Tuesday, October 5, 2021

राज्य संसाधन केन्द्र (State Resource Centre (SRC))

 राज्य संसाधन केन्द्र  (State Resource Center (SRC))


परिचय (Introduction)- 

जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विकास कार्यक्रम सरकार की एकमात्र जिम्मेदारी नहीं हो सकती है। यह वास्तविकता सामाजिक विकास परियोजनाओं में गैर-सरकारी संगठनों (NGO) की सक्रिय भागीदारी की आवश्यकता है। प्रौढ़ शिक्षा एक ऐसा क्षेत्र है जहां गैर सरकारी संगठनों का कुछ बहुत ही सकारात्मक और महत्वपूर्ण योगदान है। प्रथम पंचवर्षीय योजना में प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्र में स्वैच्छिक संस्थाओं को सहायता की योजना तैयार कर प्रारम्भ की गई। यह खुशी की बात है कि बाद की योजनाओं में भी काफी जोर दिया गया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NPE), 1986 ने निर्धारित किया है कि सामाजिक कार्यकर्ता समूहों सहित गैर सरकारी संगठनों को प्रोत्साहित किया जाएगा और उचित प्रबंधन के अधीन उन्हें वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। NPE, 1986 को लागू करने के लिए संशोधित नीति (Program Of Action) ने सरकार और गैर सरकारी संगठनों के बीच वास्तविक साझेदारी के संबंध की परिकल्पना की। यह भी निर्णय लिया गया कि सरकार विभिन्न विकास कार्यक्रमों में गैर सरकारी संगठनों की व्यापक भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए सभी प्रकार की सुविधाएं प्रदान करे। साथ ही, यह महसूस किया गया कि गैर सरकारी संगठनों का उचित चयन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

इस संदर्भ में, राष्ट्रीय साक्षरता मिशन (NLM) ने बताया कि सबसे सक्रिय गैर सरकारी संगठनों की पहचान और चयन के लिए विविध तरीके अपनाए जाएंगे। निरक्षर वयस्कों और बच्चों के बीच शिक्षा कार्यक्रम के प्रसार के लिए इन गैर सरकारी संगठनों को बड़े पैमाने पर शामिल किया जा सकता है, क्योंकि निरक्षरता का उन्मूलन हमारे देश के लिए दिन की बुनियादी जरूरत है। इन परियोजनाओं की सफलता के लिए, 1978 और 1982 में तैयार की गई सहायता अनुदान योजना को NLM के उद्देश्यों और रणनीतियों के करीब लाने की दृष्टि से संशोधित किया गया था। इस संशोधित योजना को साक्षरता कार्रवाई में गैर-सरकारी संगठनों के भागीदारों के लिए केंद्रीय सहायता योजना का नाम दिया गया था। इस योजना को NLM के तहत 1988 में लागू किया गया था। साथ ही योजना को परिणामोन्मुखी, समयबद्ध एवं लागत प्रभावी बनाने के लिए शिक्षा विभाग द्वारा उपाय किए गए। अब गैर सरकारी संगठनों को बुनियादी साक्षरता, साक्षरता के बाद और वयस्क शिक्षा कार्यक्रम की निगरानी और मूल्यांकन सहित विभिन्न अन्य वयस्क शिक्षा कार्यक्रमों की परियोजनाओं को शुरू करने के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। योजना का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय साक्षरता मिशन में गैर सरकारी संगठनों की गहन भागीदारी को सुरक्षित करना है। राज्य संसाधन केंद्रों (SRC) ने भारत में वयस्क शिक्षा के पेशेवर संगठनों के बीच अपने लिए एक अलग जगह बनाई है। 1980 में 14 एसआरसी से शुरू होकर, 1997 तक उनकी संख्या बढ़कर 24 हो गई। राज्य में कार्यक्रमों के कार्यभार और आकार के आधार पर, SRC को A और B में वर्गीकृत किया गया है। जबकि कुछ SRC सीधे राज्य सरकारों के अधीन कार्य करते हैं, अन्य गैर सरकारी संगठनों या विश्वविद्यालयों द्वारा प्रबंधित हैं, सभी SRC से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने-अपने राज्यों में मुख्य रूप से प्रशिक्षण कार्यक्रमों, सामग्री विकास और उत्पादन, प्रकाशन, विस्तार गतिविधियों, नवीन परियोजनाओं, शोध अध्ययन और मूल्यांकन के माध्यम से वयस्क शिक्षा कार्यक्रमों को शैक्षणिक और तकनीकी संसाधन सहायता प्रदान करें।

राज्य संसाधन केन्द्र एक स्वतन्त्र और ऑटोनॉमस (Autonomous)  रूप में कार्य करने वाला केन्द्र है।  यह अकादमिक  के साथ-साथ तकनीकी संसाधन भी है। क्योंकि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन सामग्री तैयार करना, सामग्री का प्रकाशन करना, विस्तार क्रियाएँ, नवाचार प्रोजेक्टस, शोध अध्ययन और मूल्यांकन आदि कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। योजनाओं का निर्माण करके  SRC की भूमिका को शक्तिशाली बनाया जाता है और उसका विस्तार किया जाता है। योजनाओं के निर्माण द्वारा केवल संख्या वृद्धि ही नहीं की जाती है बल्कि ढांचागत और संसाधन सुविधाओं से भी सजाने का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार सुविधाओं से युक्त करके इन केन्द्रों को इस योग्य बनाया जाता है कि ये विशेष एजेन्ट की भूमिका का निर्वाह कर सकें। सरकार  का प्रयास यह है कि एस० आर० सी० (SRC) एक स्वतन्त्र एजेन्सी या संस्था के रूप में उच्च अधिगम (Higher Learning) का कार्य करे।

SRC को पूर्ण रूप से केंद्र सरकार  द्वारा फण्ड प्रदान किया जाता है और ये वित्त सम्बन्धी निश्चित  मानकों का पालन करते हैं तथा वित्तीय अनुशासन को बनाए रखते हैं। प्रक्रिया को सरल बनाने, अधिकांश जनता को लाभ मिलने की दृष्टि से वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों का विकेन्द्रीकरण किया गया है। यह विकेन्द्रीकरण राज्य साक्षरता मिशन ऑथोरिटी के अन्तर्गत किया गया है ताकि प्रत्येक राज्य में साक्षरता मिशन को स्थापना हो सके और सतत शिक्षा अभियान चलाया जा सके।

लक्ष्य समूह (Target Group)-

संसाधन केंद्रों के अधिकार क्षेत्र के  दिए गए क्षेत्र में सभी गैर-साक्षर (आयु वर्ग 15-35 वर्ष), नव-साक्षर, स्कूल छोड़ने वाले छात्र।


संसाधन केन्द्र का संगठनात्मक स्तर (Organisational Status of Resource Centre)

संसाधन केन्द्र दो प्रकार से कार्य करेगा-  

1.  गैर सरकारी संगठन के अन्तर्गत 

2.  विश्वविद्यालय के अन्तर्गत।

विश्वविद्यालय को तभी संसाधन केन्द्र दिया जाएगा जबकि वहाँ कोई उपयुक्त स्वैच्छिक एजेन्सी नहीं  होगी। प्रत्येक संसाधन केन्द्र के कार्यों का प्रबन्धन बोर्ड ऑफ मैनेजमेंट द्वारा किया जाएगा, जिसे गवर्निंग बॉडी (Governing Body) के नाम से जाना जाएगा। गवर्निंग बॉडी की सहायता के लिए एक्जीक्युटिव कमेटी (Executive Committee, EC), स्टाफ सलेक्शन कमेटी (Staff Selection Committee, SSC) अन्य उप समितियाँ (Sub Committees) होंगी।

प्रत्येक संसाधन केन्द्र पर योजना निर्माण के लिए प्रोग्राम समन्वय एवं संचालन के लिए व्यावसायिक स्टाफ होगा और स्थानीय अनुभवी और योग्य व्यक्तियों की सेवाएँ ली जाएँगी। ये सेवाएँ अंशकालीन होंगी। इन केन्द्रों पर साक्षरता सामग्री तैयार करना, प्रशिक्षण प्रोग्राम कराना, सेमिनार, वर्कशॉप, कान्फ्रेंस का आयोजन कराना, रिसर्च, प्रकाशन, राज्य सरकार के साथ समन्वय, नवाचार और अन्य प्रोजेक्ट सम्बन्धी क्रियाएँ सम्पन्न की जाएँगी।

कार्य (Functions)-

  • साक्षरता कार्यक्रमों के लिए शिक्षण-अधिगम और प्रशिक्षण सामग्री का विकास करना ।
  • प्रौढ़ शिक्षा के लिए साहित्य का उत्पादन और प्रसार करना ।
  • साक्षरता कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देना।
  • प्रौढ़ शिक्षा के लिए प्रेरक और पर्यावरण निर्माण गतिविधियाँ करना।
  • क्षेत्रीय कार्यक्रमों का संचालन करना ।
  • साक्षरता परियोजनाओं का कार्य अनुसंधान, मूल्यांकन और निगरानी करना ।
  • साक्षरता कार्यक्रमों की भावी आवश्यकता की पहचान करने के लिए नवीन परियोजनाओं को शुरू करना।

एस. आर. सी. के उद्देश्य (Aims of SRC)

  • एकेडेमिक और तकनीकी संसाधन सहायता प्रदान करना। 
  •  साक्षरता कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने में सहायता करना।
  • प्रशिक्षण कार्यक्रम, सामग्री विकास एवं उत्पादन, प्रकाशन और सैद्धान्तिक संगठन को सफल बनाना। 
  • विस्तार क्रियाएँ, नवाचार प्रोजेक्टस, शोध अध्ययन और मूल्यांकन को बढ़ावा देना।



Sunday, October 3, 2021

जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (District Institutes of Education and Training, DIET)

 जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (District Institutes of Education and Training, DIET)


परिचय (Introduction)- 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 में शिक्षक शिक्षा में सुधार हेतु अनेक कार्यक्रमों की घोषणा  की गई थी कि प्रत्येक जनपद में एक जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (District Institute of Education and Training, DIET) की स्थापना  की जाए। इसके तहत 1987 से देश के सभी प्रान्तों के सभी जिलों में इस प्रकार के एक-एक संस्थान स्थापित करने का कार्य शुरू किया गया। 

जिला स्तर पर प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए डाइट एक नोडल संस्थान हैं। ये प्रारम्भिक शिक्षा के शिक्षकों के लिए सेवापूर्व और सेवारत प्रशिक्षण कार्यक्रम को सम्पादित करने के लिए अधिकृत हैं। डाइट का सभी स्तर पर सुदृढीकरण किया जाना आवश्यक है यथा संगठनात्मक संरचना, भौतिक संसाधन, आधारभूत संरचना, अकादमिक कार्यक्रम, मानव संसाधन और वित्तीय संबल आदि। संशोधित योजना के तहत डाइट की जिम्मेदारी RTE अधिनियम, RMSA और NCF के संदर्भ में कई गुना बढ़ जाती है। डाइट का कार्य न केवल शिक्षकों को प्रशिक्षण अपितु स्कूल में गुणवत्ता सुनिश्चित करना, शिक्षकों का व्यावसायिक उन्नयन, जिले में प्रारम्भिक शिक्षा में समन्वय, अकादमिक मूल्यांकन एवं प्रबोधन, ​​अनुसंधान और क्रियात्मक अनुसंधान, कंप्यूटर अनुप्रयोग, शैक्षिक नवाचार एवं जिला स्तर पर अकादमिक योजना निर्माण में भी महती भूमिका निभाते है। 

डाइटों (DIETs) की स्थापना दो प्रकार से की जा रही है-

1. मौजूदा प्राथमिक शिक्षक शिक्षा संस्थानों के उन्नयन द्वारा ।

2. नए संस्थान स्थापित करके। 

नए रूप में संस्थान स्थापित करने के लिए भूमि तो राज्य सरकारों द्वारा उपलब्ध कराई जाती है शेष सब व्यय केन्द्र सरकार वहन करती है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय (MHRD)/ शिक्षा मंत्रालय के दिशा निर्देश के अनुसार किसी नए डाइट की स्थापना हेतु लगभग 10 एकड़ भूमि होनी चाहिए  

अधिसंरचना (Infrastructure) -  प्राचार्य कक्ष, स्टाफ कक्ष, प्राचार्य तथा स्टॉफ के लिए आवासीय व्यवस्था, छात्रावास सुविधा, शैक्षिक मनोविज्ञान प्रयोगशाला, विज्ञान प्रयोगशाला, खेलकूद व्यवस्था तथा कम्प्यूटर सेल (Cell) होने चाहिए एवं 'इंस्टीट्यूट क्लीनिक' तथा अंशकालिक -डॉक्टर की व्यवस्था होनी चाहिए। डाइट के पुस्तकालय में लगभग 10,000 पुस्तकें होनी चाहिए।  

उद्देश्य एवं कार्य (Aims and Functions)-

  • प्राथमिक शिक्षा में गुणात्मक सुधार हेतु इस स्तर पर सेवा पूर्व शिक्षक शिक्षा एवं शिक्षकों के लिए सेवाकालीन प्रशिक्षण  की व्यवस्था करना ।
  •  निरौपचारिक शिक्षा के निर्देशकों एवं प्रौढ़ शिक्षा के कार्यकर्त्ताओं के लिए सेवाकालीन प्रशिक्षण की व्यवस्था करना । 
  • प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्तर की शिक्षा संस्थाओं के प्रधानाध्यापकों के लिए पुनर्बोधन कार्यक्रमों (Refresher Courses) की व्यवस्था करना तथा   सूक्ष्म स्तर योजना (Micro-Planning) का निर्माण करना।
  • प्राथमिक, निरौपचारिक एवं प्रौढ़ शिक्षा के क्षेत्रों में शोध कार्य करना। 
  • प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक विद्यालयों तथा अनौपचारिक शिक्षा एवं प्रौढ़ शिक्षा केन्द्रों हेतू मूल्यांकन केन्द्र स्थापित करना।
  • सन्दर्भ केन्द्र (Resource Centers) एवं अधिगम केन्द्र (Learning Centers) के रूप में प्रसार सेवा (Extension Services) आयोजित करना। 
  • शैक्षिक प्रसाशन व शैक्षिक सुधारों के विकेन्द्रीकरण की व्यवस्था करना एवं जिला स्तर पर शैक्षिक योजनाओं का निर्माण करना।
  • प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण के कार्यक्रमों एवं अभियोजनाओं (Strategies) के लिए प्राथमिक स्तर पर सन्दर्भ व्यक्तियों (Resource Persons) के प्रशिक्षण की व्यवस्था करना। 


विभाग (Departments) 


1. सेवा पूर्व शिक्षक शिक्षा विभाग (Department of Pre-Service Teacher Education, PSTE) -  

  • प्राथमिक स्तर के अध्यापकों के लिए सेवा पूर्व प्रशिक्षण की व्यवस्था करना। जैसे- BTC, STC.

2. सेवारत कार्यक्रम, क्षेत्रीय अन्तःक्रिया एवं नवाचार समन्वय (In-Service Programme, Field Interaction and Innovation Co-ordination, IFIC) – 

  • सेवारत शिक्षक शिक्षा कार्यक्रम आयोजित करना एवं नवाचार हेतु अभिनव कार्यक्रम चलाना।  
  • जिला शिक्षा प्रशासन को जिले की शैक्षिक योजना बनाने में सहयोग प्रदान करना। 
  • क्रियात्मक अनुसंधान द्वारा शैक्षिक समस्याओं के समाधान खोजना एवं नवीन शिक्षण तकनीक का प्रभावी उपयोग करना ।

3. जिला संसाधन इकाई (District Resource Unit, DRU) – 

  •  जिले में प्रौढ़ एवं अनौपचारिक शिक्षा कार्यक्रमों का समन्वय करना तथा इसके पर्यवेक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान करना।

4. योजना एवं प्रबन्धन (Planning and Management, P&M) – 

  • प्राथमिक विद्यालयों के प्रधानाध्यापको एवं ब्लाक स्तर के शिक्षा अधिकारियों को प्रशिक्षित करना।  
  • स्कूल मैपिंग एवं सूक्ष्म स्तर योजना (Micro planning) में सहयोग प्रदान करना। 
  • शैक्षिक आंकड़ों (Data) के संकलन एवं पिछड़े क्षेत्रों का शैक्षिक दृष्टि से आंकलन करना।  

5. पाठ्यक्रम शिक्षण सामग्री विकास एवं मूल्यांकन विभाग (Department of Curriculum Material Development and Evaluation, CMDE) - 

  • प्राथमिक शिक्षक शिक्षा का पाठ्यक्रम विकसित करना । 
  • मूल्यांकन विधियों पर कार्यशालाओं का आयोजन करना। 
6. कार्यानुभव विभाग (Department of Work Experience, WE) – 

  • शिक्षण अधिगम सामग्री तैयार करना। 
  • कार्यानुभव कार्यक्रमों में प्राथमिक विद्यालय, उच्च प्राथमिक विद्यालय, प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र एवं अनौपचारिक शिक्षा केन्द्रों को सहयोग प्रदान करना।

7. शैक्षिक तकनीकी विभाग (Department of Educational Technology, ET)-  

  • कम लागत की शिक्षण सामग्री तैयार करना। 
  • कम्प्यूटर लैब, श्रृव्य-दृश्य सामग्री का रख-रखाव, उपयोग एवं प्रदर्शन के कार्य के साथ-साथ ऑडियों एवं वीडियों कैसेट्स का संग्रह  करना।

8. प्रशासनिक शाखा (Administrative Branch)- 

  •  DIET के प्रशासन को संभालना एवं प्रशासनिक संबंधित कार्य करना।
  • इसमे  एक प्राचार्य, एक उपप्राचार्य तथा इसके विभिन्न विभागों में 43 व्याख्याता सहित 15 अन्य कर्मी जैसे-तकनीकी कर्मचारी एवं प्रशासनिक अधिकारी आदि । नए स्थापित डाइटों में एक प्राचार्य, 7 वरिष्ठ व्याख्याता तथा 17 व्याख्याता सहित 23 अन्य कर्मचारी; जैसे-तकनीकी कर्मी, प्रयोगशाला सहायक एवं क्लर्क आदि ।







Thursday, September 30, 2021

यूक्लिड का गणित में योगदान (Contribution of Euclid in Mathematics)

यूक्लिड का गणित में योगदान (Contribution of Euclid in Mathematics

  • जन्म - लगभग 300/325 ई0 पूर्व 
  • स्थान - सिकन्दरिया (अलेक्जेंड्रिया)
  • प्रमुख पुस्तक - एलिमेंट्स (Elements) (13 अध्याय)
  • अन्य पुस्तक - डेटा, स्युडेरिया, शांकब, पोरिस्मस, तल बिंदुपथ।
  • शिक्षा - प्लेटो अकादमी से
  • इन्हें ज्यामिति का जनक भी माना जाता है।
  • उसकी एलिमेंट्स (Elements) नामक पुस्तक गणित के इतिहास में सफलतम् पुस्तक है।

एलिमेंट्स नामक इस ग्रन्थ के पहले खण्ड में वृत, त्रिभुज, रेखा, बिंदु के बारे में समझाया गया है। दूसरे खण्ड में बीजगणित के द्वारा रेखागणित की आकृतियां बनाना बताया गया है। तीसरे और चौथे खण्ड में वृत की जानकारी है। पांचवे और छठे खण्ड में अनुपात के सिद्धान्त है। सातवे, आठवें और नवे खण्ड में अंकगणित को समझाया है। बाकी के खण्ड ठोस ज्यामिति से सम्बंधित है जिसमे घन, पिरामिड की ज्यामिति समझाई गई है।
एलिमेंट्स के 13 अध्यायों की सूची- 
  •  सर्वांगसमता (Congruency ) और समांतर (Parallelism)
  • बीजगणितीय सर्वसमिकायें और क्षेत्रफल (Algebraic Identity and Area)
  • वृत्त (Circle) 
  • अन्तर्गत और परिगत बहुभुज (Inscribed and Circumscribed Polygons)
  •  समानुपात (Proportion) 
  •  बहुभुजों की समरूपता (Similarity of Polygons)
  • (7-9) अंकगणित (Arithmetic)
  • असुमेय राशियाँ (Irrational Numbers)
  • (11-13) ठोस ज्यामिति (Solid Geometry )

‘एलीमेन्ट्स’ में यूक्लिड ने ज्यामिति के आधारभूत सिद्धान्तों तथा साध्यों की बहुत-ही व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से पूर्व जानकारी देने की चेष्टा की है। साथ ही, स्वयं-सिद्ध तथ्यों एवं अभिगृहीतों (Axioms and Postulates) पर उन्होंने बहुत ही  गहनता से मनन किया तथा अपने मौलिक विचार प्रस्तुत किये।  बाइबिल के बाद दुनिया की यह दूसरी पुस्तक थी जिसकी इतनी अधिक प्रतियाँ बिकीं और दुनिया की लगभग सभी भाषाओं में इसके अनुवाद छापे गए।  अधिकांश विशेषज्ञों का ऐसा विचार है कि यूक्लिड को इस विशाल ग्रंथ की प्रेरणा महान्  दार्शनिक अरस्तू से मिली थी किन्तु उनके इस विशाल ग्रंथ का अध्ययन करने से प्रतीत  होता है कि यह सब कुछ उनकी अपनी सूझबूझ तथा खोजों द्वारा ही संभव हो पाया। यही कारण है कि आज का संसार इन्हें ज्यामिति के जनक (Originator of Geometry)के रूप में जानता है और यही सही भी है। इन्होंने रेखागणित के क्षेत्र में ‘यूक्लीडियन गणित शिक्षण ज्योमेट्री' के नाम से एक दिव्य ज्योति को प्रज्ज्वलित किया। आइन्सटीन  महान् वैज्ञानिक ने ‘सापेक्षिकता के सिद्धान्त' के प्रतिपादन हेतु इसी ग्रंथ का सहारा लिया। उनकी नाम दृष्टि में यूक्लिड ऐसा अन्वेषी था जिसने तार्किक योजना को जन्म दिया। इस महान् गणितज्ञ का योगदान सिर्फ ज्यामिति में ही नहीं अपितु प्रकाशिकी, विभाजन सिद्धान्त आदि में भी था।


योगदान (Contribution)-

1. अपने पूर्वज ग्रीक रेखागणितज्ञों की तरह उसने उस युग की तीन चुनौतीपूर्ण समस्याओं पर विचार किया- 

(a) किसी कोण को तीन बराबर भागों में बाँटना

(b) किसी घन (Cube) को दुगुना करके 

(c) किसी वृत्त का वर्गीय (Square) रूप प्राप्त करना ।

2. यूक्लिड ने पाइथागोरस द्वारा हल होने वाली अपरिमेय संख्याओं (Irrational Numbers) से सम्बन्धित एक पुरानी समस्या को भी हल करने में सफलता प्राप्त की। इस समस्या में एक ऐसे समकोण त्रिभुज के कर्ण की लम्बाई ज्ञात करनी जिसका आधा और लम्ब दोनों की इकाई एक हो। पाइथागोरस का यही अनुमान था कि इसका को उचित हल नहीं निकल सकता। परन्तु यूक्लिड ने इसे हल करके दिखाया।

3. संख्या सिद्धान्त (Number Theory) के क्षेत्र में अपने समय के और गणितज्ञ की तरह यूक्लिड ने भी कोई संख्या अभाज्य संख्या (Prime Number) है या नहीं, इसक पता लगाने के लिये एक टैस्ट तैयार करने का प्रयास किया। यद्यपि इस दिशा में उसे कोई विशेष सफलता नहीं मिल सकी परन्तु फिर भी उसने अभाज्य संख्याओं के बारे मे कम से कम यह पता तो लगाया कि उनकी संख्या अनगिनत (Infinite) है।

4. यूक्लिडियन ज्यामिति एक गणितीय प्रणाली है जिसका श्रेय अलेक्जेंड्रिया के यूनानी गणितज्ञ यूक्लिड को दिया जाता है, जिसका वर्णन उन्होंने ज्यामिति पर अपनी पाठ्यपुस्तक The Elements में किया है। यूक्लिड की विधि में सहज रूप से आकर्षक स्वयंसिद्धों (Axioms) के एक छोटे से सेट को ग्रहण करना और इनमें से कई अन्य प्रमेय  को निकालना शामिल है। हालांकि यूक्लिड के कई परिणाम पहले के गणितज्ञों द्वारा बताए गए थे, यूक्लिड ने सबसे पहले यह दिखाया कि कैसे ये प्रमेय एक व्यापक निगमनात्मक और तार्किक प्रणाली में फिट हो सकते हैं। Elements की शुरुआत समतल ज्यामिति से होती है, जो अभी भी माध्यमिक विद्यालय (हाई स्कूल) में पहली स्वयंसिद्ध प्रणाली (Axiomatic system) और गणितीय प्रमाणों  (Mathematical proofs) के पहले उदाहरणों के रूप में पढ़ाया जाता है। यह तीन आयामों की ठोस ज्यामिति पर जाता है। अधिकांश तत्व उस परिणाम को बताते हैं जिसे अब बीजगणित और संख्या सिद्धांत कहा जाता है, जिसे ज्यामितीय भाषा में समझाया गया है।

5. Euclid's Division Algorithm - HCF

If a and b are two positive integers then the must satisfy the condition - a = bq + r . Where 0  r< b.

Ex-   45 = 6*7+3


Tuesday, September 28, 2021

जवाहर नवोदय विद्यालय समिति (Jawahar Navodaya Vidyalaya Samiti, NVS)

 जवाहर नवोदय विद्यालय समिति (Jawahar Navodaya Vidyalaya Samiti, NVS)

स्थापना -         1986-87

मुख्यालय -    नई दिल्ली

क्षेत्रीय कार्यालय - 8

कुल  विद्यालय - 661  (638+ 23 additional) (As per Year 2021)

मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चों को उनके परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों की परवाह किए बिना अच्छी गुणवत्ता वाली आधुनिक शिक्षा प्रदान करना- जिसमें संस्कृति का एक मजबूत घटक, मूल्यों का समावेश, पर्यावरण के प्रति जागरूकता, साहसिक गतिविधियाँ और शारीरिक शिक्षा शामिल है। 

जवाहर नवोदय विद्यालय समिति भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के अन्तर्गत एक स्वायत्तशासी संगठन है।  यह संगठन पिछड़े और निर्धन वर्ग के विद्यर्थियों को शिक्षा प्रदान कर  प्रतिभाशाली विद्याथियों को  आगे बढ़ा रहा है  जिससे  देश इन विद्यार्थियों की  प्रतिभा के लाभ से वंचित न रहे। देश मे गरीब एव पिछड़े वर्ग के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों की शिक्षा की  ओर सर्वप्रथम ध्यान 1982 में तत्कालीन युवा प्रधानमन्त्री श्री राजीव गाँधी का गया। उन्होंने शिक्षाविदों से इस समस्या के समाधान हेतु सुझाव आमन्त्रित किए और उन सुझावों के आधार पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 में गति निर्धारिक विद्यालयों (Pace Setting Schools) की स्थापना की घोषणा की और इन्हें नवोदय विद्यालय का नाम दिया। आगे चलकर इन नवोदय विद्यालयों को जवाहर नवोदय विद्यालयों के नाम से पुकारा जाने लगा। 1986-87 में इन विद्यालयों की स्थापना शुरू की गई और इन विद्यालयों की स्थापना एवं इनकी पूर्ण व्यवस्था के लिए इस समिति का गठन किया गया। 

संगठनात्मक सरंचना ( Organizational Structure)




इस समिति के प्रशासन तंत्र को तीन भागों में विभक्त किया गया है- 

केंद्रीय स्तर, क्षेत्रीय स्तर एवं स्थानीय स्तर।

केंद्रीय स्तर पर प्रशासन-  इसमे दो समितियाँ हैं -

1. सामान्य समिति (General Body) - 

केंद्रीय शिक्षा मन्त्री -  चेयरमेन (Chairman)  
राज्य मन्त्री -            डिप्टी चेयरमेन (Deputy Chairman)  

2. कार्यकारिणी समिति (Executive Committee) - 

केंद्रीय शिक्षा मन्त्री -  चेयरमेन (Chairman)   

इसके मुख्य अधिकारी कमिश्नर (Commissioner) की नियुक्ति सरकार करती है। इस समिति में कमिश्नर के अतिरिक्त 3 जॉइन्ट कमिश्नर (Joint Commissioner), 5 डिप्टी कमिश्नर (Deputy Commissioner), 11 एसिसटेन्ट कमिश्नर (Assistant. Commissioner) और एक जनरल मैनेजर (General Manager) नियुक्त हैं। कार्यकारिणी समिति की दो उपसमितियाँ हैं—

(i) वित्त समिति (Finance Committee) – यह वित्त मामलों के लिए उत्तरदायी ।

(ii) प्रशासन सलाहकार समिति (Administration Advisory Committee) – यह प्रशासन सम्बन्धी सभी मामलों के लिए उत्तरदायी। 

क्षेत्रीय स्तर पर प्रशासन-  

कुल क्षेत्रीय कार्यालय (Regional Office)-  8 (As per Current Report 2021)

Regional Offices of NVS
Sr. No.RegionsNo. of JNVsStates & No. of Jawahar Navodaya Vidyalayas as on 31.03.2020
1.Bhopal108 + 5 = 113Chhattisgarh (28), Madhya Pradesh (54), Odisa (31)
2.Chandigarh  57 + 2 =   59Chandigarh U.T.(1), Himachal Pradesh (12),Jammu & Kashmir (21), Ladakh U.T. (2), Punjab (23)
3.Hyderabad   74 + 3 =  77A&N Islands U.T.(3), Andhra Pradesh (15), Karnataka(31), Kerala(14), Lakshadweep U.T.(1), Pondicherry U.T. (4), Telangana(9)
4.Jaipur  63 + 2 =   65Delhi (9), Haryana (21), Rajasthan(35)
5.Lucknow  88 + 1 =   89Uttar Pradesh (76), Uttarakhand(13)
6.Patna  81 + 4 =   85Bihar (39), Jharkhand (26), West Bengal (20)
7.Pune  71 + 2 =   73Dadra Nagar Haveli and Daman & Diu U.T.(3), Goa (2). Gujarat(34), Maharashtra(34)
8.Shillong  96 + 4 = 100Arunachal Pradesh(18), Assam(28), Manipur (11), Meghalaya (12), Mizoram (8), Nagaland (11), Sikkim (4), Tripura(8)
Total638 + 23 = 661Total 661 JNVs have been sanctioned in 638 districts of India. Additional JNVs have been sanctioned in 23 districts, which include 10  JNVs in SC & 10 JNVs in ST having large concentrated population and 03 JNVs i.e.  Senapati-II (Manipur), Ukhrul-II (Manipur) and Ratlam-II (Madhya Pradesh) as a special case.

प्रत्येक क्षेत्रीय कार्यालय में एक डिप्टी कमिश्नर (Deputy Commissioner) नियुक्त है जो क्षेत्रीय कार्यालय के मुख्य अधिकारी के रूप में कार्य करता है। इसकी सहायता के लिए 4 एसिसटेन्ट कमिश्नर (Assistant Commissioner), 1 इंजीनियर (Engineer), 1 एकाउन्ट ऑफीसर (Account Officer) और सपोर्टिंग स्टॉफ है। ये क्षेत्रीय कार्यालय अपने क्षेत्र के समस्त जवाहर नवोदय विद्यालयों के प्रशासन एवं उनकी उचित देखभाल के लिए उत्तरदायी हैं। इनके सहयोग से ही केन्द्रीय कार्यालय अपने उत्तरदायित्व का सम्पादन करता है। 

स्थानीय स्तर पर  प्रशासन-

प्रत्येक जवाहर नवोदय विद्यालय के लिए दो समितियाँ हैं 

1. विद्यालय एडवाइजरी समिति (Vidyalaya Advisory Committee)- 

अध्यक्ष -  जिलाधिकारी (DM)  

सदस्य-   स्थानीय अधिकारी एवं शिक्षाविद  

2. विद्यालय प्रबन्ध समिति (Vidyalaya Management Committee) - 

अध्यक्ष -  जिलाधिकारी (DM)  

सदस्य-   स्थानीय अधिकारी एवं शिक्षाविद  

उद्देश्य (Objective)- 

  • 1. मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली बच्चों को उनके परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति पर ध्यान दिए बिना, गुणात्मक आधुनिक शिक्षा प्रदान करना, जिसमें सामाजिक मूल्यों, पर्यावरण के प्रति जागरूकता, साहसिक कार्यकलाप और शारीरिक शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण घटकों का समावेश हो।
  • 2. देश भर में एक उपयुक्त स्तर पर एक समान माध्यम अर्थात् अंग्रेजी एवं हिन्दी में शिक्षण की सुविधाएं प्रदान करना।
  • 3. सभी विद्यालयों के स्तर में तुलनात्मकता सुनिश्चित करने व हमारी मिली-जुली संस्कृति एवं परम्पराओं को समझने में सुविधा हो इसके लिए मूल-पाठ्यचर्या प्रदान करना।
  • 4. राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने और सामाजिक भावना की समृद्धि के लिए प्रत्येक स्कूल के विद्यार्थियों को क्रमिक रूप से देश के एक भाग से दूसरे भाग में ले जाना।
  • 5. वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप अध्यापकों को प्रशिक्षण एवं अनुभव और सुविधाओं के परस्पर आदान-प्रदान द्वारा स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए एक केन्द्र बिन्दु के रूप में कार्य करना।
  • 6. नवोदय विद्यालयों के विद्यार्थियों के रहने के लिए छात्रवास स्थापित करना, उनका विकास, रख-रखाव व प्रबंधन करना।  समिति के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए यदि आवश्यक हो, देश के किसी भी भाग में स्थित अन्य संस्थाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करना, उन्हें स्थापित एवं उनका संचालन करना।
  • 7. ऐसे सभी कार्य करना जो इस समिति के किसी या सभी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक, प्रासंगिक या सहायक समझे जाएं।

कार्य (Functions) -

  • समय-समय पर आवश्यकतानुसार नीति एवं कार्यक्रम निर्धारण करना। 
  • वार्षिक बजट बनाना और भिन्न-भिन्न मदों के लिए धनराशि निश्चित करना। 
  • जिन जिलों में अभी तक नवोदय विद्यालय नहीं है, राज्य सरकार द्वारा 35 एकड़ भूमि निःशुल्क उपलब्ध कराने पर उनमें जवाहर नवोदय विद्यालय स्थापित करना । 
  • जवाहर नवोदय विद्यालयों में प्रवेश हेतु चयन परीक्षा की व्यवस्था करना प्रारम्भ में इस चयन परीक्षा का सम्पादन एन.सी.ई.आर.टी. (NCERT) करती थी, वर्तमान में सी.बी.एस.ई (CBSE) के द्वारा होता है। इस परीक्षा में सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त स्कूलों से कक्षा 5 उत्तीर्ण छात्र बैठ  सकते हैं। इनमें 75% स्थान ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों के लिए, 33% स्थान लड़कियों के लिए और स्थान विशेष पर अनुसूचित जाति एवं जनजाति के प्रतिशत के आधार पर अनुसूचित जाति एवं जनजाति के बच्चों के लिए आरक्षित हैं।
  • जवाहर नवोदय विद्यालयों के लिए प्रधानाचार्यों एवं शिक्षकों का चयन करना। यह चयन भारतीय स्तर पर खुले विज्ञापन, लिखित परीक्षा और मौखिक साक्षात्कार द्वारा किया जाता है।
  • नवोदय विद्यालयों के भवन निर्माण एवं भवन मरम्मत कार्य कराना। 


Friday, September 24, 2021

ब्रह्मगुप्त का गणित में योगदान (Contribution of Brahmagupta in Mathematics)

 ब्रह्मगुप्त का गणित में योगदान (Contribution of Brahmagupta in Mathematics)

जन्म - 598 ई0

स्थान- भिलनालका (पंजाब) / उज्जैन 

पिता का नाम-  विष्णुगुप्त

मृत्यु -  668 ई ० 

क्षेत्र - Astronomy, Mathematics

प्रमुख पुस्तक-  ब्रह्म स्फुट सिद्धान्त, ध्यान ग्रहोपदेश 

  • ब्रह्मगुप्त गणित ज्योतिष के बड़े आचार्य हो गये हैं। प्रसिद्ध गणितज्ञ भास्कराचार्य ने इन्हें 'गणित चक्र चूरामणि' कहा है। 
  • शून्य से गणना करने का नियम सबसे पहले ब्रह्मगुप्त  ने ही दिया था । 
  • सन् 628 ई० में ब्रह्म स्फुट सिद्धान्त और सन् 665 में खण्ड साधक को बनाया था।  ब्रह्म स्फुट सिद्धान्त में 21 अध्याय हैं, जिनमें गणित अध्याय तथा कुटखाध्यका उल्लेखनीय हैं। गणित अध्याय का उल्लेख गिनने तथा कुटखाध्यका में बीजगणित का उल्लेख किया है। 
  • इन्होंने अंकगणित, बीजगणित तथा रेखागणित सभी गणितों पर प्रकाश डाला है।   
  • π का मान √10 माना है  ।
  • वर्गीकरण की विधि का वर्णन सर्वप्रथम ब्रह्मगुप्त ने ही किया है तथा विलोम विधि का वर्णन बड़ी अच्छी तरह से किया है। 
  • गणित अध्याय शुद्ध गणित में ही हैं। इसमें जोड़ना, घटाना आदि त्रैराशिक भाण्ड, प्रति भाण्ड आदि हैं। 
  • अंकगणित या परिपाटी गणित में है श्रेणी व्यवहार (Series behavior), क्षेत्र व्यवहार (area behavior), त्रिभुज , चतुर्भुज (quadrilateral) आदि के क्षेत्रफल जानने की विधि , चित्र व्यवहार (ढाल-खाई आदि के घनफल जानने की रीति), त्रैवाचिक व्यवहार (triangular behavior), राशि व्यवहार (zodiac behavior) (अन्न के ढेर का परिमाण जानने की विधि ), छाया व्यवहार (shadow behavior) (इसमें दोष, सम्बन्ध तथा उसके स्तम्भ की अनेक विधि) आदि 24 प्रकार के अध्याय इसी के अन्तर्गत हैं।
  • वृतीय चतुर्भुज के क्षेत्रफल निकालने के लिए सूत्र दिया -


where s, the semi - perimeter, is defined to be


Brahmagupta's identity (Brahmagupta–Fibonacci identity)-

In algebraBrahmagupta's identity says that, for given , the product of two numbers of the form  is itself a number of that form. In other words, the set of such numbers is closed under multiplication. Specifically:

For example,


(This identity holds in both the ring of integers and the ring of rational numbers, and more generally in any commutative ring.)

Brahmagupta's problem- 

This problem was given in India by the mathematician Brahmagupta in 628 AD in his treatise Brahma Sphuta Siddhanta:

Solve the Pell's equation

for integers .

Brahmagupta gave the smallest solution as

.

ब्रह्मगुप्त का प्रक्षेप सूत्र (Brahmagupta's interpolation formula)-

Brahmagupta used a simple linear interpolation formula. The linear interpolation formula to compute f(a) is

 where .

 








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