Wednesday, November 19, 2025

मरे का व्यक्तित्व आवश्यकता सिद्धांत (Murray's Need Theory of Personality)

 मरे का व्यक्तित्व आवश्यकता सिद्धांत
(Murray's Need Theory of Personality)

हेनरी मरे का व्यक्तित्व आवश्यकता सिद्धांत, जिसे मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं के सिद्धांत (Theory of Psychogenic Needs) के रूप में भी जाना जाता है, व्यक्तित्व को मूलभूत मानवीय उद्देश्यों और आवश्यकताओं के इर्द-गिर्द संगठित बताता है, जो सचेतन और अचेतन (Consciously and Unconsciously) दोनों रूपों में कार्य करता है।

मरे ने इस तथ्य पर बल दिया कि मानव एक प्रेरित जीव (Inspired creatures) है, जो अपनी अन्तर्निहित आवश्यकताओं (Internal Needs) और बाहरी दबावों (External pressures) के कारण उत्पन्न तनावों को कम करने का प्रयत्न करता है। उन्होंने व्यक्ति के व्यक्तित्व की व्याख्या उसकी आन्तरिक आवश्यकताओं (Internal Needs) के आधार पर की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मनुष्य जिस वातावरण में रहता है उस वातावरण के दबावों का समग्र रूप उस मनुष्य के अन्दर कुछ आवश्यकताओं को उत्पन्न कर देता है। उनके अनुसार ये आवश्यकतायें ही उसके व्यवहार को निश्चित करती हैं। मरे ने इस प्रकार की 24 आवश्यकताओं का पता भी लगाया और उन्हें व्यक्तित्व आवश्यकता (Personality Needs) कहा। उनके द्वारा खोजी गई कुछ आवश्यकतायें हैं- निष्पति (Achievement) की आवश्यकता , स्वायत्तता (Autonomy) की आवश्यकता, प्रभुत्व (Dominance) की आवश्यकता, सानिध्य (Affiliation) की आवश्यकता, प्रदर्शन (Exhibition) की आवश्यकता, परोपकार (Nurturance) की आवश्यकता और आक्रामकता (Aggression) की आवश्यकता

मरे ने प्रस्तावित किया कि -

  • व्यक्तियों की सार्वभौमिक आवश्यकताओं (Universal Needs) का एक समूह होता है, लेकिन इन आवश्यकताओं की तीव्रता और प्राथमिकता प्रत्येक व्यक्ति के लिए अलग-अलग होती है, जिससे अद्वितीय व्यक्तित्व (Unique Personality) का निर्माण होता है।
  • आवश्यकताओं को आंतरिक शक्तियों (Internal Powers) या "विशिष्ट परिस्थितियों में एक निश्चित तरीके से प्रतिक्रिया करने की तत्परता" के रूप में देखा जाता है।
  • व्यवहार इन आवश्यकताओं से प्रेरित होता है, और अपूर्ण आवश्यकताओं के कारण उत्पन्न तनाव को कम करने से मानव क्रियाएँ बहुत प्रभावित होती हैं।

मरे ने आवश्यकताओं को दो मुख्य प्रकारों में विभाजित किया:-

  • प्राथमिक आवश्यकताएँ (Primary needs): ये जैविक या शारीरिक होती हैं, जैसे भोजन, पानी या ऑक्सीजन की आवश्यकता।
  • द्वितीयक (मनोवैज्ञानिक) आवश्यकताएँ (Secondary Needs): ये मनोवैज्ञानिक होती हैं और कल्याण के लिए आवश्यक होती हैं, जैसे उपलब्धि, संबद्धता, शक्ति और सूचना प्राप्ति। उन्होंने लगभग 24 मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की एक सूची तैयार की, जिनमें उपलब्धि, संबद्धता, प्रभुत्व, स्वायत्तता, पोषण, आदि शामिल हैं।

Tuesday, September 23, 2025

राष्ट्रीय शैक्षिक योजना और प्रशासन संस्थान (National Institute of Educational Planning and Administration, NIEPA)

 राष्ट्रीय शैक्षिक योजना और प्रशासन संस्थान 
(National Institute of Educational Planning and Administration, NIEPA)


NIEPA का अर्थ है राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन संस्थान, जो भारत में एक प्रमुख स्वायत्त संस्थान है जो शैक्षिक योजना एवं प्रशासन के क्षेत्र में अनुसंधान, प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और नीति समर्थन पर केंद्रित है। शैक्षिक राष्ट्रीय प्रणाली में इस संस्थान का महत्त्वपूर्ण स्थान है। गत बीस वर्षों में देश के अन्तर्गत यह एक उच्च स्तरीय संगठन है। इसने शैक्षिक नियोजन एवं प्रशासन के क्षेत्र में व्यापक रूप में विकास एवं प्रशिक्षण का कार्य किया है
इसकी स्थापना मूलतः 1962 में यूनेस्को द्वारा एशियाई क्षेत्रीय शैक्षिक योजनाकारों एवं प्रशासकों के केंद्र के रूप में की गई थी। यह कई चरणों से गुज़रते हुए 1973 में राष्ट्रीय शैक्षिक योजनाकारों एवं प्रशासकों का स्टाफ कॉलेज बना और 1979 में इसका नाम बदलकर NIEPA  कर दिया गया। वर्ष 2006 में, भारत सरकार ने इसे मानद विश्वविद्यालय का दर्जा प्रदान किया, जिससे इसे अपनी डिग्रियाँ प्रदान करने की अनुमति मिल गई।

Monday, September 22, 2025

राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (National Council for Teacher Education, NCTE)

राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद 
(National Council for Teacher Education, NCTE)

  राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (NCTE) भारत सरकार का एक सांविधिक निकाय है। राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद, 1973 से अपनी पूर्व स्थिति में, केंद्र और राज्य सरकारों के लिए शिक्षक शिक्षा से संबंधित सभी मामलों पर एक सलाहकार निकाय थी। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NPE) 1986 और उसके अंतर्गत कार्ययोजना में शिक्षक शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन हेतु एक प्रारंभिक कदम के रूप में एक वैधानिक दर्जा और आवश्यक संसाधनों से युक्त राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद की परिकल्पना की गई थी। राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद अधिनियम, 1993 (1993 का संख्या 73) के अनुसरण में 17 अगस्त, 1995 को अस्तित्व में आया। यह परिषद केंद्र और राज्य सरकारों के लिए शिक्षक शिक्षा से संबंधित सभी मामलों में कार्य करती है। इसका उद्देश्य पूरे देश में शिक्षक शिक्षा का नियोजित और समन्वित विकास करना और शिक्षक शिक्षा के मानदंडों एवं मानकों के नियमन एवं उचित रखरखाव का प्रबंधन करना है। यह संगठन अखिल भारतीय स्तर पर कार्यरत है और इसमें विभिन्न प्रभागों के साथ-साथ 4 क्षेत्रीय समितियाँ शामिल हैं। उत्तरी क्षेत्रीय समिति, पूर्वी क्षेत्रीय समिति, दक्षिणी क्षेत्रीय समिति और पश्चिमी क्षेत्रीय समिति, जो सभी नई दिल्ली में स्थित हैं। एन0सी0टी0ई0 द्वारा निष्पादित कार्यों का दायरा बहुत व्यापक है, जिसमें सभी शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम शामिल हैं, जैसे- प्रारंभिक शिक्षा में डिप्लोमा (D. El. Ed.), शिक्षा स्नातक (B.Ed.), शिक्षा स्नातकोत्तर (M.Ed.) आदि। इसमें छात्र-शिक्षकों का अनुसंधान और प्रशिक्षण शामिल है।

NCTE को एक बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका सौंपी गई है और इसने एकीकृत शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम (ITEP), शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक (NPST) और राष्ट्रीय मार्गदर्शन मिशन (NMM) जैसे विभिन्न राष्ट्रीय अधिदेशों को अपने हाथ में लिया है। NCTE द्वारा अन्य शिक्षक शिक्षा कार्यक्रमों, जैसे विनियमन, पाठ्यक्रम और डिजिटल संरचना, का संशोधन भी NEP 2020 के अनुरूप किया जा रहा है। ऐसी पहलों के साथ, NCTE न केवल शिक्षकों के व्यावसायिक विकास के लिए प्रयासरत है, बल्कि हमारे देश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षक शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करने का भी लक्ष्य रखता है। NEP 2020 शिक्षकों की भूमिका में एक व्यापक बदलाव की परिकल्पना करता है, जिसमें सेवा-पूर्व शिक्षक शिक्षा और सेवाकालीन शिक्षक क्षमता निर्माण पर विशेष जोर दिया गया है। NCTE का मुख्यालय जी-7, सेक्टर-10, द्वारका, मेट्रो स्टेशन के पास, नई दिल्ली-110075 में स्थित है। 

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