Sunday, May 23, 2021

सृजनात्मक -प्रक्रिया (Creative- Process)

 सृजनात्मक -प्रक्रिया (Creative- Process)  

सृजनात्मक प्रक्रिया एक जटिल प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया का मनोवैज्ञानिकों तथा शिक्षाविदों ने गहन अध्ययन किया। सृजनात्मकता की प्रक्रिया के सोपान निम्न हैं- 

1. तैयारी (Preparation) 

2. उद्भवन काल (Incubation Period) 

3. प्रकाश  या प्रेरणा (Illumination or Motivation) 

4. किसी एक विचार से बँध जाना (Stay on an idea) 

5. परिणाम का अनुमान (Result estimate):- 

6. सत्यापन  (Verification) 


1. तैयारी (Preparation) :-

सृजनात्मकता की प्रक्रिया में तैयारी (Preparation) प्रथम सोपान होता है जिसमें समस्या पर गंभीरता (seriousness) के साथ कार्य किया जाता है। सर्वप्रथम समस्या का विश्लेषण (Analysis) किया जाता है और उसके समाधान के लिए एक रूपरेखा का निर्माण किया जाता है। 


(A) समस्या का प्रत्यक्षीकरण (Clarification of  the problem) :- सृजनात्मक प्रक्रिया किसी ऐसी अनूठी (Unique) समस्या के अवलोकन स्वरूप (Format) होती है जिसका प्रत्यक्षीकरण (Clarification) करना आम आदमी की पहुँच से परे है। 

जैसे-  न्यूटन ने पेड़ से नीचे गिरते हुए सेब  को देखकर इसके नीचे गिरने के कारण का पता लगाने से सम्बन्धित समस्या पर ध्यान केन्द्रित किया था।


(B) समस्या में परिवर्तन ( Modification of problem ) :- समस्या का प्रत्यक्षीकरण करने के बाद समस्या के प्रत्येक पहलू का विभिन्न दृष्टिकोणों (Perspective) से अध्ययन किया जाता है तथा उसमें संभावित परिवर्तन किये जाते हैं।


(C) परम्परागत निर्णयों को स्थगित करना (Suspending Conventional judgments):- इस चरण में व्यक्ति समस्या से सम्बन्धित परम्परागत (Traditional) निर्णयों की पूर्ण रूप से उपेक्षा (Neglect) करता है तथा उनकी जगह कुछ अलग तरह के  लगने वाले विचित्र  हास्याप्रद  विचारों का प्रतिवादन करता है।


2. उद्भवन काल (Incubation Period) :-


जब व्यक्ति कई प्रकार से समस्या समाधान के प्रयास करने पर सफल नहीं हो पाता है तो उद्भवन की स्थिति आ जाती है। उद्भवन काल में व्यक्ति समस्या के बारे में चिन्तन छोड़कर चेतन/सचेत (Conscious) रूप से तो विश्राम की अवस्था में चला जाता है लेकिन अचेतन (Unconscious) रूप से वह समस्या के बारे में विचार करता रहता है। इस अवस्था में व्यक्ति दो कार्य करता है -

(i) नये ज्ञान को सीखता है, 

(ii) नये ज्ञान को पुराने ज्ञान के साथ आत्मसात् (Assimilation) करता है। 

इस अवस्था में व्यक्ति कोई प्रकाश की किरण तलाशता है जो समस्या का समाधान करने का रास्ता दिखाये।


3. प्रकाश अथवा प्रेरणा (Illumination or Motivation) :-


उद्भवन के बाद प्रकाश की किरण अथवा प्रेरणा अचेतन मन (Unconscious Mind) की गहराइयों से उत्पन्न होती है। निष्क्रिय (Inactive) रहने की अवस्था में कवि के मन  से कविता  का निर्माण होता है।  आर्कमिडीज को अपने उत्प्लावन बल (Buoyancy Force) के सिद्धान्त का ज्ञान पानी के हौज में नहाते समय अचानक हुआ था। इसी प्रकार के उदाहरणों के आधार पर ही मनोवैज्ञानिकों ने माना है कि प्रकाश अथवा प्रेरणा मानसिक निष्क्रियता (Mental Inactivity) की अवस्था में प्राप्त होती है।


4. किसी एक विचार से बँध जाना (Stay on an idea):- 


जब व्यक्ति को किसी विचार की गहन जानकारी हो जाती है तो वह अपने इस विचार को समस्या के समाधान हेतु चुन लेता है और लोग यदि उसकी आलोचना (Criticism) भी करते हैं तो भी वह अपने निर्णय पर अडिग रहता है।


5. परिणाम का अनुमान (Result estimate):- 


इस सोपान में व्यक्ति अपनी समस्या के संभावित परिणाम (Result) का अनुमान लगाने लगता है। व्यक्ति द्वारा इस व्यवस्था पर संभावित परिणाम का जो अनुमान लगाया जाता है वह सही हो भी सकते हैं और नहीं भी। परंतु उसमें व्यक्ति के उत्साह की अवस्था देखने को मिलती है।


6. सत्यापन/पुष्टिकरण (Verification):- 


यह सृजनात्मक प्रक्रिया की अन्तिम अवस्था है। इस स्थिति में वह प्रकाशित विचारों (Illuminated thoughts) की वैधता की जाँच करता है। इस स्थिति में वह यह निश्चित करता है कि उसकी सोच से प्राप्त विचार अथवा समस्या के हल ठीक हैं  या  नहीं। यदि परिणाम त्रुटिपूर्ण आते हैं तो समस्या समाधान हेतु नये सिरे से प्रयास किये जाते हैं और परिणामों को परिवर्तित अथवा संशोधित करके वांछित निष्कर्ष तक पहुंचा जाता है। प्रायः देखा जाता है कि साहित्यकार(Writer) अपनी रचनाओं को आवश्यकतानुसार संशोधन करके उन्हें पुनः लिखते हैं।








Tuesday, May 18, 2021

सृजनात्मकता के तत्व एवं प्रकार (Elements & Types of Creativity)

 

सृजनात्मकता के तत्व (Elements of Creativity)

गिलफोर्ड, टोरेंस तथा लेविन आदि मनोवैज्ञानिकों ने सृजनात्मकता के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया जिनके अनुसार सृजनात्मकता (Creativity) के निम्न तत्व होते हैं- 


1. धाराप्रवाहिता (Fluency)
2. लचीलापन (Flexibility)
3. मौलिकता (Originality)
4. विस्तारण (Elaboration)

1. धाराप्रवाहिता (Fluency)-

धाराप्रवाहिता से तात्पर्य  किसी दिये गये विषय पर अनेक प्रकार से विचारों को प्रस्तुत करना है  अथवा  अनेक तरह के विचारो की खुली अभिव्यक्ति (Expression) से है। जो  व्यक्ति किसी भी विषय पर अपने विचारो की खुली अभिव्यक्ति को पूर्ण रूप से प्रकट करता है वह उतना ही सृजनात्मक कहलाता है। धारा प्रवाहिता को भी चार भागों में विभक्त किया जा सकता है- 


(i) वैचारिक धाराप्रवाहिता (Ideological Fluency) : इसमें किसी वस्तु के बारे में विचारों को स्वतन्त्र रूप से प्रकट करने को प्रोत्साहित किया जाता है। 
जैसे-  किसी वस्तु के विभिन्न उपयोग बताना, किसी कहानी के संभावित शीर्षक (Title) बताना, किसी समस्या के समाधान करने के लिए विभिन्न तरीके बताना  आदि। 

(ii) अभिव्यक्ति धाराप्रवाहिता (Expression Fluency) : इसमें व्यक्ति की शाब्दिक अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित किया जाता है
जैसे- व्यक्ति के सम्मुख कुछ शब्द लिखकर उसे शब्दों से वाक्य बनाने को कहा जाये अथवा वाक्यों के रिक्त स्थानों की पूर्ति अनेक प्रकार से करने को कहा जाये ।


(iii) साहचर्य धाराप्रवाहिता (Associative Fluency) :- साहचर्य प्रवाहिता से तात्पर्य शब्दों या वस्तुओं आदि में साहचर्य स्थापित करने से है। 
जैसे- दिये गये शब्दों के अधिक-से-अधिक विलोम (Antonyms) तथा पर्यायवाची (Synonyms) शब्द लिखना, किसी भी शब्द के अन्तर्गत आने वाली अधिक-से-अधिक वस्तुओं के नाम गिनाना। 

(iv) शब्द धाराप्रवाहिता (Word Fluency) : शब्द प्रवाहिता से तात्पर्य शब्दों की विभिन्न प्रकार से रचना करने से है। 
जैसे- दिये गये प्रत्ययों (suffix) तथा उपसर्गों (infix) के बनाने में अधिक -से-अधिक शब्दों की रचना करना , प्रति से प्रतिदिन, प्रतिव्यक्ति, प्रतिवर्ष आदि ।

2. लचीलापन/विविधता (Flexibility)-

लचीलापन (Flexibility) से तात्पर्य समस्या के समाधान के लिए विभिन्न प्रकार के तरीकों को अपनाये जाने से है। किसी समस्या के समाधान के लिए मात्र एक विधि न अपनाकर अनेक विधियों से समस्या समाधान करना। जो व्यक्ति किसी भी समस्या के समाधान हेतु अनेक नये-नये रास्ते अपनाता है वह उतना ही सृजनात्मक कहलाता है। लचीलेपन से यह ज्ञात होता है कि व्यक्ति समस्या को कितने तरीकों से समाधान कर सकता है। विविधता  के भी तीन तत्व  हैं- 

(i) आकृति विविधता (Figural Flexibility) : किसी आकृति में सुधार करने के उपायों की विविधता को आकृति विविधता के नाम से जाना जाता है।


(ii) आकृति अनुकूलनात्मक विविधता (Figural Adaptive Flexibility): किसी आकृति के दिये गये रूप में परिवर्तन (Modification) करने की विधियों की विविधता को आकृति अनुकूलनात्मक विविधता कहा जाता है।


(iii) शाब्दिक विविधता (Semantic Flexibility) : - शब्दों अथवा वस्तुओं को विविध प्रकार से प्रयोग में लाने की विधियों को शाब्दिक विविधता कहते हैं।



3. मौलिकता (Originality) : 


मौलिकता मुख्य रूप से नवीनता (Novelty) से सम्बन्धित है । मौलिकता से  अभिप्राय व्यक्ति द्वारा समस्याओं को हल करने में सामान्य (General) विधियों से हटकर किसी अनोखी विधि (Unique method) का प्रयोग करने से है। जो व्यक्ति दूसरे लोगों की अपेक्षा जितने अधिक भिन्न विकल्प प्रस्तुत करता है वह उतना ही अधिक मौलिकता से सम्पन्न माना जाता है।  जब व्यक्ति समस्या के समाधान के रूप में एक बिल्कुल ही नई अनुक्रिया करता है तो ऐसा माना जाता है कि उसमें मौलिकता का गुण विद्यमान है। 
जैसे- परमाणु ऊर्जा को समाजोपयोगी किसी नवीन कार्य में प्रयोग करना। 

4. विस्तारण (Elaboration) :


विस्तारण से तात्पर्य व्यक्ति की उस क्षमता से है जिसके द्वारा वह किसी वस्तु, घटना आदि को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करता है। जो व्यक्ति किसी भी विशय पर अपने विचारो की खुली अभिव्यक्ति को पूर्ण रूप से बढ़ा-चढ़ाकर एवं विस्तार के साथ प्रकट करता है उसमें विस्तारण का गुण अधिक होता है। वह उतना ही सृजनात्मक कहलाता है। विस्तारण को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है—


(i) शाब्दिक विस्तारण (Semantic Elaboration) : शाब्दिक विस्तारण में व्यक्ति, किसी दी गयी संक्षिप्त घटना, कहानी, परिस्थिति, या समस्या को विस्तृत करके अपने शब्दों में प्रस्तुत करता है।

(ii) आकृति विस्तारण (Figural Elaboration) : आकृति विस्तारण में व्यक्ति दी गयी अपूर्ण अथवा छोटी आकृतियों को पूर्ण अथवा बड़े आकार में प्रस्तुत करता है 
जैसे -किसी अपूर्ण दृश्य (Scenery) के चित्र अथवा रेखा आकृति को अपने अनुसार पूरा करना।


सृजनात्मकता के प्रकार(Types of Creativity)


सृजनात्मकता को मुख्य रूप से तीन प्रकार में वर्गीकृत किया जा सकता है।






1. आकस्मिक सृजनात्मकता (Chance Creativity) : इस प्रकार के सृजनात्मक कार्य अचानक ही भाग्यवश या दैवीय संयोग से होते हैं। 

2. सहज सृजनात्मकता (Spontaneous Creativity) : सहज सृजनात्मकता से तात्पर्य सहज भावना से ऐसे नवीन कार्य करने अथवा किसी नवीन वस्तु का निर्माण करने से है जो किसी तत्कालिक उद्देश्य की पूर्ति करे। 
जैसे - किसी नाले को पार करने के लिए सैनिक अस्थाई पुल का निर्माण कर लेते हैं।

3. संरक्षणात्मक सृजनात्मकता (Conservable Creativity)
: - संरक्षणात्मक सृजनात्मकता वह प्रक्रिया है जिसमें सृजित वस्तु का कोई तत्कालिक उपयोग करने का उद्देश्य नहीं होता है। लेकिन भविष्य के उपयोग हेतु इस प्रकार से सृजित वस्तु का संरक्षण किया जाता है। कभी-कभी -  कभी यह सृजित वस्तु आने वाली कई पीढ़ियों के काम आती है ।






Monday, May 17, 2021

सृजनात्मकता (Creativity)

 सृजनात्मकता/रचनात्मकता (Creativity)

अर्थ (Meaning) -  सृजनात्मकता (Creativity) सामान्य रूप से जब हम किसी वस्तु या घटना के बारे में विचार करते हैं तो हमारे मन-मस्तिष्क में अनेक प्रकार के विचार उत्पन्न  होते  है। उत्पन्न विचारों को जब हम व्यावहारिक (Practical) रूप प्रदान करते हैं तो उसके पक्ष एवं विपक्ष (Pros and Cons), लाभ एवं हानियाँ (Profit and Losses) हमारे समक्ष आती हैं। इस स्थिति में हम अपने विचारों की सार्थकता एवं निरर्थकता (Meaningful and Meaningless) को पहचानते हैं। सार्थक विचारों को व्यवहार में प्रयोग करते हैं। इस प्रकार की स्थिति सृजनात्मक चिन्तन/सृजनात्मकता (Creativity)  कहलाती है।

 उदाहरण- जेम्स वाट एक वैज्ञानिक था। उसने रसोईघर से आने वाली एक आवाज को सुना तथा जाकर देखा कि चाय की केतली का ढक्कन बार-बार उठ रहा है तथा गिर रहा है। एक सामान्य व्यक्ति के लिये सामान्य घटना थी परन्तु सृजनात्मक व्यक्ति के लिये सृजनात्मक चिन्तन का विषय थी।

यहाँ से सृजनात्मक चिन्तन (Creative Thinking) की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। जेम्सवाट ने सोचा कि भाप में शक्ति होती है इसके लिये उसने केतली के ढक्कन पर पत्थर रखकर उसकी शक्ति का परीक्षण किया। इसके बाद उसने उसका उपयोग दैनिक जीवन में करने पर विचार किया तथा भाप के इन्जन का निर्माण करने में सफलता प्राप्त की।


परिभाषाएं (Definitions)

1. क्रो एवं क्रो (Crow & Crow)  के अनुसार - सृजनात्मकता मौलिक परिणामों को व्यक्त करने वाली मानसिक प्रक्रिया है। (Creativity is a mental process to express the original outcomes.)

2. जेम्स ड्रेवर (James Drever) के अनुसार-  “सृजनात्मकता मुख्यतः नवीन रचना या उत्पादन में होती है।” (Creativity is essentially found in new constructions or productions.)

3. कोल और ब्रूस (Cole & Bruce) के अनुसार- “सृजनात्मकता एक मौलिक उत्पादन के रूप में मानव-मन की ग्रहण करने, अभिव्यक्त करने और गुणांकन करने की योग्यता एवं क्रिया है।" (Creativity is an ability and activity of man's mind to grasp, express and appreciate in the form of an original product.)

4. हैमोविज एवं हैमोविज (Haimowitz & Haimowitz)  के अनुसार-  सृजनात्मकता व्यक्ति की वह क्षमता है जो उसे नवाचार (innovation) करने, आविष्कार करने तथा चीजों को इस तरह नये ढंग से रखने, जिस तरह वे पहले कभी न रखी गयी हों ताकि उनके महत्व या सुन्दरता में वृद्धि हो सके। (Creativity has been defined as the capacity to innovate, to invent, to place elements in a way in which they have never been placed, so that their value or beauty is enhanced.)

5. आइसेंक (Eysenck) के अनुसार-  “सृजनात्मकता वह योग्यता है जिसके द्वारा नये सम्बन्धों का ज्ञान होता है, असाधारण विचारों की उत्पत्ति होती है तथा परम्परागत ढंग (Pattern) से हट कर चिन्तन किया जाता है। " (Creativity is the ability to see relationship, to produce unusual ideas and to deviate from traditional pattern of thinking.) 

6. स्किनर  (Skinner) के अनुसार– “सृजनात्मक विचारक वह है जो नवीन क्षेत्रों को खोजता है, नये प्रकार से अवलोकन करता है, नवीन भविष्यवाणी करता है तथा नवीन निष्कर्ष निकालता है।”(The creative thinker is one who explores new areas and makes new observations, new prediction and new inferences.)

7. स्टेल (Steil)  के अनुसार - जब किसी कार्य का परिणाम नवीन हो और जो किसी समय में समूह के द्वारा स्वीकृत हो , उपयोगी हो, वह कार्य सृजनात्मकता कहलाता है । (When it results in a novel work that is accepted as tenable or useful or satisfying by a group at some point in time.)

 परिभाषाओं का विश्लेषण करने पर हम कह सकते हैं कि
सृजनात्मकता व्यक्ति की वह क्षमता (Ability) है जो उसे कुछ नयी खोज करने, किसी समस्या के समाधान हेतु परम्परागत (Traditional) विधियों से हटकर अनेक प्रकार की नवीन विधियों का प्रयोग करने, मौलिक (original) रूप से चिन्तन करने तथा समाज के उपयोग हेतु नवीन उत्पादों का सृजन करने में सहायता प्रदान करती है।


सृजनात्मकता की प्रकृति (Nature of Creativity)

1. सृजनात्मकता सार्वभौमिक (Universal) होती है। प्रत्येक व्यक्ति में किसी न किसी प्रकार की कुछ न कुछ सृजनात्मकता (Creativity) होती है।
2. सृजनात्मकता (Creativity)  द्वारा पूर्ण अथवा आंशिक रूप से नये विचार अथवा नवीन  वस्तु की उत्पत्ति होती है। 
3. सृजनात्मकता (Creativity)  से मौलिक (Original) परिणाम प्राप्त होते हैं जो व्यक्ति तथा समाज दोनों के लिए लाभदायक होते हैं। 
4. सृजनशील व्यक्ति के विचारों में लचीलापन (Flexibility) होती  है अतः वह अपने विचारों में सदैव परिवर्तन तथा परिमार्जन (Modification) करने के लिए तत्पर रहता है।
5 . सृजनात्मकता एक ऐसी अनोखी (Unique) मानसिक प्रक्रिया है जिसके साथ व्यक्ति की अन्य योग्यताएँ भी जुड़ी होती हैं।

7. सृजनात्मकता (Creativity)  में चिन्तन की प्रकृति अभिप्रेरित तथा स्थाई होती है।
8. सृजनात्मकता अभिव्यक्ति सृजक को आनन्द तथा सन्तोष (Joy and Satisfaction) प्रदान करती है। 
9. सृजनात्मक व्यक्ति अपने कार्य को इतनी तल्लीनता (धुन) से करते हैं कि लोग उनको सनकी अथवा पागल
समझने लगते हैं। 
10. सृजनात्मक चिन्तन की प्रक्रिया में बहु-प्रतिक्रियाओं (Multiplicity of responses) को प्रोत्साहित किया जाता है। 
11. सृजनात्मक क्षमताएँ यद्यपि जन्म-जात होती हैं लेकिन प्रशिक्षण तथा अच्छे वातावरण के द्वारा इनका कुछ सीमा तक विकास किया जा सकता है।


 सृजनात्मकता के  क्षेत्र  (Scope of Creativity)

 विभिन्न विचारकों के अनुसार सर्जनात्मकता के प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं-

  1.  विज्ञान (Science) - इसके अन्तर्गत भौतिकी (Physics), रसायन (Chemistry), औषधि-निर्माण (Drug manufacturing) आदि से सम्बन्धित हर प्रकार के  अविष्कार  (Invention )एवं अनुसंधान आ जाते हैं।
  2. कला-कौशल (Art- skills) - संगीत, नृत्य, चित्रकला, वास्तुकला तथा धातु, काष्ठ, चर्म, कागज  आदि से सम्बंधित कौशल भी सृजनात्मक के अंतर्गत आते हैं।
  3. तकनीकी (Technology)- इसमें विशेष रूप से मशीनों, उनके यंत्रों और पुर्जों आदि के निर्माण का क्षेत्र आ जाता है । 
  4. साहित्य (Literature)- इसके अन्तर्गत कविता (poem), कहानी (Story), नाटक (drama), उपन्यास (Novel), निबन्ध (Essay) आदि की रचना तथा भाषणकला,  लेखन -कला सम्मिलित है।
  5. सामाजिक क्षेत्र  (Social Area)- व्यक्ति को समाज में आपस में एक दूसरे के सहयोग द्वारा अनेक प्रकार के सामाजिक  क्रियाओं-धार्मिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, राजनैतिक आदि को सम्पादित करना पड़ता है और अनेक समस्याओं का  समाधान करना पड़ता है। इन सभी अवसरों पर व्यक्ति अपनी सृजनात्मक शक्ति का प्रयोग करता है। 
  6. व्यक्तिगत क्षेत्र (Individual  Area )-  व्यक्ति अपने व्यक्तिगत जीवन में किसी व्यवसाय, उद्योग या कार्य में लगा रहता वह सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक और शैक्षिक, प्रशासनिक जिस क्षेत्र में रहता है, अपनी सृजनात्मकता का प्रयोग करता  है।
  7. मानसिक प्रक्रियाओं का क्षेत्र (Field of mental Processes) - विभिन्न मानसिक प्रक्रियाओं जैसे कल्पना (Imagination), चिन्तन (Thinking), तर्क (Logic), समस्या-समाधान (Problem Solving)  सृजनात्मकता के  प्रमुख भाग होते  है।



Sunday, May 16, 2021

शिक्षार्थियों की अभिप्रेरणा को बढ़ाने की विधियाँ (Techniques of Enhancing Learner's Motivation)

 शिक्षार्थियों की अभिप्रेरणा को बढ़ाने की विधियाँ (Techniques of Enhancing Learner's Motivation) 

शिक्षार्थियों को सीखने के लिए पूर्ण रूप से अभिप्रेरित करने के लिए मनोवैज्ञानिकों ने अनेक विधियों का विकास किया है-


1. पढ़ाए जाने वाले विषय अथवा सिखाए जाने वाले कौशल की उपयोगिता (Utility of the subject taught or skills taught) -
उपयोगिता सबसे अधिक शक्तिशाली अभिप्रेरक (Motive) होता है। यदि शिक्षार्थियों को यह स्पष्ट कर दिया जाए कि पढ़ाया जाने वाला विषय  (Subject) अथवा सिखाया जाने वाला कौशल (Skill) उनके जीवन में उनके लिए कितना उपयोगी है तो जितना अधिक उन्हें उसकी उपयोगिता का आभास होगा, वे सीखने के लिए उतने ही अधिक अभिप्रेरित (Motivate) होंगे।

2. पढ़ाए जाने वाले विषय अथवा सिखाए जाने वाले कौशल के प्रशिक्षण के उद्देश्य (Aims)
किसी विषय (Subject) अथवा कौशल (Skill) की जीवन में उपयोगिता के साथ पढ़ाए जाने वाले विषय अथवा सिखाए जाने वाले कौशल के उद्देश्य एवं लक्ष्य भी स्पष्ट करना आवश्यक होता है। ये प्रथम विधि से अभिप्रेरित शिक्षार्थियों को सीखने के लिए और अधिक अभिप्रेरित (Motivate) करते हैं। शिक्षार्थियों को सीखे जाने वाले ज्ञान अथवा कौशल के सीखने के उद्देश्य जितने अधिक स्पष्ट होते हैं वे सीखने के लिए उतने ही अधिक अभिप्रेरित होते हैं और उनकी सीखने सम्बन्धी क्रियाएँ भी उतनी ही अधिक उद्देश्य लक्षित  होती हैं।

3. शिक्षार्थियों की आवश्यकताएं (Needs)-  किसी विषय का ज्ञान एवं कौशल का शिक्षण  एवं प्रशिक्षण अपने में कितना भी उपयोगी क्यों न हो लेकिन वह शिक्षार्थियों की आवश्यकताओं की सन्तुष्टि नहीं करता तो शिक्षार्थी उसे सीखने के लिए अभिप्रेरित नहीं होते। शिक्षार्थियों को अभिप्रेरित करने के लिए यह आवश्यक होता है कि सिखाए जाने वाले ज्ञान अथवा कौशल का सम्बन्ध उनकी आवश्यकताओं से जोड़ा जाए। छात्रों की विषय अथवा कौशल के प्रति अभिप्रेरणा की यह उत्तम विधि मानी जाती है।


4. शिक्षार्थियों का आकांक्षा स्तर (Aspiration Level)— कुछ शिक्षार्थी केवल उत्तीर्ण होने भर की आकांक्षा रखते हैं  कुछ  द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण होने की और कुछ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने की। इसी प्रकार कुछ शिक्षार्थी छोटे-मोटे व्यवसाय को प्राप्त करने की आकांक्षा रखते हैं, कुछ की आकांक्षाएँ इससे अधिक होती हैं और कुछ की आकांक्षाएँ तो बहुत अधिक होती  है। यह देखा गया है कि जिन शिक्षार्थियों का आकांक्षा स्तर जितना अधिक ऊँचा होता है वे उससे सम्बंधित  ज्ञान एवं कौशल सीखने के लिए उतने ही अधिक अभिप्रेरित होते हैं। साफ जाहिर है कि शिक्षार्थियों का आकांक्षा स्तर उठाकर हम उनकी अभिप्रेरणा में वृद्धि कर सकते हैं।

5. कक्षा का वातावरण (Class Climate)-  कक्षा का वातावरण भी शिक्षार्थियों को अभिप्रेरित करने में अभिप्रेरक (Motive)  का कार्य करता है। सुन्दर कक्ष , शुद्ध हवा, पर्याप्त प्रकाश, शान्त वातावरण, शिक्षक-शिक्षार्थियों के बीच के सम्बन्ध और शिक्षार्थियों के आपस के सम्बन्ध, इन सबसे कक्षा का वातावरण तैयार होता है। जिस कक्षा में सीखने के लिए जितना अच्छा वातावरण होता है उस कक्षा के शिक्षार्थी उतने ही अधिक अभिप्रेरित (Motivate) होते हैं।

6. शिक्षक का व्यवहार (Teacher Behaviour)- शिक्षक का शिक्षार्थियों के प्रति प्रेम, सहानुभूति एवं सहयोगपूर्ण व्यवहार  होता है छात्रों की भावनाओं का सम्मान करके, उन्हें अभिव्यक्ति के स्वतन्त्र अवसर प्रदान करके और उनकी समस्याओं का तुरन्त हल करके शिक्षार्थियों की अभिप्रेरणा को सरलता से बढ़ा सकता है।

 7. प्रशंसा एवं निन्दा (Appreciation and Censure) इस सन्दर्भ में किए गए मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से दो तथ्य उजागर हुए। प्रथम यह कि औसत बुद्धि वाले शिक्षार्थियों के लिए प्रशंसा अच्छे अभिप्रेरक का कार्य करती है और छोटे बच्चों के लिए निन्दा अच्छे अभिप्रेरक का कार्य करती है। और दूसरा यह कि निन्दा की अपेक्षा प्रशंसा अधिक अच्छा अभिप्रेरक होता है। यह कार्य शिक्षक शिक्षार्थियों की सही अनुक्रिया के लिए प्यार  एवं मुस्कान भरी स्वीकृति एवं सुन्दर, शाबास, बहुत ठीक आदि शब्दों के द्वारा कर सकते हैं। गलत अनुक्रिया पर निन्दा के स्थान पर सहयोग अधिक उत्तम अभिप्रेरक होता है। यदि कोई शिक्षार्थी बार-बार गलत अनुक्रिया करे तब भी उसकी निन्दा, प्रेम एवं सहानुभूति के साथ करनी चाहिए।


8. पुरस्कार एवं दण्ड (Reward and Punishment)- इस सन्दर्भ में किए गए मनोवैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया कि जिस समूह की प्रशंसा की गई उसकी निष्पत्ति उस समूह से अधिक थी जिसकी आलोचना की गई थी और जिसे नियन्त्रण में रखा गया था। हाँ, कुछ परिस्थितियों में बच्चों को दण्ड देना अभिप्रेरक का कार्य करता है पर दण्ड बड़ी सावधानी से देना चाहिए क्रोध की स्थिति में दण्ड देना हानिकारक होता है, शिक्षार्थी अभिप्रेरित होने के स्थान पर पलायन कर जाते हैं। पुरस्कार भी बड़ी सावधानी से देना चाहिए, यह लोभ का कारण नहीं बनना चाहिए; यह पदक अथवा प्रमाण-पत्र के रूप में देना अधिक प्रभावी होता है। 

9. प्रतिस्पर्धा  एवं प्रतियोगिता (Rivalry and Competition) - कभी-कभी स्पर्धा आधारित  प्रतिस्पर्धा और प्रतियोगिता भी अच्छे अभिप्रेरक (Motives) का कार्य करती हैं। यह प्रतिस्पर्धा व्यक्तिगत के स्थान पर सामूहिक स्तर की अधिक प्रभावशाली होती है। व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा एवं प्रतियोगिता जहाँ अच्छे अभिप्रेरक का कार्य करती हैं वहाँ शिक्षार्थियों में द्वेष की भावना भी उत्पन्न करती हैं, परन्तु सामूहिक प्रतिस्पर्धा एवं प्रतियोगिता शिक्षार्थियों को अपने समूह को विजयश्री दिलाने हेतु अधिक श्रम करने के लिए अभिप्रेरित करती हैं। शिक्षकों को प्रतिस्पर्धा और प्रतियोगिता का उपयोग बड़ी सावधानी से करना चाहिए। 
10. सफलता का ज्ञान (Knowledge of Success)-    मनोवैज्ञानिक स्कीनर ने अपने प्रयोगों में पाया कि यदि सीखने वाले को अपनी सफलता का ज्ञान तुरन्त करा दिया जाए तो वह उसके लिए अभिप्रेरक का कार्य करता है, वह उससे आगे के कार्य को और अधिक उत्साह से करता है। स्कीनर ने इसे पुनर्बलन (Reinforcement) की संज्ञा दी। 

11. बालकेन्द्रित शिक्षण उपागम (Child Centered approach of teaching)- पूरी शिक्षण प्रक्रिया की मुख्य धुरी बालक है। इसलिए कहा गया है कि "Teaching is meant for the learner and the learner is not meant for teaching” इसलिए शिक्षक को चाहिये कि वह शिक्षण कार्य करते समय बालकों की रुचि, आवश्यकताओं, मानसिक स्तर तथा अभिक्षमताओं का पूरी तरह से ध्यान रखे।


12. शिक्षण की सहायक सामग्री तथा प्रविधियों का प्रयोग (Use of teaching aids and devices) -
शिक्षक को चाहिये कि वह उपयुक्त शिक्षण सामग्री, युक्तियों (Tactics), सीखने के नियमों तथा नवीन शिक्षण सामग्री का प्रयोग करके बालकों को सीखने के लिए अभिप्रेरित करे।
(i) ज्ञात से अज्ञात (Known to Unknown), सरल से जटिल (Easy to Complex) , स्थूल से सूक्ष्म (Macro to Micro) , निश्चित से अनिश्चित (Fixed to Doubtful)  तथा विश्लेषण से संश्लेषण (Analysis to Synthesis) जैसी युक्तियों का प्रयोग करके विषय-वस्तु को बोधगम्य (Understandable) बनाये।
(ii)  करके सीखना , विषय-वस्तु को अच्छी तरह से व्यवस्थित (organised) करना, लचीलापन अपनाना,  सीखने के नियमों (तत्परता, अभ्यास तथा प्रभाव) का उपयोग करना, पृष्ठ-पोषण (feed back devices) का प्रयोग करना आदि शिक्षण के अधिगम के नियमों का कक्षा में भरपूर उपयोग किया जाना चाहिये।
(iii) अध्यापक को कक्षा में दृश्य-श्रव्य सामग्री, टी.वी. फिल्म, चार्टर, प्रोजक्टर, चार्ट, मॉडल आदि का प्रयोग करके विषय-वस्तु को रोचक ढंग से प्रस्तुत करना चाहिये। 




Tuesday, May 11, 2021

अभिप्रेरणा का शैक्षिक महत्व (Educational Importance of Motivation)

 

अभिप्रेरणा का शैक्षिक महत्व (Educational Importance of Motivation)


बालक की शिक्षा में अभिप्रेरणा (Motivation) का अत्यधिक महत्व है। अभिप्रेरणा के द्वारा अध्यापक कक्षा में बालकों को नियंत्रित (Controlled) तथा सक्षम बनाने के लिए ध्यानमग्न (Attention) कर सकता है। शिक्षा में अभिप्रेरणा के महत्व को निम्नांकित रूप से स्पष्ट किया जा सकता है-

1. अधिगम के लिए प्रोत्साहन हेतु (For encouragement to learning)- शिक्षा में अपेक्षित अधिगम (Expected learning) के लिए अभिप्रेरणा एक प्रभावशाली आधार है। अभिप्रेरणा का अधिगम स्वरूप, मात्रा एवं गति पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। कक्षा में प्रभावशाली अभिप्रेरणा के अभाव में अभीष्ट शिक्षा के लक्ष्य की प्राप्ति में कठिनाई होती है। ऐसी स्थिति में विद्यार्थियों को विभिन्न प्रकार के अभिप्रेरक (Motives) प्रदान किये जाने चाहिए, तभी विद्यार्थी अधिगम से सफलतापूर्वक  निर्धारित लक्ष्य की दिशा में क्रियाशील रहकर प्रगति कर सकते हैं।

2. अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्ति करने हेतु (To gain maximum knowledge)- 
क्रो तथा क्रो के अनुसार, “अध्यापक विद्यार्थियों में प्रतियोगिता (Competition)  की भावना को विकसित करके उन्हें अधिकाधिक ज्ञानार्जन हेतु अभिप्रेरणा प्रदान कर सकते हैं।” कक्षा में प्रतिभाशाली विद्यार्थियों के अतिरिक्त शेष विद्यार्थियों को भी प्रतिस्पर्धा, प्रशंसा आदि के द्वारा अधिक से अधिक ज्ञान प्राप्त करने   हेतु अभिप्रेरित किया जा सकता है।

3. अनुशासन विकसित करने हेतु (To develop discipline) - विद्यार्थियों में स्वअनुशासन (Self-discipline) की भावना का विकास करने में भी अभिप्रेरणा का अत्यधिक महत्व है। मनोविज्ञान के ज्ञान के प्रभाव के फलस्वरूप स्वअनुशासन की भावना विकसित करने पर आज सर्वाधिक बल दिया जा रहा है। इस प्रकार स्पष्ट है कि उपयुक्त अभिप्रेरकों के माध्यम से विद्यार्थियों को वांछित व्यवहारों का अभ्यास कराने से उसमें स्व-अनुशासन (Self-discipline) की भावना का विकास किया जा सकता है।

4. उचित मार्ग- दर्शन हेतु (For proper guidance) - समय-समय पर बालकों का उचित मार्ग- दर्शन करना अत्यन्त आवश्यक हो जाता है। शैक्षिक क्षेत्र में समायोजन (Adjustment), समस्या समाधान (Problem Solving), अध्ययन तथा अनुशासन आदि के लिए बालकों को मार्ग- दर्शन की अपेक्षा रहती है। इस हेतु विभिन्न अभिप्रेरकों का प्रयोग करके बालकों में रुचि एवं उत्साह (Excitement) का संचार किया जा सकता है तथा उन्हें लक्ष्य प्राप्ति के लिए दिशा प्रदान किया जा सकता है।

5. सामाजिक तथा चारित्रिक गुणों के विकास हेतु (For the development of social and character qualities) - विद्यार्थियों में चारित्रिक एवं सामाजिक विकास (Character and Social Development) करना शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य होता है। बालक की प्रशंसा तभी की जा सकती है जब वह उच्च चारित्रिक गुणों वाला हो, उसकी आदतें अच्छी हों तथा उसका व्यवहार समाज के अनुकूल हो। बालकों में अपेक्षित चारित्रिक तथा सामाजिक गुणों का पर्याप्त विकास हो, इसके लिए आवश्यक है कि ऐसा वातावरण बनाया जाए जिसमें वह वांछनीय व्यवहारों को सीखने का अभ्यास कर सके। 

6. व्यवहार में वांछित परिवर्तन हेतु (For desired change in behavior) - बालकों के व्यवहार में शिक्षा द्वारा वांछित परिवर्तन कर उसके व्यक्तित्व (Personality) का विकास किया जाता है। व्यक्तित्व के विकास का आधार व्यवहार में परिवर्तन एवं संशोधन है  । शिक्षा की किसी भी व्यवस्था में, विशेष रूप से औपचारिक व्यवस्था (Formal arrangement) में, बालकों में वांछित व्यावहारिक परिवर्तन के लिए ही समस्त  प्रयास किए जाते हैं। इन व्यवहार परिवर्तनों का मुख्य माध्यम शैक्षणिक  क्रियाएँ होती हैं। इन क्रियाओं द्वारा बालक के व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन तभी हो सकते हैं जब उनसे सम्बन्धित क्रियाकलापों में बालक रुचि, ध्यान और उत्साह से भाग ले। इसके लिए बालकों को अभिप्रेरित किया जाना अति आवश्यक है जिससे वे स्वयं ही सक्रिय होकर वांछित व्यवहार परिवर्तनों की दिशा में अग्रसर हो सकें।

7. उच्च आकांक्षा स्तर हेतु (For high aspirations Level) - बालकों द्वारा शिक्षा में उच्च सफलता प्राप्त करने के लिए उच्च आकांक्षा स्तर की आवश्यकता होती है। बिना उच्च आकांक्षा स्तर के बालक उच्च स्तर का शैक्षिक अथवा अधिगम सम्बन्धी प्रयास नहीं करता, इसके लिए स्वस्थ मनोवृत्ति (Healthy attitude)  की भी अपेक्षा रहती है। अतः बालकों में स्वस्थ मनोवृत्ति का विकास करने तथा उच्च आकांक्षाओं की दिशा में उत्साहित करने हेतु शिक्षक को पर्याप्त एवं उचित अभिप्रेरकों का प्रयोग करना चाहिए जिससे बालकों में उच्च सामाजिकता, सहयोग, सद्भाव, निष्ठा तथा मानसिक व्यापकता आदि का विकास हो सके तथा वह उच्च शैक्षिक उपलब्धि के साथ-साथ समाज में अपने को श्रेष्ठ प्रदर्शित कर सके।

मैस्लो के सिद्धांत का शैक्षिक अनुप्रयोग (Educational Implication of Maslow's Theory)


1. मास्लो के आवश्यकताओं के सिद्धांत के पदानुक्रम ने स्कूलों में शिक्षण और कक्षा प्रबंधन में एक बड़ा योगदान दिया है। 

2. वातावरण में एक प्रतिक्रिया के लिए व्यवहार को कम करने के बजाय , मास्लो  शिक्षा और सीखने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण अपनाता है।

 3. मास्लो  व्यक्ति के पूर्ण शारीरिक, भावनात्मक, सामाजिक और बौद्धिक गुणों को देखता है और कैसे वे सीखने पर प्रभाव डालते हैं। इसको स्पष्ट करता है।

4. एक छात्र की संज्ञानात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने से पहले, उन्हें पहले अपनी बुनियादी शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करना होगा।

5. मास्लो का सुझाव है कि छात्रों को दिखाया जाना चाहिए कि वे कक्षा में मूल्यवान और सम्मानित हैं, और शिक्षक को एक सहायक वातावरण बनाना चाहिए। कम आत्म-सम्मान वाले छात्र अकादमिक रूप से एक सर्वोत्तम दर पर प्रगति नहीं करेंगे जब तक कि उनका आत्म-सम्मान मजबूत नहीं हो जाता।

6. छात्रों को अपनी पूरी क्षमता तक पहुंचने और पहुंचाने के लिए कक्षा के भीतर भावनात्मक और शारीरिक रूप से सुरक्षित और स्वीकृत महसूस करने की आवश्यकता है।



















शैक्षिक मनोविज्ञान की विधियाँ (Methods of Educational Psychology)

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