Wednesday, December 3, 2025

मनोविज्ञान के सम्प्रदाय (Schools of Psychology)

मनोविज्ञान के सम्प्रदाय (Schools of Psychology)


मनोविज्ञान के सम्प्रदाय से अभिप्राय उन विचारधाराओं से है जिनके अनुसार मनोवैज्ञानिक मन, व्यवहार और अनुभव का अध्ययन संगठित तरीके से करते हैं। इतिहास में कई प्रमुख सम्प्रदाय उभरे हैं जिनके अपने-अपने विषय, पद्धति और प्रतिनिधि हैं। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत एवं बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में मनोविज्ञान के दर्शनशास्त्र से अलग होने की प्रक्रिया में मनोविज्ञान के कई सम्प्रदाय (Schools) अथवा प्रणाली (Systems) अथवा वाद (views) सामने आए। मनोविज्ञान के किसी सम्प्रदाय (School of Psychology) से तात्पर्य मनोवैज्ञानिकों के किसी ऐसे समूह से है जो मनोविज्ञान के अध्ययन के लिए एक समान विचारधारा तथा विधियों का अनुसरण करते हैं।  19 वीं शताब्दी के अन्त तथा 20 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में मनोवैज्ञानिकों के बीच मनोविज्ञान के दृष्टिकोण, विषय वस्तु तथा अध्ययन विधियों के सम्बन्ध में अनेक मतभेद हो गये एवं वे अनेक समूहों में विभक्त होकर अपनी-अपनी विचारधारा तथा चिन्तन प्रणाली के साथ मनोविज्ञान के अध्ययन सम्बन्धी कार्य में लग गये थे। संरचनावाद, कार्यवाद, व्यवहारवाद, गेस्टाल्टवाद तथा मनोविश्लेषणवाद कुछ ऐसे ही प्रमुख मनोवैज्ञानिक सम्प्रदाय थे। 

 

संरचनावाद (Structuralism) (1896)

विचारधारा के प्रवर्तक:  विलियम वुन्ट और टिचनर (Wundt and Titchener)

इन्होंने 1879 ई. में जर्मनी में लिपजिंग (Leipzig) नगर में सबसे पहली मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला की स्थापना की। इस प्रयोगशाला में मानसिक संरचना और क्रियाओं के प्रयोगात्मक अध्ययन का आरम्भ हुआ। वुंट के शिष्य एडवर्ड ब्रैडफोर्ड टिचनर ने इस दृष्टिकोण को व्यवस्थित रूप से विकसित करके “संरचनावाद” नाम दिया और अमेरिका के कार्नेल विश्वविद्यालय में इसे स्थापित किया। संरचनावाद के अनुसार मनुष्य की चेतना अनेक मानसिक तत्त्वों से मिलकर बनी है, जैसे संवेदनाएँ (sensations), प्रतिमाएँ/प्रत्यक्षीकरण (images) और भावनाएँ/मनोभाव (affections)। इन तत्त्वों को पहचानकर, गिनकर और वर्गीकृत करके मन की आंतरिक संरचना का अध्ययन ही संरचनावाद का मुख्य कार्य क्षेत्र माना गया।  इसका प्रमुख लक्ष्य वैज्ञानिक विधि से चेतन अनुभवों का अध्ययन करना है। मनोविज्ञान आन्तरिक अनुभवों का सर्वेक्षण करता है। इस विचार से कुछ मनोवैज्ञानिकों ने इस सम्प्रदाय को 'अन्तर्दर्शनवाद (introspection)' भी कहा है। यह अन्तर्दर्शन विधि पर आधारित है। इस विधि द्वारा चेतना के विभिन्न अंगों और अनुभवों का अध्ययन भली-भांति किया जा सकता है।
टिचनर के अनुसार - बिना मन की शरीर की तथा बिना शरीर के अशाररिक मन की व्याख्या करना संभव नहीं है। 

डिक्शनरी अपने विचारों को An outline of Psychology & Experimental Psychology  जैसी रचनाओं में रेखांकित किया।
संरचनावादियों के अनुसार चेतना के तीन अवयव होते हैं -
  1. संवेदना (Sensation) -                                       प्रत्यक्ष ज्ञान। 
  2. प्रतिमा (Image) -                                               विचार 
  3. भावनात्मक अवस्थाएं  (Affective States)-        संवेग 

मुख्य विधियाँ:

  • अन्तर्दर्शन  विधि (Introspection method) – प्रशिक्षित प्रेक्षक अपने तात्कालिक अनुभव का सूक्ष्म विश्लेषण कर मौखिक रिपोर्ट देते थे।​
  • प्रयोगात्मक विधि (Experimental method)-  नियंत्रित प्रयोगों के माध्यम से संवेदनाओं, प्रतिक्रिया समय, आदि का मापन किया जाता था।


मुख्य विशेषताएँ (Main Characteristics)


  • चेतना को “क्या से बनी है?” इस प्रश्न का उत्तर खोजने पर जोर, यानी “संरचना” पर बल दिया है ।​
  • मानसिक प्रक्रियाओं को छोटे-छोटे तत्त्वों में तोड़कर उनका वर्गीकरण, जैसे– प्रकार, तीव्रता, अवधि, स्पष्टता आदि के आधार पर।​​
  • मनोविज्ञान को दर्शन से अलग करके एक स्वतंत्र, प्रयोगात्मक विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित करने में योगदान।
  • ये अनुभव का आधार तंत्रिका तंत्र (nervous system) को मानते हैं जो अनुभव प्राप्त करने में सहायता करता है। टिचनर के अनुसार व्यक्ति के अनुभवों की इकाई मानसिक तत्व है। अनुभव व्यक्ति की चेतन आंतरिक सरंचना है।  चेतना किसी निश्चित समय में घटित होने वाली मानसिक क्रियाओ का योग है। 
  • इसमें मन और चेतना के स्वरूप की जानकारी विश्लेषण द्वारा की जाती है। चेतना के तीन तत्व हैं- संवेदन, प्रतिभा और भाव। संवेदन का सम्बन्ध प्रत्यक्षीकरण से, प्रतिभा का सम्बन्ध विचारों से और भाव का सम्बन्ध संवेगों से होता है।
  • मन और शरीर दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व है और दोनों मिलकर मानसिक प्रक्रियाओं के घटित होने की व्यवस्था करते हैं।
  • चेतना का अध्ययन के बिना अन्तर्दर्शन  ज्ञान की संभव नहीं है। अतः विश्लेषणात्मक अंतरदर्शन विधि पर जोर दिया गया। 

संरचनावाद का शिक्षा में योगदान (Contribution of structuralism to education)



  • संरचनावाद का शिक्षा में योगदान प्रत्यक्ष से अधिक परोक्ष है, परन्तु शिक्षा‑मनोविज्ञान को “वैज्ञानिक” और “प्रयोगात्मक” बनाने में इसका आधारभूत योगदान माना जाता है।​
  • संरचनावाद ने सबसे पहले मनोविज्ञान को दर्शन से अलग कर प्रयोगशाला‑आधारित विज्ञान के रूप में स्थापित किया, जिससे शिक्षा‑मनोविज्ञान सहित पूरी शाखा में नियंत्रित अवलोकन, मापन और प्रयोग की परम्परा विकसित हुई।​ 
  • इसने प्रतिक्रिया‑समय, संवेदनाओं की तीव्रता, ध्यान आदि के मापन जैसे प्रयोगों ने शिक्षण‑अधिगम पर वैज्ञानिक शोध की दिशा खोली।​
  • संरचनावादियों ने इन्द्रियानुभव, ध्यान और प्रत्यक्षण की सूक्ष्म संरचना पर विशेष बल दिया, जिससे पाठ्य‑सामग्री की प्रस्तुति, इन्द्रिय‑समृद्ध शिक्षण‑सामग्री और स्पष्टता (clarity) के सिद्धान्त को महत्व मिला।​ इससे यह विचार मजबूत हुआ कि प्रभावी शिक्षण के लिए उपयुक्त संवेदी उत्तेजनाएँ, क्रमबद्ध प्रस्तुति और व्यतिकरण (distraction) को कम करना आवश्यक है।​
  • संरचनावाद ने प्रशिक्षित अन्तर्दर्शन के माध्यम से अपने अनुभव का विश्लेषण करने पर बल दिया, जिसने आगे चलकर स्व‑अवलोकन, आत्ममूल्यांकन और reflective thinking जैसी अवधारणाओं को प्रेरित किया।​शिक्षक‑प्रशिक्षण में “अपनी कक्षा‑अनुभव की समीक्षा” या “शिक्षण‑डायरी” जैसे अभ्यासों की पृष्ठभूमि में यही आत्म‑निरीक्षण की धारणा परोक्ष रूप से जुड़ी देखी जा सकती है।​
  • संरचनावादी दृष्टि इस विचार को बल देती है कि जटिल अनुभवों/अवधारणाओं को छोटे‑छोटे सुव्यवस्थित “तत्त्वों” में बाँटकर पढ़ाया जाए, ताकि शिक्षार्थी धीरे‑धीरे सरल से जटिल की ओर बढ़े।​ पाठ्यक्रम को इकाइयों, उप‑इकाइयों, शीर्षकों आदि में क्रमबद्ध संरचना देना इसी प्रकार की “element-based” सोच से मेल खाता है।​
  • संरचनावाद ने जो प्रयोगात्मक परम्परा और चेतना‑अध्ययन की भाषा दी, उसी ने प्रकार्यवाद, व्यवहारवाद, गेस्टाल्ट और आधुनिक संज्ञानात्मक मनोविज्ञान को जन्म देने में भूमिका निभाई; इन सभी के शैक्षिक योगदान आज सीधे प्रयोग में आते हैं।​


संरचनावाद की सीमाएँ (Limitations of structuralism)


  • अन्तर्दर्शन अत्यन्त व्यक्तिपरक, आत्म‑रिपोर्ट पर निर्भर और पुनरुत्पादन‑कठिन विधि है; दो अलग प्रेक्षक अक्सर एक ही अनुभव की भिन्न रिपोर्ट दे सकते हैं।​
  • यह सामान्य व्यक्तियों, बच्चों, अशिक्षितों या असामान्य मानसिक दशाओं में लगभग अनुपयोगी हो जाता है, इसलिए सार्वत्रिक वैज्ञानिक विधि नहीं बन पाता।​
  • संरचनावाद केवल “चेतन अनुभव” के घटकों तक सीमित रहा; व्यवहार, व्यक्तित्व, प्रेरणा, भावना, अचेतन आदि का समुचित अध्ययन इसमें नहीं हो सका।​ पशु‑व्यवहार, शिशु‑मनोविज्ञान और रोगात्मक अवस्थाओं का अध्ययन भी लगभग बाहर रह गया, जबकि बाद के सम्प्रदायों (व्यवहारवाद, मनोविश्लेषण आदि) ने इन्हें केन्द्र में रखा।​
  • यह मन से अधिक “मन की रचना किस‑किस तत्त्व से बनी है” पर केन्द्रित रहा, जबकि विचारों और व्यवहारों के वास्तविक जीवन में क्या कार्य/उद्देश्य हैं, यह प्रश्न पीछे चला गया।​ कार्यवादियों ने आलोचना की कि केवल घटकों की सूची से न तो अनुकूलन, समस्या‑समाधान, सीखने और विकास को समझा जा सकता है, न शिक्षा जैसी व्यावहारिक क्षेत्रों को।​
  • अनुभव को बहुत छोटे‑छोटे तत्त्वों (संवेदना, प्रतिमा, भावना आदि) में तोड़ने पर, उनके आपसी सम्बन्ध और “समग्र अर्थ” की पकड़ ढीली हो जाती है।​ गेस्टाल्ट मनोवैज्ञानिकों ने दिखाया कि व्यक्ति वस्तुओं को “पूर्ण रूप” में ग्रहण करता है, मात्र तत्त्वों के जोड़ के रूप में नहीं; इस दृष्टि से संरचनावाद अधूरा माना गया।​
  • कक्षा‑स्थितियों, अधिगम‑समस्याओं, प्रेरणा, व्यक्तित्व‑अन्तरों आदि के समाधान के लिए संरचनावादी सिद्धान्त प्रत्यक्ष रूप से पर्याप्त दिशा नहीं देते।​




प्रकार्यवाद / कार्यवाद (Functionalism) (1896)



प्रकार्यवाद के मुख्य प्रतिपादक: विलियम जेम्स (William James)  

प्रकार्यवाद / कार्यवाद मनोविज्ञान का वह सम्प्रदाय है जो यह जानने पर केन्द्रित है कि मानसिक क्रियाएँ और व्यवहार “क्या कार्य करते हैं” और “किस उद्देश्य की पूर्ति करते हैं”, न कि केवल यह कि चेतना किन तत्त्वों से बनी है। यह संरचनावाद की प्रतिक्रिया में विकसित हुआ और व्यवहार की उपयोगिता, अनुकूलन (adaptation) और उद्देश्यपरकता (purposefulness) पर विशेष बल देता है।

प्रकार्यवाद को वास्तविक स्वरूप जॉन डीवी और रोनेल्ड एंजिल ने दिया। इसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि प्रयोजनवाद (Pragmatism) है। प्रकार्यवाद (Functionalism) के अनुसार मनोविज्ञान का कार्य यह समझना है कि व्यक्ति क्या करता है और किसी विशेष स्थिति में क्यों उस प्रकार का व्यवहार करता है। मानसिक प्रक्रियाओं को ऐसे कार्यों के रूप में देखा जाता है जो व्यक्ति को अपने वातावरण के साथ अनुकूलित होने, समस्याओं का समाधान करने और लक्ष्य प्राप्त करने में सहायता करते हैं।  
वुडवर्थ महोदय का विचार है "एक मनोविज्ञान जो इस प्रश्न पर मनुष्य क्या करते हैं? का सही और व्यवस्थित उत्तर देता है और आगे के प्रश्नों, किस प्रकार वे उसे करते हैं? और क्यों वे उसे करते हैं? का भी उत्तर देता है, प्रकार्यवाद सम्प्रदाय कहलाता है।" मनोविज्ञान में ज्ञान (Knowing), संकल्प (Willing) तथा क्रिया (Feeling) का समावेश प्रकार्यवाद (कार्यात्मकवाद) के कारण हुआ। यह विचारधारा मन की शक्तियों की गत्यात्मकता (dynamism) पर बल देता है।

इसके प्रमुख सम्प्रदाय निम्नांकित हैं-

शिकागो सम्प्रदाय (Chicago School): -    

शिकागो सम्प्रदाय (Chicago School) प्रकार्यवाद / कार्यवाद की ही एक प्रमुख धारा है, जो विशेष रूप से शिकागो विश्वविद्यालय में विकसित हुई और जिसने मनोविज्ञान को वास्तविक जीवन‑समस्याओं, अनुकूलन और शिक्षा से गहराई से जोड़ा। इसमें जॉन डीवी, जेम्स रोनेल्ड एंजिल और हैर्वे ए. कैर (Harvey A. Carr) के नाम विशेष उल्लेखनीय है। 

जॉन ड्यूई (John Dewey) – मनोविज्ञान के क्षेत्र में मन और बुद्धि की उपयोगिता पर विशेष बल दिया। समस्या समाधान में किस प्रकार चिन्तन प्रक्रिया कार्य करती है इस पर भली-भाँति प्रकाश डाला है। Reflex Arc Concept in Psychology” लेख के माध्यम से व्यवहार को उद्देश्यपूर्ण, सतत क्रिया के रूप में समझाया; इन्होंने कहा कि मानसिक कार्यों में निरन्तरता होती है। वे बिना एक क्षण भी रुके होती रहती हैं।  शिक्षा को “जीवन का पुनर्गठन (Reorganization of life)” और “स्कूल को समाज का लघु रूप” माना।

जेम्स रोवलैण्ड एंजेल (J.R. Angell) – कार्यवाद को स्पष्ट रूप से परिभाषित व संगठित किया; चेतना के कार्य, समायोजन, सीखना, आदत आदि पर बल दिया। प्रकार्यवाद का सम्बन्ध 'प्रक्रिया' से है। इनके अनुसार मानसिक प्रक्रियाओं का स्वरूप क्या है और ये किस प्रकार कार्य करती हैं इनकी जानकारी पर बल देते हैं। 

हैर्वे ए. कैर (Harvey A. Carr) – अधिगम, समायोजन और समस्या‑समाधान पर कार्य; functional viewpoint को शोध से जोड़ा।


प्रमुख विचार :-
  • अनुकूलन पर बल (Emphasis on Adaptation) – मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं को जीव और पर्यावरण के बीच समायोजन (adjustment) का साधन माना; मनोविज्ञान का काम है यह समझना कि व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार कैसे ढलता है।
  • उद्देश्यपूर्ण व्यवहार (Purposeful Behavior)– व्यवहार को केवल उत्तेजना‑प्रतिक्रिया का यांत्रिक योग नहीं, बल्कि लक्ष्य‑निष्ठ, अर्थपूर्ण और समस्या‑समाधान की प्रक्रिया माना गया।
  • शिक्षा और वास्तविक जीवन से जुड़ाव (Connecting Education and Real Life) – विद्यालय, कक्षा, खेल, कार्य‑स्थल आदि वास्तविक परिस्थितियों में सीखने, आदत, बुद्धि, समायोजन आदि पर शोध; शिक्षा को जीवन‑तैयारी और सामाजिक दक्षता के विकास की प्रक्रिया की तरह देखना।
  • अधिगम प्रक्रिया पर जोर (Emphasis on the Learning Process) – अधिगम, व्यक्तिगत भिन्नताएँ, परीक्षण और मूल्यांकन आदि पर अनेक शोध; इनसे शिक्षा‑मनोविज्ञान और मार्गदर्शन‑परामर्श को दिशा मिली।


कोलम्बिया सम्प्रदाय (Colombian School):- 

यह धारा प्रयोगात्मक अनुसंधान, मापन और खासकर अधिगम (learning) के नियमों पर बल देने के लिए प्रसिद्ध है।  इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक कोलम्बिया विश्वविद्यालय के जेम्स कैटल, एडवर्ड थार्नडाइक और राबर्ट वुडवर्थ थे। कैटल ने साहचर्य, प्रत्यक्ष ज्ञान और मनोभौतिकी पर कार्य किया। इनके लिए मुख्य प्रश्न था: व्यवहार कैसे सीखा जाता है, कैसे मापा जा सकता है और किस प्रकार प्रशिक्षण द्वारा उसे बदला जा सकता है। थार्नडाइक ने बुद्धिमापन और अधिगम प्रक्रिया पर कार्य किया। राबर्ट वुडवर्थ ने 'समकालीन मनोवैज्ञानिक सम्प्रदाय' (Contemporary Schools of Psychology) पुस्तक लिखकर ख्याति प्राप्त की। इन्होंने अपने विभिन्न प्रयोगों के आधार पर प्रयोगात्मक मनोविज्ञान पर भी पुस्तक लिखी। 

जेम्स मैककीन कैटेल (James McKeen Cattell) – मानसिक परीक्षणों (mental tests) और मापन‑आधारित मनोविज्ञान के अग्रदूत; प्रतिक्रिया‑समय, बुद्धि, क्षमताओं आदि के परीक्षण विकसित किए।

एडवर्ड एल. थॉर्नडाइक (Edward L. Thorndike) – अधिगम के सिद्धांत (Trial and Error learning, Law of Effect आदि) के प्रतिपादक; शिक्षा‑मनोविज्ञान को वैज्ञानिक आधार देने में केंद्रीय भूमिका।

रॉबर्ट एस. वुडवर्थ (Robert S. Woodworth) – “प्रेरणा × स्थिति” (S–O–R) दृष्टिकोण; अभिप्रेरणा, व्यक्तित्व और प्रयोगात्मक मनोविज्ञान में महत्त्वपूर्ण योगदान।


प्रमुख विचार :-

  • अधिगम और अभ्यास पर बल (Emphasis on learning and practice)- व्यवहार के गठन में अभ्यास, प्रयास‑त्रुटि, पुनर्बलन और परिणामों की भूमिका पर विशेष ध्यान; अधिगम‑नियमों को सूक्ति‑रूप में प्रतिपादित किया गया (थॉर्नडाइक के नियम)।
  • मापन और परीक्षण‑केन्द्रित दृष्टि (Measurement and test-centered approach)- बुद्धि, योग्यता, उपलब्धि आदि के मापन के लिए विविध परीक्षणों का निर्माण; शिक्षा‑मनोविज्ञान में objective tests, स्केल्स, मार्किंग‑सिस्टम आदि का विकास।
  • प्रयोगात्मक और सांख्यिकीय पद्धति (Experimental and statistical methods)– प्रयोग, नियंत्रित स्थितियाँ, बड़े नमूने और सांख्यिकीय विश्लेषण के माध्यम से निष्कर्ष; इसने शिक्षा‑शोध को वैज्ञानिक रूप दिया।
  • व्यावहारिक शैक्षिक उपयोग (Practical educational applications)– कक्षा‑अधिगम, अभ्यास- प्रशिक्षण, गृह‑कार्य, पुनरावृत्ति, ग्रेडिंग, प्रतिभा‑चयन, मार्गदर्शन‑परामर्श आदि में इनके सिद्धांतों का सीधा अनुप्रयोग।

यूरोपीय संप्रदाय (European School): 

इस सम्प्रदाय के फ्रांस के रिबॉट (Theodule Ribot), रूस के लैंगे (Lange) तथा स्वीट्जरलैंड के एडवर्ड क्लापरेडे (Edward Claparede) मानसिक प्रक्रियाओं की व्याख्या प्राकृतिक विज्ञान के आधार पर करने के समर्थक थे। इस सम्प्रदाय में, क्लापरेडे, डेविड, कॉज तथा रयूबिन (Rubin) का महत्वपूर्ण योगदान रहा। क्लापरेडे ने एक पशु प्रयोगशाला की स्थापना की थी। उसने प्रकार्यवाद के विषय में अपने विचार स्पष्ट करते हुए कहा कि जीवन की क्रियात्मकता का अध्ययन प्रकार्यवाद की सामग्री है। प्रकार्यवाद की सामग्री का मूल उद्देश्य मानव की आवश्यकताओं और उनकी रुचियों का अध्ययन करना है। कार्यात्मकता शारीरिक घटकों पर मुख्य रूप से विचार करती है और इसमें उनके कार्य तथा उपयोगिता का अध्ययन किया जाता है।





प्रकार्यवाद (Functionalism) की विशेषताएं 


  • प्रकार्यवाद मन के “क्या से बना है” (संरचना) के बजाय “क्या करता है” (कार्य) पर जोर देता है। मानसिक प्रक्रियाओं को उनके कार्य और उपयोगिता के संदर्भ में समझा जाता है, जैसे वे व्यक्ति को लक्ष्य प्राप्ति और समस्या‑समाधान में कैसे मदद करती हैं।​
  • यह दृष्टिकोण मानता है कि व्यवहार और मानसिक क्रियाएँ जीव को अपने वातावरण के साथ समायोजन और अनुकूलन करने में सहायता करने वाले साधन हैं। मनोविज्ञान का उद्देश्य यही समझना है कि व्यक्ति अलग‑अलग परिस्थितियों में क्यों और कैसे अपने व्यवहार को ढालता है।​
  • प्रकार्यवादियों के अनुसार मानव व्यवहार मूलतः उद्देश्यपूर्ण (goal‑directed) और अर्थपूर्ण होता है, केवल यांत्रिक प्रतिक्रिया नहीं। व्यक्ति की आवश्यकताएँ, रुचियाँ और लक्ष्य उसके व्यवहार को दिशा देते हैं; इसलिए प्रेरणा और उद्देश्य को समझना आवश्यक है।​
  • प्रकार्यवाद मन और शरीर को अलग‑अलग न मानकर एक संयुक्त क्रियाशील इकाई के रूप में देखता है। विचार, भावना और शारीरिक क्रिया – ये सब मिलकर अनुकूल व्यवहार उत्पन्न करते हैं; केवल “मन” या केवल “शरीर” के अध्ययन को अधूरा माना जाता है।​
  • चेतना को छोटे‑छोटे स्थिर तत्वों में बाँटने की बजाय इसे सतत, बहती हुई प्रक्रिया (stream of consciousness) माना जाता है। यह प्रवाह परिस्थितियों के अनुसार लगातार बदलता है और व्यक्ति को लचीला अनुकूलन करने में सहायक होता है।​
  • प्रकार्यवाद का झुकाव प्रयोगशाला से बाहर, विद्यालय, घर और समाज जैसी वास्तविक स्थितियों में व्यवहार को समझने की ओर है। अधिगम, आदत, अभिप्रेरणा, समायोजन आदि जैसी व्यावहारिक समस्याओं के समाधान पर विशेष ध्यान दिया जाता है।​
  • शैक्षिक स्तर पर यह सम्प्रदाय बालक की आवश्यकताओं, रुचियों और जीवन‑प्रासंगिक अनुभवों पर आधारित पाठ्यक्रम और शिक्षण की वकालत करता है। केवल वही विषय व गतिविधियाँ महत्वपूर्ण मानी जाती हैं जिनकी समाज में और शिक्षार्थी के जीवन में प्रत्यक्ष उपयोगिता हो (प्रैग्मेटिक/उपयोगितावादी दृष्टि)।​



शिक्षा में उपयोगिता (Usefulness in Education)

  • समायोजन और अनुकूलन पर बल (Emphasis on Adjustment and Adaptation) - प्रकार्यवाद के अनुसार मानव व्यवहार मूलतः अनुकूल और लक्ष्यपूर्ण है; इसलिए विद्यालय का प्रमुख लक्ष्य बच्चों को समाज में समायोजित करना होना चाहिए।​ सीखने की प्रक्रिया में वातावरण की भूमिका पर जोर दिया गया; शिक्षक का दायित्व है कि वह ऐसा स्वस्थ, प्रेरक वातावरण दे जो बच्चों को वास्तविक जीवन में अनुकूलन सिखाए।​
  • बालक‑केंद्रित और उपयोगिता‑आधारित पाठ्यक्रम (Child-Centered and Utility-Based Curriculum): प्रकार्यवाद ने “उपयोगिता सिद्धान्त” (pragmatism) को बल दिया; पाठ्यक्रम में वही विषय शामिल हों जिनकी समाज और विद्यार्थी के जीवन में प्रत्यक्ष उपयोगिता हो।​ “करके सीखना” (Learning by doing), परियोजना, कार्य‑आधारित और अनुभवात्मक गतिविधियों को महत्व दिया गया, जिससे सीखना अर्थपूर्ण और जीवन‑संबद्ध बनता है।​
  • व्यक्तिगत भिन्नताओं का सम्मान (Respect for Individual Differences): प्रकार्यवादियों ने शिक्षार्थियों की क्षमताओं में व्यक्तिगत भिन्नता पर बल दिया; अलग‑अलग आयु‑स्तरों और क्षमताओं के लिए भिन्न‑भिन्न शैक्षिक अनुभवों की आवश्यकता मानी।​ इससे स्तरानुसार पाठ्यपुस्तकें, क्षमता‑आधारित समूह, मार्गदर्शन‑परामर्श आदि की धारणा को मजबूती मिली।
  • मन–शरीर की संयुक्त क्रियाशीलता (Mind-Body Joint Functioning): प्रकार्यवाद ने मन और शरीर को संयुक्त क्रियाशील इकाई मानते हुए गतिविधि‑आधारित, शारीरिक‑मानसिक दोनों को सक्रिय करने वाली शिक्षण‑विधियों का समर्थन किया।​ खेल, प्रयोग, प्रयोगशाला‑कार्य, हस्तकौशल, नाटक आदि गतिविधियों के माध्यम से सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास पर बल दिया गया।
  • वैज्ञानिकता, उद्देश्यों और नई विधियों पर बल (Emphasis on Scientific Thinking, Objectives and New Methods): इस सम्प्रदाय ने शिक्षा में वैज्ञानिक जानकारी, प्रयोगात्मक शोध और मापन की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित किया, जिससे शिक्षा‑मनोविज्ञान, शैक्षिक परीक्षण और अनुसंधान का विकास हुआ।​
  • विद्यालय को जीवन की तैयारी मानना (School as Preparation for Life):  प्रकार्यवाद शिक्षा को जीवन की तैयारी मानते हुए विद्यालय को समाज का लघु रूप समझता है; यहाँ बच्चे सहयोग, अनुशासन, सामाजिक भूमिकाएँ और जिम्मेदारियाँ सीखते हैं।


प्रकार्यवाद की सीमाएँ (Limitations of Functionalism)


  • प्रकार्यवाद किसी एक ठोस, व्यवस्थित सिद्धांत या सूत्रबद्ध school के रूप में विकसित नहीं हो पाया; अलग‑अलग लेखकों के विचार एक थोड़ी ढीली परम्परा के रूप में दिखते हैं। इस कारण इसकी परिभाषा, सीमा और मूल मान्यताओं पर विद्वानों में समानता नहीं मिलती।
  • मन के कार्यों पर जोर देते‑देते प्रकार्यवाद मन की संरचना, प्रक्रियाओं की सूक्ष्म प्रकृति और तंत्र (mechanism) को पर्याप्त स्पष्ट नहीं कर पाया। कई आलोचकों के अनुसार, यह बताता है कि व्यवहार किस काम आता है, पर यह पर्याप्त नहीं बताता कि वह कैसे उत्पन्न होता है।
  • प्रकार्यवाद संरचनावाद की तरह सूक्ष्म अन्तर्दर्शन‑प्रयोगों तक सीमित नहीं रहा, लेकिन खुद अपनी खास विशिष्ट अनुसंधान‑विधि भी स्पष्ट रूप से सामने नहीं रख पाया। कई शोध केवल सामान्य अवलोकन, दार्शनिक चर्चा या शैक्षिक‑सुधार के स्तर पर रहे, जिन्हें कठोर “प्रयोगात्मक मनोविज्ञान” के मानकों पर सीमित माना गया।
  • व्यावहारिक समस्याओं, अनुकूलन और उपयोगिता पर अधिक बल देने के कारण कई बार इसके निष्कर्ष बहुत सामान्य और नीतिगत (policy‑type) हो जाते हैं। ऐसे सामान्य कथन हमेशा सभी संस्कृतियों, परिस्थितियों और व्यक्तियों पर समान रूप से लागू नहीं किए जा सकते।
  • प्रकार्यवाद मुख्यतः अनुकूल व्यवहार, शिक्षा, समायोजन आदि पर केन्द्रित रहा; गहरे अचेतन प्रक्रियाओं, आन्तरिक संघर्षों या गहन भावनात्मक अनुभवों को उतना महत्त्व नहीं दे पाया जितना बाद में मनोविश्लेषण और अन्य धाराओं ने दिया। इससे व्यक्तित्व के जटिल, रोगात्मक और अंतरंग पक्षों की व्याख्या में इसकी सीमा स्पष्ट होती है।


व्यवहारवाद (Behaviorism) (1913)


 व्यवहारवाद के जन्मदाता -  जे. बी. वाटसन 

व्यवहारवाद (Behaviorism) मनोविज्ञान का वह सम्प्रदाय है जो कहता है कि मनोविज्ञान का विषय देखा‑जाने वाला, मापा‑जाने वाला व्यवहार” होना चाहिए, न कि भीतर की चेतना, विचार या भावना। यह मानता है कि व्यवहार मुख्यतः उद्दीपन (Stimulus) और प्रतिक्रिया (Response) के सम्बन्ध तथा अधिगम (learning/conditioning) से बनता‑बदलता है।

दूसरे शब्दों में - व्यवहारवाद एक ऐसा मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण है जो केवल अवलोकनीय व्यवहार और बाह्य उद्दीपन को व्यवहार का आधार मानता है और इस बात पर जोर देता है कि व्यवहारों को अनुकूलन प्रक्रियाओं (conditioning) के माध्यम से बदला और नियंत्रित किया जा सकता है। 

बीसवीं शताब्दी के आरम्भ में संरचनावाद और प्रकार्यवाद का विरोध होने के कारण व्यवहारवाद की स्थापना हुई। इसके पहले चेतना के तत्वों के अध्ययन पर बल दिया गया, जिसे कुछ मनोवैज्ञानिकों ने निरर्थक समझा और कहा कि चेतना का हमारे शरीर पर जो प्रभाव पड़ता है उसका अध्ययन सार्थक है। इसलिए चेतना की रचना के स्थान पर उसके कार्यों पर बल दिया गया। किन्तु कुछ समय बाद चेतना का अध्ययन करने वाली पद्धति अन्तर्दर्शन विधि की कटु आलोचना होने लगी। इनमें विलियम जेम्स प्रमुख आलोचक थे।  इस वाद का क्षेत्र व्यवहार का अध्ययन करना है। वाटसन ने चेतना जैसी अस्पष्ट वस्तु को स्वीकार नहीं किया। इनके अनुसार प्राणी को समझने के लिए उसके शरीर के कार्य, इन्द्रियों की चेष्टाएँ और बाहरी क्रियाओं को देखना और समझना चाहिये। मानव के सम्पूर्ण व्यक्तित्व की जाँच, उसके व्यवहार और क्रियाओं से होती है। इसलिए केवल चेतना का अध्ययन करना उपयोगी नहीं, बल्कि संवेदन, भाव, प्रतिभा और स्मृति के स्थान पर उसकी चेष्टा या व्यवहार पर ध्यान दिया जाय जो कि प्रत्यक्ष दिखाई देता है। ये चेष्टाएँ और व्यवहार दोनों स्वाभाविक और अर्जित होते हैं जिनका अध्ययन मनोवैज्ञानिक करते हैं।  प्रमुख व्यवहारवादी मनोवैज्ञानिकों में मेक्समेयर, पी. बीस, हल,  टालमैन और बी. एफ. स्किनर आदि हैं।

व्यवहारवाद के उदय में पशु मनोविज्ञान के क्षेत्र में थार्नडाइक महोदय का उल्लेखनीय योगदान है। इन्होंने मछली, मुर्गी और बिल्लियों पर कई प्रयोग किये। इन प्रयोगों ने यह सिद्ध कर दिया कि पशु बुद्धि कम होने के कारण प्रयास और त्रुटि (Trial and Error) द्वारा बहुत-सी बातें सीखते हैं। पशु प्रयत्न करते-करते किसी कार्य को पूरा करने में सफल हो जाता है। अधिगम नामक अध्ययन में इन प्रयोगों का विस्तार से वर्णन किया गया


जॉन बी. वॉटसन – आधुनिक व्यवहारवाद के जनक; घोषणापत्र में कहा कि मनोविज्ञान केवल व्यवहार का विज्ञान है।

ईवॉन पावलॉव – शास्त्रीय अनुबंधन (classical conditioning) के प्रयोग (कुत्तों पर घंटी‑लार प्रयोग) के लिए प्रसिद्ध।

बी. एफ. स्किनर – ओपेरेंट अनुबंधन (operant conditioning), पुनर्बलन (reinforcement), दण्ड, स्किनर बॉक्स आदि पर शोध।

थॉर्नडाइक – प्रयत्न‑त्रुटि अधिगम और प्रभाव के नियम (Law of Effect) के कारण व्यवहारवादी परम्परा से गहरे जुड़े।




नव - व्यवहारवादी (Neo-Behaviourists):


नियो‑व्यवहारवादी (Neo‑behaviorists) वे मनोवैज्ञानिक हैं जिन्होंने शुद्ध व्यवहारवाद (Watson वाले S‑R मॉडल) को स्वीकार करते हुए उसमें “मध्यस्थ चर” (intervening variables), लक्ष्य‑निर्देशन और संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं जैसी बातों को जोड़कर उसे अधिक व्यापक बनाया। यह धारा पारंपरिक व्यवहारवाद और आधुनिक संज्ञानात्मक मनोविज्ञान के बीच की कड़ी मानी जाती है।

क्लार्क एल. हल (Clark L. Hull) – Drive‑reduction theory, habit strength, reinforcement को वैज्ञानिक समीकरणों और सूत्रों के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया ।

एडवर्ड सी. टॉलमैन (E.C. Tolman) – Purposive behaviorism; cognitive map, latent learning, goal‑directed behaviour की अवधारणाएँ; S–R के स्थान पर S–O–R  (Stimulus–Organism–Response) पर बल।

एडविन गुथ्री (E. Guthrie) – contiguity theory; एक‑प्रयास (one‑trial) अधिगम, उद्बोधन और आंदोलन (Movement) के तात्कालिक साथ‑साथ होने से ही बंध बनने की बात।

कभी‑कभी स्किनर को “radical behaviorist” और बंडूरा को “neo‑behavioristic / social learning theorist” के रूप में संक्रमण‑धारा में भी रखा जाता है, पर अधिकांश पाठ्यक्रमों में ऊपर के तीन नाम नियो‑व्यवहारवादी के रूप में अनिवार्य हैं।





 व्यवहारवाद (Behaviorism) की विशेषताएं


  • व्यवहारवाद में मनोविज्ञान का विषय आन्तरिक मन, चेतना या अचेतन नहीं, बल्कि बाह्य, प्रत्यक्ष, मापनीय व्यवहार होता है।​ केवल वही क्रियाएँ अध्ययन की जाती हैं जिन्हें देखा, गिना और मापा जा सके (जैसे बोलना, लिखना, रोना, दौड़ना, कार्य‑प्रदर्शन आदि)।​
  • व्यवहारवाद के अनुसार हर व्यवहार किसी उद्दीपन (Stimulus) के प्रति दी गई प्रतिक्रिया (Response) है; इसलिए व्यवहार को S–R सम्बन्ध के रूप में समझा जाता है।​ अधिगम मूलतः नये S–R बन्धों के बनने और पुराने के टूटने की प्रक्रिया मानी जाती है।​
  • व्यवहारवादी व्यक्तिगत अनुभव, भावनाओं और आत्म‑वर्णनों को अवैज्ञानिक मानते हैं; वे तथ्य, अवलोकन और मापन पर आधारित निष्कर्षों पर जोर देते हैं।​ अनुसंधान में शोधकर्ता के निजी मूल्यों/आस्थाओं को अलग रखकर निष्पक्ष (value‑free) और वस्तुनिष्ठ रहना आवश्यक माना जाता है।​
  • व्यवहारवाद नियंत्रित प्रयोग (खासकर प्रयोगशाला में), पशुओं पर प्रयोग, प्रतिक्रियाओं का समय/आवृत्ति/तीव्रता आदि मापने जैसी वैज्ञानिक तकनीकों का प्रयोग करता है।​ परिमाणीकरण (quantification), आँकड़ों का प्रयोग और प्रतिरूप (models) बनाने पर विशेष बल दिया जाता है।​
  • यह मान्यता कि अधिकांश व्यवहार जन्मजात नहीं, बल्कि अनुबंधन (conditioning), पुनर्बलन (reinforcement), दण्ड आदि प्रक्रियाओं से सीखे जाते हैं।​ सामान्य और असामान्य दोनों प्रकार के व्यवहारों की व्याख्या सीखने के सिद्धांतों से की जाती है; इसलिए अधिगम‑सिद्धांत इसका केंद्रीय भाग हैं।​
  • व्यवहारवाद के अनुसार व्यक्ति का व्यवहार मुख्यतः उसके वातावरण, प्रशिक्षण और अनुभवों  (Environment, training and experiences) का परिणाम है, न कि केवल वंशानुक्रम या जन्मजात प्रवृत्तियों का।​  “बच्चा खाली स्लेट है” जैसी धारणा से प्रेरित होकर यह मानता है कि उपयुक्त परिस्थितियाँ व पुनर्बलन देकर व्यवहार को इच्छित दिशा में ढाला जा सकता है।
  • व्यवहारवाद यह मानता है कि उसके द्वारा प्रतिपादित अधिगम और S–R के नियम मनुष्य तथा पशु दोनों पर व्यापक रूप से लागू किए जा सकते हैं।​ इसी कारण यह मनोविज्ञान को “pure science” की तरह सार्वत्रिक नियमों (universal rules) वाला विज्ञान मानने का प्रयास करता है।


शिक्षा में उपयोगिता (Usefulness in Education)



  • पुनर्बलन और दण्ड का शैक्षिक उपयोग (Educational Uses of Reinforcement and Punishment): व्यवहारवाद ने दिखाया कि पुरस्कार, प्रशंसा, ग्रेड, टोकन, दण्ड आदि पुनर्बलन (reinforcement) और दंड के माध्यम से वांछित व्यवहार को बढ़ाया और अवांछित को घटाया जा सकता है।​कक्षा‑प्रबंधन में नियमों का पालन, समय पर गृह‑कार्य, ध्यानपूर्वक सुनना आदि व्यवहार positive reinforcement से सुदृढ़ किए जाते हैं।​
  • ड्रिल, अभ्यास और कार्यक्रमबद्ध शिक्षण (Drill, Practice and Programmed Learning): “ड्रिल‑एंड‑प्रैक्टिस”, बार‑बार अभ्यास, छोटे‑छोटे चरणों में पढ़ाना, त्वरित फीडबैक देना – ये सभी तकनीकें व्यवहारवादी अधिगम‑सिद्धांतों पर आधारित हैं।​ Programmed instruction, teaching machines और step‑by‑step learning materials स्किनर के operant conditioning theory के प्रत्यक्ष अनुप्रयोग हैं।​
  • व्यवहार संशोधन (Behavior Modification): अनुशासनहीन, कुसमायोजित (undisciplined, maladjusted)या low‑motivation वाले विद्यार्थियों के लिए व्यवहार‑संशोधन कार्यक्रम (reward charts, token economy, response cost आदि) विकसित किए गए।​ इससे कक्षा में आक्रामकता, अनुपस्थित रहना, काम टालना (aggression, absenteeism and procrastination) जैसे अवांछित व्यवहारों को कम करने और सकारात्मक व्यवहारों को बढ़ाने में व्यावहारिक मदद मिलती है।​
  • व्यवहारिक उद्देश्यों और मापनीय उपलब्धि (Behavioral Objectives and Measurable Achievements): व्यवहारवाद ने “behavioral objectives” की संकल्पना को लोकप्रिय किया, पाठ के अन्त में विद्यार्थी कौन‑सा प्रेक्षणीय कार्य कर सकेगा, इसे पहले से स्पष्ट रूप में लिखना।​ इससे शिक्षण अधिक लक्ष्य‑उन्मुख, मापनीय और मूल्यांकन‑योग्य (goal-oriented, measurable and evaluable) बना; उपलब्धि‑परीक्षण, objective tests आदि का विकास इसी सोच से जुड़ा है।​
  • अनुकूल वातावरण और सीखने का नियंत्रण (Favorable Environment and Control of Learning): इस दृष्टिकोण ने बताया कि यदि शिक्षक कक्षा का वातावरण, नियम‑व्यवस्था और पुनर्बलन‑प्रणाली को नियंत्रित करे, तो सीखने की दिशा और गति को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।​ Thorndike, Pavlov, Skinner के प्रयोगों से निकले नियमों के आधार पर “favorable learning environment” (उत्तेजना, अभ्यास, पुनर्बलन, फीडबैक) की डिजाइनिंग संभव हुई​।
  • विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों के लिए उपयोगिता (Usefulness for Children with Special Needs):  कुसमायोजित, विकलांग या विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के प्रशिक्षण में छोटी‑छोटी प्रेक्षणीय इकाइयों, निरंतर पुनर्बलन और behavior shaping की तकनीकें बहुत सफल रही हैं।​ ऑटिज़्म, Attention problems आदि में लागू ABA (Applied Behavior Analysis) इसी व्यवहारवादी परम्परा पर आधारित आधुनिक पद्धति है।


व्यवहारवाद की सीमाएँ (Limitations of Behaviorism)



  • व्यवहारवाद विचार, समझ, कल्पना, समस्या‑समाधान, योजना, रचनात्मकता (thinking, understanding, imagination, problem-solving, planning and creativity)  जैसी संज्ञानात्मक प्रक्रियाओं को अध्ययन‑विषय नहीं मानता।​ इससे जटिल मानवीय अधिगम (जैसे अवधारणा‑निर्माण, तर्क, अंतर्दृष्टि‑अधिगम) की व्याख्या अधूरी रह जाती है।​
  • यह दृष्टिकोण मुख्यतः बाहरी प्रतिक्रियाओं तक सीमित रहता है, गहरे भावनात्मक अनुभव, व्यक्तित्व‑गत भिन्नताएँ और अचेतन प्रक्रियाएँ  (emotional experiences, personality differences and unconscious processes) (जिन पर मनोविश्लेषण आदि ने बल दिया) लगभग नज़रअंदाज़ हो जाते हैं।​ परिणामस्वरूप जटिल वैयक्तिक‑सामाजिक समस्याओं, संघर्षों और मानसिक विकारों (complex personal and social problems, conflicts and mental disorders) की व्याख्या में यह अपर्याप्त माना जाता है।​
  • व्यवहारवाद मनुष्य को किसी हद तक S–R मशीन की तरह देखता है, जहाँ पर्यावरणीय उद्दीपन और पुनर्बलन से व्यवहार “ढाला” जाता है।​ यह दृष्टिकोण मुक्त इच्छा, आत्म‑नियंत्रण, नैतिक‑मूल्य, आत्म‑साक्षात्कार और मानवीय गरिमा (Free will, self-control, moral values, self-actualization and human dignity) जैसे मानवीय गुणों को पर्याप्त महत्व नहीं देता।​
  • “सिर्फ वही वस्तु वैज्ञानिक है जिसे देखा और मापा जा सके” – इस आग्रह के कारण अनेक महत्वपूर्ण मानवीय अनुभव शोध‑क्षेत्र से बाहर चले जाते हैं।​ व्यवहारवादी मॉडलों से हमेशा यह नहीं समझा जा सकता कि एक ही परिस्थितियों में अलग‑अलग लोग अलग तरह से क्यों व्यवहार करते हैं।​
  • अनुबंधन (conditioning), पुनर्बलन (reinforcement), drill आदि से सरल आदतें और मूल कौशल तो समझाए जा सकते हैं, परन्तु उच्च स्तरीय सोच, रचनात्मकता, अर्थपूर्ण अधिगम, भाषा‑अधिगम (higher-level thinking, creativity, meaningful learning, language learning) आदि को केवल S–R सिद्धांतों से समझाना कठिन है।​ इसके कारण बाद में गेस्टाल्ट, संज्ञानात्मक और मानवतावादी (Gestalt, cognitive and humanistic) मनोविज्ञान ने व्यवहारवाद की आलोचना करते हुए अपने सिद्धांत विकसित किए।​
  • शिक्षा में यदि केवल पुरस्कार‑दण्ड और बाह्य नियंत्रण पर आधारित व्यवहारवादी पद्धतियाँ अपनाई जाएँ, तो विद्यार्थियों की आंतरिक अभिप्रेरणा, स्वायत्तता और रचनात्मकता (intrinsic motivation, autonomy and creativity) प्रभावित हो सकती है।​ छात्र केवल पुरस्कार पाने या दण्ड से बचने के लिए काम करने लगते हैं, वास्तविक रुचि, जिज्ञासा और स्व‑प्रेरित अधिगम कम हो सकता है।


संबंधवाद/साहचर्यवाद (Associationism)



यह एक प्राचीन ब्रिटिश सम्प्रदाय है साहचर्यवाद का प्रादुर्भाव अरस्तु के लेख स्मृति (Memory) से हुआ था और यह 17वीं तथा 18वीं शताब्दी के ब्रिटिश दार्शनिकों के लिए महत्वपूर्ण विषय रहा।  साहचर्यवाद (Associationism) वह मनोवैज्ञानिक सिद्धांत है जिसके अनुसार मानसिक प्रक्रियाएँ “संयोगों/संघों” (associations) के आधार पर काम करती हैं, यानी सरल संवेदी‑अनुभव और विचार (simple sensory experiences and ideas) आपस में जुड़‑जुड़कर जटिल विचारों और मानसिक क्रियाओं का निर्माण करते हैं। इस दृष्टिकोण में अधिगम, स्मृति और चिंतन को मूलतः “विचारों, उद्दीपनों और अनुभवों  (ideas, stimuli and experiences) के बीच बने संबंधों” से समझाया जाता है।
इस सम्प्रदाय की नींव थोमस हॉब्स (1588-1670), जोहन लोक (1632-1704), जॉर्ज बर्कले (1685-1753) और डेविड ह्यूम (1711-1776) ने डाली। इन सभी दार्शनिकों ने सहवर्तिता (Contiguity) तथा समानता (Similarity) को साहचर्य (Association) के आधारभूत नियम मानें।
  • साहचर्यवाद (Associationism) के अनुसार एक मानसिक स्थिति (जैसे कोई अनुभूति या विचार) बार‑बार दूसरी स्थिति के साथ आने लगे तो दोनों के बीच संबंध बन जाता है; बाद में पहली स्थिति अपने‑आप दूसरी को जगा देती है।​
  • “जटिल विचार सरल विचारों के संघ (association) से बनते हैं” – यह इसका केन्द्रीय सिद्धांत है; इसीलिए इसे ऐतिहासिक रूप से अनुभववाद (empiricism) की मनोवैज्ञानिक अभिव्यक्ति माना गया है।

अध्ययन की दृष्टि से साहचर्यवाद को दो भागों में बाँटा जाता है- (i) प्राचीन साहचर्यवाद (ii) नवीन साहचर्यवाद ।

प्राचीन साहचर्यवाद विशेष रूप से ब्रिटिश दार्शनिकों के विचारों पर आधारित है। अरस्तू, हाब्स, जॉन लॉक, जॉर्ज बर्कले, डेविड ह्यूम, डेविड हार्टले, टॉमस ब्राउन, जेम्स मिल तथा अलेग्जेण्डर बेन के नाम इस विचारधारा को मानने वालों में प्रमुख हैं। प्राचीन साहचर्यवादियों ने अधिगम के स्थान पर स्मरण (memory) को अधिक महत्व दिया। इनके अनुसार स्मृति में आने वाले विचार पूर्व अनुभवों का परिणाम होते हैं। इनका मानना है कि कोई घटना अथवा मस्तिष्क में आने वाला विचार किसी न किसी दूसरी घटना की याद दिला देता है अर्थात् घटना का दूसरी घटना से कुछ-न-कुछ सम्बन्ध होता है।
अधिकांश ग्रन्थों में संघ के तीन मुख्य नियम बताये जाते हैं:​

  • सहसंयोग (Contiguity) – जो अनुभूतियाँ समय या स्थान में साथ‑साथ घटित होती हैं, वे आपस में जुड़ जाती हैं (जैसे घंटी की आवाज़ और भोजन)।​
  • समानता (Similarity) – समान प्रकार के विचार/अनुभव एक‑दूसरे को स्मृति में जाग्रत कर देते हैं (एक मित्र को देखकर दूसरे मित्र की याद आना)।​
  • कारण‑कार्य / संघटन (Cause–Effect / Other laws) – कुछ विचार कारण–कार्य के संबंध से जुड़े रहते हैं; बार‑बार के अनुभव से यह संबंध मजबूत होता है।
कई आधुनिक विवरणों में आवृत्ति (frequency) और तीव्रता (vividness) को भी सहायक सिद्धांत के रूप में जोड़ा जाता है – जितनी अधिक बार या जितनी स्पष्टता से दो अनुभव साथ आएँगे, संघ (association) उतना मजबूत होगा।

प्राचीन साहचर्यवादियों की अध्ययन विधियाँ प्रयोगात्मक नहीं थी। ये सभी दार्शनिक थे और इनकी अध्ययन विधियाँ निरीक्षण  तथा विचारों का विश्लेषण करने तक सीमित थी। 

नवीन साहचर्यवादियों में एबिंगहास (Herman Ebbinghaus, 1850-1909), थॉर्नडाइक (E.L. Thorndike, 1874-1949), पैवलोव  (I.P. Pavlov, 1849-1936) के नाम प्रमुख हैं। इनका मानना है कि प्रत्येक कारण (Cause) किसी निश्चित परिणाम के रूप में प्रकट होते हैं। इन्होंने परिणाम देखकर कारण (Cause) नहीं खोजें बल्कि कारणों के अध्ययन के आधार पर इन्होंने परिणामों का पता लगाया।

एबिंगहॉस ने प्रयोगों के आधार पर बारम्बारता  का नियम (Law of Repetition) तथा अनाभ्यास का नियम (Law of Disuse) प्रतिपादित किये। थार्नडाइक ने उत्तेजना (Stimulus) तथा अनुक्रिया (Response) साहचर्य का सीखने के सम्बन्ध में अध्ययन किया। इन्होंने साहचर्य के आधार पर सीखने के नियम तथा सिद्धान्त भी प्रतिपादित किये।


संबंधवाद/साहचर्यवाद (Associationism) की विशेषताएं


  • साहचर्यवाद मानता है कि मन की सारी सामग्री इन्द्रिय‑अनुभवों (sense experiences) से आती है; कोई भी ज्ञान जन्मजात नहीं, बल्कि अनुभवों के संगठन का परिणाम है।​ यह आधुनिक अनुभववाद (Empiricism) की मनोवैज्ञानिक अभिव्यक्ति माना जाता है, जहाँ विचारों की उत्पत्ति संवेदनाओं से मानी जाती है।
  • इसकी मूल धारणा है कि जटिल विचार अपेक्षाकृत सरल विचारों/संवेदनाओं के साहचर्य से बनते हैं।​ कई सरल अनुभव बार‑बार साथ‑साथ आएँ, तो वे मिलकर “समग्र (composite)” या जटिल मानसिक संरचना (विचार, कल्पना, संकल्पना) बना देते हैं।​
  • साहचर्यवादियों ने यह समझाने के लिए नियम दिये कि विचारों के बीच संबंध कैसे बनते हैं; मुख्य रूप से: सन्निकटता / सहसंयोग (Contiguity) – जो अनुभव समय या स्थान में साथ‑साथ आते हैं, वे जुड़ जाते हैं।​साधर्म्य (Similarity) – समान गुणों वाले अनुभव एक‑दूसरे को स्मरण कराते हैं।​ 
          विरोध / वैधर्म्य (Contrast) – विरोधी गुणों वाली वस्तुएँ भी परस्पर को याद दिलाती हैं (जैसे गर्म–ठंडा)।​
  • स्मरण को “पूर्वानुभवों की पुनरावृत्ति” माना गया, जो साहचर्य के कारण स्वतः जाग्रत होते हैं; एक अनुभव दूसरे को खींच लाता है।​ अधिगम को नए‑नए साहचर्य (associations) बनने की प्रक्रिया के रूप में देखा गया; यही विचार बाद में अनुबंधन (conditioning) और व्यवहारवादी अधिगम‑सिद्धांतों की पृष्ठभूमि बना।​
  • सोच, निर्णय, कल्पना, यहाँ तक कि भावनाओं जैसी उच्च मानसिक प्रक्रियाओं को भी “संवेदनाएँ + उनके साहचर्य” के यांत्रिक संयोजन से समझाने की कोशिश की गई।​ इस दृष्टि से मन को किसी “मानसिक रसायन (mental chemistry)” की तरह माना गया, जहाँ सरल तत्व (संवेदनाएँ) मिलकर जटिल यौगिक (विचार) बनाते हैं।​
  • साहचर्यवादियों के अनुसार अध्ययन‑अधिगम में सही प्रकार के साहचर्य तैयार करना अत्यन्त महत्वपूर्ण है – जैसे शब्द–अर्थ, नियम–उदाहरण, दृश्य–ध्वनि आदि को साथ‑साथ प्रस्तुत करना।​ बार‑बार पुनरावृत्ति, अभ्यास और पुराने ज्ञान से समानता/सम्बंध दिखाकर नया ज्ञान जोड़ना – ये सब उनके “association‑based learning” दृष्टिकोण से मेल खाते हैं


शिक्षा में उपयोगिता (Usefulness in Education)

संबंधवाद / साहचर्यवाद (Associationism) का शिक्षा में मुख्य उपयोग यह है कि यह सीखने को “पुराने और नए अनुभवों के बीच सही संबंध (association) बनाने की प्रक्रिया” मानता है। इसलिए यह बताता है कि शिक्षक को सामग्री ऐसे ढंग से प्रस्तुत करनी चाहिए कि नए ज्ञान का सीधा संबंध बालक के पूर्व‑अनुभवों से जुड़ सके।​

  • नए ज्ञान को पुराने से जोड़ना (Connecting New Knowledge to Old Knowledge): साहचर्यवाद के अनुसार जब नया विचार पुराने अनुभव के साथ जुड़ता है, तो सीखना स्थायी होता है; अतः कक्षा में किसी भी नये पाठ को पढ़ाते समय पहले पूर्व‑ज्ञान की जाँच और सक्रियण (recall) आवश्यक है।​ EX. गणित के नये सूत्र को पहले पहले से ज्ञात उदाहरणों, दृश्य‑सामग्री या जीवन‑अनुभवों से जोड़कर समझाया जाए, तो संप्रत्यय (concept) सुगमता से बनता है।​
  • सहसंयोग (Contiguity) और पुनरावृत्ति का उपयोग (Use of Contiguity and Repetition): सिद्धान्त कहता है कि जो अनुभव समय और स्थान में साथ‑साथ आते हैं, उनके बीच साहचर्य बनता है; इसलिए शब्द–अर्थ, चित्र–शब्द, वस्तु–नाम आदि को साथ‑साथ दिखाना/सुनाना प्रभावी माना जाता है।​ बार‑बार पुनरावृत्ति और अभ्यास से ये साहचर्य मजबूत होते हैं; इसलिए drill, practice, revision, flashcards जैसी तकनीकें साहचर्यवादी दृष्टि से समर्थित हैं।​

  • साहचर्य विधि एवं शिक्षण सामग्रियाँ (Associative Methods and Teaching Materials): प्राथमिक स्तर पर चित्र, मॉडल, वास्तविक वस्तु और लिखित/मौखिक शब्द के बीच साहचर्य स्थापित करने वाली “साहचर्य विधि” (जैसे Montessori की picture–word matching) बहुत प्रभावी मानी जाती है।​ मल्टी‑मीडिया, flash cards, word–picture charts, mind‑maps जैसी सामग्री भी मूलतः यही काम करती है – विभिन्न संकेतों (visual, verbal, auditory) के बीच मजबूत links बनाना।​

  • स्मरण और अधिगम‑समस्याओं में उपयोगिता (Usefulness in Memory and Learning Problems): साहचर्यवाद स्मरण को पूर्व अनुभवों की पुनरावृत्ति मानता है; अतः “अच्छा याद न रहना” अक्सर उचित साहचर्य न बनने का परिणाम माना जा सकता है।​ सीखने में कठिनाई वाले छात्रों के लिए शिक्षक पुराने परिचित संकेतों के साथ नया ज्ञान जोड़कर, छोटे‑छोटे और सार्थक संघ बनाकर स्मृति को मजबूत कर सकता है।​
  • आधुनिक अधिगम सिद्धांतों पर प्रभाव (Influence on Modern Learning Theories): क्लासिकल और ओपेरेंट अनुबंधन, stimulus–response learning, और network‑आधारित संज्ञानात्मक मॉडलों में “कनेक्शन/लिंक” की जो धारणा है, उसकी ऐतिहासिक जड़ें साहचर्यवाद में ही हैं।​ इस प्रकार, आज भले ही इसे स्वतंत्र school के रूप में न पढ़ाया जाए, लेकिन अधिगम‑मनोविज्ञान एवं शिक्षण‑विधियों की पृष्ठभूमि में इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव लगातार बना हुआ है।



 संबंधवाद / साहचर्यवाद (Associationism) की सीमाएँ



  • साहचर्यवाद जटिल मानसिक क्रियाओं (सोच, तर्क, समस्या‑समाधान, रचनात्मकता) को केवल सरल संवेदनाओं या विचारों के साहचर्य (associations) का योग मानता है, जिससे मानवीय चिंतन की गहराई और संगठन की सही व्याख्या नहीं हो पाती।​
  • यह मान लेता है कि जो अनुभव साथ‑साथ आएँगे, उनके बीच संबंध बन जाएगा, पर यह नहीं बताता कि किसी व्यक्ति के लिए कौन‑सा संबंध अर्थपूर्ण, उपयोगी या स्थायी रहेगा और क्यों।​ गेस्टाल्ट और संज्ञानात्मक मनोविज्ञान ने दिखाया कि केवल “संयोग” नहीं, बल्कि संपूर्ण संरचना, पैटर्न, अंतर्दृष्टि और उद्देश्य भी अधिगम को गहराई से प्रभावित करते हैं।​
  • साहचर्यवाद लगभग पूरा ध्यान अनुभव और साहचर्य पर रखता है; जन्मजात प्रवृत्तियाँ, परिपक्वता और  तंत्रिका‑तंत्र (innate tendencies, maturation, nervous system) की तैयारी आदि को वह पर्याप्त महत्व नहीं देता।​
  • यह सिद्धांत मुख्यतः “कौन‑सी वस्तु किसके साथ जुड़ी” पर केन्द्रित है; सीखने वाले की भावनाएँ, रुचि, डर, जिज्ञासा या आंतरिक प्रेरणा की भूमिका पर बहुत कम ध्यान देता है।​ कक्षा‑स्थितियों में भावनात्मक माहौल और प्रेरणा सीखने को गहराई से प्रभावित करते हैं, जिन्हें केवल साहचर्य के नियमों से नहीं समझाया जा सकता।​
  • रटन, शब्द–अर्थ, आदत आदि जैसे निम्न‑स्तरीय अधिगम को साहचर्य से कुछ हद तक समझा जा सकता है, परन्तु संकल्पना‑निर्माण, सिद्धान्त‑निर्माण, तर्क, रचनात्मकता तथा अंतर्दृष्टि‑अधिगम (concept formation, theory building, reasoning, creativity, and insight learning) को मात्र साहचर्य पर आधारित मॉडल पर्याप्त रूप से नहीं समझाते।​
  • यदि शिक्षण पूरी तरह साहचर्यवादी सोच पर आधारित हो जाए, तो जोर बार‑बार जोड़ने (repetition, drill) और सतही स्मरण पर रह जाता है; इससे विद्यार्थियों में अर्थपूर्ण समझ और आलोचनात्मक सोच के बजाय केवल रटने की प्रवृत्ति विकसित हो सकती है।​ ऐसे अधिगम का स्थायित्व और स्थानांतरण (transfer) सीमित होता है, क्योंकि विद्यार्थी “क्यों” और “कैसे” नहीं, केवल “किसके साथ क्या जुड़ा है” याद रखते हैं।


व्यक्तिपरक/ वैयक्तिक मनोविज्ञान (Individual Psychology)



व्यक्तिपरक मनोविज्ञान (Individual Psychology) अल्फ्रेड एड्लर (Alfred Adler) द्वारा विकसित व्यक्तित्व‑सिद्धांत और मनोचिकित्सीय संप्रदाय है, जिसका केन्द्रीय विचार यह है कि प्रत्येक व्यक्ति एक “एकीकृत, उद्देश्यपूर्ण और सामाजिक संदर्भ में जीने वाली संपूर्ण इकाई (integrated, purposeful, and complete entity living within a social context)” है। यह फ्रायड के मनोविश्लेषण से अलग होकर विकसित हुआ और मानसिक जीवन की व्याख्या में सामाजिक रुचि, हीनता‑भावना और श्रेष्ठता की आकांक्षा पर ज़ोर देता है।​

“Individual” शब्द यहाँ दो बातों पर बल देता है: व्यक्ति की अद्वितीयता (हर व्यक्ति विशिष्ट है) और उसकी अखंडता (व्यक्तित्व को अलग‑अलग हिस्सों में नहीं बाँटा जा सकता, वह एक संगठित संपूर्ण है)।​ एड्लर के अनुसार व्यक्ति का व्यवहार किसी अचेतन यौन‑प्रेरणा से नहीं, बल्कि अपने आप को कमतर महसूस करने से ऊपर उठने और “महत्त्व या सफलता (importance or success)” की अनुभूति पाने की कोशिश से प्रेरित होता है; यह प्रयास सामाजिक संदर्भ के भीतर चलता है।​
एडलर ने यद्यपि फ्रायड के सहयोगी के रूप में कार्य किया लेकिन वह फ्रायड के इस मत से अहसमत था कि व्यक्तित्व के निर्धारण तथा मनोरागों में कामुकता (Sexuality) महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। एडलर का मानना है कि बच्चे का व्यक्तित्व (Individuality) पाँच वर्ष के बचपन काल में एक विशेष जीवन शैली (Life Style) की संरचना के रूप में विकसित हो जाता है। जीवन शैली वैयक्तिक मनोविज्ञान का केन्द्रीय विचार (Central Notion) है। बालक अपने शारीरिक अंगों में कोई कमी या दोष अनुभव करता है तो उसमें अपने स्वयं के प्रति हीनभावना उत्पन्न हो जाती है। बालक इस हीनभावना (Complex) से जिस ढंग से निपटने की कोशिश करता है वह उसकी जीवन शैली कहलाती है। एडलर कहता है, कि व्यक्ति के सभी कायों और व्यवहार का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कोई न कोई लक्ष्य होता है। लक्ष्य के निर्धारण तथा प्राप्ति में व्यक्ति की जीवन शैली महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।



प्रमुख अवधारणाएँ (Main concepts)

  • हीनता‑भावना और क्षतिपूर्ति (Inferiority & Compensation)- हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में अपने को “कमतर / असमर्थ (inferiority)” अनुभव करता है; यही हीनता‑भावना उसे स्वयं को बेहतर बनाने, उपलब्धि और दक्षता की ओर प्रयत्न करने के लिए प्रेरित करती है।​
  • श्रेष्ठता / परिपूर्णता की ओर प्रयत्न (Striving for superiority / perfection)- यह प्रयत्न दो रूप ले सकता है – रचनात्मक (creative), सामाजिक भलाई की दिशा में (socially useful goals) और  आत्मकेन्द्रित (self-centered) , प्रभुत्व की दिशा में (power over others) – जो अस्वस्थ व्यक्तित्व की ओर ले जाता है।​
  • जीवन‑शैली (Style of Life / Lifestyle)- एड्लर ने “style of life” शब्द से उस विशिष्ट ढंग को बताया जिसमें व्यक्ति अपने लक्ष्य चुनता है, दुनिया को देखता है और समस्याओं से निपटता है। यह जीवन‑शैली बचपन में ही बनती है और आगे चलकर लगभग सभी व्यवहार को संगठित करती है।​
  • सामाजिक रुचि (Social Interest)- स्वस्थ व्यक्तित्व की पहचान यह है कि व्यक्ति अपने आप को समुदाय का भाग समझे, सहयोग, सहानुभूति और योगदान की भावना रखे।​ मानसिक रोग या असमायोजन तब दिखता है जब व्यक्ति अत्यधिक आत्मकेन्द्रित, अलग‑थलग और केवल निजी श्रेष्ठता की तलाश में रहता है।​
  • समग्र दृष्टि (Holism)- एड्लर का आग्रह था कि व्यक्ति को “id–ego–superego” जैसे भागों में बाँट कर नहीं, बल्कि एक समग्र, लक्ष्य‑निष्ठ इकाई के रूप में समझा जाए; जैविक और सामाजिक दोनों पहलुओं की संयुक्त दृष्टि आवश्यक है।



वैयक्तिक मनोविज्ञान (Individual Psychology) की विशेषताएं



वैयक्तिक मनोविज्ञान (Individual Psychology) की विशेषताएँ समझने की सबसे अच्छी कुंजी तीन शब्द हैं – समग्र (holistic), लक्ष्य‑निष्ठ (goal‑directed) और सामाजिक (social), जिन पर अल्फ्रेड एड्लर ने विशेष ज़ोर दिया।​


  • “Individual” को एड्लर “अखण्ड” (un‑divided) मानते हैं: व्यक्तित्व को id–ego–superego जैसे टुकड़ों में नहीं, बल्कि एकीकृत संपूर्ण के रूप में समझा जाता है।​ हर व्यक्ति अपनी विशिष्ट “जीवन‑शैली” (style of life) रखता है, जो बचपन के अनुभवों के आधार पर बनती है और आगे के व्यवहार को संगठित करती है।​
  • सिद्धांत के केन्द्र में “हीनता‑भावना” (inferiority feelings) है – व्यक्ति अपने किसी कमी या कमजोरी के कारण स्वयं को कमतर अनुभव करता है।​ यही हीनता‑भाव उसे क्षतिपूर्ति (compensation) की ओर ले जाता है, यानी अपनी कमी को दूर करने, कुछ विशेष दक्षता या उपलब्धि प्राप्त करने के प्रयास में लगा देता है।​
  • मनुष्य मूलतः “श्रेष्ठता” या “परिपूर्णता” (striving for superiority / perfection) की ओर प्रयत्नशील प्राणी है; यही उसकी मुख्य प्रेरक शक्ति मानी गई।​ यह प्रयत्न जब सामाजिक रूप से उपयोगी लक्ष्यों की ओर होता है तो स्वस्थ व्यक्तित्व बनता है, और जब केवल प्रभुत्व या स्वार्थ की दिशा लेता है तो अस्वस्थता की ओर जाता है।​
  • स्वस्थ व्यक्तित्व की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता “सामाजिक रुचि” (Social Interest) है – अर्थात् समुदाय‑भाव, सहयोग, सहानुभूति और समाज के प्रति जिम्मेदारी।​ मानसिक रोग या असमायोजन को एड्लर ने सामाजिक रुचि की कमी, अत्यधिक आत्मकेन्द्रिकता और अलगाव  (lack of social interest, excessive egocentrism and isolation) से जोड़ा।​
  • फ्रायड के विपरीत, एड्लर का मत है कि व्यक्ति मुख्यतः भविष्य के लक्ष्यों और अर्थपूर्ण उद्देश्यों से प्रेरित होता है, न कि केवल अतीत की प्रवृत्तियों से।​ हर व्यवहार के पीछे कोई “निजी लक्ष्य” (fictional finalism / guiding fiction) कार्य कर रहा होता है, जो अक्सर अचेतन होता है लेकिन व्यक्ति को दिशा देता है।​
  • व्यक्तित्व‑निर्माण में पारिवारिक वातावरण, बाल्यकालीन सम्बन्धों और जन्म‑क्रम (Birth Order) (first, middle, youngest, single) को विशेष महत्व दिया गया।​ अलग‑अलग जन्म‑क्रम वाले बच्चों की हीनता‑भावना, प्रतिस्पर्धा‑भाव और सामाजिक रुचि (inferiority complexes, competitiveness, and social interests) के ढंग में व्यवस्थित भिन्नताएँ पाई जाती हैं।​
  • वैयक्तिक मनोविज्ञान मानवीय (humanistic) और प्रोत्साहन‑केन्द्रित है: इसमें दण्ड या निदान से अधिक महत्व “हिम्मत बढ़ाने” (encouragement), सहयोग और जीवन‑शैली में सकारात्मक परिवर्तन को दिया जाता है।​ शिक्षक/परामर्शदाता का कार्य बच्चे में सामाजिक रुचि, आत्म‑विश्वास और यथार्थवादी लक्ष्य (Social interest, self-confidence and realistic goals) विकसित करने में मदद करना है, न कि केवल गलतियों पर सज़ा देना।




शिक्षा में उपयोगिता (Usefulness in Education)



वैयक्तिक मनोविज्ञान (Individual Psychology) शिक्षा को मूलतः “व्यक्ति को सामाजिक रूप से उपयोगी, सहयोगी और आत्मविश्वासी बनाने की प्रक्रिया” मानता है, इसलिए इसका सीधा संबंध शिक्षक की भूमिका, कक्षा‑वातावरण और परामर्श से जुड़ता है।

  • बालक‑केंद्रित और समग्र दृष्टि (Child-Centered and Holistic Approach): एड्लर प्रत्येक विद्यार्थी को एक विशिष्ट, अखण्ड व्यक्तित्व मानता है; इससे शिक्षा में “whole child” पर बल मिलता है – केवल अंकों पर नहीं, उसकी भावनाओं, संबंधों और जीवन‑लक्ष्यों पर भी ध्यान। शिक्षक को बच्चे की समग्र जीवन‑शैली (style of life) – वह दुनिया को कैसे देखता है, अपने को कैसा समझता है, किन लक्ष्यों की ओर बढ़ रहा है – समझकर शिक्षण‑रणनीति बनानी चाहिए।
  • हीनता‑भावना और प्रोत्साहन (Inferiority Complex and Encouragement):  कई विद्यार्थी शारीरिक, बौद्धिक, आर्थिक या पारिवारिक कारणों से स्वयं को “कमतर (lesser)” अनुभव करते हैं; एड्लर इसे हीनता‑भावना कहता है और मानता है कि यही उनका मुख्य संघर्ष है। शिक्षक का काम केवल गलती पकड़ना नहीं, बल्कि लगातार प्रोत्साहन देकर (encouragement) छात्र को यह महसूस कराना है कि वह सक्षम, मूल्यवान और प्रगति‑योग्य है – इससे ड्रॉप‑आउट, अनुशासनहीनता व कम उपलब्धि (Indiscipline and underachievement) की समस्याएँ घटती हैं।
  • सामाजिक रुचि और सहकारी कक्षा (Social Interest and the Cooperative Classroom): वैयक्तिक मनोविज्ञान “social interest” को स्वस्थ व्यक्तित्व की सबसे बड़ी कसौटी मानता है; शिक्षा का लक्ष्य भी यही होना चाहिए कि छात्र सहयोग, साझा जिम्मेदारी और समुदाय‑भाव (students to cooperate, share responsibility and cultivate) सीखें। कक्षा‑गत गतिविधियाँ (समूह‑कार्य, सहकारी अधिगम, सेवा‑परियोजनाएँ) विद्यार्थियों में “मैं उपयोगी हूँ, मैं योगदान दे सकता हूँ” जैसी भावना जगाती हैं, जो एड्लरियन दृष्टि से मानसिक स्वास्थ्य की आधारशिला है
  • अनुशासन का लोकतांत्रिक मॉडल (The Democratic Model of Discipline): एड्लर कठोर दमनात्मक अनुशासन को नकारते हुए “लोकतांत्रिक” या “भागीदारी‑आधारित (participatory)” अनुशासन की वकालत करता है, जहाँ नियम बच्चों से चर्चा‑संवाद के बाद बनते हैं। इस दृष्टिकोण से कक्षा में दण्ड की जगह तर्क, स्व‑नियंत्रण (Self Control), तार्किक परिणाम (logical consequences) और जिम्मेदारी पर बल दिया जाता है, जिससे बच्चों में आत्म‑नियमन और नैतिकता (Self-regulation and ethics) विकसित होती है।
  • पारिवारिक पृष्ठभूमि और परामर्श (Family Background and Counseling):  एड्लर जन्म‑क्रम (birth order), पारिवारिक वातावरण और प्रारम्भिक स्मृतियों (family environment and early memories) को अत्यंत महत्वपूर्ण मानता है; शिक्षक इन बातों का ध्यान रखकर “problem child” को केवल अनुशासन‑समस्या मानने की बजाय उसके घर‑पर्यावरण और हीनता‑संसार को समझ सकता है। विद्यालय‑परामर्श (Adlerian counseling) के माध्यम से छात्र की निजी तर्क (private logic) को समझकर उसे अधिक यथार्थवादी और सामाजिक रूप से उपयोगी लक्ष्य चुनने में सहायता दी जा सकती है।
  • करियर‑निर्देशन और लक्ष्य‑निर्धारण (Career Guidance and Goal Setting): वैयक्तिक मनोविज्ञान के अनुसार हर छात्र के भीतर “भविष्य की एक काल्पनिक छवि” (fictional goal) काम करती है; शिक्षा को इस लक्ष्य को स्पष्ट, यथार्थवादी और सामाजिक रूप से अर्थपूर्ण दिशा देने में मदद करनी चाहिए। करियर‑निर्देशन (Career-guidance), life‑skills education और goal‑setting गतिविधियाँ – जिनमें छात्र अपनी ताकत, रुचि और सामाजिक योगदान पर विचार करें – एड्लरियन सिद्धांतों से गहराई से मेल खाती हैं।




व्यक्तिपरक मनोविज्ञान (Individual Psychology) की सीमाएँ



  • एड्लर के अनेक सिद्धांत (हीनता‑भाव, काल्पनिक अंतिम लक्ष्य, जीवन‑शैली, सामाजिक रुचि आदि) को स्पष्ट रूप से मापना और प्रयोगात्मक रूप से जाँचना कठिन है; वे अक्सर “अर्थपूर्ण व्याख्या (meaningful explanations)” तो देते हैं, पर कठोर वैज्ञानिक कसौटी पर कम उतरते हैं।​ दार्शनिक कार्ल पॉपर जैसे आलोचकों ने इन्हें “असत्यापन‑अयोग्य” (unfalsifiable) कहा, क्योंकि लगभग हर व्यवहार को बाद में समझाकर सिद्धांत के पक्ष में मोड़ा जा सकता है।​
  • “जीवन‑शैली”, “निजी तर्क (private logic)”, “सामाजिक रुचि (Social interest)” जैसी धाराएँ अक्सर गुणात्मक और चिकित्सक की व्याख्या पर निर्भर रहती हैं; अलग‑अलग चिकित्सक इन्हीं संकेतों को अलग तरह से समझ सकते हैं।​ इससे निदान और उपचार दोनों में उच्च स्तर की व्यक्तिपरकता आ जाती है, जो मानकीकरण और विश्वसनीयता (Standardization and reliability)  के मार्ग में बाधा है।​
  • एड्लर ने मानसिक स्वास्थ्य की लगभग मुख्य कसौटी “सामाजिक रुचि” को माना; इससे व्यक्तिगत भिन्नताओं, सांस्कृतिक विविधता और आत्म‑परक लक्ष्यों की वैधता कभी‑कभी कम करके आँकी जा सकती है।​ कुछ आलोचक मानते हैं कि हर संस्कृति में “समुदाय‑भाव” की परिभाषा अलग है; इसे सार्वत्रिक मानक मान लेने से सैद्धांतिक पक्षपात (theoretical bias) उत्पन्न हो सकता है।​
  • एड्लर ने व्यक्तित्व‑निर्माण में जन्म‑क्रम (first, middle, youngest, single) और प्रारम्भिक स्मृतियों को बहुत महत्त्व दिया, किन्तु अनुसंधान में जन्म‑क्रम के प्रभाव के निष्कर्ष मिश्रित और सीमित पाए गए हैं।​ कई आधुनिक अध्ययनों में जन्म‑क्रम के प्रभाव छोटे या असंगत मिलते हैं, जिससे यह दावा कमजोर पड़ता है कि यह व्यक्तित्व की प्रमुख निर्धारक शक्ति है।​
  • फ्रायड की तुलना में एड्लर ने जैविक यौन‑प्रेरणाओं और गहरे अचेतन संघर्षों को बहुत कम महत्व दिया; आलोचकों के अनुसार इससे कुछ जटिल न्यूरोटिक या मनोविश्लेषणीय मामलों की व्याख्या अधूरी रह सकती है।​ “हीनता‑भावना” और “श्रेष्ठता‑प्रयास”  (inferiority complex" and "superiority striving") जैसे सामान्य सिद्धांतों से हर प्रकार के रोगात्मक व्यवहार की बारीक व्याख्या कर पाना हमेशा संभव नहीं दिखता।​
  • परामर्श और शिक्षा में Adlerian ideas (प्रोत्साहन, सामाजिक रुचि, लक्ष्य‑निर्धारण आदि) काफी लोकप्रिय हैं, परन्तु नियंत्रित, दीर्घकालिक शोध‑अध्ययन अपेक्षाकृत कम हैं जो स्पष्ट रूप से दिखाएँ कि यह दृष्टिकोण अन्य विधियों से निश्चित रूप से अधिक प्रभावी है।​ कई अवधारणाएँ “clinical wisdom” के रूप में उपयोगी हैं, लेकिन प्रमाण‑आधारित (evidence‑based) मानक उपचार के रूप में उनकी स्थिति सीमित मानी जाती है।

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