Thursday, August 26, 2021

विद्यालय पाठ्यक्रम में गणित का महत्व (Importance of Mathematics in School Curriculum)

 

विद्यालय पाठ्यक्रम में  गणित का महत्व (Importance of Mathematics in School Curriculum) 

प्राचीन काल से ही गणित को हमारे देश में एक विषय के रूप में महत्व दिया जाता रहा है। प्राचीन काल से ही विद्यालयों में गणित शिक्षण की प्रभावशाली व्यवस्था की जाती रही है। वर्तमान में भी गणित का हमारे दैनिक जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है।  वर्तमान काल में गणित को विद्यालय पाठ्यक्रम में विशेष महत्व देने के लिए गणित विषय को सामान्यतः निम्न दृष्टिकोणों से देखा जाता है-


1. दैनिक जीवन में उपयोगी (Useful in Daily Life)-  

वर्तमान समय विज्ञान का युग है और प्रत्येक स्थान या जगह पर हमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से गणित का उपयोग करना पड़ता है।  दैनिक जीवन में घर में, बाहर बाजार, दुकान, आय-व्यय में, बैंक ब्याज आदि क्रय-विक्रय में गणित को ही आधार बनाया जाता है। लौकिक, वैदिक तथा सामाजिक जो आधार हैं, उन सबमें गणित का उपयोग है इसलिये विद्यालय में बालकों को प्रारम्भ से ही, प्रारम्भिक गणित का ज्ञान कराया जाये तो वे अपने दैनिक जीवन और अनुभवों को समझने और समझाने में सक्षम रहेंगे।

2. आर्थिक एवं सामाजिक प्रगति में उपयोगी (Useful in Progress of Economical & Social)-  

हमारी वर्तमान आर्थिक व सामाजिक सभ्यता विज्ञान की ही देन है और विज्ञान का आधार गणित है। जब तक बालक को गणित का ज्ञान नहीं होगा तब तक वह विज्ञान के बारे में विस्तृत जानकारी हासिल नहीं कर सकेगा। गणित के बिना  विज्ञान में भी प्रगति होना असम्भव है। इस कारण से यह कह सकते हैं कि गणित हमारी इस आधुनिक प्रगति, विकास और सभ्यता के भवन का स्तम्भ रूप है जिसको हटा लेने से वर्तमान सभ्यता, वैज्ञानिक प्रगति और समृद्धि का भवन निश्चित रूप से गिर जायेगा।


3. बालकों के मानसिक अनुशासन बनाने में उपयोगी (Useful in making of mental discipline in Children)-

गणित का ज्ञान विद्यार्थियों के मस्तिष्क को अनुशासित करने में सहायक होता है। जब विद्यार्थी गणित के प्रश्न को हल करने का प्रयास करता है, तो उसे अपने मन को एकाग्र करना होता है। मन की एकाग्रता मानसिक अनुशासन उत्पन्न करने में सहायक होती है। इससे बालक में उत्पन्न जिज्ञासायें सन्तुष्ट होकर शान्त हो जाती हैं। गणित का अध्ययन बालक को विवेकी, आत्म-विश्वासी, तर्क-वितर्क शक्ति युक्त बनाता है। 


4. स्पष्ट भाव प्रकाशन में उपयोगी (Useful thoughts helpful in Publication)–

हम अपने विचारों, भावों को भाषा के माध्यम से ही किसी दूसरे के सामने  रखते हैं। गणित विषय की भी एक भाषा होती है, जिसका निर्माण प्रतीकों के द्वारा होता है। गणित भाषा को शुद्ध व स्पष्ट बनाता है। जब हम यह कहते हैं कि 'अमुक स्थान बहुत दूर है' तो इसका अर्थ उसकी दूरी से होता है और दूरी ज्ञात करने के लिये हमें गणित का सहारा लेना पड़ता है। उसके द्वारा ही हम यह ज्ञात कर पाते हैं कि वह स्थान कितनी दूर है। .एच० सी० वैश्य ने इसको स्पष्ट करते हुए कहा है कि, “गणित भाषा का दूसरा रूप है, क्योंकि साधारण भाषा की अपेक्षा उसमें प्रयुक्त व्यंजना अधिक शुद्ध और सूक्ष्म होती है।


5. बालकों के चरित्र निर्माण में उपयोगी (Useful in Character building of Children) - 

कुछ विद्वानों ने कहा है कि  गणित विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण में सहायक होता है। गणित एक ऐसा विषय है, जिसमें अशुद्धता का कोई स्थान नहीं होता है अर्थात् गणित किसी झूठ, फरेब, आडम्बर आदि को कोई स्थान नहीं देता है। गणित के द्वारा ही विद्यार्थियों को सत्य का ज्ञान होता है  व सत्य की ओर आकर्षित होकर उनमें नैतिकता का विकास होता है, जो बालक के चरित्र निर्माण में उपयोगी सिद्ध होता है।


6. सांस्कृतिक समृद्धि के विकास में उपयोगी (Useful in the development of Cultural Growth)-

गणित को सांस्कृतिक समृद्धि के विकास की आधारशिला माना जाता है। हागवेन (Hagven) ने गणित को सभ्यता का दर्पण कहा है। (Mathematics is the mirror  of culture.) यदि हम अपनी सभ्यता के बारे में मनन करते हैं तो उसके द्वारा हमें यह पता चलता है कि मानव संस्कृति एवं गणित का विकास लगभग साथ-साथ ही हुआ है। इनकी समुचित जानकारी के लिये हमारे लिये गणित का ज्ञान करना अति आवश्यक हो जाता है। 


7. तर्क संगत, क्रमबद्ध एवं व्यवहारिक गुणों का समावेश एवं उनके विकास में उपयोगी (Useful the development of absorption and Logical Systematical and Behavioural Virtues)—

अध्यापक, विद्यार्थी को गणित शिक्षण को सोचने, समझने, विचारने, तार्किक ढंग से सोचने तथा तथ्यात्मक ढंग से हल खोजने के लिये प्रेरित करता है। जब विद्यार्थी का मस्तिष्क क्रियाशील होता है, तो उसमें अनेक विचार, तर्क, विश्लेषण और उस समस्या पर विवेचना करने की क्रियाएँ स्वतः ही उसके मस्तिष्क में संचालित हो जाती हैं। इस प्रकार की क्रियाओं से विद्यार्थी का बौद्धिक विकास होता है। उसमें तर्क-वितर्क करने, तुलना करना एवं स्वयं निर्णय करने की क्षमता उत्पन्न होती है जिससे उसके मस्तिष्क को शक्ति प्राप्त होती है। और जब उसका मस्तिष्क परिपक्व हो जाता है तथा वह स्वयं ही क्रियाएँ करने लगता है।



Wednesday, August 25, 2021

गणित का अर्थ, परिभाषा एवं प्रकृति (Meaning, Definitions and Nature of Mathematics)

 

 गणित का अर्थ (Meaning of Mathematics)


'गणित' शब्द बहुत प्राचीन है तथा वैदिक साहित्य में इसका बहुतायत से उपयोग किया गया है। गणित शब्द का शाब्दिक अर्थ है, “वह शास्त्र  या विद्या जिसमें गणना की प्रधानता हो।" इस प्रकार गणित के सम्बन्ध में दी गयी मान्यताओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि गणित, अंक, अक्षर, चिन्ह आदि संक्षिप्त संकेतों का वह विधान है जिसकी सहायता से परिमाण (Magnitude), दिशा (Direction) तथा स्थान (Space) का बोध होता है। 

गणित विषय का प्रारम्भ गिनती से ही हुआ है और संख्या पद्धति (Number of System) इसका एक विशेष क्षेत्र है जिसकी सहायता से गणित की अन्य शाखाओं का विकास किया गया है । 

गणित मानव जीवन का एक गणनात्मक पक्ष (Quantitative aspect) है। जिसमें जीवन से संबंधित वस्तुओं के बारे में गणना करके उसके बारे में जानकारी प्राप्त की जाती है।  गणनात्मक पक्ष का आधार मात्रा एवं स्थान (Quantity and Space) है, जो मात्रात्मक संबंधों का प्रयोग समस्या समाधान के साथ करता है। यह विज्ञान की एक सुसंगठित , क्रमबद्ध एवं शुद्ध शाखा है। यह युक्तिसंगत तर्क की आंकिक समस्याओं का विज्ञान है।


परिभाषायें (Definitions)

गैलीलियो (Galileo) के अनुसार- गणित वह भाषा है जिसमें परमेश्वर ने संपूर्ण जगह या ब्रह्मांड को लिख दिया है (Mathematics is the language which God written Universe.) 

लौक (Locke) के अनुसार- "गणित वह है जिसके द्वारा बच्चों के मन या मस्तिष्क में तर्क करने की आदत स्थापित होती है। " (Mathematics is a way to settle the mind of children a habit of reasoning.)

गॉस (Gauss) के अनुसार- "गणित, विज्ञान की  रानी  है।"(Mathematics is the queen of the science.) 

बेल (Bell) महोदय के अनुसार- "गणित को विज्ञान का नौकर  माना जाता है। " (Mathematics is supposed to be the servant of Science.)

गिब्स (J. Willard Gibbs) के अनुसार- "गणित एक भाषा है। " (Mathematics is a language.)

बेकन (Bacon) अनुसार- गणित सभी विज्ञानों का मुख्य द्वार एवं कुंजी है।"(Mathematics is the gateway and  key to all sciences.)

होगबेन (Hogben) के अनुसार- "गणित सभ्यता और संस्कृति का दर्पण है। (Mathematics is the mirror of civilization.) 

उपरोक्त परिभाषाओं के विश्लेषण करने पर कहा जा सकता है कि- 

  • गणित गणनाओं का विज्ञान है। (Mathematics is the science of calculations.)
  • गणित विज्ञान का अमूर्त रूप है।(Mathematics is the abstract form of science.) 
  • गणित ज्ञानेन्द्रियों का विकास है । (Mathematics is the development of sense organs.)
  • गणित स्थान तथा संख्याओं का विज्ञान है । (Mathematics is the science of space and numbers.) 
  • गणित विज्ञान की क्रमबद्ध, संगठित एवं यथार्थ शाखा है।(Mathematics is the systematised, organised and exact branch of science.)
  • गणित तार्किक विचारों का विज्ञान है । (Mathematics is a science of logical reasoning.)  
  • यह आगमनात्मक विज्ञान है ।(It is an inductive science.)
  • गणित एक प्रायोगिक विज्ञान है। (Mathematics is a experimental science.) 
  • गणित मात्रात्मक तथ्यों और सम्बन्धों का अध्ययन है।(Mathematics is the study of quantitative facts and relationship) 
  • गणित में आवश्यक निष्कर्ष निकाले जाते हैं । (Mathematics is draws necessary conclusions.)


गणित की प्रकृति (Nature of Mathematics)


  1. गणित में संख्यायें (Numbers), स्थान (Place), दिशा (Magnitude) तथा मापन या माप-तौल (Measurement) का ज्ञान प्राप्त किया जाता है।
  2. गणित की अपनी भाषा (Language) है। भाषा का तात्पर्य-गणितीय पद (Mathematical terms), गणितीय प्रत्यय (Mathematical concepts), सूत्र (Formulae), सिद्धान्त (Principles) तथा संकेतों (Signs) से है जो कि विशेष प्रकार के होते हैं तथा गणित की भाषा को जन्म देते हैं ।
  3. गणित के ज्ञान का आधार हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ (Sense organs) हैं।
  4. इसके ज्ञान का आधार निश्चित होता है जिससे इस पर विश्वास किया जा सकता है। 
  5. गणित का ज्ञान यथार्थ (Exact), क्रमबद्ध (Systematic), तार्किक (Logical) तथा अधिक स्पष्ट (Clear) होता है, जिससे उसे एक बार ग्रहण करके आसानी से भुलाया नहीं जा सकता।
  6. गणित में अमूर्त प्रत्ययों (Abstract concepts) को मूर्त रूप (Concrete form) में परिवर्तित किया जाता है, साथ ही उनकी व्याख्या भी की जाती है। 
  7. गणित के नियम, सिद्धान्त, सूत्र सभी स्थानों पर एक समान होते हैं जिससे उनकी सत्यता की जाँच (Verification) किसी भी समय तथा स्थान पर की जा सकती है।
  8. इसके अध्ययन में प्रत्येक ज्ञान तथा सूचना स्पष्ट होती है तथा उसका एक सम्भावित उत्तर निश्चित होता है। 
  9. इसके विभिन्न नियमों, सिद्धान्तों, सूत्रों आदि में सन्देह (Doubts) की सम्भावना नहीं रहती है।
  10. गणित के अध्ययन से आगमन (Induction), निगमन (Deduction) तथा सामान्यीकरण (Generalization) की योग्यता विकसित होती है।
  11. गणित के अध्ययन से बालकों में आत्मविश्वास (Confidence) और आत्मनिर्भरता (Self Reliance) का विकास होता है।
  12. इससे बालकों में स्वस्थ तथा वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific attitude) विकसित होता है। 
  13. इसमें प्रदत्तों अथवा सूचनाओं (संख्यात्मक) को आधार मानकर संख्यात्मक निष्कर्ष (Numerical Inferences) निकाले जाते हैं।
  14. गणित के ज्ञान का उपयोग (Application) विज्ञान की विभिन्न शाखाओं यथा भौतिकी, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान तथा अन्य विषयों के अध्ययन में किया जाता है। 
  15. गणित, विज्ञान की विभिन्न शाखाओं के अध्ययन में सहायक ही नहीं, बल्कि उनकी प्रगति तथा संगठन की आधारशिला है।

Sunday, August 22, 2021

राज्य स्तर पर शैक्षिक प्रशासन की संरचना (Structure of Educational Administration at State Level)

राज्य स्तर पर शैक्षिक प्रशासन  की संरचना (Structure of Educational Administration at State Level)




राज्यों का शैक्षिक प्रशासन भी तीन भागों में विभाजित है— 

1. मन्त्रालय (Ministry)

2. सचिवालय Secretariate) 

3. निदेशालय (Directorate)। 

शैक्षिक प्रशासन के कार्य (Functions of Educational Administration)-

1. शिक्षा मन्त्रालय (Education Ministry) - 

प्रत्येक राज्य में शिक्षा मन्त्रालय है। किसी राज्य में केवल एक शिक्षा मन्त्री है, किसी में दो और किसी में बेसिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा और उच्च शिक्षा के लिए अलग-अलग तीन शिक्षा मन्त्री हैं। शिक्षा मन्त्रालय का मुख्य कार्य नीति निर्धारण है। जहाँ एक से अधिक शिक्षामन्त्री हैं, वे अपने-अपने विभाग के लिए नीति निर्धारण के लिए उत्तरदायी हैं। शिक्षा मन्त्री विधान सभा (Assembly) एवं विधान परिषद (Legislative Assembly) के लिए जवाबदेह है।

2. शिक्षा सचिवालय (Education Secretariate)– 

शिक्षा सचिव इसके मुख्य अधिकारी होते हैं। उनके आधीन उपसचिव और सहायक सचिव होते हैं। जिन राज्यों में एक से अधिक शिक्षा मन्त्री हैं उनमें अलग -अलग विभाग बेसिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के लिए अलग-अलग उपसचिव होते हैं। शिक्षा सचिवालय राज्य द्वारा निश्चित शिक्षा नीति के क्रियान्वयन के लिए उत्तरदायी होता है। राज्य सरकार के सभी आदेश शिक्षा सचिव के नाम से ही निकाले जाते हैं। जहाँ आवश्यक होता है, यह विभाग सरकार को सलाह भी देता है।

3. शिक्षा निदेशालय (Education Directorate) - 

शिक्षा निदेशक इस विभाग के सर्वोच्च अधिकारी होते हैं। कुछ राज्यों में केवल एक ही शिक्षा निदेशक है और कुछ राज्यों में बेसिक शिक्षा, माध्यमिक शिक्षा और उच्च शिक्षा के लिए अलग-अलग निदेशक हैं और आवश्यतानुसार अतिरिक्त निदेशक एवं उपनिदेशक हैं। इस विभाग  का मुख्य कार्य राज्य में अपने-अपने क्षेत्र में शिक्षा की व्यवस्था करना और उसमें गुणात्मक उन्नयन (quality upgrade) करना है। यह विभाग सरकार और शिक्षा संस्थाओं को जोड़ने का कार्य करता है, सरकार को राज्य की शिक्षा प्रगति के विषय में सूचना देता है और उसे राज्य की शैक्षिक माँगों की जानकारी देता है। शिक्षा निदेशालय अपने कार्यों का निष्पादन क्षेत्रीय एवं जनपदीय शैक्षिक प्रशासनिक संगठनों के माध्यम से करता है ये शैक्षिक प्रशासकीय संगठन हैं

(i) क्षेत्रीय स्तर पर शैक्षिक प्रशासन (Educational Administration at Regional Level) 

राज्य का शिक्षा निदेशालय अपने कार्यों को सुचारु रूप से सम्पादित करने के लिए राज्य को कई क्षेत्रों में विभाजित करता है।  प्रत्येक क्षेत्र में एक-एक क्षेत्रीय बेसिक शिक्षा अधिकारी, एक-एक क्षेत्रीय माध्यमिक शिक्षा अधिकारी और एक-एक क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी नियुक्त हैं। ये सभी शिक्षा उपनिदेशक स्तर के अधिकारी हैं। ये क्षेत्रीय अधिकारी अपने-अपने शिक्षा निदेशालय के अन्तर्गत कार्य करते हैं और अपने-क्षेत्र में  क्षेत्र की शिक्षा  की व्यवस्था के लिए उत्तरदायी हैं। 

(ii) जनपदीय स्तर पर शैक्षिक प्रशासन (Educational Administration at District Level)-

प्रत्येक क्षेत्रीय शिक्षा कार्यालय से कई जिले जुड़े हैं। जिले स्तर पर प्रत्येक जिले में एक जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी और एक माध्यमिक शिक्षा अधिकारी नियुक्त हैं। इनके अपने-अपने कार्यालय है। जिले की  बेसिक शिक्षा और माध्यमिक शिक्षा की व्यवस्था के लिए उत्तरदायी है।


(iii) विकास खण्ड स्तर पर शैक्षिक प्रशासन (Educational Administration at Development  Block Level)-

किसी भी राज्य के जिलों को जनसंख्या के आधार पर कई का विकास खण्डों में विभाजित किया गया है। इन विकास खण्डों में एक-एक शिक्षा समिति होती है जिसका प्रमुख  शिक्षा अधिकारी होता है। यह समिति अपने विभाग खण्ड की प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था को देख-रेख के लिए उत्तरदायी होती है।

(iv) ग्राम पंचायत स्तर पर शैक्षिक प्रशासन (Educational Administrate at Gram Panchayat. Level) - 

प्रत्येक विकास खण्ड के अन्तर्गत कई ग्राम पंचायत होती है। इन ग्राम पंचायतों में एक शिक्षा समिति होती है जिसका मुखिया  ग्राम पंचायत प्रधान होता है। यह समिति अपने क्षेत्र की प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था के लिए उत्तरदायी होती है।

राज्यों में शिक्षा के क्षेत्र में सलाह देने एवं विशेष कार्यों का सम्पादन करने के लिए कुछ अन्य शैक्षिक प्रशासिक संस्थाओं का गठन भी किया जाता है। ये संस्थाएँ हैं-

(i) राज्य शिक्षा सलाहकार बोर्ड (State Advisory Board of Education, SABE) सरकार को शिक्षा से सम्बन्धित सभी विषयों पर अपनी सलाह देता है। 

(ii) राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (State Councils of Educational Research and Training, SCERT)-  स्कूली शिक्षा के सम्बन्ध में सरकार को सलाह देना , स्कूली शिक्षा का पाठ्यक्रम एवं पाठ्यपुस्तकों का निर्माण करना , सेवा पूर्व एवं सेवारत शिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना  और शिक्षा के क्षेत्र में नवाचारों को प्रोत्साहित करना । 

(iii) माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (Board of Secondary Education, BSE)-   राज्य की माध्यमिक शिक्षा संस्थाओं को शर्तें पूरी करने पर मान्यता देना और मान्यता प्राप्त संस्थाओं का समय-समय पर निरीक्षण करना और उन पर नियन्त्रण करना, माध्यमिक स्तर के लिए पाठ्यक्रमों का निर्माण करना, पाठ्यपुस्तकों का निर्माण अथवा चयन करना और कक्षा 10 व कक्षा 12 की सार्वजनिक परीक्षाओं का सम्पादन करना । 

(iv) राज्य स्रोत केन्द्र (State Resource Centre (SRC) -  प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन, सामग्री तैयार करना, सामग्री का प्रकाशन करना, नवाचार प्रोजेक्ट, शोध अध्ययन और मूल्यांकन आदि कार्यक्रमों का आयोजन करना।

(v) उच्च शिक्षा अध्ययन संस्थान (Institute of Advance Studies in Education {IASE})- SSA, RMSA योजनाओं का प्रबंध देखना, शोध कार्यों को प्रोत्साहन देना , सेवापूर्व प्रशिक्षण देना।

(vi) अध्यापक शिक्षा महाविद्यालय (College of Teacher Education) 

(vii) जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (District Institute of Education and Training {DIET})- प्राथमिक शिक्षा एवं प्राथमिक शिक्षक शिक्षा के  प्रशिक्षण की व्यवस्था करना।

(viii) जिला स्रोत इकाईयाँ (District Resource Unit) 

(ix)  ब्लाक स्रोत इकाईयाँ (Block Resource Unit)- प्राथमिक स्तर के अध्यापकों को सभी प्रकार की एकेडेमिक सहायता, शिक्षक शिक्षण, सामुदायिक गतिशीलता, क्रियात्मक अनुसंधान कार्य, प्रतियोगताएँ ।






केंद्रीय स्तर पर शिक्षा प्रशासन की संरचना (Structure of Educational Administration at Central Level)

केंद्रीय स्तर पर शिक्षा प्रशासन की संरचना (Structure of Educational Administration at Central Level)

शैक्षिक प्रशासन (Educational Administration)-

शैक्षिक प्रशासन एक ऐसे सेवा करने वाली गतिविधि है जिसके माध्यम से शैक्षिक प्रक्रिया के लक्ष्य  प्रभावशाली ढंग से प्राप्त किए जाते हैं।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत सरकार ने शिक्षा विभाग को शिक्षा मन्त्रालय में परिवर्तित कर दिया। 1957 में शिक्षा मन्त्रालय के साथ वैज्ञानिक अनुसन्धान को भी जोड़ दिया गया।  1958 में इस मन्त्रालय को दो भागों में बाँट दिया गया-

1. शिक्षा मन्त्रालय (Ministry of Education),

2. वैज्ञानिक अनुसन्धान एवं सांस्कृतिक मामलों का मन्त्रालय (Ministry of Scientific Research and Cultural Affairs) 

यह दोनों मन्त्रालय अलग-अलग राज्यमंत्री की अध्यक्षता में रखे गये। 1963 में पुनः इन दोनों मन्त्रालयों को दो भागों में विभक्त कर दिया गया

(i) शिक्षा विभाग (Department of Education)

(ii) विज्ञान विभाग (Department of Science)

यह दोनों ही मन्त्रालय शिक्षा मन्त्री की अध्यक्षता में संगठित किये गये और शिक्षा मन्त्री की सहायता के लिए एक या दो राज्य मन्त्री या उपमन्त्री होते हैं। 1964-65 में शिक्षा मन्त्रालय को पुनर्गठित किया गया और इसमें पाँच ब्यूरो तथा चार डिवीजनों की व्यवस्था की गई।

ब्यूरो (Buereaus) -

1. विद्यालयी शिक्षा (School Education)

2. उच्च शिक्षा (Higher Education)

3. छात्रवृत्तियाँ (Scholarships) 

4. नियोजन  तथा अधीनस्थ शैक्षिक सेवायें (Planning and Ancillary Education Services)

5. भाषाएँ, साहित्य एवं ललित कलाएँ (Language, Literature and fine Arts) 

डिवीजन (Division)

1. शारीरिक शिक्षा तथा मनोरंजन (Physical Education and Recreation) 

2. बाह्य सम्बन्ध (External Relations)

3. वैज्ञानिक अनुसन्धान (Scientific Resource)

4. प्रशासन (Administration) 

सन् 1967-68 में मन्त्रालय के ढाँचे में पुनः परिवर्तन किया गया और इसमें दो नये ब्यूरो जोड़े गये और इस प्रकार कुल सात ब्यूरो हो गये।

26 सितम्बर 1985 को शिक्षा मन्त्रालय के नाम को बदल कर मानव संसाधन विकास मन्त्रालय (Ministry of Human Resource Development) रखा गया, जिसमें पाँच विभाग बनाये गये- 

1. शिक्षा विभाग (Department of Education)

2. संस्कृति विभाग (Department of Culture) 

3. कला विभाग (Department of Arts)

4. युवा कल्याण एवं खेलकूद विभाग (Department of youth Affairs and Sports)

5. महिला एवं बाल देखभाल विकास (Department of Women and Child Care)

वर्तमान में केन्द्रीय स्तर पर शैक्षिक प्रशासन तीन स्तरों में विभाजित है— 

  • मन्त्रालय (Ministry) 
  • सचिवालय (Secretariate) 
  • शैक्षिक ब्यूरो  (Educational Buereaus) । 

शैक्षिक प्रशासन एवं उनके कार्य-

1. मानव संसाधन विकास मन्त्रालय (Ministry of Human Resource Development)-  मानव संसाधन मन्त्री इस मन्त्रालय के प्रमुख अधिकारी होते हैं। इस विभाग के राज्य शिक्षा मन्त्री शिक्षा विभाग के शैक्षिक प्रशासन के मुख्य अधिकारी होते हैं। मन्त्रालय का मुख्य कार्य शिक्षा  सम्बन्धी नीतियों का निर्माण करना है।

2. शिक्षा सचिवालय (Education Secretariate) - शिक्षा सचिव (Education Secretary) इस सचिवालय के मुख्य अधिकारी होते हैं। इनके अधीन अतिरिक्त सचिव, उपसचिव और सहायक सचिव होते हैं।  सचिवालय का मुख्य कार्य शिक्षा नीति का कार्यान्वयन है।

3. शैक्षिक व्यूरो (Educational Buereaus) -  वर्तमान में शिक्षा विभाग का प्रशासन निम्न विभागों में विभाजित है।

1. डीपीईपी (District Primary Education Programme)।

2. प्रारम्भिक शिक्षा एवं यु.अ. (Elementary Education and OL)। 

3. प्रौढ़ शिक्षा तथा राष्ट्रीय साक्षरता मिशन  (Adult Education and National Literacy Mission)।

4. योजना (Planning)।

5. विश्वविद्यालयी तथा उच्च शिक्षा (University and Higher Education)।

6. माध्यमिक शिक्षा एवं प्रबन्धन (Secondary Education and Administration)।

7. पुस्तक संवर्धन, छात्रवृत्ति एवं यूटीएस (Book Promotion, Scholarship and UTS)। 

8. भाषाएँ (Languages)।

9. तकनीकी शिक्षा (Technical Education)।

10. व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education)।

11. वित्त (Finance)|

12. लेखा (Accounts)।

इन सब विभागों में एक-एक सहायक सचिव है जो मानव संसाधन विकास मन्त्री और मानव संसाधन विकास राज्य मन्त्री और शिक्षा सचिव को इन विभागों के कार्य कलापों में सहायक एवं संयोजक का कार्य करते है। इन सहायक सचिवों की सहायता के लिए प्रत्येक विभाग में कई अन्य अधिकारी और सहायक स्टाफ है। इन विभागों का कार्य अपने-अपने विभागों से सम्बन्धित शैक्षिक प्रशासन की व्यवस्था करना है।

केन्द्र सरकार ने शिक्षा सम्बन्धी विभिन्न विभागों के कार्य क्षेत्र में परामर्श देने और तत्सम्बन्धी कार्यों का सम्पादन करने में सहयोग करने के लिए कुछ मण्डल, परिषद, संस्थान और आयोगों का गठन किया है।

1. केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (Central Advisory Board of Education, CABE) - शिक्षा संबंधित नीतियों तथा कार्यों में सरकार को सलाह देना।

2. अखिल भारतीय प्रारम्भिक शिक्षा परिषद (All India Council of Elementary Education AICEE) - प्रारंभिक शिक्षा संबंधी नीति और कार्यक्रम तैयार करना।

3. राष्ट्रीय प्रौढ़ शिक्षा संस्थान (National Institute of Adult Education, NIAE) - प्रौढ़ शिक्षा संबंधित नीति एवं कार्यक्रमों को तैयार करना तथा समस्याओं का समाधान करना।

4. राष्ट्रीय शैक्षिक योजना और प्रशासन संस्थान (National Institute of Educational Planning and Administration, NIEPA) - शैक्षिक योजनाओं के निर्माण एवं प्रशासनिक कार्यों में सरकार का सहयोग करना।

5. विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (University Grants Commission UGC) - उच्च शिक्षा के स्तर मान को बनाये रखना।

6. राष्ट्रीय ग्रामीण उच्च शिक्षा परिषद (National Rural Higher Education Council (NRHEC) - ग्रामीण उच्च शिक्षा के स्वरूप का निर्धारण एवं संचालन करना।

7. अखिल भारतीय माध्यमिक शिक्षा परिषद (All India Council of Secondary Education, AICSE) - माध्यमिक शिक्षा संबंधित नीति, कार्यक्रम एवं योजना बनाना तथा उससे संबंधित समस्याओं का समाधान करना।

8. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (National Council of Educational Research and Training, NCERT) -अनुसंधान, विस्तार कार्य, स्कूली शिक्षा व शिक्षक शिक्षा संबंधित नीतियों एवं कार्यक्रमों का संचालन करना।

9. राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद (National Council for Teacher Education, NCTE) - प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों का निर्माण एवं नियंत्रण करना

10. केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय (Central Directorate of Hindi, CDH)-   राष्ट्रभषा हिंदी के स्वरूप का निर्धारण एवं प्रचार का कार्य करना।

11. अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (All India Council for Technical Education, AICTE) - तकनीकी शिक्षा के पाठ्यक्रमों के निर्माण एवं उससे संबंधित समस्याओं का समाधान करना।

12. राष्ट्रीय स्त्री शिक्षा  परिषद (National Council of Women Education)- स्त्री शिक्षा के प्रसार से सम्बंधित कार्यक्रमों का निर्माण करना ।

Tuesday, August 10, 2021

व्यक्तित्व का मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त (Psycho-analytical Theory of Personality)

 

व्यक्तित्व का मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त (Psycho-analytical Theory of Personality)

प्रतिपादक -  सिगमंड फ्रायड

व्यक्तित्व का अध्ययन करने का सबसे प्रथम सिद्धान्त मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त है। फ्रायड ने व्यक्ति के व्यवहार को समझने तथा मानसिक विकारों से पीड़ित व्यक्तियों की चिकित्सा करने में मनोविश्लेषण विधि का अधिक प्रयोग किया जिससे उसको काफी प्रसिद्धि प्राप्त हुई। फ्रायड ने मूल प्रवृत्तियों को मानव व्यवहार का निर्धारक तत्व माना है। फ्रायड के मनोविश्लेषण सिद्धान्त में मूल प्रवृत्तियों की अवधारणा व्यक्तित्व की गतिशीलता को समझने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। मूल-प्रवृत्तियों का उल्लेख व्यक्ति की जन्म-जात समस्त मनःऊर्जा (Psychic ) के रूप में किया जाता है।  इन्होंने दो मूल प्रवृत्तियों की ओर ध्यान आकर्षित किया। 

(1) जीवन मूल-प्रवृत्ति या यौन-प्रेम (Life instinct or Eros ) :

जीवन मूल प्रवृत्ति व्यक्ति को जीवित रहने के लिए प्रेरणा स्रोत का कार्य करती है। जीवन मूल-प्रवृत्ति से सम्बन्धित सभी मूल-प्रवृत्तियों में निहित सम्पूर्ण मानसिक शक्ति को फ्रायड ने काम-शक्ति (Libido) का नाम दिया है। जीवन मूल-प्रवृत्ति के सभी कार्य इस काम शक्ति के द्वारा ही संचालित होते हैं। काम -शक्ति में अनेक जीवन मूल प्रवृत्तियों की शक्तियाँ सम्मिलित रहती हैं, जिनमें काम-वासना, भूख तथा प्यास मुख्य हैं। जीवन मूल-प्रवृत्तियों के सम्पूर्ण समूह को संगठित रूप में फ्रायड ने यौन-प्रेम (Eros) का नाम दिया है।


(2) मृत्यु मूल -प्रवृत्ति या मूमुर्षा  (Death instinct or Thanatos) : 

मृत्यु के उपरान्त व्यक्ति की सभी प्रकार की जैविक  आवश्यकताओं का अन्त हो जाता है। अर्थात् मृत्यु वह कारक है जो सभी मानवीय क्रियाओं के अन्त का कारण सिद्ध होता है। इसके बाद प्राणी को जैविक आवश्यकताओं को संतुष्ट करने के लिए किसी प्रकार का प्रयत्न नहीं करना पड़ता है। मृत्यु मूल-प्रवृत्ति में मृत्यु प्राप्त करने की अचेतन भावना निहित रहती है। फ्रायड के अनुसार  प्राणी के जीवन का उद्देश्य मृत्यु है।


व्यक्तित्व की सरंचना (Structure of Personality)



व्यक्तित्व का स्थलाकृतिक पहलू (Topographical Aspect of Personality)

 व्यक्ति की स्थालाकृतिक संरचना में फ्रायड ने मन के तीन स्तरों का वर्णन किया है-चेतन, अर्द्धचेतन तथा अचेतन । 

(i) चेतन (Conscious) :-  चेतन मन का वह भाग है जिसमें वे अनुभूतियाँ (experiences) निहित रहती हैं, जिनके बारे में व्यक्ति पूर्णतः अवगत रहता है। यह उन विचारों, भावनाओं, तथा सूचनाओं का भण्डार होता है जिनका व्यक्ति आसानी से तुरन्त स्मरण कर सकता है।

(ii) अर्धचेतन अथवा अवचेतन (Subconscious or Preconscious) : - व्यक्ति के अर्ध-चेतन मन में वे अनुभूतियाँ निहित रहती हैं जिनकी उसे वर्तमान में पूर्णतः जानकारी नहीं रहती है लेकिन थोड़ा प्रयास करने पर उनसे अवगत हुआ जा सकता है अर्थात् यह व्यक्ति के मन का वह भाग है जिसमें संचित अनुभूतियों को वह थोड़ा प्रयास करने पर स्मृति पटल पर वापिस ला सकता है।

(iii) अचेतन (Unconscious):  फ्रायड का मानना  था  कि व्यक्ति का व्यवहार उसके चेतन मन  की अपेक्षा अचेतन मन  अधिक  प्रभावित करता  है।  व्यक्ति का अचेतन मन उन इच्छाओं तथा प्रवृत्तियों का भण्डार होता है जिनकी पूर्ति वह वास्तविक जीवन (real life) में नहीं कर पाता है। ये अतृप्त इच्छाए तथा प्रवृत्तियाँ व्यक्ति के चेतन मन से हटकर दमन की प्रक्रिया के द्वारा उसके अचेतन में संगृहीत होती जाती हैं। आगे चलकर ये दमित इच्छाएँ व्यक्ति के व्यवहार को अनेक प्रकार से प्रभावित करती हैं। फ्रायड ने व्यक्तित्व की तुलना आइसवर्ग से की है जिसका 1/10 हिस्सा पानी से ऊपर रहता है। तथा 9/10 हिस्सा पानी में डूबा रहता है। अतः हमारे व्यक्तित्व का अधिकांश भाग अचेतन के रूप में हिमखण्ड की तरह से अदृश्य रहता है। अचेतन में दमित इच्छाओं को व्यक्ति संघर्ष के बाद ही चेतन स्तर पर ला पाता है।

 जैसे-  स्वप्न में दमित इच्छाओं की पूर्ति होते हुए दिखाई देना, किसी चीज का अचानक याद आ जाना, सम्मोहन की अवस्था में प्रश्नों का उत्तर देना, अनायास मुँह से अवांछित शब्दों का निकलना, लिखते समय असंभावित त्रुटियाँ होना तथा सोते समय समस्याओं का समाधान होना आदि क्रियाएँ अचेतन के अस्तित्व (existence) को दर्शाती हैं।


व्यक्तित्व का गत्यात्मक पहलू (Dynamic Aspect of Personality) 


व्यक्तित्व के गत्यात्मक पहलू से फ्रायड का तात्पर्य उस उपक्रम (System) से है जिसके द्वारा व्यक्ति की मूल प्रवृत्तियों से उत्पन्न होने वाले संघर्षों का समाधान करने का प्रयास किया जाता है। ये तीन प्रकार के  हैं -


(i) Id (इदम् ) :-  यह व्यक्तित्व का वह मूल तन्त्र (System) है जो व्यक्ति की जन्मजात मनःशक्तियों का भण्डार होता। है। इसकी प्रकृति मूल प्रवृत्तियों पर निर्भर करती है। यह अहम् तथा पराहम् के संचालन के लिए ऊर्जा प्रदान करता है। यह आनन्द प्राप्ति के सिद्धान्त पर कार्य करता है।  अतः यह तनाव कम करने के लिए आनन्द पथ का अनुसरण करता है, चाहे वह पथ अच्छा हो अथवा बुरा हो अर्थात् इसका यथार्थ से कोई सम्बन्ध नहीं होता है। यह सहज् क्रियाओं (Reflex actions) तथा प्राथमिक प्रक्रिया (Primary process) को नियन्त्रित करता है। सहज् क्रियाएँ जन्मजात तथा स्वतः संचालित (automatic) क्रियाएँ होती हैं जैसे - छींकना, पलकें झपकना आदि। ये क्रियाएँ तनाव को तुरन्त दूर करती हैं। प्राथमिक प्रक्रियाओं से प्रतिमाओं के द्वारा तनाव को कम करने का प्रयास किया जाता है जैसे भूख लगने पर अच्छे भोजन की प्रतिमाओं को स्मृति में लाना। लेकिन खाने की प्रतिमाओं द्वारा भूख से उत्पन्न तनाव वास्तविक (Realistic) रूप में दूर नहीं हो पाता है। इदम् यौन प्रवृत्ति तथा आक्रामकता पर आधारित होता है और यह पूर्णतः अचेतन होता है। यह व्यक्तित्व का जैविक पहलू है| 

(ii) अहम् (Ego): यह इदम् तथा बाह्य जगत् दोनों के सम्पर्क में रहता है तथा इदम् की इच्छाओं को सामाजिक परिवेश के दायरे में सन्तुष्ट करने के उपाय जुटाता है। इसकी प्रकृति तार्किक होती है तथा यह इदम् तथा पराहम् के बीच सम्बन्ध  स्थापित करने का प्रयास करता है। अहम् द्वितीय प्रक्रिया द्वारा संचालित होता है  इसकी गतिविधियाँ वास्तविक चिन्तन (realistic thinking) पर आधारित होती हैं। जिस व्यक्ति का अहम् सशक्त (strong) होता है वह इदम् पर नियन्त्रण करके वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करने में सफल रहता। है। अहम् यर्थायता के सिद्धान्त पर कार्य करता है। अहम् का विकास माता-पिता तथा बालक के सम्पर्क में रहने वाले व्यक्तियों द्वारा होता है। अहम् को व्यक्तित्व का मनोवैज्ञानिक पहलू माना जाता है ।

(iii) पराहम् (Super ego) :- पराहम् नैतिकता के सिद्धान्त पर कार्य करता है यह पूर्णतः चेतन होता है। यह मन का वह भाग है जिसे हम अन्तरात्मा (Conscience) कहते हैं । यह अहम् को उन्हीं कार्यों को करने की स्वीकृति देता है जो नैतिक मूल्यों (Moral values) के दायरे में आते हैं। पराहम् हमेशा इद्म के सम्पर्क में रहता है तथा उसकी अवांछित इच्छा पर नियन्त्रण करने की हर कोशिश करता है। यह अहं को भी नियन्त्रित करता है। इसका विकास माता-पिता तथा अध्यापक द्वारा दिए  संस्कारों और अपनाये गए आदर्शों द्वारा होता है । पराह्म व्यक्तित्व का सामाजिक पहलु माना जाता है ।

 फ्रॉयड ने आगे स्पष्ट किया कि अहम् (Ego) सदैव इदम् (Id) और पराहम् (Super Ego) के बीच साम॑ज॒स्य॒ स्थापित करने का प्रयास करता है; जिन व्यक्तियों में यह सामंजस्य हो जाता है वे व्यक्तिगत एवं सामाजिक दोनों क्षेत्रों में समायोजन करने में समर्थ होते हैं और उन्हें सुसमायोजित व्यक्तित्व (Well Adjusted Personality) कहा जाता है। इसके विपरीत जिन व्यक्तियों में इदम् अहम् और पराहम के बीच संघर्ष बना रहता है वे व्यक्ति व्यक्तिगत अथवा सामाजिक किसी  भी क्षेत्र में समायोजन नहीं कर पाते। ऐसे व्यक्तियों को कुसमायोजित व्यक्तित्व (Mal- Adjusted Personality) का कहा जाता है।


व्यक्तित्व का  विकास (Development of Personality)

 फ्रॉयड ने मनोलैंगिक विकास की पाँच अवस्थाएं   बताई हैं -

(1) मुखावस्था  (Oral Stage) : यह अवस्था जन्म से एक वर्ष की उम्र तक चलती है, जिसमें बालक मुख की क्रियाओं द्वारा लैंगिक सुख  प्राप्त करता है। स्तनपान करना, अंगूठा चूसना तथा अन्य चीजों को मुँह में डालना आदि ऐसी ही क्रियाएँ हैं।

(2) गुदा अवस्था  (Anal Stage):  यह अवस्था तीन वर्ष की आयु तक चलती है। इस अवस्था में बच्चा मल-मूत्र को त्यागने तथा कभी-कभी रोकने में लैंगिक सुख की प्राप्ति करता है। मल त्यागते समय वे काफी देर तक बैठे रहते हैं। 

(3) लिंग प्रधान अवस्था (Phallic Stage): यह अवस्था तीन वर्ष से पाँच वर्ष की आयु तक रहती है। इस अवस्था में बच्चे अपने हाथों से जननेन्द्रियों को स्पर्श करके लैंगिक सुख की प्राप्ति करते हैं। इस में दो प्रकार की ग्रंथियों का निर्माण होता है -

1. Oedipus Complex-  मातृ-मनोग्रंथि -

  • लड़कों में पायी जाती है ।
  • माँ के प्रति प्रेम ।

2. Electra Complex- पितृ -ग्रंथि 

  • लड़कियों में पायी जाती है ।
  • पिता के प्रति प्रेम ।

(4) अव्यक्त अवस्था  (Latency Stage): यह अवस्था 6 वर्ष से लेकर 12 वर्ष की आयु तक चलती है। इस अवस्था में बच्चे सामाजिक दबाव में आकर लैंगिक इच्छाओं को अनैतिक मानकर उनका दमन करते हैं।

(5) जननेन्द्रिय अवस्था (Genital Stage) : यह अवस्या 13 वर्ष की आयु से प्रारम्भ होती है। इस अवस्था में किशोर पहले  समलिगियों तथा बाद में विषमलिगियों (Opposite sex) के साथ  सम्बन्ध बनाने में आनन्द की अनुभूति प्राप्त करते हैं ।


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