अधिगम का ज्ञानात्मक क्षेत्रीय सिद्धान्त (Cognitive Field Theory of Learning)
अधिगम का ज्ञानात्मक क्षेत्रीय सिद्धान्त मुख्यतः मनोवैज्ञानिक कर्ट लेविन (Kurt Lewin) द्वारा प्रतिपादित किया गया था। इस सिद्धान्त को अधिगम का क्षेत्रीय सिद्धान्त (Field Theory of Learning) या अधिगम का तलरूप सिद्धान्त (Topological Theory of Learning) के नाम से जाना जाता है। इस सिद्धान्त के प्रतिपादक कर्ट लेविन (Kurt Lewin) हैं, जिन्होंने वर्दीमर, कोहलर, कोफ्का आदि समग्राकृति सिद्धान्तवादियों के साथ बर्लिन में कार्य किया। यह सिद्धांत गेस्टाल्ट मनोविज्ञान से प्रेरित है और 1940 के दशक में विकसित हुआ, जो व्यक्ति के संपूर्ण जीवन क्षेत्र को ध्यान में रखता है । लेविन के अनुसार, किसी भी व्यक्ति का व्यवहार उसके व्यक्तिगत गुणों (Person) और उसके वातावरण (Environment) के आपसी प्रभाव का परिणाम होता है, जिसे सूत्र के रूप में इस प्रकार लिखा जाता है:
B = f (P, E)
B = f (P, E) अर्थात व्यवहार व्यक्ति और वातावरण का फलन है ।
कर्ट लेविन (Kurt Lewin) ने मनोविज्ञान को एक ऐसे विज्ञान के रूप में माना जिसका सम्बन्ध नित्य के जीवन से है। उसकी रुचि शिक्षण अधिगम से सम्बन्धित समस्याओं का अध्ययन करने में अधिक थी। उसके मनोविज्ञान का मुख्य केन्द्र व्यक्ति, वातावरण, परिस्थितियों (Person, Environment, Situations) की अभिप्रेरित दशायें थी। इसके अतिरिक्त वह समस्याओं के समाधान में रुचि रखता था।
इस सिद्धान्त के 4 प्रमुख तत्त्व हैं-
- जीवन-स्थल (Life-Space):-
- यह व्यक्ति के चेतन अनुभव से जुड़ा होता है—यानि जिन घटनाओं, अनुभवों या उद्देश्यों के प्रति व्यक्ति सचेत रूप से प्रतिक्रियाशील होता है, वे उसके जीवन क्षेत्र का हिस्सा होते हैं ।
- इसमें व्यक्ति (Person) तथा मनोवैज्ञानिक वातावरण (Environment) शामिल होता है, जिनके बीच की क्रिया-प्रतिक्रिया व्यवहार को निर्धारित करती है।
- जीवन क्षेत्र सीमित नहीं होता—यह समय, परिस्थिति और अनुभव अनुसार बदलता रहता है, जैसे-जैसे व्यक्ति नया ज्ञान अर्जित करता है या नई चुनौतियों का सामना करता है । जो चीज़ें व्यक्ति के सीधे अनुभव में नहीं आईं, वे उसके जीवन क्षेत्र से बाहर मानी जाती हैं।
- मनोवैज्ञानिक क्षेत्र (Psychological Field) :
- मनोवैज्ञानिक क्षेत्र हमेशा “समग्र” (holistic) माना जाता है; किसी एक तत्व को अलग करके पूरी तरह नहीं समझा जा सकता, क्योंकि हर भाग अन्य भागों से जुड़ा होता है।
- यह समयानुसार बदलता रहता है; नई जानकारी, अनुभव, सफलता–असफलता, सामाजिक परिवर्तन आदि के साथ क्षेत्र की संरचना और उसमें मौजूद वेक्टर (शक्तियाँ) और कर्षण (आकर्षण/विकर्षण) भी बदलते हैं।
- इसमें जीवन क्षेत्र के भीतर की चीजें (जिनसे व्यक्ति मनोवैज्ञानिक रूप से जुड़ा है) और जीवन क्षेत्र के बाहर की चीजें (जो अभी उसके अनुभव का हिस्सा नहीं हैं और उसके व्यवहार पर प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं डालतीं) – दोनों के बीच स्पष्ट सीमा (boundary) मानी जाती है।
- जब किसी नई समस्या, संघर्ष या लक्ष्य के कारण मनोवैज्ञानिक क्षेत्र की संरचना बदलती है (जैसे नई राहें खुलना, पुरानी बाधाओं का हटना, नए लक्ष्यों का बनना), तब उसे अधिगम और अनुकूलन (adjustment) का संकेत माना जाता है।
- वेक्टर (Vectors): -
- दिशा (Direction) व्यक्ति को किस ओर ले जा रहा है – लक्ष्य की ओर या उससे दूर।
- बल कितना प्रबल या कमजोर है, इससे व्यवहार की तीव्रता पता चलती है।
- यह बल व्यक्ति के भीतर से (जैसे इच्छा, अभिप्रेरणा) या बाह्य परिस्थितियों से (जैसे सामाजिक दबाव, पुरस्कार, दंड) उत्पन्न हो सकता है ।
- सकारात्मक कर्षण होने पर वेक्टर व्यक्ति को लक्ष्य की ओर खींचता है (Approach tendency) और नकारात्मक कर्षण होने पर वेक्टर व्यक्ति को उस वस्तु या लक्ष्य से दूर ले जाता है (Avoidance tendency) ।
- कर्षण (Valence):
- जो चीज़ें आवश्यकता की पूर्ति, आनंद, सफलता या सुरक्षा का अनुभव कराएँ, उनका कर्षण सकारात्मक होता है, जैसे पुरस्कार, प्रशंसा, वांछित लक्ष्य आदि।
- जो चीज़ें भय, दर्द, विफलता, दंड या असुरक्षा से जुड़ी हों, उनका कर्षण नकारात्मक माना जाता है, जैसे कड़ी फटकार, अप्रिय कार्य, शर्मिंदा करने वाली स्थिति आदि ।
- यदि किसी छात्र के लिए “अच्छे अंक और शिक्षक की प्रशंसा” का कर्षण सकारात्मक है, तो पढ़ाई की दिशा में मजबूत वेक्टर बनेगा (अधिक अध्ययन, नियमित उपस्थिति)।
- यदि “कक्षा में प्रश्न पूछना” शर्म, उपहास या घबराहट से जुड़ा हो और उसका कर्षण नकारात्मक लगे, तो छात्र प्रश्न पूछने से बचेगा, भले ही उसे शंका हो ।
- बाधाएँ, लक्ष्य और खतरे (Barriers, Goals, Threats):
- व्यक्ति के पास कोई लक्ष्य होता है → लक्ष्य की ओर सकारात्मक कर्षण और अग्रसर वेक्टर बनते हैं।
- लक्ष्य तक पहुँचने के रास्ते में बाधा आती है → यही बाधा, यदि पार न हो सके, तो “खतरे” की अनुभूति (विफलता, दंड, हानि का डर) को जन्म दे सकती है ।
- यदि शिक्षक या वातावरण बाधाओं को कम करें (सहयोग, संसाधन, मार्गदर्शन देकर) और खतरे‑भावना को घटाएँ (समर्थनकारी वातावरण, त्रुटि को सीखने का अवसर मानना), तो अधिगम के लिए सकारात्मक कर्षण और प्रभावी वेक्टर मज़बूत हो जाते हैं ।