Sunday, May 16, 2021

शिक्षार्थियों की अभिप्रेरणा को बढ़ाने की विधियाँ (Techniques of Enhancing Learner's Motivation)

 शिक्षार्थियों की अभिप्रेरणा को बढ़ाने की विधियाँ (Techniques of Enhancing Learner's Motivation) 

शिक्षार्थियों को सीखने के लिए पूर्ण रूप से अभिप्रेरित करने के लिए मनोवैज्ञानिकों ने अनेक विधियों का विकास किया है-


1. पढ़ाए जाने वाले विषय अथवा सिखाए जाने वाले कौशल की उपयोगिता (Utility of the subject taught or skills taught) -
उपयोगिता सबसे अधिक शक्तिशाली अभिप्रेरक (Motive) होता है। यदि शिक्षार्थियों को यह स्पष्ट कर दिया जाए कि पढ़ाया जाने वाला विषय  (Subject) अथवा सिखाया जाने वाला कौशल (Skill) उनके जीवन में उनके लिए कितना उपयोगी है तो जितना अधिक उन्हें उसकी उपयोगिता का आभास होगा, वे सीखने के लिए उतने ही अधिक अभिप्रेरित (Motivate) होंगे।

2. पढ़ाए जाने वाले विषय अथवा सिखाए जाने वाले कौशल के प्रशिक्षण के उद्देश्य (Aims)
किसी विषय (Subject) अथवा कौशल (Skill) की जीवन में उपयोगिता के साथ पढ़ाए जाने वाले विषय अथवा सिखाए जाने वाले कौशल के उद्देश्य एवं लक्ष्य भी स्पष्ट करना आवश्यक होता है। ये प्रथम विधि से अभिप्रेरित शिक्षार्थियों को सीखने के लिए और अधिक अभिप्रेरित (Motivate) करते हैं। शिक्षार्थियों को सीखे जाने वाले ज्ञान अथवा कौशल के सीखने के उद्देश्य जितने अधिक स्पष्ट होते हैं वे सीखने के लिए उतने ही अधिक अभिप्रेरित होते हैं और उनकी सीखने सम्बन्धी क्रियाएँ भी उतनी ही अधिक उद्देश्य लक्षित  होती हैं।

3. शिक्षार्थियों की आवश्यकताएं (Needs)-  किसी विषय का ज्ञान एवं कौशल का शिक्षण  एवं प्रशिक्षण अपने में कितना भी उपयोगी क्यों न हो लेकिन वह शिक्षार्थियों की आवश्यकताओं की सन्तुष्टि नहीं करता तो शिक्षार्थी उसे सीखने के लिए अभिप्रेरित नहीं होते। शिक्षार्थियों को अभिप्रेरित करने के लिए यह आवश्यक होता है कि सिखाए जाने वाले ज्ञान अथवा कौशल का सम्बन्ध उनकी आवश्यकताओं से जोड़ा जाए। छात्रों की विषय अथवा कौशल के प्रति अभिप्रेरणा की यह उत्तम विधि मानी जाती है।


4. शिक्षार्थियों का आकांक्षा स्तर (Aspiration Level)— कुछ शिक्षार्थी केवल उत्तीर्ण होने भर की आकांक्षा रखते हैं  कुछ  द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण होने की और कुछ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने की। इसी प्रकार कुछ शिक्षार्थी छोटे-मोटे व्यवसाय को प्राप्त करने की आकांक्षा रखते हैं, कुछ की आकांक्षाएँ इससे अधिक होती हैं और कुछ की आकांक्षाएँ तो बहुत अधिक होती  है। यह देखा गया है कि जिन शिक्षार्थियों का आकांक्षा स्तर जितना अधिक ऊँचा होता है वे उससे सम्बंधित  ज्ञान एवं कौशल सीखने के लिए उतने ही अधिक अभिप्रेरित होते हैं। साफ जाहिर है कि शिक्षार्थियों का आकांक्षा स्तर उठाकर हम उनकी अभिप्रेरणा में वृद्धि कर सकते हैं।

5. कक्षा का वातावरण (Class Climate)-  कक्षा का वातावरण भी शिक्षार्थियों को अभिप्रेरित करने में अभिप्रेरक (Motive)  का कार्य करता है। सुन्दर कक्ष , शुद्ध हवा, पर्याप्त प्रकाश, शान्त वातावरण, शिक्षक-शिक्षार्थियों के बीच के सम्बन्ध और शिक्षार्थियों के आपस के सम्बन्ध, इन सबसे कक्षा का वातावरण तैयार होता है। जिस कक्षा में सीखने के लिए जितना अच्छा वातावरण होता है उस कक्षा के शिक्षार्थी उतने ही अधिक अभिप्रेरित (Motivate) होते हैं।

6. शिक्षक का व्यवहार (Teacher Behaviour)- शिक्षक का शिक्षार्थियों के प्रति प्रेम, सहानुभूति एवं सहयोगपूर्ण व्यवहार  होता है छात्रों की भावनाओं का सम्मान करके, उन्हें अभिव्यक्ति के स्वतन्त्र अवसर प्रदान करके और उनकी समस्याओं का तुरन्त हल करके शिक्षार्थियों की अभिप्रेरणा को सरलता से बढ़ा सकता है।

 7. प्रशंसा एवं निन्दा (Appreciation and Censure) इस सन्दर्भ में किए गए मनोवैज्ञानिक अध्ययनों से दो तथ्य उजागर हुए। प्रथम यह कि औसत बुद्धि वाले शिक्षार्थियों के लिए प्रशंसा अच्छे अभिप्रेरक का कार्य करती है और छोटे बच्चों के लिए निन्दा अच्छे अभिप्रेरक का कार्य करती है। और दूसरा यह कि निन्दा की अपेक्षा प्रशंसा अधिक अच्छा अभिप्रेरक होता है। यह कार्य शिक्षक शिक्षार्थियों की सही अनुक्रिया के लिए प्यार  एवं मुस्कान भरी स्वीकृति एवं सुन्दर, शाबास, बहुत ठीक आदि शब्दों के द्वारा कर सकते हैं। गलत अनुक्रिया पर निन्दा के स्थान पर सहयोग अधिक उत्तम अभिप्रेरक होता है। यदि कोई शिक्षार्थी बार-बार गलत अनुक्रिया करे तब भी उसकी निन्दा, प्रेम एवं सहानुभूति के साथ करनी चाहिए।


8. पुरस्कार एवं दण्ड (Reward and Punishment)- इस सन्दर्भ में किए गए मनोवैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया कि जिस समूह की प्रशंसा की गई उसकी निष्पत्ति उस समूह से अधिक थी जिसकी आलोचना की गई थी और जिसे नियन्त्रण में रखा गया था। हाँ, कुछ परिस्थितियों में बच्चों को दण्ड देना अभिप्रेरक का कार्य करता है पर दण्ड बड़ी सावधानी से देना चाहिए क्रोध की स्थिति में दण्ड देना हानिकारक होता है, शिक्षार्थी अभिप्रेरित होने के स्थान पर पलायन कर जाते हैं। पुरस्कार भी बड़ी सावधानी से देना चाहिए, यह लोभ का कारण नहीं बनना चाहिए; यह पदक अथवा प्रमाण-पत्र के रूप में देना अधिक प्रभावी होता है। 

9. प्रतिस्पर्धा  एवं प्रतियोगिता (Rivalry and Competition) - कभी-कभी स्पर्धा आधारित  प्रतिस्पर्धा और प्रतियोगिता भी अच्छे अभिप्रेरक (Motives) का कार्य करती हैं। यह प्रतिस्पर्धा व्यक्तिगत के स्थान पर सामूहिक स्तर की अधिक प्रभावशाली होती है। व्यक्तिगत प्रतिस्पर्धा एवं प्रतियोगिता जहाँ अच्छे अभिप्रेरक का कार्य करती हैं वहाँ शिक्षार्थियों में द्वेष की भावना भी उत्पन्न करती हैं, परन्तु सामूहिक प्रतिस्पर्धा एवं प्रतियोगिता शिक्षार्थियों को अपने समूह को विजयश्री दिलाने हेतु अधिक श्रम करने के लिए अभिप्रेरित करती हैं। शिक्षकों को प्रतिस्पर्धा और प्रतियोगिता का उपयोग बड़ी सावधानी से करना चाहिए। 
10. सफलता का ज्ञान (Knowledge of Success)-    मनोवैज्ञानिक स्कीनर ने अपने प्रयोगों में पाया कि यदि सीखने वाले को अपनी सफलता का ज्ञान तुरन्त करा दिया जाए तो वह उसके लिए अभिप्रेरक का कार्य करता है, वह उससे आगे के कार्य को और अधिक उत्साह से करता है। स्कीनर ने इसे पुनर्बलन (Reinforcement) की संज्ञा दी। 

11. बालकेन्द्रित शिक्षण उपागम (Child Centered approach of teaching)- पूरी शिक्षण प्रक्रिया की मुख्य धुरी बालक है। इसलिए कहा गया है कि "Teaching is meant for the learner and the learner is not meant for teaching” इसलिए शिक्षक को चाहिये कि वह शिक्षण कार्य करते समय बालकों की रुचि, आवश्यकताओं, मानसिक स्तर तथा अभिक्षमताओं का पूरी तरह से ध्यान रखे।


12. शिक्षण की सहायक सामग्री तथा प्रविधियों का प्रयोग (Use of teaching aids and devices) -
शिक्षक को चाहिये कि वह उपयुक्त शिक्षण सामग्री, युक्तियों (Tactics), सीखने के नियमों तथा नवीन शिक्षण सामग्री का प्रयोग करके बालकों को सीखने के लिए अभिप्रेरित करे।
(i) ज्ञात से अज्ञात (Known to Unknown), सरल से जटिल (Easy to Complex) , स्थूल से सूक्ष्म (Macro to Micro) , निश्चित से अनिश्चित (Fixed to Doubtful)  तथा विश्लेषण से संश्लेषण (Analysis to Synthesis) जैसी युक्तियों का प्रयोग करके विषय-वस्तु को बोधगम्य (Understandable) बनाये।
(ii)  करके सीखना , विषय-वस्तु को अच्छी तरह से व्यवस्थित (organised) करना, लचीलापन अपनाना,  सीखने के नियमों (तत्परता, अभ्यास तथा प्रभाव) का उपयोग करना, पृष्ठ-पोषण (feed back devices) का प्रयोग करना आदि शिक्षण के अधिगम के नियमों का कक्षा में भरपूर उपयोग किया जाना चाहिये।
(iii) अध्यापक को कक्षा में दृश्य-श्रव्य सामग्री, टी.वी. फिल्म, चार्टर, प्रोजक्टर, चार्ट, मॉडल आदि का प्रयोग करके विषय-वस्तु को रोचक ढंग से प्रस्तुत करना चाहिये। 




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