Tuesday, May 11, 2021

अधिगम के प्रकार (Types of Learning)

 अधिगम के प्रकार (Types of Learning)

सामान्यतः अधिगम तीन प्रकार के होते हैं-

  • संज्ञानात्मक/ज्ञानात्मक अधिगम (Cognitive/Knowledgeable Learning)
  • क्रियात्मक अधिगम (Conative /Functional Learning)
  • भावात्मक अधिगम (Affective/Emotional Learning)


  • संज्ञानात्मक/ज्ञानात्मक अधिगम (Cognitive/ Knowledgeable Learning)- इस प्रकार के अधिगम का संबंध ज्ञान से होता है अर्थात अधिगमकर्ता अपने ज्ञान में वृद्धि करता है इस प्रकार के अधिगम में ज्ञान अर्जित करने निम्न विधियां  होती हैं-

(A) प्रत्यक्षात्मक अधिगम (Perceptual Learning)-  मूर्त वस्तुओं को देखकर, सुनकर, छूकर सीखना। यह शैशवावस्था में पाया जाता है।

(B) प्रत्यात्मक अधिगम ( Conceptual Learning)- किसी विषय  वस्तु के बारे में अमूर्त चिंतन, कल्पना या तर्क के आधार पर सीखना प्रत्यात्मक अधिगम कहलाता है। यह विशेषता किशोरावस्था  वाले बालकों में पाई जाती है।

(C)  साहचर्यात्मक अधिगम (Associated Learning)-  जब पहले से सीखे अनुभवों को नए ज्ञान के साथ जोड़ा जाता है या  समान अधिगम परिस्थितियों में एक अधिगम प्रक्रिया को दूसरे अधिगम प्रक्रिया से जोड़ा जा सकता है। 
 
  • क्रियात्मक अधिगम (Conative /Functional Learning)- यह क्रिया से सम्बंधित अधिगम है । इसे मनोदैहिक अधिगम भी कहा जाता है। विभिन्न प्रकार की क्रियाओं जैसे - तैरना, सिलाई सीखना, खाना बनाना ,  संगीत, नृत्य आदि के माध्यम से होने वाला अधिगम क्रियात्मक अधिगम कहलाता है। 
  • भावात्मक अधिगम (Affective/Emotional Learning)- यह जीव की भावनाओं से संबंधित अधिगम है । यदि किसी बालक को चित्र, रंग , आकृति सवेंग शब्द  को आधार मानकर सिखाया जाता है तो उसे भावात्मक अधिगम कहते हैं।

रोबेर्ट मिल्स गैने (Robert Mills Gagne) केे अनुसार-

 रोबेर्ट  मिल्स गैने (Robert Mills Gagne)  ने अधिगम के आठ प्रकार बताये हैं। इन्होंने अपनी किताब "अधिगम की शर्तें (Conditions of Learning)  (1965) में इन 8 प्रकार के अधिगम की व्याख्या की है।  इसे अधिगम का सोपानिकी सिद्धान्त भी कहते हैं ।



  • संकेत अधिगम (Signal Learning)-  संकेत अधिगम  परिस्थिति पॉवलोव द्वारा प्रस्तुत शास्त्रीय अनुबन्धन के सिद्धांत (Classical Conditioning Theory) पर आधारित है।  छोटे बच्चों को अक्षर ज्ञान संकेत अधिगम की उपस्थिति में उत्पन्न किया जाता है। जैसे अक्षर  की पहचान करने के लिए कबूतर का चित्र, अक्षर के लिए खरगोश आदि। इसको गैने द्वारा निम्न स्तर में रखा गया है।
  • उद्दीपन- अनुक्रिया अधिगम (Stimulus-Response Learning)- थार्नडाइक के प्रयास-त्रुटि सिद्धान्त, स्किनर के क्रियाप्रसूत अनुबन्धन सिद्धान्त (Trial-error theory, Skinner's operant conditioning theory) के समान है।  थार्नडाइक के प्रयोग में बिल्ली सही और गलत उद्दीपकों को पहचान कर और अपनी अनुक्रिया में संसोधन करके सही अनुक्रिया सीख लेती है।
  • श्रृंखला अधिगम (Chain Learning)- श्रृंखला अधिगम में दो या दो से अधिक उद्दीपक अनुक्रिया संबंधों को साथ-साथ जोड़ दिया जाता है। इस प्रकार की अधिगम में व्यक्तिगत संबंधों को क्रमानुसार संबंधित किया जाता है।
  • शाब्दिक साहचर्य अधिगम (Verbal Associative Learning)- इस प्रकार के अधिगम में शाब्दिक अनुक्रिया क्रम की व्यवस्था की जाती है। अधिक जटिल शाब्दिक श्रृंखला के लिए व्यवस्था क्रम एक संकेत का कार्य करती है। शाब्दिक इकाई को सीखने के लिए  उससे पूर्व की इकाई सहायता प्रदान करती है 
  • विभेदन अधिगम (Discrimination Learning)- विभेदन अधिगम के अंतर्गत बालक भिन्न-भिन्न उद्दीपनों के प्रति अनुकूलन से भिन्न भिन्न स्पष्ट अनुक्रिया करना सीख जाता है एक जैसे दिखने वाले उद्दीपनों में विभेद करने की क्षमता आ जाती है और विभेदी उद्दीपन के अनुरूप अनुक्रिया करने में बालक समर्थ हो जाता है।
  • संप्रत्यय अधिगम (Concept Learning)-  जब किसी वस्तु की पहचान गुणों के आधार पर किया जाता है तो उसे संप्रत्यय अधिगम कहते हैं। 
  • सिद्धान्त/नियम अधिगम (Rule/Principle Learning)- नियम अधिगम को महासंप्रत्यय अधिगम (Super Concept) भी कहा जाता है क्योंकि नियम की शाब्दिक रूप में भी अभिव्यक्ति की जा सकती हैं नियम अधिगम में बालकों द्वारा विचारों का संयोजन किया जाता है इस प्रकार के अधिगम में दो या अधिक संप्रत्ययों को श्रृंखलाबद्ध किया जाता है जिससे एक नियम की संकल्पना बनती है। जैसे- पृथ्वी में गरुत्वाकर्षण शक्ति है।
  • समस्या समाधान अधिगम (Problem solving learning)- समस्या समाधान अधिगम में बालक द्वारा पूर्व में सीखे गए नियमों का उपयोग वर्तमान समस्या का हल करने में किया जाता है । इस प्रकार समस्या समाधान अधिगम  नियम-अधिगम का एक प्राकृतिक विस्तार है । इस अधिगम में चिंतन की सामग्री निहित होती है। इसको गैने सर्वश्रेष्ठ् प्रकार बताया है ।





Sunday, May 9, 2021

अभिप्रेरणा के सिद्धान्त (Theories of Motivation)

 अभिप्रेरणा के सिद्धान्त (Theories of Motivation)

अभिप्रेरणा के मुख्य सिद्धान्त निम्न हैं-
1. अभिप्रेरणा का मूल प्रवृत्ति का सिद्धांत (Instinct theory of Motivation)-   

मानव व्यव्हार को मूल प्रवृतियों द्वारा अभिप्रेरित होने का प्रत्यय  सर्वप्रथम विलियम जेम्स ने दिया था।  मूल प्रवृतियों पर आधारित अभिप्रेरणा सिद्धांत का प्रतिपादन मैक्डूगल ने 1980 में किया था। इन्होने माना कि मानव का प्रत्येक व्यवहार उसकी मूल प्रवृतियों द्वारा संचालित होता है ।                                                              

2. उपलब्धि अभिप्रेरणा का सिद्धांत (Theory of Achievement Motivation)-
                    
 प्रतिपादक -          D.C. Maclelland & J.W. Atkinson                                                                      
उपलब्धि की  आवश्यकता को मुख्य अभिप्रेरक (Drive) माना  है जिसको व्यक्ति की किसी कार्य में सफलता की प्रत्याशाओं (Expectations) के द्वारा पहचाना जा सकता है ।                                                                            

3. सत्ता अभिप्रेरणा का सिद्धांत (Theory of power Motivation)-   
                               
प्रतिपादक -  Alfred Adler                                                                                                
पुस्तक -   The practice and Theory of Individual psychology                                        
व्यक्ति को अभिप्रेरित करने में क्रोध (Agression) की प्रवृति को अधिक महत्व  दिया जिसको आगे चलकर सत्ता की इच्छा (Will for Power) के रूप में प्रस्तुत किया  सत्ता की इच्छा (Will for Power) का व्यक्ति द्वारा किये जाने वाले अनेक कार्यों में बड़ा योगदान रहता है ।                                                                                                                                       
4. अहम अन्तरग्रसता का अभिप्रेरणा सिद्धान्त (Ego-Involvement theory of Motivation) -

प्रतिपादक - शैरीफ और कैन्टिल (1974)                                                                                          
पुस्तक -   The Psychology of Ego-Involvement                                                          
अहम् को व्यक्ति की की अभिवृतियों का समूह माना है।  
                                                                              
5. अभिप्रेरणा का मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त (Psycho-analytic theory of Motivation)

प्रतिपादक - सिगमन फ्रॉयड 
इस सिद्धान्त में सिगमण्ड फ्रायड ने व्यवहार को प्रभावित करने वाले दो कारक बताये- एक मूल प्रवृत्तियां तथा दूसरा अचेतन मन। फ्रायड के अनुसार मनुष्य में मूल रूप से दो ही मूल प्रवृत्तियां होती हैं- एक जीवन मूल प्रवृत्ति (Life instinct or Eros) और दूसरी मृत्यु मूल प्रवृत्ति (Death instinct or Thanaros) । मनुष्य के व्यवहार के संचालन में ये दोनों मूल प्रवृत्तियाँ महत्वूपर्ण मानी गयी हैं। जीवन-मूल प्रवृत्ति व्यक्ति को सकारात्मक कार्यों, जैसे- आत्म सुरक्षा, दूसरों से प्रेमपूर्वक व्यवहार करना तथा अपनी क्षमताओं का विकास करने आदि की ओर उन्मुख करती है। जब जीवन-प्रवृत्ति शिथिल हो जाती है तो मृत्यु- प्रवृत्ति सक्रिय होकर व्यक्ति को विध्वंसकारी कार्यों, जैसे दूसरों की बुराई, निन्दा, आलोचना करना, छल कपट से दूसरों को हानि पहुंचाना, हत्या अथवा आत्महत्या करने आदि के लिए अभिप्रेरित करती है। 

6. अभिप्रेरणा का प्रोत्साहन सिद्धांत (Incentive theory of Motivation)-

प्रतिपादक-  वोल्स और कॉफमैन  
इस सिद्धांत के अनुसार,” मनुष्य जिस वातावरण में रहता है उस वातावरण में निश्चित वस्तुएं उसे किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती हैं।

7. अभिप्रेरणा का आवश्यकता सिद्धांत (Need theory of Motivation)-

प्रतिपादक- हेनरी मरे तथा अब्राहम मैस्लो   (1930)
आवश्यकता के दो  प्रकार बताये - 
1. दैहिक आवश्यकता (Biological/Primary Need) - भोजन, पानी सहित 12 आवश्यकताएं बताई हैं 
2. मनोवैज्ञानिक आवश्यकता (Psychological/Secondary Need) - सम्बन्ध, प्रेम सहित 28 आवश्यकताएं बताई हैं 

8. अभिप्रेरणा का शारीरिक सिद्धांत (Physiological Theory of Motivation)-

प्रतिपादक-      मॉर्गन 
इस सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य में अभिप्रेरणा किसी बाह्य उद्दीपक द्वारा उत्पन्न नहीं होती है बल्कि उसके शरीर के अन्दर के तन्त्रों में होने वाले परिवर्तनों के कारण होती है। इन परिवर्तनों के कारण शरीर के अन्दर अनेक प्रकार की प्रतिक्रियाएं (Reactions) होती रहती हैं। यह सिद्धान्त केन्द्रीय अभिप्रेरक अवस्था  [Central Motive State (CMS)] के नाम से भी जाना जाता है । इस सिद्धान्त में प्रत्येक मानवीय व्यवहार की व्याख्या केंद्रीय अभिप्रेरक अवस्था (CMS) के आधार की जाती है। 

9. उद्दीपन -अनुक्रिया अभिप्रेरणा सिद्धांत (S-R Theory of Motivation)-

प्रतिपादक-      थॉर्नडाइक  (व्यवहारवादी) 
मनुष्य का व्यवहार शरीर के द्वारा उद्दीपन के फलस्वरूप होने वाली प्रतिक्रिया है 

10. अभिप्रेरणा का चालक सिद्धान्त  (Drive Theory of Motivation)

प्रतिपादक-      सी० एल० हल 
व्यक्ति का व्यवहार आवश्यकताओं की संतुष्टि पर निर्भर करता है 


अभिप्रेरणा का  आवश्यकता सिद्धान्त (Need Theory of Motivation)


इस सिद्धान्त के प्रतिपादन का श्रेय हेनरी मरे तथा अब्राहम मैसलो (Abraham Maslow)  को जाता है मरेे ने आवश्यकताओं को दो भागों में में विभक्त किया है-
प्रथम जैविक या प्राथमिक (Biological or Primary) आवश्यकताएं तथा दूसरी मनोजन्य अथवा गौण (Psychogenic or Secondary) आवश्यकताएं। मरे के अनुसार व्यक्ति की अभिप्रेरणाओं का मुख्य स्रोत उसकी अतृप्त इच्छाएं (Unquenchable desires) हैं। व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि हेतु उन कार्यों के करने केे लिये तैयार  होता है जो उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करे । मरे का मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति की कुछ आवश्यकताएं उसके लिए अधिक महत्वपूर्ण होती हैं जबकि कुछ महत्वहीन । मरे की दृष्टि में अधिकांश अभिप्रेरणाएं पर्यावरणीय कारकों का प्रतिफल होती हैं जबकि कुछ अभिप्रेरणाएं व्यक्ति की निजी आवश्यकताओं के कारण प्रभावित होती हैं। मरे ने चौबीस मुख्य आवश्यकताओं का चयन किया जो कथानक बोध परीक्षण (Thematic Apperception Test) द्वारा मापी जा सकती है। 


मैसलो का आवश्यकता का पदानुक्रम सिद्धान्त (Maslow's Need Hierarchy Theory)


इस सिद्धान्त के अनुसार जब व्यक्ति को किसी चीज की कमी का अहसास होता है तो उसकी आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए वह क्रियाशील हो जाता है अर्थात् आवश्यकता व्यक्ति को किसी कार्य करने के लिए अभिप्रेरित करती है। मैसलो के अनुसार व्यक्ति निम्न स्तर की माँगों की पूर्ति करते हुए उत्तरोत्तर (step by step) क्रम की माँगों की पूर्ति करने का प्रयास करता है। अतः व्यक्ति का अभिप्रेरणात्मक व्यवहार (Motivational Behaviour) उसकी तृप्त माँगों (Satisfaction needs) से संचालित न होकर अतृप्त माँगों (Extinction needs) से संचालित होता है। अभिप्रेरणात्मक व्यवहार की प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक कि व्यक्ति आत्मसिद्धि (self realization) के स्तर की आवश्यकता की पूर्ति नहीं कर लेता है ।

 

1. शारीरिक आवश्यकता (Physiological Needs) Maslow Theory के अनुसार मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकता (Primary Need) उसकी शारीरिक संतुष्टि होती है जिसके अभाव में वह जीवन व्यतित करने की कल्पना तक नही कर सकता। शारीरिक आवश्यकताओं में भोजन, पानी, वस्त्र, मन की एकाग्रता, यौन संबंधी आवश्यकताएं एवं शरीर के आराम हेतु निद्रा आदि। इस  सिद्धांत के अनुसार यह सभी आवश्यकताएं मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकताएं (Primary Needs) होती है जिसकी पूर्ति हेतु वह सबसे पहले प्रयास  करता हैं। इन सभी आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाने के पश्चात इन  आवश्यकताओं को स्थायी रूप प्रदान करने हेतु एवं संरक्षित करने हेतु उसे सुरक्षा की आवश्यकता महसूस होती है।


2. सुरक्षा की आवश्यकता (Safety Needs) – जब व्यक्ति को उसकी प्रथम चरण की आवश्यकता की पूर्ति हो जाती है तो तब उसको अपने अस्तित्व की चिंता होने लगती है वह अपने अस्तित्व की महत्ता को जानने लगता है जिस कारण वह अपने जीवन-मृत्यु के संबंध में सोचने लगता हैं। अपने जीवन को स्थिरता प्रदान करने के लिए उसे सुरक्षा की आवश्यकता महसूस होती हैं।

3. प्यार और संबंधों की आवश्यकता (Love and Belonging) – व्यक्तियों को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अन्य व्यक्तियों की आवश्यकता होती है वह इन समस्त आवश्यकताओं की प्राप्ति अकेले रहकर नही कर सकता। जिस कारण वह अपने परिवार का निर्माण करता है एवं समाज के साथ विभिन्न प्रकार के संबंधों की स्थापना करता है जैसे- पत्नी, भाई, बहन, प्यार, दोस्त आदि। सुरक्षा की आवश्यकता के चरणों की पूर्ति हो जाने के पश्चात ही वह इस चरण की आवश्यकता की पूर्ति हेतु क्रियाशील हो जाता हैं।

4. आत्मसम्मान की आवश्यकता (Need of Self-respect/Esteem Needs) – प्यार और संबंधों की आवश्यकता की पूर्ति हो जाने के पश्चात उसे समाज मे गौरवपूर्ण तरीके से जीवनयापन करने हेतु आत्मसम्मान की आवश्यकता महसूस होती है जिस कारण वह एक गौरवपूर्ण  पद प्राप्त करने और दूसरे से अपनी एक अलग पहचान बनाने अर्थात खुद को विशिष्ट दिखाने की आवश्यकता की पूर्ति करने का प्रयास करता हैं। जिस कारण समाज के सभी लोग उससे प्रेमपूर्वक व्यवहार करें एवं उसका आदर करें। मैस्लो के अनुसार- मनुष्य जीवनपर्यंत इन चार चरणों की प्राप्ति हेतु सदैव क्रियाशील रहता है एवं वह सदैव यह प्रयास करता है कि इन आवश्यकताओं की पूर्ति वह जल्द से जल्द कर सके और कम ही ऐसे लोग होते है जो इन चार चरणों की पूर्ति कर पाते है और इस सिद्धांत के अंतिम चरण आत्मबोध/आत्म सिद्धि (Self-actualization) में पहुँच पाते हैं।

5. आत्मबोध/आत्म सिद्धि की आवश्यकताएं  (Needs of Self-actualization) मैस्लो ऐसे मनोवैज्ञानिक थे जिन्होंने सर्वप्रथम आत्मबोध को मनुष्य के लिए महत्वपूर्ण माना। इस  सिद्धांत के अनुसार आत्मबोध मनुष्य की आवश्यकताओं का अंतिम चरण है। इनके अनुसार मनुष्य को आत्मबोध तब होता है जब वह अपने चारों चरणों की पूर्ति कर लेता हैं। इसमे व्यक्ति अपनी आंतरिक शक्तियों (Internal Powers) को जान लेता है एवं उसे आंतरिक संतुष्टि की प्राप्ति हो जाती है। आत्मबोध अर्थात आत्मा को जानना, सांसारिक कटुता एवं सत्यता को पहचान लेना ही आत्मबोध (Self-actualization) हैं।


इस सिद्धान्त की आलोचना करने वालों का मत है कि साधारणतया तो व्यक्ति निम्न स्तर की आवश्यकताओं की पूर्ति करके ही उच्च स्तर की आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए आगे बढ़ता है लेकिन अनेक बार व्यक्ति उच्च आदर्शों अथवा विशेष उद्देश्यों जैसे- आत्म सम्मान, सामाजिक प्रतिष्ठा, राष्ट्र-हित आदि की रक्षा के लिए भूखा प्यासा रहकर अपनी जिन्दगी को दाँव पर लगाने तक के लिए तत्पर हो जाता है । क्रान्तिकारियों द्वारा भूखा रहकर आमरण अनशन करके देश की स्वतन्त्रता के लिए प्राणों को न्योछावर करना, इसका ज्वलन्त उदाहरण है। इसके अतिरिक्त सभी प्रकार के अभिप्रेरणा-व्यवहारों की व्याख्या माँग की सन्तुष्टि के आधार पर नहीं की जा सकती है ।


अभिप्रेरणा का प्रोत्साहन सिद्धांत (Incentive theory of Motivation)

प्रोत्साहन के सिद्धांत का प्रतिपादन वोल्स और कॉफमैन ने किया। इस सिद्धांत के अनुसार,” मनुष्य जिस वातावरण में रहता है उस वातावरण में निश्चित वस्तुएं उसे किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती हैं।
इस सिद्धान्त के अनुसार अभिप्रेरणा की उत्पत्ति वातावरण में स्थित प्रोत्साहन तथा व्यक्ति की शारीरिक तथा सामाजिक आवश्यकताओं के बीच अन्तःक्रिया के द्वारा होती हैं। इस प्रक्रिया में व्यक्ति को अपने द्वारा किए जाने वाले व्यवहार के परिणाम की जानकारी पहले से ही होती है।
इनके अनुसार प्रोत्साहन दो प्रकार का होता है-

(A) धनात्मक प्रोत्साहन (Positive Incentive)- यह किसी लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। जैसे- भोजन पानी, मनपसंद वस्तु आदि।
(B) ऋणात्मक प्रोत्साहन (Negative Incentive)- यह किसी लक्ष्य की ओर बढ़ने से रोकता है। जैसे- दंड , घृणा करना, आदि

दैनिक जीवन में वातावरण में स्थित विभिन्न प्रकार की वस्तुएं तथा सामाजिक प्रतिष्ठा देने वाले पद प्राप्त करने के लिए व्यक्ति हमेशा लालायित तथा अभिप्रेरित होते हैं लेकिन इस सिद्धांत में मात्र  बाह्य कारकों को ही महत्व दिया गया है अतः यह सिद्धांत पूर्ण नही  है।






Thursday, May 6, 2021

अधिगम का अर्थ, परिभाषा और प्रकृति (Meaning, Definition and Nature of Learning)

 अधिगम/सीखना (Learning)

अर्थ (Meaning)-  मनोविज्ञान में सीखना शब्द का अर्थ दो रूपों में होता है -

1. प्रक्रिया (Process) के रूप में ।
2. परिणाम (Result) के रूप में।
प्रक्रिया(Process) के रूप में सीखने का अर्थ उस प्रक्रिया से होता है जिसके द्वारा मनुष्य नए - नए तथ्यों को ग्रहण करता है और नई-नई क्रियाओं को सीखता है।
परिणाम (Result) के रूप में सीखने का अर्थ मनुष्य के व्यवहार परिवर्तन से होता है जो नए- नए तथ्यों की जानकारी और नई-नई क्रियाओं में प्रशिक्षण के फलस्वरूप होता है।
मनुष्य कुछ कार्य स्वाभाविक रूप से करते हैं जैसे - सांस लेना, पलक झपकाना, देखना, सुनना, हाथ पैर हिलाना आदि । इसके अतिरिक्त कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिन्हें वह अपनी शारीरिक एवं मानसिक विकास के साथ-साथ स्वयं करने लगता है जैसे - भूख लगने पर भोजन की तलाश करना, प्राणों की रक्षा के लिए भागना आदि।  इन सब कार्यों को मनुष्य या प्राणी को सीखना नहीं पड़ता है।  इसलिए यह कार्य अनर्जित कार्य (Unlearned Action) कहे जाते हैं।
 कुछ कार्य ऐसे हैं जिन्हें मनुष्य अपने प्राकृतिक एवं सामाजिक पर्यावरण के आधार पर ग्रहण करता है। जैसे- पेड़ पर चढ़ना, पानी में तैरना, भाषा विशेष में बोलना आदि।  इन कार्यों को मनोवैज्ञानिक अर्जित कार्य (Learned Action) कहते हैं, और इन कार्यों को ग्रहण करने की प्रक्रिया को सीखना या अधिगम कहते हैं। 

अधिगम का अर्थ-  व्यवहार में वांछित एवं स्थाई परिवर्तन।

परिभाषायें (Definitions)

  • वुडवर्थ  के अनुसार-  नवीन ज्ञान और नवीन प्रतिक्रियाओं को ग्रहण करने की प्रक्रिया को सीखने की प्रक्रिया कहते हैं । (The process of of acquiring new knowledge and new responses is the process of learning.)
  • स्किनर के अनुसार-  सीखना वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य प्रगतिशील व्यवहार को स्वीकार करता है। (Learning is is a process of of progressive behaviour adaptation.)
  • क्रो एंड क्रो के अनुसार-  सीखना आदतों, ज्ञान और अभिवृतियों का अर्जन है (Learning is the acquisition of habits knowledge and attitudes.)
  • गेट और अन्य के अनुसार-  सीखना अनुभव और प्रशिक्षण के परिणाम स्वरूप व्यवहार में परिवर्तन है 
  • हिलगार्ड के अनुसार-  सीखना वह प्रक्रिया है जिसमें अभ्यास अथवा प्रशिक्षण द्वारा व्यवहार का उद्भव होता है या व्यवहार में परिवर्तन होता है । (Learning is the process by by which behaviour is originated or changed through practice for training.)
अधिगम वह प्रक्रिया है जिसमें अनुभव, अभ्यास, प्रशिक्षण तथा अध्ययन आदि से व्यक्ति का कोई व्यवहार उद्भव होता है या व्यवहार में परिवर्तन होता है यह परिवर्तन अपेक्षाकृत स्थाई होता है सीखने के अंतर्गत वे परिवर्तन सम्मिलित नहीं किए जाते हैं जो व्यक्ति ने परिपक्वता, थकान, नशीले पदार्थों का सेवन अथवा चोट आदि अनाधिगम  के कारणों से होता है



Tuesday, May 4, 2021

अभिप्रेरणा के स्रोत/तत्व (Source/Elements of Motivation)

 अभिप्रेरणा के स्रोत/तत्व (Source/Elements of Motivation)

अभिप्रेरणा के चार स्रोत या तत्व होते हैं-

1. आवश्यकता (Need)- प्रत्येक प्राणी के जीवन को बनाये रखने के लिए  कुछ मौलिक आवश्यकताएं (Basic Needs) होती हैं जिनकी पूर्ति होना आवश्यक है । मनुष्य की आवश्यकताओं को दो भागों में विभाजित किया जाता है -
  • शारीरिक/ जैविक/प्राथमिक आवश्यकतायें (Physical/ Biological /Primary Needs)- वे आवश्यकतायें जिनके अभाव में किसी भी प्राणी का  अस्तित्व असंभव है । जैसे- भोजन, पानी, हवा, मल -मूत्र  त्याग करना,  नींद ।
  • मनो-सामाजिक/द्वितीयक आवश्यकतायें (Psycho-social/Secondary Needs)-.  वे आवश्यकतायें जिनके अभाव में प्राणी जीवित रह सकता है परन्तु जीवन जीने के लिए इनकी आवश्यकता भी महत्वपूर्ण है। जैसे- प्रेम, संबंध (Relation), उपलब्धि (Achievement) , आत्मसम्मान (Self respect), सामाजिक स्तर (Social Level) आदि।

2. चालक/प्रणोद/ अन्तर्नोद (Drive)- वह कारक जो आंतरिक रुप से व्यक्ति को कार्य/ व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है, चालक  (Drive) कहलाता है। 

दूसरे शब्दों में - प्राणी के शरीर में जब किसी मौलिक आवश्यकता की पूर्ति में कमी आ जाती है तो उसके अंदर तनाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती  है।  यह तनाव की स्थिति जिस रूप में अनुभव की जाती है, उसे चालक  (Drive) कहते हैं ।
जैसे - भूख , प्यास , निंद्रा  आदि ।
डैशिल के अनुसार - चालक शक्ति का वह मौलिक स्रोत है जो व्यक्ति को क्रियाशील कर देता है । (Drive is an original source of energy that activates the human organism.)
माथुर के अनुसार - चालक आवश्यकता से उत्पन्न होती है और प्राणी को कार्य करने के लिए अग्रसर करती है। 

3. उद्दीपन /प्रोत्साहन (Incentive) - प्रोत्साहन बाह्य वातावरण  से प्राप्त होने वाली वह वास्तु है जो प्राणी की आवश्यकता की पूर्ति करके चालक को शांत करती है ।
जैसे - शरीर में पानी की कमी होने से प्यास (चालक) प्राणी को क्रियाशील कर देती है तथा पानी मिलने पर प्यास शांत हो जाती है । इस प्रक्रिया में पानी प्रोत्साहन का कार्य करता है । इसी तरह भूख के लिए भोजन , साँस लेने के ऑक्सीजन प्रोत्साहन है ।
हिलगार्ड के अनुसार - उचित प्रोत्साहन वह है जिसके प्राप्त होने से चालक (Drive) की तीव्रता घटती है और व्यक्ति का मानसिक तनाव दूर होता है । ( An appropriate incentive is one that can reduce the intensity of a drive.)

प्रोत्साहन दो तरह के होते हैं - 
1. धनात्मक प्रोत्साहन (Positive Incentive)-  प्रशंसा, पुरस्कार, धन , स्वीकृति आदि ।
2.  नकारात्मक प्रोत्साहन (Negative  Incentive)-  पीड़ा , दंड , निंदा आदि। 

4. अभिप्रेरक/प्रेरक  (Motive)-  अभिप्रेरक अति व्यापक (Comprehensive) शब्द है इसके अंतर्गत प्रोत्साहन के अतिरिक्त चालक , तनाव , आवश्यकता सभी आ जाते हैं। 

गेट्स एवं अन्य के अनुसार - अभिप्रेरकों के विभिन्न स्वरुप हैं और इनको विभिन्न नामों से जाना जाता है जैसे - आवश्यकताएं (Needs),  इच्छाएं (Desires), तनाव (Tension), अभिवृत्तियाँ  (Attitudes), रूचि (Interest) , स्थायी प्रोत्साहन (Persisting Incentive) आदि ।
कुछ लोग अभिप्रेरणा (Motivation) तथा अभिप्रेरक (Motive) दोनों का  एक ही अर्थ मानते हैं परन्तु इसमें कुछ अंतर है । अभिप्रेरणा व्यक्ति को किसी व्यवहार करने की मानसिक स्थिति (Mental Set) है जबकि अभिप्रेरक (Motive) इस मानसिक स्थिति के कारक (Factor)  हैं ।  
ब्लेयर, जोन्स व सिम्पसन के अनुसार (According to Blair, Jones & Simpson) - अभिप्रेरक हमारी आधारभूत आवश्यकताओं से उत्पन्न होने वाली वे शक्तियां हैं जो व्यवहार  को दिशा और उद्देश्य प्रदान करती है ।
(Arising form our needs, motives are the energies which give direction and purpose to behaviour.)


आवश्यकता, अन्तर्नोद और प्रोत्साहन में सम्बन्ध (Relation in Need, Drive and Incentive)


हिलगार्ड के अनुसार  -  आवश्यकता (Need) चालक (Drive) को जन्म देती है। चालक  बढ़े हुए तनाव (Tension) की स्थिति है जो क्रिया और प्रारम्भिक व्यवहार की ओर ले जाती है। प्रोत्साहन (Incentive) वाह्य पर्यावरण (External Environment) की कोई वस्तु होती है जो आवश्यकता की सन्तुष्टि करती है और इस प्रकार सन्तुष्टि  क्रिया द्वारा चालक (Drive)  को कम करती है । 


अभिप्रेरणा चक्र (Motivation Cycle)


अभिप्रेरकों का वर्गीकरण (Classification of Motives)

 अभिप्रेरकों (Motives)  का वर्गीकरण अनेक विद्वानों द्वारा किया गया  है -.

गैरेट (Garrett) ने के अनुसार -  अभिप्रेरक  के  तीन प्रकार हैं 

  1.  जैविक अभिप्रेरक (Biological Motives) - भूख, प्यास, काम, काम, निंद्रा, विश्राम आदि।
  2.  मनोवैज्ञानिक अभिप्रेरक (Psychological Motives)- ये प्रबल मनोवैज्ञानिक दशाओं के कारण उत्पन्न होते हैं । गैरेट ने इनके अंतर्गत संवेगों (Emotions) को स्थान दिया है। जैसे - क्रोध, भय, प्रेम, दुःख, आनंद आदि।
  3. सामाजिक अभिप्रेरक (Social Motives)-  ये प्रेरक सामाजिक आदर्शों, स्थितियों, संबंधों आदि के कारण उत्पन्न होते हैं और व्यक्ति के व्यवहार पर बहुत प्रभाव डालते हैं । जैसे - आत्म-सम्मान, आत्म- सुरक्षा, आत्म-प्रदर्शन, जिज्ञासा, रचनात्मकता आदि

थॉमसन (Thomson) के अनुसार- 

थॉमसन  ने दो प्रकार के  अभिप्रेरक बताये हैं- 

1.  स्वाभाविक अभिप्रेरणा (Natural Motives) - ये प्रेरक व्यक्ति के स्वभाव से ही पाए जाते है । जैसे-   खेल, अनुकरण,  सुझाव, प्रतिष्ठा, सुख- प्राप्ति आदि।

2. कृत्रिम अभिप्रेरक (Artificial Motives) – इस प्रकार के अभिप्रेरक वातावरण जनित होते हैं और व्यक्ति केे कार्य या व्यवहार को नियंत्रित और प्रोत्साहित करते हैं । जैसे- दंड, प्रशंसा, पुरस्कार, सहयोग, व्यक्तिगत और सामुहिक कार्य की प्रेरणा  आदि।

3. मैसलो (Maslow) के अनुसार–  शिक्षा के क्षेत्र में मैसलो द्वारा किया गया वर्गीकरण अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। उसने अभिप्रेरकों का वर्गीकरण करते समय आवश्यकताओं की तीव्रता को आधार माना है। उसके अनुसार कुछ मूलभूत आवश्यकताएँ ऐसी हैं जिनकी पूर्ति के लिए व्यक्ति को शीघ्र प्रयास करना पड़ता है, जैसे भूख, प्यास आदि।

दूसरे स्तर की वे आवश्यकताएँ हैं जिनके लिए व्यक्ति तब प्रयास करता है जब मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है। सामाजिक तथा वातावरण जनित आवश्यकताएँ कम तीव्रता वाली आवश्यकताओं की श्रेणी में आती हैं। मैसलो ने दो प्रकार के अभिप्रेरक (Motive) बताये  हैं-

1जन्मजात अभिप्रेरक (Innate motives)- इन अभिप्रेरकों को शारीरिक (Physiological) या जैविक (Biological) अभिप्रेरक भी कहते हैं । जैसे -भूख, प्यास, काम, निंद्रा आदि।
2. अर्जित अभिप्रेरक (Acquired Motives)- 

(A) व्यक्ति अभिप्रेरक (Person Motives)-  आदत (Habit), रूचि (Interest), अभिवृत्ति (Attitude), जीवन मूल्य (Life Value), जीवन लक्ष्य (Life goal), अचेतन इच्छायें (Unconscious Desires) आदि।

(B) सामाजिक अभिप्रेरक (Social Motives)-  सामाजिकता (Sociality) , आत्म-स्थापना (Self-assertion), संग्रहता (Acquisition), सामाजिक मूल्य (Social Value) आदि।












शिक्षा मनोविज्ञान (Educational Psychology)

शिक्षा मनोविज्ञान (Educational Psychology)

शिक्षा मनोविज्ञान दो शब्दों से मिलकर बना है शिक्षा और मनोविज्ञान। पहले शिक्षा के बारे में जानना आवश्यक है। 

शिक्षा का अर्थ (Meaning of Education)-     शिक्षा शब्द अंग्रेजी शब्द के Education का हिंदी रूपांतरण है जो लेटिन भाषा की Educatum शब्द से निकला है। Educatum  लैटिन भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना हुआ है। E तथा Duco । यहाँ पर E का अर्थ  है  "अंदर से" तथा  Duco का अर्थ "आगे बढ़ाना" अर्थात "भीतर से बाहर निकलना"। 
शिक्षा का अर्थ है-  बालक की अंतर्निहित शक्तियों एवं गुणों को आगे बढ़ाना और विकसित करना। 
परंतु शिक्षा के वास्तविक स्वरूप के अवलोकन से ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि शिक्षा द्वारा बालक के अंतर्निहित शक्तियों एवं गुणों का विकास ही नहीं होता बल्कि बाहर से भी उसमें शक्तियों एवं  गुणों का विकास किया जाता है यह लैटिन भाषा की दूसरे शब्द Educare के अर्थ के विश्लेषण से प्रतीत होता है। Educare का अर्थ है - पोषित करना, विकसित करना एवं अंतर्निहित शक्तियों को आगे बढ़ाना।

गांधीजी के अनुसार - शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक और मनुष्य की शरीर मन और आत्मा के सर्वांगीण एवं सर्वोत्तम विकास से है। (By Education I mean an allround drawing out of the best, in the child and man- body, mind and spirit.)

बीएन झा के अनुसार-   शिक्षा एक प्रक्रिया है और एक सामाजिक कार्य हैं जिसे कोई समाज अपने हित के लिए करता है। (Education is the process, a social function carried on the by the society for its own sake.)

प्लेटो के अनुसार- "शारीरिक, मानसिक तथा बौद्धिक विकास की प्रक्रिया ही शिक्षा है।" (Education is a process of physical, mental and intellectual development." -Plato) 
रेमन्ट के अनुसार- “शिक्षा विकास की वह प्रक्रिया है जिसमें मनुष्य बचपन से प्रौढ़ता की ओर प्रगति करता है।" ("Education is a process of development in which man progresses from childhood to manhood." - Raymont)

ट्रो के अनुसार- “शिक्षा नियंत्रित वातावरण में मानव विकास क्रिया है।" ("Education is a human development in a controlled environment."- G.W. Trow)
हरबर्ट के अनुसार- शिक्षा का अर्थ अन्तःशक्तियों का बाह्य जीवन से समन्वय स्थापित करना है। (Education means establishment of co-ordination between the inherent powers and the outer life. - Herbert Spencer
पेस्टलोजी के अनुसार-  मनुष्य की शक्तियों का स्वाभाविक, समरस और प्रगतिशील विकास है।(Education is natural, harmonious and progressive development of mans innate powers.)

स्वामी विवेकानंद के अनुसार, “मनुष्य में अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है।”

शिक्षा मनोविज्ञान (Educational Psychology)

शिक्षा के क्षेत्र में मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण का आरंभ पेस्टलोजीहरबर्ट और फ्रोबेल के प्रयत्नों से हुआ। शिक्षा शास्त्रियों ने शिक्षा को मनोवैज्ञानिक बनाने का प्रयास किया किंतु शिक्षा में मनोवैज्ञानिक आंदोलन का सूत्रपात करने वाला प्रकृतिवादी शिक्षा शास्त्री रूसो था। उसने शिक्षा शास्त्रियों का ध्यान शिक्षा तथा पाठ्य विषय से हटाकर बालक की ओर केंद्रित किया और इस बात पर बल दिया कि शिक्षा बालक की प्रवृतियो (Trends) रूचियों (Interests) योग्यताओं (Abilities) तथा उनके विकास की विभिन्न अवस्थाओं के अनुसार दी जाए।

शिक्षा मनोविज्ञान के जनक एडवर्ड ली थार्नडाइक माने जाते हैं।

अर्थ (Meaning)- शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य मानव व्यवहार में परिवर्तन लाना है और मनोविज्ञान एक ऐसा विज्ञान है जिसका संबंध व्यवहारिक परिवर्तनों से है यह सामान्य मनोविज्ञान का व्यवहारिक रूप है दोनों का संबंध व्यवहार से है शिक्षा, मनोविज्ञान का आधार है। 

सामान्यतः शिक्षा की समस्याओं को समझने एवं उनका समाधान करने में मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों एवं  नियमों के प्रयोग के ज्ञान या विद्या को शिक्षा मनोविज्ञान (Educational Psychology)  कहते हैं।


परिभाषायें (Definitions)

कोल्सनिक के अनुसार-  शिक्षा मनोविज्ञान,  शिक्षा के क्षेत्र में खोजो एवं सिद्धांतों का प्रयोग हैं ।(Educational Psychology is the the application of the findings and the theories of psychology in the field of education.)

 बीएफ स्किनर के अनुसार - 1. शिक्षा मनोविज्ञान मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसका संबंध अध्ययन तथा सीखने से है।

2. शिक्षा मनोविज्ञान अध्यापकों की तैयारी की आधारशिला है।

3. शिक्षा से जुड़े सभी व्यवहार तथा व्यक्तित्व शिक्षा मनोविज्ञान के अंतर्गत आते हैं । 

4. शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र में उन सभी ज्ञान और विधियों को शामिल किया जाता है जो सीखने की प्रक्रिया को अधिक अच्छी प्रकार से समझने और अधिक कुशलता से निर्देशित करने के लिए है।

5.  मानव व्यवहार का शैक्षिक परिस्थितियों में अध्ययन करना ही शिक्षा मनोविज्ञान है।

" शिक्षा मनोविज्ञान शैक्षिक  परिस्थितियों में मनोविज्ञान की उन खोजों का प्रयोग करता है जो मुख्य रूप से मनुष्य के अनुभवों और व्यवहार से संबंधित है।"

क्रो एंड क्रो के अनुसार- शिक्षा मनोविज्ञान व्यक्ति के जन्म से लेकर वृद्धावस्था तक अधिगम के अनुभवों का वर्णन तथा व्याख्या करना है ।(Educational psychology describes and explains the learning experiences of an individual from birth to old age.)

थॉर्नडाइक के अनुसार- शिक्षा मनोविज्ञान के अंतर्गत शिक्षा से संबंधित संपूर्ण व्यवहार और व्यक्तित्व आता है।

"शिक्षा मनोविज्ञान वह विज्ञान है जिसमें मनोविज्ञान में की गई खोजों, बनाए गए सिद्धांतों एवं नियमों का शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग करके शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया को अधिक प्रभावशाली बनाने का प्रयास किया जाता है । इसमें छात्र की अभिवृद्धि व विकास एवं मानसिक, शारीरिक, संवेगात्मक तथा सृजनात्मक क्षमताओं आदि का अध्ययन तथा मापन किया जाता है।"

शिक्षा मनोविज्ञान की आवश्यकता एवं महत्व (Need and Importance of Educational Psychology)


  1. बालक की स्वभाव का ज्ञान प्रदान करने हेतु।
  2.  बालक को अपने वातावरण से सामंजस्य स्थापित करने हेतु।
  3.  शिक्षा के स्वरूप उद्देश्यों और प्रयोजनों से परिचित कराना।
  4.  सीखने और सिखाने के सिद्धांतों और विधियों से अवगत कराना। 
  5. शिक्षक प्रबंधकों एवं प्रशासकों का मुख्य कार्य शिक्षा प्रबंध करना तथा उसकी व्यवस्था करने और उसे सुचारू रूप से चलाने के लिए इसकी आवश्यकता है।
  6.  अभिभावकों को बच्चों की बुद्धि, अभिक्षमता एवं रुचियों को स्पष्ट करने के लिए इसकी आवश्यकता है।
  7.  प्रधानाचार्यों को अपनी क्रियाओ में सुधार करने के लिए शिक्षा मनोविज्ञान की आवश्यकता है।    
शिक्षकों के लिए आवश्यकता एवं महत्व-
  1. शिक्षा के संप्रत्यय को समझने में सहायक।
  2. शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति एवं लक्ष्य निर्धारित करने में सहायक।
  3. पाठ्यचर्या के चयन एवं निर्माण में सहायक।
  4.  शिक्षण विधियों के चयन एवं निर्माण में सहायक। 
  5. शैक्षिक मापन एवं मूल्यांकन में सहायक।
  6.  शिक्षकों को अपने आप को समझने में सहायक। 
  7. विद्यार्थियों को समझने में सहायक।
  8. शैक्षिक एवं व्यवसायिक निर्देशन में सहायक।


शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षा मनोविज्ञान का योगदान/ शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र (Contribution of Educational Psychology in field of Education/ Scope of Educational Psychology)




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