Friday, May 28, 2021

सृजनात्मकता के विकास में शिक्षकों की भूमिका (Role of Teachers in the Development of Creativity)

 सृजनात्मकता के विकास में शिक्षकों की भूमिका   (Role of Teachers in the Development of Creativity)

 अध्यापक की भूमिका ऐसी होनी चाहिए कि वह विद्यार्थी को उसकी सृजनात्मकता की प्रवृत्ति की अभिव्यक्ति हेतु उपयुक्त माध्यम ढूंढने में समुचित दिशा निर्देशन करें। सर्जनशीलता को विकसित करने के लिए गिलफोर्ड Guilford), आसबर्न (Osborn) आदि मनोवैज्ञानिकों ने निम्नलिखित व्यवहारिक सुझाव दिये है -

1. बालकों में सृजनात्मकता का विकास करने के लिए शिक्षक को स्वयं भी सृजनात्मक प्रवृत्ति का होना चाहिए उसे चाहिए कि वह स्वयं भी साहित्य (Literature), विज्ञान, कला आदि के क्षेत्र में सृजन कार्य करे और छात्रों के समक्ष एक उदाहरण प्रस्तुत करे। इससे  बालकों को प्रेरणा एवं प्रोत्साहन प्राप्त होता है। 

2.  शिक्षक द्वारा  छात्रों में  विभिन्न सृजनात्मक कार्यों की  नवीनतम् सूचनाओं के  संग्रह करने का अवसर एवं सुविधा प्रदान की जानी  चाहिए । 

3.  शिक्षकों द्वारा  बालकों को ऐसा वातावरण प्रस्तुत किया जाये, जो प्रोत्साहित करने वाला और क्रियाशीलता एवं नम्यता (Flexibility) की शिक्षा देने वाला हो।

4. जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में जैसे सामाजिक (Social), आर्थिक (Economic), राजनैतिक (Political), वैज्ञानिक (Scientific), तकनीकी (technology) और शैक्षिक (Educational) आदि समस्याओं के समाधान की  योजना प्रस्तुत करके छात्रों से हल कराने का प्रयत्न किया जाय।

5 . सुधार, निर्माण खोज और आविष्कार की क्रियाओं में छात्रों को लगाया जाय। इससे उनमें सृजनात्मकता का विकास होगा।

6 . अध्यापक को चाहिए कि वह छात्रों को विभिन्न स्रोतों से ज्ञान (Knowledge), कौशल (Skill) एवं अन्य सूचनाएँ  (Other Information) ग्रहण करने और संग्रह करने को प्रेरित करे। 

7 . शिक्षकों द्वारा  बालकों को   उत्तर देने की पर्याप्त स्वतंत्रता प्रदान की जानी  चाहिए  । 

8.  शिक्षकों द्वारा  बालकों  को   उचित अवसर व वातावरण उपलब्ध कराना चाहिए  । 

9. बालकों में मौलिकता  एवं लचीलेपन के गुणों को विकसित करने का प्रयास किया जाना चाहिए ।

10.बालकों के डर (Fear) एवं झिझक (hesitation) को दूर करने का प्रयास किया जाये।

11. बालकों के लिए सृजनात्मकता को विकसित करने वाले उपकरणों (Tools) की व्यवस्था की जानी चाहिए।

12. बालकों  मे सृजनात्मकता को विकसित करने के लिए विशेष प्रकार की तकनीकी (Technology) का प्रयोग करना चाहिए। जैसे:- मस्तिश्क विप्लव (Brain Storming), किसी वस्तु के असाधारण प्रयोग, शिक्षण प्रतिमानों (Teaching models) का प्रयोग, खेल विधि (Play Method) आदि।

13. बालकों  के लिए सृजनात्मकता को विकसित करने के लिए पाठ्यक्रम में सृजनात्मक विषय- वस्तुओं का समावेश (Inclusion) किया जाना चाहिए।

14. बालकों  में सृजनात्मकता के प्रशिक्षण (training) एवं विकास (development) के लिए उन्हें अपने उत्तर  का स्वयं ही वास्तविक मूल्यांकन (Actual Evaluation) करने के लिए प्रेरित किया जाय। अर्थात् किसी समस्या के समाधान अथवा नवीन रचना के लिए बालक ने जिन तथ्यों को लागू करने का निश्चय किया है, उसका वह स्वयं ही मूल्यांकन करे कि क्या वे उस समस्या के समाधान अथवा रचना में सहायक होंगे।




Monday, May 24, 2021

सृजनशील बालकों की विशेषताएँ (Characteristics of Creative Children's)

 सृजनशील बालकों की विशेषताएँ 

(Characteristics of Creative Children's )

विभिन्न मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के निष्कर्षो में यह पाया गया है कि सृजनशील बालकों में निम्नलिखित विशेषताएँ पायी जाती हैं-


1. क्रियाशीलता  (Productivity/Self-activity)-  सृजनशील बालक में क्रियाशीलता अधिक होती है। वह हर समय किसी-न-किसी कार्य में लगा रहता है।

2. मौलिकता (Originality)- क्रियाशील बालक में मौलिक रूप से कल्पना और चिन्तन करने की क्षमता (Ability) होती है। 

3. स्वतंत्र निर्णय-शक्ति (Free decision power) -  सृजनशील बालक किसी समस्या के समाधान करने में दूसरों के सुझावों को शीघ्र स्वीकार नहीं करता है , उसमें समस्या के सम्बन्ध में स्वयं  निर्णय लेने  की क्षमता होती है।

4. बुद्धिलब्धि (Intelligence Quotient) -   सृजनात्मक बालकों की बुद्धि-लब्धि उच्च होती है। 

5. जिज्ञासा एवं रुचि (Curiosity & Interest) -  इस प्रकार के बालकों में किसी कार्य को सम्पन्न करने के लिए  जिज्ञासा  और उत्सुकता दिखाई देती है। वे रुचिपूर्वक अपने कार्य में लगे रहते हैं। 

6. बोधगम्यता (Intelligibility) - वे किसी विषय को सरलता और शीघ्रता से समझ लेते हैं।

7. भावाभिव्यक्ति की क्षमता  (Ability of Expression) - वे अपने विचारों और कल्पना को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने की क्षमता रखते हैं। 

8. विनोदी प्रवृत्ति (Sense of Humour)- सृजनशील बालक परिहास (Humour) (मजाकिया/खुश रहने वाले) प्रिय होते हैं। वे आनन्द और मनोरंजन  में रुचि लेते हैं।
 
9. अन्तर्दृष्टि (Insight) का होना-  वे सूझ-बूझ से कार्य करते हैं। वे किसी भी कार्य में सबसे आगे पहल (initiative) करते हैं।
10. समायोजनशीलता (Adjustability) - वे अधिक सहनशील एवं परिस्थितियों के साथ शीघ्र समन्वय या समायोजन (Adjustment) करने वाले होते हैं। 
11. संवेदनशीलता (Sensitivity) - इस प्रकार के बालक अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। वे किसी भी कार्य की समस्या पर गम्भीरतापूर्वक विचार करते हैं। 
12. अपने उत्तरदायित्वों के प्रति सजग (Alert) रहते हैं । 
13. इनमे गतिशीलता (Mobility) का गुण  पाया जाता है । 
14. आत्मनिर्भर व अधिगम स्थानांतरण (Transfer of Learning) की तीव्र  योग्यता पायी जाती है । 
15. इनके विचारों में प्रवाहशीलता (Flowability) पायी जाती है । 
16. उच्च  आकांक्षा (Aspiration Level)  स्तर होता है । 
17. एक ही समय बहुत से विचारों को सामने रखने की योग्यता (Ability) होती है । 
18. विस्तार (Distribution) की तीव्र योग्यता पायी जाती है ।
19. दूरदर्शिता (Foresight) एवं आशावादी  (Hopeful) सोच रखते हैं।  
20. सृजनात्मक  बालक अन्य बालकों की तरह जीवन न जी कर, एक नये ढंग से जीवन को जीने की कोशिश करते हैं।

Sunday, May 23, 2021

सृजनात्मक -प्रक्रिया (Creative- Process)

 सृजनात्मक -प्रक्रिया (Creative- Process)  

सृजनात्मक प्रक्रिया एक जटिल प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया का मनोवैज्ञानिकों तथा शिक्षाविदों ने गहन अध्ययन किया। सृजनात्मकता की प्रक्रिया के सोपान निम्न हैं- 

1. तैयारी (Preparation) 

2. उद्भवन काल (Incubation Period) 

3. प्रकाश  या प्रेरणा (Illumination or Motivation) 

4. किसी एक विचार से बँध जाना (Stay on an idea) 

5. परिणाम का अनुमान (Result estimate):- 

6. सत्यापन  (Verification) 


1. तैयारी (Preparation) :-

सृजनात्मकता की प्रक्रिया में तैयारी (Preparation) प्रथम सोपान होता है जिसमें समस्या पर गंभीरता (seriousness) के साथ कार्य किया जाता है। सर्वप्रथम समस्या का विश्लेषण (Analysis) किया जाता है और उसके समाधान के लिए एक रूपरेखा का निर्माण किया जाता है। 


(A) समस्या का प्रत्यक्षीकरण (Clarification of  the problem) :- सृजनात्मक प्रक्रिया किसी ऐसी अनूठी (Unique) समस्या के अवलोकन स्वरूप (Format) होती है जिसका प्रत्यक्षीकरण (Clarification) करना आम आदमी की पहुँच से परे है। 

जैसे-  न्यूटन ने पेड़ से नीचे गिरते हुए सेब  को देखकर इसके नीचे गिरने के कारण का पता लगाने से सम्बन्धित समस्या पर ध्यान केन्द्रित किया था।


(B) समस्या में परिवर्तन ( Modification of problem ) :- समस्या का प्रत्यक्षीकरण करने के बाद समस्या के प्रत्येक पहलू का विभिन्न दृष्टिकोणों (Perspective) से अध्ययन किया जाता है तथा उसमें संभावित परिवर्तन किये जाते हैं।


(C) परम्परागत निर्णयों को स्थगित करना (Suspending Conventional judgments):- इस चरण में व्यक्ति समस्या से सम्बन्धित परम्परागत (Traditional) निर्णयों की पूर्ण रूप से उपेक्षा (Neglect) करता है तथा उनकी जगह कुछ अलग तरह के  लगने वाले विचित्र  हास्याप्रद  विचारों का प्रतिवादन करता है।


2. उद्भवन काल (Incubation Period) :-


जब व्यक्ति कई प्रकार से समस्या समाधान के प्रयास करने पर सफल नहीं हो पाता है तो उद्भवन की स्थिति आ जाती है। उद्भवन काल में व्यक्ति समस्या के बारे में चिन्तन छोड़कर चेतन/सचेत (Conscious) रूप से तो विश्राम की अवस्था में चला जाता है लेकिन अचेतन (Unconscious) रूप से वह समस्या के बारे में विचार करता रहता है। इस अवस्था में व्यक्ति दो कार्य करता है -

(i) नये ज्ञान को सीखता है, 

(ii) नये ज्ञान को पुराने ज्ञान के साथ आत्मसात् (Assimilation) करता है। 

इस अवस्था में व्यक्ति कोई प्रकाश की किरण तलाशता है जो समस्या का समाधान करने का रास्ता दिखाये।


3. प्रकाश अथवा प्रेरणा (Illumination or Motivation) :-


उद्भवन के बाद प्रकाश की किरण अथवा प्रेरणा अचेतन मन (Unconscious Mind) की गहराइयों से उत्पन्न होती है। निष्क्रिय (Inactive) रहने की अवस्था में कवि के मन  से कविता  का निर्माण होता है।  आर्कमिडीज को अपने उत्प्लावन बल (Buoyancy Force) के सिद्धान्त का ज्ञान पानी के हौज में नहाते समय अचानक हुआ था। इसी प्रकार के उदाहरणों के आधार पर ही मनोवैज्ञानिकों ने माना है कि प्रकाश अथवा प्रेरणा मानसिक निष्क्रियता (Mental Inactivity) की अवस्था में प्राप्त होती है।


4. किसी एक विचार से बँध जाना (Stay on an idea):- 


जब व्यक्ति को किसी विचार की गहन जानकारी हो जाती है तो वह अपने इस विचार को समस्या के समाधान हेतु चुन लेता है और लोग यदि उसकी आलोचना (Criticism) भी करते हैं तो भी वह अपने निर्णय पर अडिग रहता है।


5. परिणाम का अनुमान (Result estimate):- 


इस सोपान में व्यक्ति अपनी समस्या के संभावित परिणाम (Result) का अनुमान लगाने लगता है। व्यक्ति द्वारा इस व्यवस्था पर संभावित परिणाम का जो अनुमान लगाया जाता है वह सही हो भी सकते हैं और नहीं भी। परंतु उसमें व्यक्ति के उत्साह की अवस्था देखने को मिलती है।


6. सत्यापन/पुष्टिकरण (Verification):- 


यह सृजनात्मक प्रक्रिया की अन्तिम अवस्था है। इस स्थिति में वह प्रकाशित विचारों (Illuminated thoughts) की वैधता की जाँच करता है। इस स्थिति में वह यह निश्चित करता है कि उसकी सोच से प्राप्त विचार अथवा समस्या के हल ठीक हैं  या  नहीं। यदि परिणाम त्रुटिपूर्ण आते हैं तो समस्या समाधान हेतु नये सिरे से प्रयास किये जाते हैं और परिणामों को परिवर्तित अथवा संशोधित करके वांछित निष्कर्ष तक पहुंचा जाता है। प्रायः देखा जाता है कि साहित्यकार(Writer) अपनी रचनाओं को आवश्यकतानुसार संशोधन करके उन्हें पुनः लिखते हैं।








Tuesday, May 18, 2021

सृजनात्मकता के तत्व एवं प्रकार (Elements & Types of Creativity)

 

सृजनात्मकता के तत्व (Elements of Creativity)

गिलफोर्ड, टोरेंस तथा लेविन आदि मनोवैज्ञानिकों ने सृजनात्मकता के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया जिनके अनुसार सृजनात्मकता (Creativity) के निम्न तत्व होते हैं- 


1. धाराप्रवाहिता (Fluency)
2. लचीलापन (Flexibility)
3. मौलिकता (Originality)
4. विस्तारण (Elaboration)

1. धाराप्रवाहिता (Fluency)-

धाराप्रवाहिता से तात्पर्य  किसी दिये गये विषय पर अनेक प्रकार से विचारों को प्रस्तुत करना है  अथवा  अनेक तरह के विचारो की खुली अभिव्यक्ति (Expression) से है। जो  व्यक्ति किसी भी विषय पर अपने विचारो की खुली अभिव्यक्ति को पूर्ण रूप से प्रकट करता है वह उतना ही सृजनात्मक कहलाता है। धारा प्रवाहिता को भी चार भागों में विभक्त किया जा सकता है- 


(i) वैचारिक धाराप्रवाहिता (Ideological Fluency) : इसमें किसी वस्तु के बारे में विचारों को स्वतन्त्र रूप से प्रकट करने को प्रोत्साहित किया जाता है। 
जैसे-  किसी वस्तु के विभिन्न उपयोग बताना, किसी कहानी के संभावित शीर्षक (Title) बताना, किसी समस्या के समाधान करने के लिए विभिन्न तरीके बताना  आदि। 

(ii) अभिव्यक्ति धाराप्रवाहिता (Expression Fluency) : इसमें व्यक्ति की शाब्दिक अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित किया जाता है
जैसे- व्यक्ति के सम्मुख कुछ शब्द लिखकर उसे शब्दों से वाक्य बनाने को कहा जाये अथवा वाक्यों के रिक्त स्थानों की पूर्ति अनेक प्रकार से करने को कहा जाये ।


(iii) साहचर्य धाराप्रवाहिता (Associative Fluency) :- साहचर्य प्रवाहिता से तात्पर्य शब्दों या वस्तुओं आदि में साहचर्य स्थापित करने से है। 
जैसे- दिये गये शब्दों के अधिक-से-अधिक विलोम (Antonyms) तथा पर्यायवाची (Synonyms) शब्द लिखना, किसी भी शब्द के अन्तर्गत आने वाली अधिक-से-अधिक वस्तुओं के नाम गिनाना। 

(iv) शब्द धाराप्रवाहिता (Word Fluency) : शब्द प्रवाहिता से तात्पर्य शब्दों की विभिन्न प्रकार से रचना करने से है। 
जैसे- दिये गये प्रत्ययों (suffix) तथा उपसर्गों (infix) के बनाने में अधिक -से-अधिक शब्दों की रचना करना , प्रति से प्रतिदिन, प्रतिव्यक्ति, प्रतिवर्ष आदि ।

2. लचीलापन/विविधता (Flexibility)-

लचीलापन (Flexibility) से तात्पर्य समस्या के समाधान के लिए विभिन्न प्रकार के तरीकों को अपनाये जाने से है। किसी समस्या के समाधान के लिए मात्र एक विधि न अपनाकर अनेक विधियों से समस्या समाधान करना। जो व्यक्ति किसी भी समस्या के समाधान हेतु अनेक नये-नये रास्ते अपनाता है वह उतना ही सृजनात्मक कहलाता है। लचीलेपन से यह ज्ञात होता है कि व्यक्ति समस्या को कितने तरीकों से समाधान कर सकता है। विविधता  के भी तीन तत्व  हैं- 

(i) आकृति विविधता (Figural Flexibility) : किसी आकृति में सुधार करने के उपायों की विविधता को आकृति विविधता के नाम से जाना जाता है।


(ii) आकृति अनुकूलनात्मक विविधता (Figural Adaptive Flexibility): किसी आकृति के दिये गये रूप में परिवर्तन (Modification) करने की विधियों की विविधता को आकृति अनुकूलनात्मक विविधता कहा जाता है।


(iii) शाब्दिक विविधता (Semantic Flexibility) : - शब्दों अथवा वस्तुओं को विविध प्रकार से प्रयोग में लाने की विधियों को शाब्दिक विविधता कहते हैं।



3. मौलिकता (Originality) : 


मौलिकता मुख्य रूप से नवीनता (Novelty) से सम्बन्धित है । मौलिकता से  अभिप्राय व्यक्ति द्वारा समस्याओं को हल करने में सामान्य (General) विधियों से हटकर किसी अनोखी विधि (Unique method) का प्रयोग करने से है। जो व्यक्ति दूसरे लोगों की अपेक्षा जितने अधिक भिन्न विकल्प प्रस्तुत करता है वह उतना ही अधिक मौलिकता से सम्पन्न माना जाता है।  जब व्यक्ति समस्या के समाधान के रूप में एक बिल्कुल ही नई अनुक्रिया करता है तो ऐसा माना जाता है कि उसमें मौलिकता का गुण विद्यमान है। 
जैसे- परमाणु ऊर्जा को समाजोपयोगी किसी नवीन कार्य में प्रयोग करना। 

4. विस्तारण (Elaboration) :


विस्तारण से तात्पर्य व्यक्ति की उस क्षमता से है जिसके द्वारा वह किसी वस्तु, घटना आदि को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है। जो व्यक्ति किसी भी विशय पर अपने विचारो की खुली अभिव्यक्ति को पूर्ण रूप से बढ़ा-चढ़ाकर एवं विस्तार के साथ प्रकट करता है उसमें विस्तारण का गुण अधिक होता है। वह उतना ही सृजनात्मक कहलाता है। विस्तारण को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है—


(i) शाब्दिक विस्तारण (Semantic Elaboration) : शाब्दिक विस्तारण में व्यक्ति, किसी दी गयी संक्षिप्त घटना, कहानी, परिस्थिति, या समस्या को विस्तृत करके अपने शब्दों में प्रस्तुत करता है।

(ii) आकृति विस्तारण (Figural Elaboration) : आकृति विस्तारण में व्यक्ति दी गयी अपूर्ण अथवा छोटी आकृतियों को पूर्ण अथवा बड़े आकार में प्रस्तुत करता है 
जैसे -किसी अपूर्ण दृश्य (Scenery) के चित्र अथवा रेखा आकृति को अपने अनुसार पूरा करना।


सृजनात्मकता के प्रकार(Types of Creativity)


सृजनात्मकता को मुख्य रूप से तीन प्रकार में वर्गीकृत किया जा सकता है।






1. आकस्मिक सृजनात्मकता (Chance Creativity) : इस प्रकार के सृजनात्मक कार्य अचानक ही भाग्यवश या दैवीय संयोग से होते हैं। 

2. सहज सृजनात्मकता (Spontaneous Creativity) : सहज सृजनात्मकता से तात्पर्य सहज भावना से ऐसे नवीन कार्य करने अथवा किसी नवीन वस्तु का निर्माण करने से है जो किसी तत्कालिक उद्देश्य की पूर्ति करे। 
जैसे - किसी नाले को पार करने के लिए सैनिक अस्थाई पुल का निर्माण कर लेते हैं।

3. संरक्षणात्मक सृजनात्मकता (Conservable Creativity)
: - संरक्षणात्मक सृजनात्मकता वह प्रक्रिया है जिसमें सृजित वस्तु का कोई तत्कालिक उपयोग करने का उद्देश्य नहीं होता है। लेकिन भविष्य के उपयोग हेतु इस प्रकार से सृजित वस्तु का संरक्षण किया जाता है। कभी-कभी -  कभी यह सृजित वस्तु आने वाली कई पीढ़ियों के काम आती है ।






Monday, May 17, 2021

सृजनात्मकता (Creativity)

 सृजनात्मकता/रचनात्मकता (Creativity)

अर्थ (Meaning) -  सृजनात्मकता (Creativity) सामान्य रूप से जब हम किसी वस्तु या घटना के बारे में विचार करते हैं तो हमारे मन-मस्तिष्क में अनेक प्रकार के विचार उत्पन्न  होते  है। उत्पन्न विचारों को जब हम व्यावहारिक (Practical) रूप प्रदान करते हैं तो उसके पक्ष एवं विपक्ष (Pros and Cons), लाभ एवं हानियाँ (Profit and Losses) हमारे समक्ष आती हैं। इस स्थिति में हम अपने विचारों की सार्थकता एवं निरर्थकता (Meaningful and Meaningless) को पहचानते हैं। सार्थक विचारों को व्यवहार में प्रयोग करते हैं। इस प्रकार की स्थिति सृजनात्मक चिन्तन/सृजनात्मकता (Creativity)  कहलाती है।

 उदाहरण- जेम्स वाट एक वैज्ञानिक था। उसने रसोईघर से आने वाली एक आवाज को सुना तथा जाकर देखा कि चाय की केतली का ढक्कन बार-बार उठ रहा है तथा गिर रहा है। एक सामान्य व्यक्ति के लिये सामान्य घटना थी परन्तु सृजनात्मक व्यक्ति के लिये सृजनात्मक चिन्तन का विषय थी।

यहाँ से सृजनात्मक चिन्तन (Creative Thinking) की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। जेम्सवाट ने सोचा कि भाप में शक्ति होती है इसके लिये उसने केतली के ढक्कन पर पत्थर रखकर उसकी शक्ति का परीक्षण किया। इसके बाद उसने उसका उपयोग दैनिक जीवन में करने पर विचार किया तथा भाप के इन्जन का निर्माण करने में सफलता प्राप्त की।


परिभाषाएं (Definitions)

1. क्रो एवं क्रो (Crow & Crow)  के अनुसार - सृजनात्मकता मौलिक परिणामों को व्यक्त करने वाली मानसिक प्रक्रिया है। (Creativity is a mental process to express the original outcomes.)

2. जेम्स ड्रेवर (James Drever) के अनुसार-  “सृजनात्मकता मुख्यतः नवीन रचना या उत्पादन में होती है।” (Creativity is essentially found in new constructions or productions.)

3. कोल और ब्रूस (Cole & Bruce) के अनुसार- “सृजनात्मकता एक मौलिक उत्पादन के रूप में मानव-मन की ग्रहण करने, अभिव्यक्त करने और गुणांकन करने की योग्यता एवं क्रिया है।" (Creativity is an ability and activity of man's mind to grasp, express and appreciate in the form of an original product.)

4. हैमोविज एवं हैमोविज (Haimowitz & Haimowitz)  के अनुसार-  सृजनात्मकता व्यक्ति की वह क्षमता है जो उसे नवाचार (innovation) करने, आविष्कार करने तथा चीजों को इस तरह नये ढंग से रखने, जिस तरह वे पहले कभी न रखी गयी हों ताकि उनके महत्व या सुन्दरता में वृद्धि हो सके। (Creativity has been defined as the capacity to innovate, to invent, to place elements in a way in which they have never been placed, so that their value or beauty is enhanced.)

5. आइसेंक (Eysenck) के अनुसार-  “सृजनात्मकता वह योग्यता है जिसके द्वारा नये सम्बन्धों का ज्ञान होता है, असाधारण विचारों की उत्पत्ति होती है तथा परम्परागत ढंग (Pattern) से हट कर चिन्तन किया जाता है। " (Creativity is the ability to see relationship, to produce unusual ideas and to deviate from traditional pattern of thinking.) 

6. स्किनर  (Skinner) के अनुसार– “सृजनात्मक विचारक वह है जो नवीन क्षेत्रों को खोजता है, नये प्रकार से अवलोकन करता है, नवीन भविष्यवाणी करता है तथा नवीन निष्कर्ष निकालता है।”(The creative thinker is one who explores new areas and makes new observations, new prediction and new inferences.)

7. स्टेल (Steil)  के अनुसार - जब किसी कार्य का परिणाम नवीन हो और जो किसी समय में समूह के द्वारा स्वीकृत हो , उपयोगी हो, वह कार्य सृजनात्मकता कहलाता है । (When it results in a novel work that is accepted as tenable or useful or satisfying by a group at some point in time.)

 परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर हम कह सकते हैं कि
सृजनात्मकता व्यक्ति की वह क्षमता (Ability) है जो उसे कुछ नयी खोज करने, किसी समस्या के समाधान हेतु परम्परागत (Traditional) विधियों से हटकर अनेक प्रकार की नवीन विधियों का प्रयोग करने, मौलिक (original) रूप से चिन्तन करने तथा समाज के उपयोग हेतु नवीन उत्पादों का सृजन करने में सहायता प्रदान करती है।


सृजनात्मकता की प्रकृति (Nature of Creativity)

1. सृजनात्मकता सार्वभौमिक (Universal) होती है। प्रत्येक व्यक्ति में किसी न किसी प्रकार की कुछ न कुछ सृजनात्मकता (Creativity) होती है।
2. सृजनात्मकता (Creativity)  द्वारा पूर्ण अथवा आंशिक रूप से नये विचार अथवा नवीन  वस्तु की उत्पत्ति होती है। 
3. सृजनात्मकता (Creativity)  से मौलिक (Original) परिणाम प्राप्त होते हैं जो व्यक्ति तथा समाज दोनों के लिए लाभदायक होते हैं। 
4. सृजनशील व्यक्ति के विचारों में लचीलापन (Flexibility) होती  है अतः वह अपने विचारों में सदैव परिवर्तन तथा परिमार्जन (Modification) करने के लिए तत्पर रहता है।
5 . सृजनात्मकता एक ऐसी अनोखी (Unique) मानसिक प्रक्रिया है जिसके साथ व्यक्ति की अन्य योग्यताएँ भी जुड़ी होती हैं।

7. सृजनात्मकता (Creativity)  में चिन्तन की प्रकृति अभिप्रेरित तथा स्थाई होती है।
8. सृजनात्मकता अभिव्यक्ति सृजक को आनन्द तथा सन्तोष (Joy and Satisfaction) प्रदान करती है। 
9. सृजनात्मक व्यक्ति अपने कार्य को इतनी तल्लीनता (धुन) से करते हैं कि लोग उनको सनकी अथवा पागल
समझने लगते हैं। 
10. सृजनात्मक चिन्तन की प्रक्रिया में बहु-प्रतिक्रियाओं (Multiplicity of responses) को प्रोत्साहित किया जाता है। 
11. सृजनात्मक क्षमताएँ यद्यपि जन्म-जात होती हैं लेकिन प्रशिक्षण तथा अच्छे वातावरण के द्वारा इनका कुछ सीमा तक विकास किया जा सकता है।


 सृजनात्मकता के  क्षेत्र  (Scope of Creativity)

 विभिन्न विचारकों के अनुसार सर्जनात्मकता के प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं-

  1.  विज्ञान (Science) - इसके अन्तर्गत भौतिकी (Physics), रसायन (Chemistry), औषधि-निर्माण (Drug manufacturing) आदि से सम्बन्धित हर प्रकार के  अविष्कार  (Invention )एवं अनुसंधान आ जाते हैं।
  2. कला-कौशल (Art- skills) - संगीत, नृत्य, चित्रकला, वास्तुकला तथा धातु, काष्ठ, चर्म, कागज  आदि से सम्बंधित कौशल भी सृजनात्मक के अंतर्गत आते हैं।
  3. तकनीकी (Technology)- इसमें विशेष रूप से मशीनों, उनके यंत्रों और पुर्जों आदि के निर्माण का क्षेत्र आ जाता है । 
  4. साहित्य (Literature)- इसके अन्तर्गत कविता (poem), कहानी (Story), नाटक (drama), उपन्यास (Novel), निबन्ध (Essay) आदि की रचना तथा भाषणकला,  लेखन -कला सम्मिलित है।
  5. सामाजिक क्षेत्र  (Social Area)- व्यक्ति को समाज में आपस में एक दूसरे के सहयोग द्वारा अनेक प्रकार के सामाजिक  क्रियाओं-धार्मिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, राजनैतिक आदि को सम्पादित करना पड़ता है और अनेक समस्याओं का  समाधान करना पड़ता है। इन सभी अवसरों पर व्यक्ति अपनी सृजनात्मक शक्ति का प्रयोग करता है। 
  6. व्यक्तिगत क्षेत्र (Individual  Area )-  व्यक्ति अपने व्यक्तिगत जीवन में किसी व्यवसाय, उद्योग या कार्य में लगा रहता वह सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षिक, प्रशासनिक जिस क्षेत्र में रहता है, अपनी सृजनात्मकता का प्रयोग करता  है।
  7. मानसिक प्रक्रियाओं का क्षेत्र (Field of mental Processes) - विभिन्न मानसिक प्रक्रियाओं जैसे कल्पना (Imagination), चिन्तन (Thinking), तर्क (Logic), समस्या-समाधान (Problem Solving)  सृजनात्मकता के  प्रमुख भाग होते  है।



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