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Sunday, September 12, 2021
Friday, September 10, 2021
गणित में भास्कराचार्य का योगदान (Contribution of Bhaskaracharya in Mathematics )
गणित में भास्कराचार्य प्रथम का योगदान (Contribution of Bhaskaracharya -I in Mathematics )
जन्म- लगभग 600 ईस्वी के आसपास
भास्कर प्रथम भारत के सातवीं शताब्दी के गणितज्ञ थे। संभवतः उन्होने ही सबसे पहले संख्याओं को हिन्दू दाशमिक पद्धति में लिखना आरम्भ किया। उन्होंने आर्यभट्ट की कृतियों पर टीका लिखी और उसी सन्दर्भ में ज्या य (sin x) का परिमेय मान बताया जो अनन्य एवं अत्यन्त उल्लेखनीय है। आर्यभटीय पर उन्होने सन् 629 में आर्यभटीयभाष्य नामक टीका लिखी जो संस्कृत गद्य में लिखी गणित एवं खगोलशास्त्र की प्रथम पुस्तक है। आर्यभट्ट की परिपाटी में ही उन्होने महाभास्करीय एवं लघुभास्करीय नामक दो खगोलशास्त्रीय ग्रंथ भी लिखे।
योगदान (Contribution) -
- भास्कर ने पहले ही इस दावे पर विचार किया है कि यदि p एक अभाज्य संख्या है, तो 1 + ( p -1)! p से विभाज्य है ।
- महाभास्करीय में आठ अध्याय हैं। सातवें अध्याय के श्लोक 17, 18 और 19 में उन्होने sin x का सन्निकट मान (approximate value) निकालने का निम्नलिखित सूत्र दिया है-
इस सूत्र को उन्होने आर्यभट्ट द्वारा दिया हुआ बताया है। इस सूत्र से प्राप्त ज्या के मानों का आपेक्षिक त्रुटि 1.9% से कम है। (अधिकतम विचलन जो
पर होता है।)
- भास्कर ने आज के प्रचलित पेल समीकरणों (Pell's Equations) के समाधान के बारे में प्रमेयों को बताया ।
गणित में भास्कराचार्य द्वितीय का योगदान (Contribution of Bhaskaracharya -II in Mathematics )
जन्म - 1114 ई० में सहस्त्रादि पर्वत के पास बिजदा बिदा (Bijjada bida) नामक गांव में पैदा हुये थे। यह गांव किस प्रान्त में स्थित है इसके बारे में विद्वानों में काफी मतभेद है परन्तु अधिक विद्वान् बिजदा बिदा को वर्तमान बीजापुर (मैसूर प्रान्त) ही मानने के पक्ष में हैं।
पुस्तक - सिद्धांत शिरोमणि , करणकौतूहल, समय सिद्धांत शिरोमणि, गोलाध्यायरसगुण और सूर्यसिद्धांत।
इनका प्रमुख ग्रंथ सिद्धान्त शिरोमणि है जिसकी रचना 1150 ई0 में की गयी। ‘सिद्धान्त शिरोमणि' ग्रंथ को चार खण्डों या अध्यायों में बांटा गया है। ये खण्ड हैं:
- लीलावती
- बीजगणित
- गोलाध्याय
- ग्रहगणित
योगदान (Contribution) -
a/0 = ∞
∞ + a = ∞
∞ - a = ∞
2. क्षेत्रमिति ( Mensuration) के क्षेत्र में भी भास्कर का काफी योगदान है। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों के क्षेत्रफल और घनफल के सम्बन्ध में बहुत ही महत्वपूर्ण सूत्र दिये हैं।
उदा0-गोले का क्षेत्रफल = 4 x वृत्त का क्षेत्रफल
गोले का घनफल = गोले का क्षेत्रफल * 1/ 6 * व्यास
3. जिस विषय को आज Permutation and Combination के नाम से जानते हैं उस पर भी भास्कर ने अपनी लेखनी उठायी थी। उन्होंने अपने ग्रंथों में इसका नाम अंक पाश' दिया है। इस विषय पर उनके द्वारा खोजे गये एक सिद्धान्त को तो हम आज तक भी काम में ला रहे हैं। इसका प्रचलित रूप इस प्रकार का है।
r वस्तुओं की क्रमचय संख्या = r!/ k! l!
4. करणी (Surds) के बारे में भी भास्कराचार्य को अच्छा ज्ञान था जैसा कि उनके ग्रंथों में पाये जाने वाली निम्न प्रकार की समस्याओं से स्पष्ट होता है।
Ex. - एक त्रिभुज की भुजायें √13 और √5 हैं अगर उसका क्षेत्रफल 4 है तो आधार की लम्बाई बताओ।
5. घन समीकरण (Cubic Equations) और द्वि-वर्गात्मक समीकरणों (Biquadratic Equations) का भी विवरण भास्कर के ग्रंथों में पाया जाता है।
x2 + 12x = 6x2 + 35
x4 - x2 - 400x = 100
जैसी द्वि-वर्गात्मक समीकरणों का पूर्ण हल सहित 'सिद्धान्त शिरोमणि' के द्वितीय अध्याय बीजगणित में पाया जाता है।
6. डिफ़रेंशियल केलकुलस (Differential Calculus) के क्षेत्र में भी भास्कराचार्य ही विश्व के प्रथम गणितज्ञ थे जिन्होंने Differential Coefficient से सम्बन्धित उदाहरण प्रस्तुत किये।
7. रौल्स प्रमेय (Rolle's Theorem) के आधारभूत तत्वों को भी भास्कराचार्य ने ही जीवन दिया है।
8. त्रिकोणमिति (Trigonometry ) के क्षेत्र में भी इनका काफी योगदान है।
Ex. -
- sin (A + B)=sin A cos B± cos A sin B
- sin (A- B /2) = 1/2 [(sin A + sin B) 2+ (cos A cos B)²]1/2
9. पृथ्वी के गोल होने का प्रमाण देते हुये वे 'गोलाध्याय' में लिखते हैं- “गोले की परिधि का सौवां भाग एक सीधी रेखा प्रतीत होती है। हमारी पृथ्वी भी एक विशाल गोला है, मनुष्य को उसकी परिधि का एक बहुत ही छोटा भाग दिखाई देता है, इसलिए यह चपटी दिखाई देती है।"
10. इसी प्रकार न्यूटन के बहुत पहले भास्कराचार्य को गुरुत्वाकर्षण शक्ति का ज्ञान हो चुका था। इसे उन्होंने धारणिकात्मक शक्ति कहा है। वे लिखते हैं- “पृथ्वी अपनी आकर्षण शक्ति के जोर से सब वस्तुओं को अपनी ओर खींचती है इसलिये सभी पदार्थ इस पर गिरते हुये दृष्टिगोचर होते हैं।"
Thursday, September 9, 2021
गणित में आर्यभट्ट का योगदान (Aryabhatta's Contribution in Mathematics)
गणित में आर्यभट्ट का योगदान (Aryabhatta's Contribution in Mathematics)
जन्म- 476 ई0 कुसुमपुरा पाटलिपुत्र (वर्तमान में पटना)
प्रसिद्ध पुस्तक - आर्यभट्टीय, आर्यस्तायता, कालकिया और गोला
इनको आर्यभट्ट प्रथम के नाम से जाना जाता है। इसी नाम के एक और गणितज्ञ इनके बाद हो चुके हैं जिन्होंने 950 ई० के लगभग महाआर्य सिद्धांत नामक पुस्तक लिखी है । अतः इन्हें 'आर्यभट्ट द्वितीय' के नाम से जाना जाता है। आर्यभट्ट प्रथम (499 ई०) के समय से भारतीय गणित विज्ञान का स्वर्णिम युग आरम्भ हुआ। इस बात में कोई संदेह नहीं है । आर्यभट्ट का जन्म कहाँ हुआ इस विषय पर भी कुछ मतभेद हैं।
इन्होंने अपनी गणितीय गणना में अंकगणित, बीजगणित एवं रेखागणित का प्रयोग किया। इनकी पुस्तकों में से 'आर्यभट्टीय' नामक पुस्तक प्रसिद्ध पुस्तक है। यह पुस्तक पूर्णतः श्लोकों में लिखी गयी है। इस पुस्तक में कुल पाँच अध्याय हैं जिनमें केवल एक अध्याय ही गणित पर है, व शेष चार ज्योतिष पर हैं। इसमें आर्यभट्ट ने केवल एक अध्याय में अंकगणित, बीजगणित, ज्यामिति और त्रिकोणमिति के 33 सूत्र दिये हैं।
आर्यभट्ट पहले गणितज्ञ थे, जिन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि पृथ्वी गोलाकार है और अपनी धुरी पर घूमती है। जिसके आधार पर ही रात-दिन होते हैं। गणित में आर्यभट्ट का योगदान अत्यधिक महत्वपूर्ण है। \
योगदान (Contribution) -
- इन्होंने (पाई) का मान 3.1416 दिया। ये ही पहले ऐसे गणितज्ञ थे, जिन्होंने ज्या तालिका (sins table) विकसित की।
- अंकगणित के क्षेत्र में वर्गमूल व घनमूल ज्ञात करने की विधियों तथा त्रैराशिक नियम का भी उल्लेख किया है।
- अक्षर संकेत (Alphabet Numbers) पद्धति का अविष्कार आर्यभट्ट प्रथम ने किया। इस पद्धति में अंकों को वर्णमाला के अक्षरों द्वारा प्रकट किया जाता है। स्वरों (Vowels) को छोड़कर देवनागरी वर्णमाला में 25 वर्गीय व्यंजन (Consonants) होते. हैं तथा 9 अवर्गीय होते हैं। 25 वर्गीय व्यंजनों द्वारा से लेकर 25 तक के अंकों को प्रकट किया जा सकता है। जैसे 'ख' द्वारा 2 को, च द्वारा 6 को इत्यादि। 9 अ वर्गीय व्यंजनों य र, ल, व, श, ष, स, ह इत्यादि के द्वारा क्रमश: 30, 40, 50, 60 इत्यादि को प्रकट किया जा सकता है तथा 'अ, आ, इ, ई, उ इत्यादि क्रमश: 100, 101 102 प्रकट करते हैं।
ख्य = ख+ य = 2 + 30 = 32
ख्यू = (ख + य )* उ = 32 × 10 power 4 = 3,20,000
- आर्यभट्ट प्रथम से पहले जैन गणितज्ञों ने वर्गमूल निकालने की विधि का अविष्कार कर लिया था, परन्तु उसका स्पष्टीकरण आर्यभट्ट द्वारा ही सम्भव हो सका।
- दशमलव पद्धति (Decimal System) को प्रयोग में लाने के लिए आर्यभट्ट ने प्रशंसनीय कार्य किया। इसके अतिरिक्त क्षेत्रफल व घनफल निकालने के सभी साधारण नियम आर्यभट्टीय में मिलते हैं। वर्ग का क्षेत्रफल, त्रिभुज का क्षेत्रफल, विषम चतुर्भुज का क्षेत्रफल, वृत्त का क्षेत्रफल, गोले (Sphere) तथा शंकु (Cone) का घनफल, तथा सभी प्रकार के क्षेत्रों की औसत (Average) लम्बाई और चौड़ाई जानकर क्षेत्रफल निकालने से सम्बन्धित सभी नियम इसमें मिलते हैं। इससे आर्यभट्ट की रेखागणित में प्रयोगात्मक रूप से कितनी रुचि थी, इसका पूर्ण आभास हो सकता है।
- पाई (π) का मान = 3.1416 (लगभग), आज हम सभी इस सम्बन्ध से अच्छी तरह परिचित हैं। विश्व में सबसे पहले आर्यभट्टीय में ही के मान की गणना की ।
- केवल अंकगणित ही नहीं बीजगणित भी आर्यभट्ट का बहुत ऋणी है। बीजगणित की राशियों के जोड़, बाकी, गुणा और भाग के अतिरिक्त भिन्नों (Fractions) के हरों (Denominators) को सामान्य (सर्वनिष्ठ) हरों में बदलने की रीति, भिन्नों में गुणा और भाग देने की रीति, बीजगणित के कुछ साधारण सूत्र जैसे a2 + b2 = (a+b)2 तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के समीकरणों को हल करने की विधि आर्यभट्टीय में दी गयी है ।
- यही नहीं आर्यभट्ट ने समान्तर श्रेणी (Arithmetic Progression) के ऊपर भी अपनी लेखनी बहुत ही सुनियोजित ढंग से उठायी है। निम्न प्रकार की बीजीय सर्वसमिकाओं (Identities) के दर्शन हमें प्रथम बार आर्यभट्टीय में ही मिलते हैं।
- आर्यभट्ट गणितज्ञ ही नहीं खगोल विज्ञान के भी प्रकांड पंडित थे। उन्होंने संसार के सम्मुख यह कहने का साहस किया कि “ब्रह्माण्ड की दिन प्रतिदिन की गतिशीलता का कारण पृथ्वी का एक धुरी के सहारे घूमते रहना ही है। " (Diurnal motion of the heavens is due to the rotation of the earth about an axis).
Tuesday, September 7, 2021
केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (Central Advisory Board of Education (CABE))
केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (Central Advisory Board of Education (CABE))
स्थापना- वर्ष 1921
मुख्य उद्देश्य - शिक्षा से संबंधित विषयों (नीतियों व कार्यों) पर प्रान्तीय सरकार को सलाह देना।
वर्ष 1923 में इसे भंग कर दिया गया और फिर वर्ष 1935 में हार्टोंग समिति (Hartong Committee) की सिफारिश पर पुनः स्थापित किया गया जो आज तक कार्य कर रहा है। यह शिक्षा मंत्रालय की महत्वपूर्ण संस्था है।आज यह मण्डल शिक्षा सम्बधी सभी महत्त्वपूर्ण समस्याओं, प्रकरणों तथा विषयों पर शिक्षा मन्त्रालय को परामर्श देता है।
बोर्ड का गठन (Constitution of Board)-
- अध्यक्ष (Chairman) - केन्द्रीय शिक्षा मन्त्री
- भारत सरकार का शिक्षा परामर्शदाता (Education Consultant)
- भारत सरकार द्वारा मनोनीत सदस्य - 15 (जिनमें 4 स्त्रियाँ होती हैं।)
- संसद के सदस्य - 5 (3 लोकसभा + 2 राज्य सभा)
- अन्तर विश्वविद्यालय द्वारा निर्वाचित सदस्य - 2
- अखिल भारतीय प्राविधिक शिक्षा परिषद् (All India Council for Technical Education) द्वारा मनोनीत सदस्य - 2
- प्रत्येक राज्य के प्रतिनिधि के रूप में शिक्षा मन्त्री अथवा उसके द्वारा मनोनीत आदि इस मण्डल के प्रमुख सदस्य के रूप में कार्य करते हैं।
समितियाँ (Committees) -
यह बोर्ड मुख्य रूप से 7 समितियों की सहायता से कार्य करता है। ये 7 समितियाँ हैं-
(i) प्राथमिक एवं बेसिक शिक्षा समिति
(ii) माध्यमिक शिक्षा समिति,
(iii) उच्च शिक्षा समिति
(iv) सामाजिक शिक्षा समिति
(v) उच्च एवं तकनीकी सहायता समिति
(Vi) सांस्कृतिक शिक्षा समिति
(Vii) सामाजिक कार्यों से सम्बंधित शिक्षा समिति
केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार मण्डल के कार्य -
- केन्द्रीय और राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत नवीन शैक्षिक योजनाओं का निर्माण, कार्यान्वयन और सफलता हेतु परामर्श देना।
- शैक्षिक विकास से सम्बन्धित राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की सूचनाओं को एकत्र करना, जाँच करना और सिफारिश के साथ केन्द्रीय व राज्य सरकारों को प्रस्तुत करना।
- देश की शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा समस्याओं को समाधान पर विचार करना और शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर शैक्षिक विकास और प्रसार करने में नेतृत्व प्रदान करना।
- केन्द्र और राज्य स्तर पर सरकार द्वारा प्रस्तुत कठिनाइयों को दूर करने हेतु कार्य करना।
- शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर गठित समितियों से सम्पर्क साधना और शैक्षिक कार्यक्रमों तथा क्रियाओं को सफलतापूर्वक क्रियान्वित करना ।
- शैक्षिक विकास के लिए गठित समिति द्वारा दिये गये किसी भी सूचना, परामर्श और सुझाव का मूल्यांकन करना तथा स्वयं की सिफारिश के साथ केन्द्र व राज्य सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना।
- सम्पूर्ण देश के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति निर्धारित करना और शिक्षा के आय-व्यय पर विचार करना।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 (1992 में संशोधित) में यह प्रावधान किया गया है कि शैक्षिक विकास की समीक्षा करने, व्यवस्था एवं कार्यक्रम पर नजर रखने के लिये आवश्यक परिवर्तनों का निर्धारण करने में भी केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (CABE) की महत्वपूर्ण भूमिका है।
Friday, August 27, 2021
गणित का इतिहास (History of Mathematics)
गणित का इतिहास (History of Mathematics)
भारतीय गणित का शुभारम्भ 'ऋग्वेद' से हुआ है। इसका इतिहास मुख्य रूप से पाँच कालखण्डों में विभाजित किया है-
1. आदिकाल (500 ई० पू० तक)
(A) वैदिक काल (1000 ई० पू० तक)
(B) उत्तर वैदिक काल (1000 ई० पू० से 500 ई० पू० तक)
- शुल्य एवं वेदांग ज्योतिष काल
- सूर्य प्रज्ञाप्तिकाल
2. पूर्व मध्यकाल (500 ई० पू० से 400 ई० पू० तक)
3. मध्यकाल (400 ई० पू० से 1200 ई० तक)
4. उत्तर मध्यकाल (1200 ई० से 1800 ई० तक)
5. वर्तमान काल (1800 ई० के पश्चात्)
आदिकाल (500 ई० पूर्व तक)
यह काल भारतीय गणित के इतिहास में अति महत्वपूर्ण काल है। इस काल में अंकगणित (Arithmetic), रेखागणित (Geometry) बीजगणित (Algebra) का विकास हुआ।
(A) वैदिक काल (1000 ई० पूर्व तक) -
- इस काल में शून्य तथा दशमलव स्थान मान पद्धति (Decimal place value method) का अविष्कार हुआ। यह गणित की अद्भुत देन है। शून्य एवं दाशमिक स्थानमान पद्धति का महत्व इस ओर परिलक्षित करता है कि आज यह पद्धति सम्पूर्ण विश्व में प्रचलित है तथा इसके आविष्कार ने ही गणित को प्रखर शिखर पर पहुँचाया है।
- महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित ‘नारद-विष्णु पुराण' के पूर्व भाग के द्वितीय पाठ में, त्रिस्कन्ध ज्योतिष के वर्णन में गणित का प्रतिपादन हुआ जिसमें एक (10० ), दश, शत, सहस्त्र अयुत (दस हजार), लक्ष (लाख), कोटि (करोड़), अर्बुद (दस करोड़), अब्ज (अरब), खर्ब (दस अरब), निखर्ब (खरब), महापद्म (दस खरब), शंकु (नील), जलधि (दस नील), अन्त्य (पद्म), पराध (शंख जो 10 के घात 17 के मान के बराबर है) इत्यादि संख्याओं के बारे में बताया गया है।
- दशामिक स्थानमान पद्धति भारत से अरब गयी और अरब से पश्चिमी देशों में पहुंची। इसी कारण से अरब के लोग 1 से 9 तक के अंकों को 'हिन्दसा' कहते हैं तथा पश्चिमी देशों में 0 - 9 तक के अंकों को 'हिन्दू-अरबीक न्यूमरल्स' (Hindu-Arabic Numerals) कहा जाता है।
(B) उत्तर वैदिक काल (1000 ई० पू० से 500 ई० पू० तक) -
(i) शुल्व एवं वेदांग ज्योतिष काल-
शुल्व से तात्पर्य रस्सी से है, वह रस्सी जो यज्ञ की वेदी बनाने के लिये माप में काम आती थी। शुल्व सूत्रों में रेखा गणित के सूत्रों का विकास एवं विस्तार उपलब्ध है। इस काल में तीन सूत्रकारों का नाम उल्लेखनीय है - बौधायन, आपस्तम्ब एवं कात्यायन ।
- बौधायन शुल्व सूत्र (1000 ई० पू०) को आज पाइथागोरस प्रमेय के नाम से जाना ने जाता है।
- बौधायन ने दो वर्गों के योग व अन्तर के बराबर वर्ग बनाने की विधि दी है तथा √2 का मान दशमलव के पाँच स्थानों तक निकालने का सूत्र भी दिया है।
(ii) सूर्य प्रज्ञाप्ति काल-
- इस काल की प्रमुख कृतियाँ- सूर्य प्रज्ञाप्ति तथा चन्द्र प्रज्ञाप्ति (500 ई० पू०) । जो जैन धर्म के प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं।
- सूर्य प्रज्ञाप्ति में दीर्घवृत्त का उल्लेख मिलता है। जिस परिमंडल के नाम से जाना जाता है।
- भगवती सूत्र (300 ई० पू०) में भी परिमंडल शब्द दीर्घवृत्त के लिए प्रयुक्त हुआ है, जिसके दो प्रकार बताये गये हैं- पहला प्रतर-परिमण्डल व दूसरा घन परिमण्डल |
- बौद्ध साहित्य में गणित को दो भागों बाँटा गया-
(ii) संख्यान (उच्च गणित)
- संख्याओं का वर्णन तीन रूपों में किया-
(ii) असंख्येय (Uncountable)
(iii) अनन्त (Infinity)
पूर्व मध्यकाल (500 ई० पू० - 400 ई० तक)
- इस युग के प्रमुख ग्रन्थों में वक्षाली गणित, सूर्य सिद्धान्त, गणितयोग, स्थानांग सूत्र, भगवती सूत्र व अनुप्रयोग द्वार सूत्र मुख्य हैं।
- वक्षाली गणित में अंकगणित की मूल संक्रियाऐं, दाशमिक अंकलेखन पद्धति पर लिखी हुई संख्याऐ, भिन्न, परिकर्म (योग, अन्तर, गुणन, भजन, वर्ग, वर्गमूल, घन और घनमूल), वर्ग, घन, व्याजरीति आदि का विस्तृत वर्णन है।
- स्थानांग सूत्र में 5 प्रकार के अनन्त की एवं अनुयोगद्वार में 4 प्रकार के प्रमाण (measure) बताये गये हैं।
- सूर्य सिद्धान्त में वर्तमान त्रिकोणमिति का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसमें ज्या (Sine), कोटिज्या (cosine) आदि का मान दिया गया है।
- भारतीयों ने जमा, घटा (धन व ऋण) चिह्नों का विकास किया।
- अंकगणित की तरह बीजगणित भी भारत से अरब पहुँचा, वहाँ के गणितज्ञ 'अलख्वारीज्यी' ने अपनी पुस्तक 'अलजब्र' एवं 'अल-मुकाबला' में भारतीय बीजगणित पर आधारित विषय का प्रतिपादन किया। इनकी इस पुस्तक के नाम पर ही इस विषय का नाम 'अलजेब्रा' (Algebra) पड़ा।
- भगवती सूत्र में n प्रकारों में से 1-1, 2-2 प्रकारों को एक साथ लेकर जो युग्म (Combination) बनते हैं उन्हें एकक , द्विक संयोग आदि कहा गया है जिनका मान n, n(n-1)/2 आदि बताया गया है।
मध्यकाल (400 ई० से 1200 ई० तक)
- मध्यकाल को भारतीय गणित का स्वर्ण-युग कहा जाता है, क्योंकि इस काल में ऐसे महान गणितज्ञ हुये, जिन्होंने गणित की सभी शाखाओं को ज्ञात किया।
- इस काल के कुछ प्रमुख गणितज्ञ भास्कर प्रथम, आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, श्रीपति मिश्र, नेमीचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्ती , महावीराचार्य आदि हैं।
- आर्यभट्ट प्रथम (499 ई०) ने अपनी पुस्तक 'आर्यभट्टीय' में 332 श्लोकों में गणित के महत्वपूर्ण मूलभूत सिद्धान्तों को दिया है। रेखागणित के क्षेत्र में इन्होंने का π का मान चार स्थानों तक 3.1416 ज्ञात किया।
- भास्कर प्रथम (600 ई०) ने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'महाभास्करीय', 'आर्यभट्टीय ''भाष्य' और 'लघु भास्करीय' दिए हैं जिनमें आर्यभट्ट द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों को विकसित किया गया।
- ब्रह्मगुप्त (628 ई०) ने अपना प्रसिद्ध ग्रन्थ 'ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त' दिया। इन्होंने बीजगणित के समीकरण साधनों के नियमों का उल्लेख किया तथा अनिर्णीत द्वि-घातीय समीकरण (Undecidable quadratic equation) का समाधान भी बताया जिसे आयलर ने 1764 में, लांग्रेज ने 1768 ई० में प्रतिपादित किया।
- श्रीधराचार्य (850 ई०) ने अंकगणित पर नवशतिका तथा त्रिशतिका, पाटी गणित और बीजगणित पुस्तकों की रचना की। इनका द्विघात समीकरण हल करने का सूत्र जो "श्रीधराचार्य विधि” कहलाता है, आज भी व्यापक रूप से प्रयोग में लाया जाता है। इनकी पुस्तक 'पाटी गणित' का अनुवाद अरब में 'हिसाबुल तरब्त' नाम से हुआ।
- महावीराचार्य (850 ई०) ने 'गणितसार संग्रह' नामक अंकगणित के वृहत् ग्रन्थ की रचना की।
- श्रीपति मिश्र (1039 ई०) ने 'सिद्धान्त शेखर' एवं 'गणित तिलक' (आज्ञात राशियों के सम्बन्ध में) की रचना की।
- भास्कराचार्य द्वितीय (1114 ई०) ने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'सिद्धान्त शिरोमणि' तथा 'करण कुतूहल को दिया है। वेदों में इनके सूत्रों को आधार मानकर वैदिक गणित की आधुनिक कृतियों में किया जा रहा है।
- लीलावती में संख्या पद्धति को आधुनिक अंकगणित व बीजगणित की रीढ मानी जाती है।
- प्राचीन ग्रंथों पर टीकाएँ (Comments) लिखना इस काल की मुख्य देन है ।
- केरल के गणितज्ञ नीलकण्ठ ने 1500 ई० में एक पुस्तक में ज्या r (sin r) का मान ज्ञात किया-
- नारायण पण्डित (1356) ने अंकगणित पर "गणितकौमुदी" (गणितीय संक्रियाओं, मैथेमैटिकल ऑपरेशन्स से सम्बंधित) नामक एक वृहत् ग्रन्थ की रचना की। इसमें अनेक विषयों का प्रतिपादन किया गया है, जिसमें क्रमचय-संचय (Permutation), अंक विभाजन (Partition of Numbers) तथा मायावर्ग (Magic squares) प्रमुख हैं।
- नीलकण्ठ (1587 ई०) ने “ताजिकनीलकण्ठी" नामक ग्रन्थ की रचना की जिसमें ज्योतिष गणित का प्रतिपादन किया गया है।
- कमलाकर (1608 ई०) ने सिद्धान्त-तत्व विवेक नामक ग्रन्थ की रचना की।
- सम्राट जगन्नाथ (1731 ई०) ने “सम्राट सिद्धान्त” तथा “रेखागणित" नाम की दो पुस्तकें लिखीं। रेखागणित की वर्तमान शब्दावली अधिकांशतः इसी पुस्तक पर आधारित है।
- नृसिंह बापू देव शास्त्री (1831 ई० ) ने भारतीय एवं पाश्चात्य गणित पर पुस्तकों का सृजन किया। इनकी पुस्तकों में रेखागणित, त्रिकोणमिति, सायनवाद तथा अंकगणित मुख्य हैं।
- सुधाकर द्विवेदी ने दीर्घ वृत्त लक्षण, गोलीय रेखागणित, समीकरण मीमांसा, चलन-कलन आदि अनेक पुस्तकों की रचना की। साथ ही ब्रह्मगुप्त एवं भास्कर की पुस्तकों पर टीकाएं लिखकर सामान्य जनता के लिये सुलभ कराया।
- रामानुजम (1889 ई०) सूत्र रूप में गणित एवं अन्य सिद्धान्तों को लिखने व सिद्ध करने की वैदिक परम्परा के आधुनिक युग के महान् गणितज्ञ हैं। उनके द्वारा प्रतिपादित 50 प्रमेयों में से एक-दो को सिद्ध करने से ही गणितज्ञों एवं शोध कर्त्ताओं . को वर्ष पर्यन्त दत्तचित्त होकर परिश्रम करना पड़ा। कुछ प्रमेय अभी तक सिद्ध नहीं किये जा सके हैं। इनकी कृति “रामानुज डायरी" शीर्षक से प्रकाशित हुई हैं।
- महान् गणितज्ञ एवं दार्शनिक जगद्गुरु शंकराचार्य भारती कृष्णतीर्थ (1884-1960 ई०) आधुनिक युग में वैदिक गणित के प्रधान भाष्यकार हैं। इन्होंने अपनी पुस्तक "वैदिक गणित" में वैदिक सूत्रों पुनः प्रतिपादित किया है और उनमें निहित सिद्धान्त और विधियों को इतनी सरल, सुग्राह्य एवं सुस्पष्ट (simple, intelligible and clear) भाषा में प्रस्तुत किया है कि गणित का एक साधारण विद्यार्थी भी उसे आत्मसात (assimilation) कर गणित के जटिलतम प्रश्नों को अत्यल्प समय में हल कर सकता है। है। इन्होंने हमें सर्वथा नवीन दृष्टि देकर वैदिक गणित पर शोध करने तथा उसका उपयोग करने के लिये विवश कर दिया है।
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