Thursday, September 23, 2021

रामानुजन का गणित में योगदान (Contribution of Ramanujam in Mathematics)

  रामानुजन  का  गणित में योगदान(Contribution of Ramanujam  in Mathematics)

जन्म - 22/12/1987
स्थान -  इरोड, मद्रास प्रेसीडेंसी, जिला - तंजौर 
मृत्यु - 26/04/1920 (32 Years)
अकादमिक सलाहकार - जी० एच० हार्डी,  जे० ई ० लिटलवुड 

इनके पिता एक साधारण परिवार में निर्धन ब्राह्मण थे तथा एक कपड़े की दुकान पर मुनीमी करके अपना पेट पालते थे। रामानुजन  ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पास के कस्बे कुम्बकोनम, जहाँ इनके पिता नौकरी करते थे, में प्राप्त की। अपनी कक्षाओं में ये सदैव ही प्रथम आते थे। इन्हें बाल्यावस्था से ही गणित से बेहद प्रेम था, यहाँ तक कि अपने दोस्तों का मनोरंजन वे गणित के सूत्रों से किया करते थे। इनकी गणितीय प्रतिभा से प्रभावित होकर इनके अध्यापकों ने इन्हें 12 वर्ष की आयु में ही बाल विद्वान घोषित कर दिया था क्योंकि इस छोटी आयु में इन्होंने गणित सम्बन्धी जो मौलिक कार्य करके सिखाया जो  बड़े-बड़े गणितज्ञों की सम्पूर्ण आयु के परिश्रम से महत्वपूर्ण था। 
17 वर्ष की आयु में इन्होंने सरकारी छात्रवृत्ति प्राप्त करते हुये हाई स्कूल की परीक्षा पास की तथा छात्रवृत्ति के बल पर ही कॉलिज में प्रवेश भी ले लिया। परन्तु यहाँ पर इनका गणित प्रेम इनके साथ धोखा कर गया। गणित के अध्ययन में डूबे रहने के कारण ये अंग्रेजी में अनुत्तीर्ण हो गये। फलस्वरूप इनकी छात्रवृत्ति बन्द हो गयी और साथ ही इस निर्धन छात्र की पढ़ाई का भी यहीं अन्त हो गया।

महत्वपूर्ण घटनाएं -

  • प्राइमरी स्कूल का एक अध्यापक तीसरी श्रेणी के अपने विद्यार्थियों को समझा रहे थे  कि "किसी भी  संख्या को उसी संख्या से भाग देने पर भागफल एक होता है।" सब बच्चे चुपचाप सुनते रहे, परन्तु रामानुजम से   न रहा गया और वह एकदम खड़ा होकर बोला “सर, क्या यह नियम शून्य पर भी लागू होता है?" अपने अध्यापक को भी इतनी छोटी-सी अवस्था में इस प्रकार के गूढ़ प्रश्नों द्वारा चक्कर में डालने वाले महानुभाव और कोई नहीं प्रख्यात गणितज्ञ रामानुजन  ही थे। तीसरी कक्षा में ही इन्होंने बीजगणित आदि का इण्टरमीडियेट कक्षाओं तक का पाठ्यक्रम समाप्त कर लिया था तथा चौथी कक्षा में आते-आते बी० ए० की त्रिकोणमिति के कठिन प्रश्न हल करने लग गये थे।
  • मद्रास "पोर्ट ट्रस्ट कार्यालय" में मध्यावकाश के समय जब सभी कर्मचारी गण चाय-पान आदि के लिये बाहर चले गये तो चेयरमैन “सर फ्रांसिस स्प्रिंग" ने अचानक कार्यालय का निरीक्षण किया। उसे फर्श पर गिरा हुआ कागज का एक पन्ना दिखाई पड़ा। उसने उसे उठाकर पढ़ना शुरु किया। वह आश्चर्यचकित होकर बोला-"ओह! यह क्या इसमें तो गणित के अत्यन्त कठिन प्रश्नों को हल किया गया है।" उसने एक बार पुनः कार्यालय में चारों तरफ नजर दौड़ाई। इस बार उसने देखा न कि एक दुबला-पतला व्यक्ति अपनी मेज से चिपका हुआ कुछ लिखने में खोया हुआ है। उस व्यक्ति के पास पहुँचकर अधिकारी ने पूछा- "तुम अकेले बैठे-बैठे यहाँ क्या कर रहे न हो?” “जी गणित के सवाल लगा रहा हूँ।" "क्या यह तुम्हारा ही लिखा हुआ है?” “जी हाँ, मेरा ही लिखा हुआ है।" "तुमने यह गणित कहाँ से सीखी है?" “देवी नाग गिरी की कृपा से अपने आप।" अधिकारी ने कहा- "मित्र तुम्हें तो गणित की दुनिया का बादशाह होना चाहिये, तुम यहाँ कहाँ पड़े हो?" वह प्रतिभाशाली नवयुवक 'रामानुज' था जिसने भारत का सर ऊँचा किया।

योगदान (Contribution)-
  • लांडौ-रामानुजन स्थिरांक (Landau–Ramanujan constant)-

If  is the number of positive integers less than  that are the sum of two squares, then

where  is the Landau–Ramanujan constant.


  • रामानुजन-पीटरसन अनुमान (Ramanujan–Peterson conjecture)

The Ramanujan conjecture, due to Srinivasa Ramanujan (1916, p.176), states that Ramanujan's tau function given by the Fourier coefficients τ(n) of the cusp form Δ(z) of weight 12

where , satisfies

when p is a prime number. The generalized Ramanujan conjecture or Ramanujan–Peterson conjecture, introduced by Peterson (1930), is a generalization to other modular forms or automorphic forms.

  • रामानुजन प्राइम (Ramanujan prime)-
Ramanujan prime is a prime number that satisfies a result proven by Srinivastava  Ramanujan relating to the prime-counting function.
that is:
where  is the prime-counting function, equal to the number of primes less than or equal to x.


  • रामानुजन-सोल्डर स्थिरांक (Ramanujan–Soldner constant)- 
Its value is approximately μ ≈ 1.45136923488338105028396848589202744949303228....

Ramanujan–Soldner constant (also called the Soldner constant) is a mathematical constant defined as the unique positive zero of the logarithmic integral function.

  • रामानुजन का योग (Ramanujan's sum)-
Ramanujan's sum, usually denoted cq(n), is a function of two positive integer variables q and n defined by the formula:

where (aq) = 1 means that a only takes on values co-prime to q.

  • Ramanujan's master theorem -

  • सभी पूर्ण संख्याएँ (Integers) रामानुजन  की मित्र थीं। एक बार जब वे बीमार थे। और उन्हें देखने के लिये मि० लिटिलवुड टैक्सी नं० 1729 में आये, तो रामानुजन  ने 1729 के विषय में कहा कि यह ऐसी छोटी से छोटी संख्या है जिसे दो संख्याओं के धनों के रूप में दी भिन्न प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है,
1729 = 13 + 123 = 93 + 103

Sunday, September 19, 2021

केन्द्रीय विद्यालय संगठन (Kendriya Vidyalaya Sangthan, KVS)

 केन्द्रीय विद्यालय संगठन (Kendriya Vidyalaya Sangthan, KVS)

परिचय (Introduction)-

स्थापना -  15 दिसंबर, 1963 

अधिकार-  शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार

स्कूल बोर्ड - केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE)

मुख्यालय - नई दिल्ली

कुल स्कूल - 1248 (2021 तक) (1245 स्कूल भारत में एवं 3 स्कूल मास्को, तेहरान एवं काठमांडू में)।


केन्द्रीय विद्यालय संगठन भारत सरकार के शिक्षा मन्त्रालय के अन्तर्गत एक स्वायत्तशासी संगठन है।  हमारे देश में स्थानान्तरणीय पदों पर कार्यरत कर्मचारियों के बच्चों को समान स्तर, समान पाठ्यक्रम एवं समान माध्यम की शिक्षा उपलब्ध कराने का कार्य सर्वप्रथम केन्द्र सरकार के रक्षा विभाग ने किया। उसने रक्षा विभाग में कार्यरत कर्मचारियों के बच्चों के लिए मिलिट्री मुख्यालयों पर रेजीमेन्ट स्कूलों की स्थापना की। 1963-64 में इन स्कूलों की संख्या 20 थी। 1965 में केन्द्रीय सरकार ने स्थानान्तरणीय पदों पर कार्यरत समस्त केन्द्रीय कर्मचारियों के बच्चों के लिए इस प्रकार के विद्यालय स्थापित करने का निर्णय लिया। उसने सर्वप्रथम तत्कालीन 20 रेजीमेन्ट स्कूलों' को शिक्षा विभाग के अन्तर्गत लिया, उन्हें सेन्ट्रल स्कूल (Central School) का नाम दिया और उन्हें केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) से सम्बद्ध किया और उनमे स्थानान्तरणीय पदों पर कार्यरत समस्त केन्द्रीय कर्मचारियों के बच्चों को प्रवेश की अनुमति प्रदान की। कुछ समय बाद सेना मुख्यालयों के साथ-साथ जिला मुख्यालयों पर भी सेन्ट्रल स्कूल स्थापित करने शुरू किए आगे चलकर इन्हें केन्द्रीय विद्यालयों का नाम दिया गया और इनकी सम्पूर्ण व्यवस्था के लिए सरकार ने 'केन्द्रीय विद्यालय संगठन' (Kendriya Vidyalaya Sangthan) का गठन किया। 


संगठनात्मक संरचना (Organizational Structure) -

केन्द्रीय विद्यालय संगठन का प्रशासनतन्त्र तीन स्तरों में विभाजित है- केन्द्रीय स्तर,  क्षेत्रीय स्तर और स्थानीय स्तर। 

केन्द्रीय स्तर पर मुख्य  दो निकाय हैं- 

1. सामान्य निकाय (General Body) 

2. प्रशासनिक निकाय (Executive Body)


1. सामान्य निकाय (General Body) - 

चेयरमेन (Chairman)-   केंद्रीय शिक्षा मन्त्री   

डिप्टी चेयरमेन (Dupty Chairman)-  राज्यमन्त्री   

वाइस चेयरमेन (Vice Chairman)- मंत्रालय का वरिष्ठ अधिकारी (भारत सरकार  द्वारा नामित)

सदस्य -  केन्द्र के रक्षा, वित्त, निर्माण एवं स्वास्थ्य विभाग के प्रतिनिधि, लोकसभा के प्रतिनिधि एवं केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (NCERT) व राज्य सरकारों के प्रतिनिधि और जाने-माने शिक्षाविद होते हैं। इन सदस्यों में महिला सदस्य एवं अनुसूचित जाति एवं जनजाति सदस्य होने आवश्यक होते हैं।

2. प्रशासनिक निकाय (Executive Body)

इसमे 1 कमिश्नर, 2 जॉइन्ट कमिश्नर, 5 डिप्टी  और 3 एसिसटेन्ट कमिश्नर होते हैं। इसके प्रशासनिक कार्यों के सम्पादन के लिए  तीन समितियाँ  होती हैं-

(i) वित्त समिति (Finance Committee)-   वार्षिक बजट, वित्त लेखा और वित्त लेखा निरीक्षण   

(ii) निर्माण समिति (Work Committee) –  केन्द्रीय विद्यालयों के भवन निर्माण कार्य ।

(iii) अकादमिक सलाहकार समिति (Acadamic Advisory Committee) - विद्यालयों की शैक्षिक एवं सहशैक्षिक क्रियाओं के लिए उत्तरदायी।


क्षेत्रीय स्तर पर प्रशासन- 

  •  क्षेत्रीय कार्यालय (Regional Offices)- 25
  •  क्षेत्रीय शिक्षा और प्रशिक्षण संस्थान (Zonal Institute of Education and Training) - 5  (ग्वालियर, मुंबई , चंडीगढ़ , मैसूर एवं भुवनेश्वर )
  • प्रत्येक क्षेत्रीय कार्यालय में 1 एसीसटेन्ट कमिश्नर  (क्षेत्रीय कार्यालय के मुख्य अधिकारी)   
  • सहायता के लिए 3 शिक्षा अधिकारी और सपोर्टिंग स्टाफ। 
  • क्षेत्रीय कार्यालयों पर अपने-अपने कार्यक्षेत्र (Jurisdiction) के केन्द्रीय विद्यालयों के नियन्त्रण का उत्तरदायित्व होता है। इनके सहयोग से केन्द्रीय कार्यालय अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करता है और इन्हीं के सहयोग से केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) केन्द्रीय विद्यालयों की कक्षा 10 व कक्षा 12 के बच्चों की परीक्षा का सम्पादन करता है।


स्थानीय स्तर पर  प्रशासन-

  • प्रत्येक केन्द्रीय विद्यालय की एक विद्यालय प्रबन्ध समिति (School Management Committee) है। 
  • स्थानीय जिलाधिकारी (DM) इस समिति का पदेन अध्यक्ष होता है। सदस्यों में विद्यालय का प्रधानाचार्य, शिक्षक प्रतिनिधि और स्थानीय शिक्षाविद होते हैं। यह समिति विद्यालय के आन्तरिक मामलों के लिए उत्तरदायी होती है।


उद्देश्य (Objectives)-

1. केन्द्र सरकार में स्थानान्तरणीय पदों पर कार्यरत समस्त कर्मचारियों के बच्चों को देश के किसी भी भाग में समान पाठ्यक्रम एवं समान माध्यम की माध्यमिक शिक्षा सुलभ कराना है जिससे उनकी शिक्षा में कोई बाधा न आए।

2. केन्द्रीय विद्यालयों में नवाचारों (Innovations) को प्रोत्साहित करना।

3. केन्द्रीय विद्यालयों को उत्कृष्ट विद्यालयों (Schools of Excellence) के रूप में विकसित करना ।

4. उत्तम प्रकार की शिक्षा की व्यवस्था कर बच्चों का सर्वांगीण विकास करना ।

5. राष्ट्रीय एकता का विकास करना।


कार्य (Functions)-

1. समय-समय पर आवश्यकतानुसार नीति निर्धारित करना । 

2. वार्षिक बजट बनाना और भिन्न-भिन्न मदों के लिए धन राशि निश्चित करना ।

3. मौजूदा केन्द्रीय विद्यालयों की आवश्यकताओं की पूर्ति करना । 

4. आवश्यकतानुसार सेना मुख्यालयों एवं जनपद मुख्यालयों पर नए केन्द्रीय विद्यालयों की स्थापना करना। 

5. केन्द्रीय विद्यालयों के लिए प्रधानाचार्यों एवं शिक्षकों का चयन करना। 

6. केन्द्रीय विद्यालयों के उपप्रधानाचार्यो एवं शिक्षकों की पदोन्नति करना। नए पद सृजन होने पर 25% पदों पर पदोन्नति की जाती है और 75% पदों पर नई नियुक्तियाँ की जाती हैं। पदोन्नति एवं नियुक्तियाँ क्षेत्रीय स्तर पर की जाती हैं।

7. केंद्रीय विद्यालयों के प्रधानाचार्य एवं शिक्षकों का स्थानांतरण करना।

8. केंद्रीय विद्यालयों के प्रशासनिक, शैक्षिक एवं सहशैक्षिक क्रियाकलापों पर नियंत्रण रखना।

9. छात्र- छात्राओं की वार्षिक परीक्षा CBSE द्वारा सम्पन्न करना और प्रमाण पत्र देना।


माध्यमिक शिक्षा के क्षेत्र में योगदान (Contribution  in the field of Secondary Education)


1. यह संगठन पूरे देश में केन्द्रीय विद्यालयों की स्थापना कर स्थानान्तरणीय पदों पर कार्यरत केन्द्रीय कर्मचारियों के बच्चों के लिए समान पाठ्यक्रम एवं समान माध्यम की माध्यमिक शिक्षा उपलब्ध करा रहा है।

2. यह  केन्द्रीय विद्यालयों में कक्षा 6 से 9 तक संस्कृत का अध्ययन अनिवार्य कर राष्ट्रीय स्मिता की रक्षा कर रहा है।

3. यह  केन्द्रीय विद्यालयों में सहशिक्षा की व्यवस्था कर अन्य माध्यमिक विद्यालयों को मार्गदर्शन प्रदान कर रहा है।

4. केन्द्रीय विद्यालयों में शिक्षा का माध्यम एक साथ क्षेत्रीय भाषाओं और अंग्रेजी को बनाकर इसकी सम्भावनाओं को स्पष्ट कर रहा है।  

5. केन्द्रीय विद्यालयों में नवाचारों को प्रोत्साहित कर देश के अन्य माध्यमिक विद्यालयों का मार्गदर्शन कर रहा है।

6. केंद्रीय विद्यालयों में सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (Continuous and Comprehensive Evaluation) प्रणाली लागू कर परीक्षाफल घोषित करके देश के अन्य माध्यमिक विद्यालयों एवं माध्यमिक शिक्षा बोर्डों का मार्गदर्शन कर रहा है।


Friday, September 10, 2021

गणित में भास्कराचार्य का योगदान (Contribution of Bhaskaracharya in Mathematics )

 गणित में भास्कराचार्य प्रथम का योगदान (Contribution of Bhaskaracharya -I  in Mathematics )

 जन्म-  लगभग 600 ईस्वी के आसपास

भास्कर प्रथम भारत  के सातवीं शताब्दी के गणितज्ञ थे। संभवतः उन्होने ही सबसे पहले संख्याओं को हिन्दू दाशमिक पद्धति में लिखना आरम्भ किया। उन्होंने आर्यभट्ट की कृतियों पर टीका लिखी और उसी सन्दर्भ में ज्या य (sin x) का परिमेय मान बताया जो अनन्य एवं अत्यन्त उल्लेखनीय है। आर्यभटीय पर उन्होने सन् 629 में  आर्यभटीयभाष्य नामक टीका लिखी जो संस्कृत गद्य में लिखी गणित एवं खगोलशास्त्र की प्रथम पुस्तक है। आर्यभट्ट की परिपाटी में ही उन्होने महाभास्करीय एवं लघुभास्करीय नामक दो खगोलशास्त्रीय ग्रंथ भी लिखे। 

योगदान  (Contribution) - 

  • भास्कर ने पहले ही इस दावे पर विचार किया है कि यदि p एक अभाज्य संख्या है, तो 1 + ( p -1)! p से विभाज्य है । 
  • महाभास्करीय में आठ अध्याय हैं। सातवें अध्याय के श्लोक 17, 18 और 19 में उन्होने sin x का सन्निकट मान (approximate value) निकालने का निम्नलिखित सूत्र दिया है-

{\displaystyle \sin x\approx {\frac {16x(\pi -x)}{5\pi ^{2}-4x(\pi -x)}},\qquad (0\leq x\leq {\frac {\pi }{2}})}

इस सूत्र को उन्होने आर्यभट्ट द्वारा दिया हुआ बताया है। इस सूत्र से प्राप्त ज्या  के मानों का आपेक्षिक त्रुटि 1.9% से कम है। (अधिकतम विचलन {\displaystyle {\frac {16}{5\pi }}-1\approx 1.859\%} जो {\displaystyle x=0} पर होता है।)

  • भास्कर ने आज के प्रचलित पेल समीकरणों (Pell's Equations) के समाधान के बारे में प्रमेयों को बताया । 



गणित में भास्कराचार्य द्वितीय का योगदान (Contribution of Bhaskaracharya -II in Mathematics )


जन्म -   1114 ई० में सहस्त्रादि पर्वत के पास बिजदा बिदा (Bijjada bida) नामक गांव में पैदा हुये थे। यह गांव किस प्रान्त में स्थित है इसके बारे में विद्वानों में काफी मतभेद है परन्तु अधिक विद्वान् बिजदा बिदा को वर्तमान बीजापुर (मैसूर प्रान्त) ही मानने के पक्ष में हैं।

पुस्तक -  सिद्धांत शिरोमणि , करणकौतूहल, समय सिद्धांत शिरोमणि, गोलाध्यायरसगुण और सूर्यसिद्धांत

इनका प्रमुख ग्रंथ सिद्धान्त शिरोमणि है जिसकी रचना 1150 ई0 में की  गयी। ‘सिद्धान्त शिरोमणि' ग्रंथ को चार खण्डों या अध्यायों में बांटा गया है। ये खण्ड हैं: 

  1. लीलावती
  2. बीजगणित
  3. गोलाध्याय 
  4. ग्रहगणित 
भास्कराचार्य ने प्रथम खण्ड का जो अंकगणित से सम्बन्धित है यह पुस्‍तक लीलावती नामक स्‍त्री को सम्‍बोधित है।  भास्‍कराचार्य ने अपनी पुस्‍तक में कहीं पर लीलावती को ‘सखी’ कहकर सम्‍बोधित करते हैं, कहीं ‘प्रिये’ तो कहीं ‘बाले’। इससे कहीं भी यह पता नहीं चलता है कि लीलावती से उनका क्‍या सम्‍बंध था?


योगदान  (Contribution) - 

1. भास्कराचार्य ही विश्व के प्रथम गणितज्ञ थे जिन्होंने किसी संख्या को भाग देने पर परिणाम में अनन्त (Infinity) की कल्पना की। इसके बारे में वे लिखते है कि - " जिस प्रकार अनन्त और अच्युत ईश्वर में, प्रलय के समय बहुत से भूतगणों का प्रवेश होने से अथवा सृष्टि के समय उनके निकल जाने से, कोई विकार नहीं होता उसी प्रकार इस शून्य हर वाली राशि में बहुत बड़ी संख्या को भी जोड़ने अथवा घटाने पर कोई परिवर्तन नहीं होता।” 

a/0    =  

∞ + a    = 

∞ - a    = 

2. क्षेत्रमिति ( Mensuration) के क्षेत्र में भी भास्कर का काफी योगदान है। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों के क्षेत्रफल और घनफल के सम्बन्ध में बहुत ही महत्वपूर्ण सूत्र दिये हैं। 

उदा0

गोले का क्षेत्रफल = 4 x वृत्त का क्षेत्रफल

गोले का घनफल = गोले का क्षेत्रफल * 1/ 6 * व्यास

3. जिस विषय को आज Permutation and Combination के नाम से जानते हैं उस पर भी भास्कर ने अपनी लेखनी उठायी थी। उन्होंने अपने ग्रंथों में इसका नाम अंक पाश' दिया है।  इस विषय पर उनके द्वारा खोजे गये एक सिद्धान्त को तो हम आज तक भी काम में ला रहे हैं। इसका प्रचलित रूप इस प्रकार का है।

r  वस्तुओं की क्रमचय संख्या = r!/ k! l!

4. करणी (Surds) के बारे में भी भास्कराचार्य को अच्छा ज्ञान था जैसा कि उनके ग्रंथों में पाये जाने वाली निम्न प्रकार की समस्याओं से स्पष्ट होता है।

Ex. - एक त्रिभुज की भुजायें √13 और √5 हैं अगर उसका क्षेत्रफल 4 है तो आधार की लम्बाई बताओ।

5. घन समीकरण (Cubic Equations) और द्वि-वर्गात्मक समीकरणों (Biquadratic Equations) का भी विवरण भास्कर के ग्रंथों में पाया जाता है।

x2 + 12x = 6x2 + 35 

 x4 - x2 - 400x = 100

जैसी द्वि-वर्गात्मक समीकरणों का पूर्ण हल सहित 'सिद्धान्त शिरोमणि' के द्वितीय अध्याय बीजगणित में पाया जाता है। 

6. डिफ़रेंशियल केलकुलस (Differential Calculus) के क्षेत्र में भी भास्कराचार्य ही विश्व के प्रथम गणितज्ञ थे जिन्होंने Differential Coefficient से सम्बन्धित उदाहरण प्रस्तुत किये।

7. रौल्स प्रमेय (Rolle's Theorem) के आधारभूत तत्वों को भी भास्कराचार्य ने ही जीवन दिया है। 

8.  त्रिकोणमिति (Trigonometry ) के क्षेत्र में भी इनका काफी योगदान है। 

Ex.  - 

  • sin (A + B)=sin A cos B± cos A sin B
  • sin (A- B /2) = 1/2  [(sin A + sin B) 2+ (cos A cos B)²]1/2


9.  पृथ्वी के गोल होने का प्रमाण देते हुये वे 'गोलाध्याय' में लिखते हैं- “गोले की परिधि का सौवां भाग एक सीधी रेखा प्रतीत होती है। हमारी पृथ्वी भी एक विशाल गोला है, मनुष्य को उसकी परिधि का एक बहुत ही छोटा भाग दिखाई देता है, इसलिए यह चपटी दिखाई देती है।"

10. इसी प्रकार न्यूटन के बहुत पहले भास्कराचार्य को गुरुत्वाकर्षण शक्ति का ज्ञान हो चुका था। इसे उन्होंने धारणिकात्मक शक्ति कहा है। वे लिखते हैं- “पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति के जोर से सब वस्तुओं को अपनी ओर खींचती है इसलिये सभी पदार्थ इस पर गिरते हुये दृष्टिगोचर होते हैं।"


Thursday, September 9, 2021

गणित में आर्यभट्ट का योगदान (Aryabhatta's Contribution in Mathematics)

 गणित में आर्यभट्ट का योगदान  (Aryabhatta's Contribution in Mathematics)


जन्म-                476 ई0 कुसुमपुरा पाटलिपुत्र  (वर्तमान में पटना) 

प्रसिद्ध  पुस्तक - आर्यभट्टीय, आर्यस्तायता, कालकिया और गोला

इनको आर्यभट्ट प्रथम के नाम से जाना जाता है। इसी नाम के एक और गणितज्ञ इनके बाद हो चुके हैं जिन्होंने 950 ई० के लगभग महाआर्य सिद्धांत नामक पुस्तक लिखी है ।  अतः इन्हें 'आर्यभट्ट द्वितीय' के नाम से जाना जाता है। आर्यभट्ट प्रथम (499 ई०) के समय से भारतीय गणित विज्ञान का स्वर्णिम युग आरम्भ हुआ। इस बात में कोई संदेह नहीं है । आर्यभट्ट का जन्म कहाँ हुआ इस विषय पर भी कुछ मतभेद हैं। 

 इन्होंने अपनी गणितीय गणना में अंकगणित, बीजगणित एवं रेखागणित का प्रयोग किया। इनकी  पुस्तकों में से 'आर्यभट्टीय' नामक पुस्तक प्रसिद्ध पुस्तक है। यह पुस्तक पूर्णतः श्लोकों में लिखी गयी है। इस पुस्तक में कुल पाँच अध्याय हैं जिनमें केवल एक अध्याय ही गणित पर है, व शेष चार ज्योतिष पर हैं। इसमें आर्यभट्ट ने केवल एक अध्याय में अंकगणित, बीजगणित, ज्यामिति और त्रिकोणमिति के 33 सूत्र दिये हैं।

आर्यभट्ट पहले गणितज्ञ थे, जिन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि पृथ्वी गोलाकार है और अपनी धुरी पर घूमती है। जिसके आधार पर ही रात-दिन होते हैं। गणित में आर्यभट्ट का योगदान अत्यधिक महत्वपूर्ण है। \

योगदान  (Contribution) -

  • इन्होंने (पाई) का मान 3.1416 दिया। ये ही पहले ऐसे गणितज्ञ थे, जिन्होंने ज्या तालिका (sins table) विकसित की। 
  • अंकगणित के क्षेत्र में वर्गमूल व घनमूल ज्ञात करने की विधियों तथा त्रैराशिक  नियम का भी उल्लेख किया है।
  • अक्षर संकेत (Alphabet Numbers)  पद्धति का अविष्कार आर्यभट्ट प्रथम ने किया। इस पद्धति में अंकों को वर्णमाला के अक्षरों द्वारा प्रकट किया जाता है। स्वरों (Vowels) को छोड़कर देवनागरी वर्णमाला में 25 वर्गीय व्यंजन (Consonants) होते. हैं तथा 9 अवर्गीय होते हैं। 25 वर्गीय व्यंजनों द्वारा से लेकर 25 तक के अंकों को प्रकट किया जा सकता है। जैसे 'ख' द्वारा 2 को, च द्वारा 6 को इत्यादि। 9 अ वर्गीय व्यंजनों य र, ल, व, श, ष, स, ह इत्यादि के द्वारा क्रमश: 30, 40, 50, 60 इत्यादि को प्रकट किया जा सकता है तथा 'अ, आ, इ, ई, उ इत्यादि क्रमश: 100, 101 102 प्रकट करते हैं। 

ख्य = ख+ य  = 2 + 30  =  32

ख्यू = (ख + य )* उ  =  32 × 10 power 4 = 3,20,000

  • आर्यभट्ट प्रथम से पहले जैन गणितज्ञों ने वर्गमूल निकालने की विधि का अविष्कार कर लिया था, परन्तु उसका स्पष्टीकरण आर्यभट्ट द्वारा ही सम्भव हो सका।

  • दशमलव पद्धति (Decimal System) को प्रयोग में लाने के लिए आर्यभट्ट ने प्रशंसनीय कार्य किया। इसके अतिरिक्त क्षेत्रफल व घनफल निकालने के सभी साधारण नियम आर्यभट्टीय में मिलते हैं। वर्ग का क्षेत्रफल, त्रिभुज का क्षेत्रफल, विषम चतुर्भुज का क्षेत्रफल, वृत्त का क्षेत्रफल, गोले (Sphere) तथा शंकु (Cone) का घनफल, तथा सभी प्रकार के क्षेत्रों की औसत (Average) लम्बाई और चौड़ाई जानकर क्षेत्रफल निकालने से सम्बन्धित सभी नियम इसमें मिलते हैं। इससे आर्यभट्ट की रेखागणित में प्रयोगात्मक रूप से कितनी रुचि थी,  इसका पूर्ण आभास हो सकता है।

  • पाई (π) का मान = 3.1416 (लगभग), आज हम सभी इस सम्बन्ध से अच्छी तरह परिचित हैं। विश्व में सबसे पहले आर्यभट्टीय में ही के मान की गणना की ।
  • केवल अंकगणित ही नहीं बीजगणित भी आर्यभट्ट का बहुत ऋणी है। बीजगणित की राशियों के जोड़, बाकी, गुणा और भाग के अतिरिक्त भिन्नों (Fractions) के हरों (Denominators) को सामान्य (सर्वनिष्ठ) हरों में बदलने की रीति, भिन्नों में गुणा और भाग देने की रीति, बीजगणित के कुछ साधारण सूत्र जैसे  a2 + b2 = (a+b)2 तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के समीकरणों को हल करने की विधि आर्यभट्टीय में दी गयी है ।
  • यही नहीं आर्यभट्ट ने समान्तर श्रेणी (Arithmetic Progression) के ऊपर भी अपनी लेखनी बहुत ही सुनियोजित ढंग से उठायी है। निम्न प्रकार की बीजीय सर्वसमिकाओं (Identities) के दर्शन हमें प्रथम बार आर्यभट्टीय में ही मिलते हैं।
1² +2²+ .......+ n² =  1/ 6 * n (n + 1) (2n + 1) 

  • आर्यभट्ट  गणितज्ञ ही नहीं खगोल विज्ञान के भी प्रकांड पंडित थे। उन्होंने संसार के सम्मुख यह कहने का साहस किया कि “ब्रह्माण्ड की दिन प्रतिदिन की गतिशीलता का कारण पृथ्वी का एक धुरी के सहारे घूमते रहना ही है। " (Diurnal motion of the heavens is due to the rotation of the earth about an axis).


शैक्षिक मनोविज्ञान की विधियाँ (Methods of Educational Psychology)

 शैक्षिक मनोविज्ञान की विधियाँ (Methods of Educational Psychology) शैक्षिक मनोविज्ञान में विद्यार्थियों के व्यवहार (Behaviour), सीखने की प्र...