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Thursday, November 27, 2025
Wednesday, November 26, 2025
आसुबेल का अधिगम सिद्धांत (Ausubel's Theory of Learning)
आसुबेल का अधिगम सिद्धांत (Ausubel's Theory of Learning)
आसुबेल ने यह सिद्धांत 1978 में दिया था। इस अधिगम सिद्धांत इसे आधुनिक संज्ञानात्मक सिद्धांत (Modern Cognitive Theory) भी कहा जाता है। संज्ञानात्मक सिद्धांत इसलिए कहा जाता है कि सीखते समय व्यक्ति के मस्तिष्क में होने वाली प्रक्रिया का वर्णन किया जाता है। आसुबेल के अनुसार व्यक्ति जब किसी विषय वस्तु/पूर्व ज्ञान/ अनुभव को अपनी संज्ञानात्मक संरचना (Cognitive Structure) से सार्थक रूप से जोड़ लेता है तो उसे आत्मसात (Assimilation) करना कहते हैं।
इनके द्वारा लक्ष्य तथा शिक्षण सामग्री (Aims & Teaching Content) के प्रस्तुतीकरण की विधि के सुधार पर अधिक बल दिया गया। इनका मत है कि व्यक्ति अधिग्रहण (Acquisition) के द्वारा सीखता है ना की अन्वेषण के द्वारा। इनका कहना था कि सिद्धांत तथा विचार प्रस्तुत किए जाते हैं ना की खोज जाते हैं।
व्याख्यात्मक शिक्षण प्रतिमान (Explanatory Teaching Model) अर्थपूर्ण शाब्दिक अधिगम (Meaningful Verbal learning) पर अधिक बल देता है। इसमें मौखिक सूचनाओं, विचार तथा विचारों में संबंध साथ-साथ चलते हैं।आसुबेल का मानना है की ब्रूनर द्वारा बताई गई आगमन विधि (Inductive Method) न होकर निगमन चिंतन (Deductive Thinking) अधिगम की प्रगति में होनी चाहिए। इन्होंने निगमनात्मक चिंतन पर जोर दिया है ।
आसुबेल ने अधिगम के चार प्रकार बताएं हैं -
- रटन्त अधिगम (Rote Learning): विषय सामग्री को बिना समझे सीखना और ज्यों का त्यों प्रस्तुत करना।
- अर्थपूर्ण अधिगम (Meaningful Learning): सीखने वाली सामग्री के सार तत्व को समझना व उसे पूर्व ज्ञान से जोड़ना। आसुबेल के अनुसार अर्थपूर्ण अधिगम (Meaningful learning) तीन बातों पर निर्भर करता है -
- अधिगम सामग्री को इस प्रकार व्यवस्थित किया जाता है की अगला प्रथम अध्याय दूसरे अध्याय को समझने में सहायक हो।
- नए ज्ञान को अर्जित करते समय व्यक्ति का मस्तिष्क किस प्रकार कार्य कर रहा है वह उसके प्रति सकारात्मक अभिवृत्ति (Positive Attitude) रखता है या नहीं।
- अध्यापक नए विषय को सीखाने के लिए अधिगम संबंधी विचारों को किस प्रकार प्रस्तुत करता है।
अतः शिक्षकों को पढ़ाए जाने वाली सामग्री का चयन, संगठन व प्रस्तुतीकरण (Selection, Organization and Presentation) इस प्रकार किया जाए कि वह छात्रों के लिए अधिक अर्थपूर्ण बन जाए।
- अधिग्रहण अधिगम (Acquisition Learning): छात्रों के समक्ष सीखने वाली सामग्री बोलकर या लिखकर प्रस्तुत की जाती है, छात्र उन सामग्रियों का आत्मसात (Assimilation) करने का प्रयास करता है।परंतु यह रटंत न होकर समझकर होता है। यह दो प्रकार का होता है -
- रटंत अधिग्रहण अधिगम (Rote Acquisition Learning)- मंद, संकुचित तथा नीरस (dull, compact and boring) ।
- अर्थपूर्ण अधिग्रहण अधिगम (Meaningful Acquisition Learning)- व्यापक, तीव्र व अर्थपूर्ण (comprehensive, intense and meaningful) ।
- अन्वेषण अधिगम (Discovery Learning): खोज करके सीखना (Learning by Discovering)। अन्वेषण अधिगम भी दो प्रकार का होता है-
- रटंत अन्वेषण अधिगम (Rote Discovery Learning)- विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति हेतु अनुक्रिया करना।
- अर्थपूर्ण अन्वेषण अधिगम (Meaningful Discovery Learning)- सीखे गए तथ्यों के आधार पर किसी नए नियम का उपयोग करके नए नियम का प्रतिपादन करना और तथ्यों को आत्मसात (Assimilation) करके अपने अनुसार नवीन प्रकार से उनका उपयोग करना।
अर्थपूर्ण अधिगम में आत्मसात को महत्वपूर्ण स्थान दिया है । उसने अधिगम में आत्मसात के चार प्रकार बताए हैं -
- योगात्मक अधिगम (Combinational Learning): छात्र सामान्य समरूपता के आधार पर सीखे गए विचारों को सार्थक ढंग से अपनी वर्तमान संज्ञानात्मक संरचना के महत्वपूर्ण तत्वों के साथ आत्मसात करके जोड़ता है । जैसे- आवश्यकता तथा पूर्ति, ताप तथा आयतन आदि ।
- अधीनस्थ अधिगम (Subordinate learning): अधिक प्रचलित शब्द की कम प्रचलित समानार्थी शब्दों को सीखना। जैसे - पानी के लिए कम प्रचलित शब्द वारि, सलिल व नीर आदि।
- सहसंबंध अधिगम (Corelation Learning): छात्र पहले सीखे हुए ज्ञान को नवीन ज्ञान से संबंधित करके उसमें परिमार्जन (Modification) या संवर्धन (Elaboration) करता है। जैसे- कोई व्यक्ति अपने राष्ट्रीय ध्वज, चिन्ह व पर्वों का बहुत सम्मान करता है । उसके लिए राष्ट्रभक्ति शब्द प्रयोग किया जाता है।
- उच्च कोटि अधिगम (Superordinate Learning): कई संप्रत्ययों (Concepts) को मिलाकर किसी नई संप्रत्यय का निर्माण करना। जैसे- गौरैया, तोता, कबूतर, मैना आदि की जानकारी के आधार पर पक्षी संप्रत्यय का विकास होता है।
Saturday, November 22, 2025
सामाजिक अधिगम सिद्धांत (Social Learning Theory)
सामाजिक अधिगम सिद्धांत (Social Learning Theory)
प्रतिपादक - अल्बर्ट बंडूरा (Albert Bandura), सहयोगी - वाल्टर (Walters)
सिद्धांत के अन्य नाम - प्रत्यक्ष अधिगम सिद्धांत (Direct Learning Theory), प्रतिरूप अधिगम सिद्धांत (Vicarious Learning Theory), अवलोकन अधिगम सिद्धांत (Observational Learning Theory), अनुकरण सिद्धांत (Imitation Theory), सामाजिक संज्ञानात्मक सिद्धांत (Social Cognitive Theory), निर्देशन का सिद्धांत (Theory of Guidance)।
पुस्तक - Principles of Behaviour Modification (1969)
आधार वाक्य - व्यक्ति दूसरे के व्यवहार को देखकर सीखते हैं।
प्रयोग - अल्बर्ट नाम का बालक, बोबो डॉल एवं जोकर।
- यह सिद्धांत इस बात पर विचार करता है कि कैसे पर्यावरण और संज्ञानात्मक कारक मानव अधिगम व व्यवहार को प्रभावित करने के लिए परस्पर क्रिया करते हैं।
- व्यक्ति का व्यवहार संज्ञान व प्रत्याशा (Expectation) द्वारा प्रमाणित होते हैं प्रत्याशा दो प्रकार की होती है परिणाम प्रत्याशा (Outcome Expectation) और प्रभावोत्पादकता प्रत्याशा (Efficacy Expectation) ।
- इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्यक्ष अनुभवों पर आधारित अधिगम के स्थान पर अप्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित अधिगम /अवलोकनात्मक अधिगम का सीखने की प्रक्रिया में अधिक सार्थक स्थान है ।
- जन्म से बालक अपने वातावरण में उपस्थित व्यक्तियों, परिवार के सदस्यों के व्यवहार का अवलोकन करता है एवं कुछ की व्यवहारों का अनुकरण कर अपनी व्यवहार में लाता है । जिन व्यक्तियों के व्यवहारों का वह अनुकरण करते हैं उन्हें निदर्श (Model) कहा जाता है किसी निदर्श (Model) के व्यवहार का अनुकरण करके किया गया अवलोकनात्मक अधिगम को निदर्शन (Modeling) कहा जाता है।
सामाजिक अधिगम के सोपान (Steps of Social Learning Theory)
- अवधान (Attention):- देखना। ध्यान देने योग्य प्रक्रिया महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी मॉडल के संपर्क में आने से यह सुनिश्चित नहीं होता है कि पर्यवेक्षक (Observer) ध्यान देंगे। मॉडल को पर्यवेक्षक की रुचि जाना चाहिए और पर्यवेक्षक को मॉडल के व्यवहार को अनुकरण के लायक समझना चाहिए। यह तय करता है कि व्यवहार को मॉडल किया जाएगा या नहीं । व्यक्ति को व्यवहार और परिणामो पर ध्यान देने और व्यवहार का मानसिक प्रतिनिधित्व बनाने की आवश्यकता है । किसी व्यवहार का अनुकरण करने के लिए उसे हमारा ध्यान खींचना होगा । हम दैनिक आधार पर कई व्यवहार देखते हैं और उनमें से कई उल्लेखनीय नहीं है, इसलिए इस बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि क्या कोई व्यवहार दूसरों को उसका अनुकरण करने के लिए प्रभावित करता है।
- धारण करना (Retention):- व्यवहार को धारण करना। सफल अनुकरण के लिए पर्यवेक्षकों (Observer) को इन व्यवहारों को प्रतीकात्मक रूप से सहेजना होगा। सक्रिय रूप से उन्हें आसानी से याद किये जाने वाले पैटर्न की व्यवस्थित करना होगा। आचरण कितना याद रहते हैं व्यवहार पर ध्यान दिया जा सकता है लेकिन इसे हमेशा याद नहीं रखा जा सकता । जो स्पष्ट रूप से नक़ल रोकता है, इसलिए महत्वपूर्ण है कि व्यवहार की एक स्मृति पर्यवेक्षक द्वारा बाद में निष्पादित किया जाए। अधिकांश सामाजिक अधिगम तुरंत नहीं होता इसलिए यह प्रक्रिया उन मामलों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इसको संदर्भित करने के लिए एक स्मृति की आवश्यकता होती है।
- पुनः प्रस्तुतीकरण (Re-production) :- उत्पादन दूसरों के सामने प्रस्तुत करना। यह उस व्यवहार को निष्पादित करने की क्षमता है जिसे मॉडल द्वारा अभी प्रदर्शित किया गया है। हम प्रतिदिन बहुत सारे व्यवहार देखते हैं जिनका हम अनुकरण करने में सक्षम होना चाहते हैं लेकिन हमेशा यह संभव नहीं हो पता क्योंकि हमारी शारीरिक क्षमता हमें सीमित करती है। यह हमारे निर्णय को प्रभावित करता है कि हमें इसका अनुकरण करने का प्रयास करना चाहिए या नहीं।
- पुनर्बलन/ अभिप्रेरणा (Reinforcement/Motivation): प्रेरणा और पुनर्बलन की प्रक्रिया मॉडल के कार्यों की नकल करने के अनुकूल या प्रतिकूल परिणाम को संदर्भित करती हैं जो नकल की संभावना को बढ़ाने या घटाने की रखते हैं । यदि अनुमानित पुरस्कार अनुमानित लागत से अधिक है तो पर्यवेक्षक की नकल करने की संभावना अधिक रहेगी परंतु यदि पुनर्बलन पर्यवेक्षक के लिए महत्वहीन है तो वह व्यवहार की नकल नहीं करेंगे।
Thursday, November 20, 2025
व्यक्तित्व का मापन (Measurement of Personality)
व्यक्तित्व का मापन (Measurement of Personality)
व्यक्तित्व मापन की विधियां (Methods of Personality Measurement)
- अप्रक्षेपी विधियां (Non-Projectives Methods)
- प्रक्षेपी विधियां (Projective Method)
- व्यक्तिनिष्ठ विधियाँ (Subjective Methods):- व्यक्तिनिष्ठ विधियों से तात्पर्य उन विधियों से है जिनमे परिणाम मापनकर्ता की अपनी पसंद- नापसंद और व्यक्तिगत मानदंडों से प्रभावित होते हैं। अवलोकन विधि (Observation Method), साक्षात्कार विधि (Interview Method), प्रश्नावली विधि (Questionnaire Method), व्यक्ति इतिहास विधि (Case History Method), आत्मकथा विधि (Autobiography Method) आदि इसके अंतर्गत आते हैं ।
- वस्तुनिष्ठ विधियां (Objectives Methods): - वास्तुनिष्ठ विधियों से तात्पर्य उन विधियों से है जिनमे परिणाम मापनकर्ता की अपनी पसंद- नापसंद और व्यक्तिगत मानदंडों से प्रभावित नहीं होते हैं। नियन्त्रित निरीक्षण विधि (Controlled Observation Method), श्रेणी मापनी (Rating Scale), शारीरिक परीक्षण (Physiological Tests), परिस्थिति परीक्षण (Situation Tests) - समाजमिति (Sociometry), मनोनाटक (Psycho Drama) आदि।
नियन्त्रित निरीक्षण विधि (Controlled Observation Method)
श्रेणी मापनी (Rating Scale)
शारीरिक परीक्षण (Physiological Tests)
Wednesday, November 19, 2025
आइजेंक का व्यक्तित्व का मानवतावादी सिद्धांत (Eysenck's Humanistic theory of Personality)
आइजेंक का व्यक्तित्व का मानवतावादी सिद्धांत (Eysenck's Humanistic theory of Personality)
अंतर्मुखता- आसानी से प्रभावित, निराशावादी, चिंताग्रस्त, कम उत्तेजित, कम महत्वाकांक्षी, आत्मनिष्ठ, कल्पनाशील, अनुशासनप्रिय एवं गंभीर।
बहिर्मुखता- आवेगशील, परिवर्तनशील, क्रियाशील, सामाजिक आदि।
(2) स्नायुविकता स्थिरता बनाम अस्थिरता (Neuroticism Stability vs Unstability):- इसका आयाम लिम्बिक सिस्टम से जुड़ा है, जो भावनाओं और प्रेरणा को नियंत्रित करता है। उच्च न्यूरोटिसिज्म भावनात्मक अस्थिरता, चिंता और मनोदशा से संबंधित है। यह मनमौजी (Moody), अति संवेदनशील, बैचेन, उग्र स्वभाव, करुणामय एवं दुश्चिंता से ग्रस्त होते हैं ।
(3) मनोविकारिता बनाम सामाजिकता (Psychoticism vs Socialization):- एकांतप्रिय, कम क्रियाशील, अहंकारी, सामाजिक मर्यादाओं का विरोधी होता है जबकि सोशलाइज़ेशन में ज़्यादा लोग हमदर्द, कोऑपरेटिव और कन्फर्मिंग होते हैं।
आइजेंक के अनुसार अंतर्मुखी, बहिर्मुखी तथा स्नायुविकता के कारण व्यक्तियों में जो विभिन्नताएं पाई जाती हैं उनमें से 75% वंशानुक्रम से निर्धारित होती हैं।
- विशिष्ट अनुक्रिया स्तर (Specific Response Level):- ये किसी परिस्थिति में अलग-अलग, ठोस काम होते हैं—जैसे, लक झपकाना, आँखें झुकाना, किसी दोस्त से किसी एक मौके पर बात करना। ऐसे व्यवहार बदलते रहते हैं और परिस्थिति के हिसाब से होते हैं।
- आदतजन्य अनुक्रिया स्तर (Habitual Response Level):- जब एक खास जवाब को एक जैसी स्थितियों में दोहराया जाता है, तो यह एक आदत बन जाती है—जैसे रेगुलर तौर पर ग्रुप में पढ़ाई करना। ये आदतें समय के साथ कुछ स्थिरता दिखाती हैं।
- शीलगुण स्तर (Trait Level) : - शीलगुण हमेशा रहने वाले गुण होते हैं जो आदतन प्रतिक्रिया के समूह से मिलते हैं। उदाहरण के लिए, जो कोई अक्सर समूह में पढ़ता है, अक्सर मिलता-जुलता है, और समूह क्रियाएं करना पसंद करता है, उसमें समाजशीलता शीलगुण हो सकता है।
- प्रकार स्तर (Type Level) :- ये पर्सनैलिटी के बड़े पहलू हैं जो एक-दूसरे से जुड़े गुणों से बने होते हैं। आइसेनक ने तीन मुख्य प्रकार बताए: एक्स्ट्रावर्जन, न्यूरोटिसिज़्म और साइकोटिसिज़्म। हर प्रकार एक हायर-ऑर्डर फैक्टर दिखाता है जिसमें कई गुण शामिल होते हैं।
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