” नहीं, बल्कि किसी गहरे कारण का परिणाम हो सकती है; इससे उसका दृष्टिकोण अधिक मानवीय और वैज्ञानिक बनता है। शिक्षक अपने कक्षा‑प्रबंधन, शिक्षण‑रणनीतियों, मूल्यांकन और मार्गदर्शन (classroom management, teaching strategies, assessment and guidance) के तरीकों में आवश्यक संशोधन करके कमजोर और समस्या‑ग्रस्त विद्यार्थियों की वास्तविक मदद कर सकता है।


दोष (Limitations): 



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