Tuesday, December 9, 2025

शैक्षिक मनोविज्ञान की विधियाँ (Methods of Educational Psychology)

 शैक्षिक मनोविज्ञान की विधियाँ (Methods of Educational Psychology)



शैक्षिक मनोविज्ञान में विद्यार्थियों के व्यवहार (Behaviour), सीखने की प्रक्रिया (Process of learning) और कक्षा की स्थितियों (Classroom conditions) को वैज्ञानिक ढंग से समझने के लिए कई विधियों का प्रयोग किया जाता है। इन विधियों की सहायता से शिक्षक बालक को समझकर उसके सर्वांगीण विकास के लिए उचित शिक्षण‑व्यवस्था कर सकता है।

प्रमुख विधियाँ (Main Methods): 

  • अंतःदर्शन विधि (Introspective Method)
  • बहिर्निरीक्षण विधि (Extrospection/Observational Method)
  • तुलनात्मक विधि (Comparative Method)
  • मनो-भौतिकी विधि (Psycho-physical Method)
  • मनोविश्लेषण विधि (Psychoanalytic Method)
  • चिकित्सीय  विधि (Clinical Method)
  • प्रायोगिक  विधि (Experimental Method)
  • केस‑स्टडी विधि (Case Study Method)
  • आनुवंशिक या विकासात्मक विधि (Genetic or Developmental Method)
  • परीक्षण या मनोवैज्ञानिक मापन विधि (Test or Psychological Measurement Method)
  • सांख्यिकीय एवं सर्वेक्षण  विधियाँ (Statistical and Survey Methods)



अंतःदर्शन विधि (Introspective Method)



अन्तःदर्शन विधि (Introspection Method) मनोविज्ञान की सबसे प्राचीन और आत्मनिष्ठ (subjective) विधि मानी जाती है, जिसमें व्यक्ति स्वयं अपने मन की क्रियाओं, भावनाओं और विचारों का निरीक्षण और विश्लेषण (Observation & Analysis) करता है। इसे आत्मनिरीक्षण या स्व‑अवलोकन की विधि भी कहा जाता है।

‘अन्तःदर्शन ((Introspection)’ का शाब्दिक अर्थ है – अपने भीतर झाँककर देखना या अपने मन का निरीक्षण करना।

इस विधि में व्यक्ति किसी स्थिति में उत्पन्न हो रही अपनी मानसिक प्रक्रियाओं (Mental Process) (विचार, भाव, कल्पना, निर्णय आदि) को उसी समय भीतर ही भीतर देखकर, समझकर उनका वर्णन करता है।


अपने मस्तिष्क के क्रियाकलापों का क्रमबद्ध ढंग से अध्ययन करना ही अन्तर्दर्शन है।-   स्टाउट
(To introspect is to attend to the working of one's own mind in a systematic way. -  Stout)

प्रक्रिया(Process)- व्यक्ति किसी विशेष अनुभव या क्रिया के समय अपने मन पर ध्यान केन्द्रित करता है और उस क्षण में उत्पन्न हो रहे विचारों, भावनाओं और मानसिक अवस्थाओं (Thoughts, feelings and mental states) का सजग अवलोकन करता है। बाद में वह इन आन्तरिक अनुभवों को शब्दों में व्यक्त करता है; यही वर्णित सामग्री अन्तःदर्शन ((Introspection) के रूप में अध्ययन का आधार बनती है।

इस विधि के दो रूप हैं एक विषयी द्वारा स्वयं अपने व्यवहार का अध्ययन करना और दूसरा अध्ययनकर्ता द्वारा विषयी जिस व्यक्ति के व्यवहार का अध्ययन करना होता है वे उसी व्यक्ति (Subject) से अपने व्यवहार का अध्ययन स्वयं करने को अपने व्यवहार का अध्ययन करने के लिए कहना। 



मुख्य विशेषताएँ (Main Features):


  • प्रेक्षक और अनुभवकर्ता (observer and the experiencer) दोनों वही व्यक्ति होता है, यानी जो अनुभव कर रहा है वही निरीक्षण भी कर रहा है।
  • यह विधि प्रत्यक्ष (direct), तात्कालिक (immediate) और निजी (personal) मानसिक अनुभवों तक पहुँचने का साधन देती है, जिन्हें बाह्य प्रेक्षण (external observation) से देख पाना सम्भव नहीं होता।



गुण (Merits):


  • व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं, कल्पनाओं, संकल्पों (thoughts, feelings, imaginations, resolutions) आदि अत्यन्त सूक्ष्म तथा आन्तरिक मानसिक प्रक्रियाओं को सीधे अनुभव और व्यक्त कर सकता है, जिन्हें बाह्य प्रेक्षण (external observation) से समझना कठिन होता है। इस कारण अन्तःदर्शन विधि (Introspection Method) से मन की आन्तरिक दुनिया की ऐसी जानकारी मिलती है जो अन्य विधियों से प्रायः उपलब्ध नहीं हो पाती।
  • यह विधि व्यक्ति में आत्मनिरीक्षण, आत्म‑चिन्तन और आत्म‑मूल्यांकन (introspection, self-reflection and self-evaluation) की आदत विकसित करती है, जिससे वह अपने गुण‑दोष पहचानकर स्वयं को सुधारने का प्रयास कर सकता है। शिक्षक और विद्यार्थी दोनों के लिए यह आत्म‑समझ, आत्म‑नियंत्रण और व्यक्तित्व विकास (self-understanding, self-control and personality development) का महत्वपूर्ण साधन बन सकती है।
  • अन्तःदर्शन विधि के लिए किसी विशेष यंत्र, प्रयोगशाला या तकनीकी साधन (special instruments, laboratories or technical equipment) की आवश्यकता नहीं होती; व्यक्ति स्वयं अपने अनुभवों का निरीक्षण और वर्णन करता है। इस वजह से यह विधि सरल, समय और धन दोनों की दृष्टि से किफायती तथा व्यावहारिक स्थितियों में आसानी से प्रयोज्य मानी जाती है।
  • इस विधि में निष्कर्ष तत्काल घटित हो रहे प्रत्यक्ष अनुभवों पर आधारित होते हैं, इसलिए व्यक्ति की वर्तमान मानसिक स्थिति का जीवंत चित्र प्राप्त किया जा सकता है। किसी स्थिति में व्यक्ति वास्तव में क्या सोच रहा है या क्या महसूस कर रहा है, यह उसी के कथन से सीधे ज्ञात होता है, मध्यस्थ कम होते हैं।
  • अन्तःदर्शन (Introspection) में वर्तमान क्षण के ‘जैसे घटित हो रहे’ मानसिक अनुभवों का निरीक्षण किया जाता है, बाद की स्मृति पर अधिक निर्भर नहीं रहा जाता।​ विचार, भावना, कल्पना, संकल्प (thought, emotion, imagination and resolution) आदि सूक्ष्म प्रक्रियाएँ प्रत्यक्ष बाह्य प्रेक्षण (direct external observation) से नहीं, बल्कि सीधे व्यक्ति के अंतर्मन (inner) के अवलोकन से जानी जाती हैं।​



दोष (Limitations):


  • इस विधि में व्यक्ति स्वयं ही प्रेक्षक भी है और अध्ययन का विषय भी, इसलिए उसके व्यक्तिगत पूर्वाग्रह, इच्छा‑अनिच्छा और स्व‑रक्षा की प्रवृत्ति (personal biases, desires and self-preservation) परिणामों को प्रभावित कर सकती है। एक ही मानसिक अनुभव के बारे में दो व्यक्तियों के विवरण अलग‑अलग हो सकते हैं, जिससे निष्कर्षों की स्थिरता और सामान्यीकरण कठिन हो जाता है।
  • अनुभव केवल व्यक्ति के कथन पर आधारित होते हैं; इन्हें बाहरी रूप से जाँचना या दोहराकर सत्यापित करना लगभग असंभव होता है, इसलिए विधि की विश्वसनीयता कम मानी जाती है। मापन न तो मानकीकृत होता है और न ही सांख्यिकीय रूप से नियंत्रित, इस कारण यह आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान की कसौटी पर पूर्णतः खरा नहीं उतरता।
  • छोटे बच्चों, मानसिक रूप से अविकसित, असामान्य अथवा अशिक्षित व्यक्तियों (young children, mentally retarded, abnormal, or uneducated individuals) से सही अन्तःदर्शन कराना लगभग असंभव होता है, क्योंकि वे अपने आन्तरिक अनुभवों को भाषा में ठीक से व्यक्त नहीं कर पाते। जिन व्यक्तियों में आत्म‑चिन्तन की क्षमता या ईमानदारी कम है, उनके द्वारा दी गई आत्म‑रिपोर्ट व्यवहार की वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शाती।
  • जिस समय व्यक्ति किसी मानसिक क्रिया में लीन होता है, उसी क्षण उस पर सजग ध्यान केन्द्रित करके उसका वर्णन करने से मूल प्रक्रिया टूट जाती है या उसका स्वरूप बदल जाता है। परिणामतः जो अनुभव बाद में बताया जाता है, वह अक्सर अपूर्ण या परिवर्तित रूप होता है, न कि वास्तविक और प्राकृतिक मानसिक प्रवाह।
  • अन्तःदर्शन केवल चेतन अनुभवों पर लागू होता है; अचेतन या अर्ध‑चेतन मानसिक प्रक्रियाएँ (दबी इच्छाएँ, गहरे संवेग आदि) इस विधि से उपलब्ध नहीं हो पातीं। आधुनिक मनोविज्ञान में जहाँ अचेतन की भूमिका महत्त्वपूर्ण मानी जाती है, वहाँ यह विधि अपनी सीमा में बँधी प्रतीत होती है।



Tuesday, December 2, 2025

अधिगम का ज्ञानात्मक क्षेत्रीय सिद्धान्त (Cognitive Field Theory of Learning)

 अधिगम का ज्ञानात्मक क्षेत्रीय सिद्धान्त (Cognitive Field Theory of Learning)


अधिगम का ज्ञानात्मक क्षेत्रीय सिद्धान्त मुख्यतः मनोवैज्ञानिक कर्ट लेविन (Kurt Lewin) द्वारा प्रतिपादित किया गया था। इस सिद्धान्त को अधिगम का क्षेत्रीय सिद्धान्त (Field Theory of Learning) या अधिगम का तलरूप सिद्धान्त (Topological Theory of Learning) के नाम से जाना जाता है। इस सिद्धान्त के प्रतिपादक कर्ट लेविन (Kurt Lewin) हैं, जिन्होंने वर्दीमर, कोहलर, कोफ्का आदि समग्राकृति सिद्धान्तवादियों के साथ बर्लिन में कार्य किया। यह सिद्धांत गेस्टाल्ट मनोविज्ञान से प्रेरित है और 1940 के दशक में विकसित हुआ, जो व्यक्ति के संपूर्ण जीवन क्षेत्र को ध्यान में रखता है । लेविन के अनुसार, किसी भी व्यक्ति का व्यवहार उसके व्यक्तिगत गुणों (Person) और उसके वातावरण (Environment) के आपसी प्रभाव का परिणाम होता है, जिसे सूत्र के रूप में इस प्रकार लिखा जाता है: 

B = f (P, E)

B = f (P, E) अर्थात व्यवहार व्यक्ति और वातावरण का फलन है ।

कर्ट लेविन (Kurt Lewin) ने  मनोविज्ञान को एक ऐसे विज्ञान के रूप में माना जिसका सम्बन्ध नित्य के जीवन से है। उसकी रुचि शिक्षण अधिगम से सम्बन्धित समस्याओं का अध्ययन करने में अधिक थी। उसके मनोविज्ञान का मुख्य केन्द्र व्यक्ति, वातावरण, परिस्थितियों (Person, Environment, Situations) की अभिप्रेरित दशायें थी। इसके अतिरिक्त वह समस्याओं के समाधान में रुचि रखता था।


इस सिद्धान्त के 4 प्रमुख तत्त्व हैं-

  • जीवन-स्थल (Life-Space):-  
यह किसी व्यक्ति का वह संपूर्ण मनोवैज्ञानिक परिवेश होता है, जिसमें उसकी इच्छाएँ, लक्ष्य, अनुभव, संज्ञानात्मक संरचना और बाधाएँ शामिल होती हैं—अर्थात् वह वातावरण और आंतरिक मनोदशा जिसमें व्यक्ति किसी समय विशेष पर कार्य करता तथा निर्णय लेता है ।  वास्तव में जीवन स्थल का अर्थ है "व्यक्तित्त्व और वातावरण में पारस्परिक सम्बन्ध"। 

  1. यह व्यक्ति के चेतन अनुभव से जुड़ा होता है—यानि जिन घटनाओं, अनुभवों या उद्देश्यों के प्रति व्यक्ति सचेत रूप से प्रतिक्रियाशील होता है, वे उसके जीवन क्षेत्र का हिस्सा होते हैं ।​​
  2. इसमें व्यक्ति (Person) तथा मनोवैज्ञानिक वातावरण (Environment) शामिल होता है, जिनके बीच की क्रिया-प्रतिक्रिया व्यवहार को निर्धारित करती है।
  3. जीवन क्षेत्र सीमित नहीं होता—यह समय, परिस्थिति और अनुभव अनुसार बदलता रहता है, जैसे-जैसे व्यक्ति नया ज्ञान अर्जित करता है या नई चुनौतियों का सामना करता है ।​​ जो चीज़ें व्यक्ति के सीधे अनुभव में नहीं आईं, वे उसके जीवन क्षेत्र से बाहर मानी जाती हैं।
जीवन क्षेत्र की यह अवधारणा दर्शाती है कि व्यवहार केवल बाहरी घटनाओं से प्रभावित नहीं होता, बल्कि व्यक्ति की आंतरिक संज्ञानात्मक स्थिति और उसके द्वारा अनुभूत वातावरण का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है ।​​


  • मनोवैज्ञानिक क्षेत्र (Psychological Field) : 
कर्ट लेविन के क्षेत्र सिद्धांत का व्यापक ढाँचा है, जिसके भीतर जीवन क्षेत्र (Life Space), व्यक्ति और उसका वातावरण, सभी शक्ति-प्रभाव और संबंध शामिल होते हैं। सरल शब्दों में, यह वह पूरा “मानसिक-सामाजिक परिदृश्य” है जिसमें किसी समय विशेष पर व्यक्ति सोचता, महसूस करता और व्यवहार करता है। मनोवैज्ञानिक क्षेत्र उस संपूर्ण मनोवैज्ञानिक जगत को कहते हैं जिसमें व्यक्ति और उससे संबंधित सभी आंतरिक (इच्छाएँ, भावनाएँ, धारणाएँ, लक्ष्य) तथा बाह्य (परिवार, साथियों, सामाजिक परिस्थितियाँ, कार्य–परिस्थिति आदि) कारक एक साथ मौजूद होते हैं और आपस में क्रिया–प्रतिक्रिया करते हैं।

  1. मनोवैज्ञानिक क्षेत्र हमेशा “समग्र” (holistic) माना जाता है; किसी एक तत्व को अलग करके पूरी तरह नहीं समझा जा सकता, क्योंकि हर भाग अन्य भागों से जुड़ा होता है।
  2. यह समयानुसार बदलता रहता है; नई जानकारी, अनुभव, सफलता–असफलता, सामाजिक परिवर्तन आदि के साथ क्षेत्र की संरचना और उसमें मौजूद वेक्टर (शक्तियाँ) और कर्षण (आकर्षण/विकर्षण) भी बदलते हैं।
  3. इसमें जीवन क्षेत्र के भीतर की चीजें (जिनसे व्यक्ति मनोवैज्ञानिक रूप से जुड़ा है) और जीवन क्षेत्र के बाहर की चीजें (जो अभी उसके अनुभव का हिस्सा नहीं हैं और उसके व्यवहार पर प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं डालतीं) – दोनों के बीच स्पष्ट सीमा (boundary) मानी जाती है।
  4. जब किसी नई समस्या, संघर्ष या लक्ष्य के कारण मनोवैज्ञानिक क्षेत्र की संरचना बदलती है (जैसे नई राहें खुलना, पुरानी बाधाओं का हटना, नए लक्ष्यों का बनना), तब उसे अधिगम और अनुकूलन (adjustment) का संकेत माना जाता है।

  • वेक्टर (Vectors): - 
कर्ट लेविन के क्षेत्र सिद्धांत में “वेक्टर” (Vectors) को मनोवैज्ञानिक बल या प्रेरक शक्ति माना जाता है, जो व्यक्ति के व्यवहार की दिशा और तीव्रता को निर्धारित करती है। ये वे शक्तियाँ हैं जो व्यक्ति को किसी लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने या उससे दूर हटने के लिए प्रेरित करती हैं ।​  वेक्टर वह मनोवैज्ञानिक बल है जो जीवन क्षेत्र में व्यक्ति की “गति” (movement) को किसी दिशा में मोड़ता है, अर्थात किस दिशा में, कितनी शक्ति और किस प्रकार से व्यक्ति कार्य करेगा, यह वेक्टर से निर्धारित होता है ।​  यदि केवल एक वेक्टर कार्य कर रहा हो, तो व्यक्ति उसी दिशा में अग्रसर होता है; यदि दो या अधिक विपरीत वेक्टर हों, तो संघर्ष (conflict) या संतुलन (equilibrium) की स्थिति बन सकती है ।​
  1. दिशा (Direction) व्यक्ति को किस ओर ले जा रहा है – लक्ष्य की ओर या उससे दूर।
  2. बल कितना प्रबल या कमजोर है, इससे व्यवहार की तीव्रता पता चलती है।
  3. यह बल व्यक्ति के भीतर से (जैसे इच्छा, अभिप्रेरणा) या बाह्य परिस्थितियों से (जैसे सामाजिक दबाव, पुरस्कार, दंड) उत्पन्न हो सकता है ।​
  4. सकारात्मक कर्षण होने पर वेक्टर व्यक्ति को लक्ष्य की ओर खींचता है (Approach tendency) और नकारात्मक कर्षण होने पर वेक्टर व्यक्ति को उस वस्तु या लक्ष्य से दूर ले जाता है (Avoidance tendency) ।​

  • कर्षण (Valence):

कर्ट लेविन के क्षेत्र सिद्धांत में “कर्षण” (Valence) किसी वस्तु, लक्ष्य, व्यक्ति या स्थिति की वह मनोवैज्ञानिक आकर्षण‑या‑विकर्षण शक्ति है, जो उस ओर जाने या उससे दूर रहने की प्रवृत्ति पैदा करती है। यह बताता है कि जीवन क्षेत्र में कौन‑सी चीज़ व्यक्ति के लिए “पसंदीदा/लुभावनी” है और कौन‑सी “अप्रिय/टालने योग्य” महसूस होती है ।​
कर्षण वह गुण है जिसके कारण कोई वस्तु या स्थिति व्यक्ति के लिए सकारात्मक (positive valence) या नकारात्मक (negative valence) बन जाती है। सकारात्मक कर्षण होने पर व्यक्ति की ओर जाने वाली प्रवृत्ति (approach) और नकारात्मक कर्षण होने पर दूर जाने वाली प्रवृत्ति (avoidance) उत्पन्न होती है ।​

  1. जो चीज़ें आवश्यकता की पूर्ति, आनंद, सफलता या सुरक्षा का अनुभव कराएँ, उनका कर्षण सकारात्मक होता है, जैसे पुरस्कार, प्रशंसा, वांछित लक्ष्य आदि। 
  2. जो चीज़ें भय, दर्द, विफलता, दंड या असुरक्षा से जुड़ी हों, उनका कर्षण नकारात्मक माना जाता है, जैसे कड़ी फटकार, अप्रिय कार्य, शर्मिंदा करने वाली स्थिति आदि ।​
  3. यदि किसी छात्र के लिए “अच्छे अंक और शिक्षक की प्रशंसा” का कर्षण सकारात्मक है, तो पढ़ाई की दिशा में मजबूत वेक्टर बनेगा (अधिक अध्ययन, नियमित उपस्थिति)।
  4. यदि “कक्षा में प्रश्न पूछना” शर्म, उपहास या घबराहट से जुड़ा हो और उसका कर्षण नकारात्मक लगे, तो छात्र प्रश्न पूछने से बचेगा, भले ही उसे शंका हो ।​

  • बाधाएँ, लक्ष्य और खतरे (Barriers, Goals, Threats):
लेविन के क्षेत्र सिद्धांत में “बाधाएँ, लक्ष्य और खतरे” जीवन क्षेत्र के ऐसे मुख्य घटक हैं जो वेक्टरों और कर्षण के माध्यम से व्यक्ति के व्यवहार और अधिगम की दिशा तय करते हैं। संक्षेप में, लक्ष्य आकर्षण पैदा करते हैं, बाधाएँ उस लक्ष्य तक पहुँचने की राह रोकती हैं, और खतरे भय या तनाव उत्पन्न करके व्यवहार को प्रभावित करते हैं ।​

लक्ष्य (Goals): लक्ष्य वह वांछित अवस्था, वस्तु या उपलब्धि है, जिसकी ओर व्यक्ति के जीवन क्षेत्र में सकारात्मक कर्षण (positive valence) और अग्रसर वेक्टर (approach vectors) काम करते हैं, जैसे परीक्षा में उत्तीर्ण होना, नौकरी पाना, किसी कौशल में दक्ष होना ।​

बाधाएँ (Barriers): बाधा वह गतिशील अवरोध है जो व्यक्ति और उसके लक्ष्य के बीच स्थित होता है और लक्ष्य की ओर गति (locomotion) को रोकता या धीमा करता है; यह शारीरिक भी हो सकती है (संसाधनों की कमी, दूरी) और मनोवैज्ञानिक भी (भय, हीनभावना, नकारात्मक अपेक्षाएँ) ।​

खतरे (Threats):  खतरा वह स्थिति या संकेत है जो व्यक्ति के लिए संभावित हानि, विफलता, अपमान, दंड या हानि की आशंका पैदा करता है, और इस कारण जीवन क्षेत्र में नकारात्मक कर्षण तथा परिहार वेक्टर (avoidance vectors) उत्पन्न करता है ।​

जब खतरा बहुत प्रबल महसूस होता है, तो व्यक्ति अक्सर लक्ष्य से दूर भागता, बचावात्मक व्यवहार करता या वैकल्पिक, अपेक्षाकृत सुरक्षित लक्ष्यों की ओर मुड़ जाता है, जिससे अधिगम और सकारात्मक प्रयास बाधित हो सकते हैं ।​


लेविन के अनुसार अधिगम की स्थिति में प्रायः यह पैटर्न मिलता है: 
  1. व्यक्ति के पास कोई लक्ष्य होता है → लक्ष्य की ओर सकारात्मक कर्षण और अग्रसर वेक्टर बनते हैं।
  2. लक्ष्य तक पहुँचने के रास्ते में बाधा आती है → यही बाधा, यदि पार न हो सके, तो “खतरे” की अनुभूति (विफलता, दंड, हानि का डर) को जन्म दे सकती है ।
  3. यदि शिक्षक या वातावरण बाधाओं को कम करें (सहयोग, संसाधन, मार्गदर्शन देकर) और खतरे‑भावना को घटाएँ (समर्थनकारी वातावरण, त्रुटि को सीखने का अवसर मानना), तो अधिगम के लिए सकारात्मक कर्षण और प्रभावी वेक्टर मज़बूत हो जाते हैं ।


Monday, December 1, 2025

ब्रूनर का संज्ञानात्मक अधिगम सिद्धान्त (Bruner's Theory of Cognitive Learning)

 ब्रूनर का संज्ञानात्मक अधिगम सिद्धान्त 
(Bruner's Theory of Cognitive Learning)


जीरोम ब्रुनर (Jerome Bruner, 1960) के द्वारा प्रतिपादित अधिगम सिद्धान्त को आधुनिक संज्ञानात्मक सिद्धान्त (Modern Cognitive Theory) कहा जाता है।  ब्रुनर ने बालकों को संज्ञानात्मक व्यवहार का विस्तृत अवलोकन करके संज्ञानात्मक विकास को उसकी विशेषताओं के आधार पर तीन स्तरों- क्रियात्मक, प्रतिबिम्बात्मक तथा संकेतात्मक (functional, reflective and symbolic)  में विभक्त करके स्पष्ट करने का महत्वपूर्ण कार्य किया था। शिक्षा के क्षेत्र में इस सिद्धान्त को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जाता है। संज्ञानात्मक विकास को विस्तृत करते हुए तथा कक्षा में छात्रों के द्वारा सीखने से सम्बन्धित किये जाने वाले व्यवहारों को ध्यान में रखकर उसने सीखने के संज्ञानात्मक सिद्धान्त की अवधारणा प्रस्तुत की है। ब्रुनर के सीखने के सिद्धान्त को निम्न भागों में विभक्त करके प्रस्तुत किया जा सकता है-


मूल धारणाएँ (Main Concept):

  • अधिगम एक सक्रिय, उद्देश्यपूर्ण तथा समस्या–समाधान की प्रक्रिया है; बच्चा पर्यावरण से जानकारी लेकर उसे वर्गीकृत व संगठित करके संप्रत्यय (concepts) बनाता है।​

  • अर्थपूर्ण अधिगम तब होता है जब बालक स्वयं चीज़ों की खोज करता है (अन्वेषण/डिस्कवरी लर्निंग) और विषय की “संरचना” (basic concepts, principles) को समझ लेता है।​
  • नया ज्ञान हमेशा पूर्व ज्ञान से जोड़ा जाता है; इसलिए अधिगम प्रगतिशील पुनर्गठन (reorganization) की प्रक्रिया है।
ब्रूनर ने बताया कि बच्चा अनुभवों को मानसिक रूप से तीन तरीकों से प्रस्तुत करता है:

  • सक्रियता विधि (Enactive mode) : 

यह वह स्थिति है जिसमें बच्चा या कोई भी व्यक्ति करके (action) के माध्यम से सीखता है, यानी ज्ञान शारीरिक क्रिया या “मसल मेमोरी” के रूप में संग्रहीत रहता है। उदाहरण: बच्चा खिलौना पकड़ना सीखता है, या किसी चीज़ को छूकर, मोड़कर समझता है – उसके लिए अनुभव करना सीखने का सबसे बड़ा तरीका है।
  1. जन्म से 3 वर्ष तक। 
  2. बालक गामक क्रिया/शारीरिक क्रिया द्वारा सीखता है। जैसे- वस्तुु को पकड़ना, चलना आदि।
  3. इस अवस्था में शिशु अपनी अनुभूतियों को शब्दविहीन क्रियाओं द्वारा व्यक्त करता है। उदा0- भूख लगने पर रोना, हाथ-पैर हिलाना आदि। इन क्रियाओं द्वारा बालक बाह्य वातावरण से सम्बन्ध स्थापित करता है। 
  4. इस अवस्था में भाषा का महत्व न के बराबर होता है, यदि कोई मानसिक क्रिया का महत्व है तो वह भी नगण्य है।
  5. किसी वस्तु को समझने के लिये बालक उसे पकड़ता है, मोड़ता है, काटता है।
  6. इस अवस्था में शिशु प्रत्यक्ष अनुभव एवं कार्य स्वयं करके ही सीखता है। इस अवस्था के बालकों में बोध विकसित करने हेतु क्रिया को सबसे प्रमुख साधन माना गया है। अतः बालकों को विषय-वस्तु को क्रिया के माध्यम से सीखाना चाहिए।
  7. किसी वस्तु या क्रिया को उसके भौतिक रूप में बार-बार जोड़-तोड़ करके सीखने में मदद करता है।

  • दृश्य–प्रतिमा विधि (Iconic mode):
बच्चा चित्रों, आकृतियों, मानसिक प्रतिमाओं के रूप में अनुभवों का प्रतिनिधित्व करता; प्रत्यक्षीकरण द्वारा सीखना प्रमुख रहता है।​
  1. 4 से 8 वर्ष तक।
  2. इस अवस्था में बालक अपनी अनुभूति को अपने मन में कुछ दृश्य प्रतिमाएं प्रकट करता है और प्रत्यक्षीकरण के माध्यम से सीखता है।
  3. इसमें सूचनाएं प्रतिबिंबों की सहायता से बालक तक पहुंचती है और बालक किसी चमक एवं शोर से प्रभावित होता है। 
  4. यह वास्तविकता का चरण होता है।
  5. प्रत्यक्षीकरण, स्वयं करके सीखना एवं दृश्य स्मृति का विकास इस अवस्था की मुख्य विशेषता है।
  6. यह बोधात्मक क्षेत्र की प्रतिमाओं का चरण है।
  7. इस अवस्था में बालक अपनी स्वयं की मानसिक छवि बनाने और उस आधार पर स्वयं को अभिव्यक्त करने में सक्षम होते हैं।
  8. बालकों में बौद्धिक क्षमता इतनी विकसित हो जाती है कि मूर्त रूप से सोचने एवं समझने लगता है। अतः बालकों में बोध को विकसित करने हेतु चित्रों, मॉडलों, चार्ट, मूर्तियों आदि का प्रयोग किया जा सकता है। इसे छायात्मक अवस्था भी कहते हैं।

  • सांकेतिक विधि (Symbolic mode):

भाषा, चिन्ह, प्रतीकों के माध्यम से सोच व अधिगम; शब्दों और सूत्रों से जटिल संकल्पनाओं को व्यक्त करता है।​
  1. 8 से 13 वर्ष तक।
  2. इस अवस्था में बालक अपने अनुभवों को शब्दों में व्यक्त करता है।
  3. इस अवस्था में बालक गणित तथा तर्क का उपयोग करना सीखते हैं। 
  4. बौद्धिक विकास की यह सर्वोच्च अवस्था है। इसे शब्द चरण भी कहते हैं। 
  5. प्राप्त अनुभवों को शब्दों के माध्यम से प्रकट करना, अमूर्त चिन्तन करना, उच्च-स्तरीय विमर्शी चिन्तन करना सांकेतिक अवस्था की विशेषता है।
  6. भाषा एवं प्रतीकों के माध्यम से अनुभवों के संसार का संप्रेषण किया जा सकता है।
  7. अन्वेषण विधि का प्रयोग किया जाता है।
  8. इस अवस्था में अध्यापक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।



शैक्षिक निहितार्थ (Educational Implication)



  • ब्रुनर ने कक्षा शिक्षण को अर्थपूर्ण बनाने पर बल दिया है।
  • विषय के तात्कालिक ज्ञान पर बल दिया है। तत्परता और शिक्षार्थी द्वारा स्वयं कार्य करने को महत्व दिया।
  • अन्वेषणात्मक विधि पर बल दिया।
  • सीखने में सामाजिक एवं व्यक्तिगत संबद्धता पर बल दिया।
  • आगमनात्मक विधि पर बल दिया।
  • शिक्षा का उद्देश्य स्वायत्त शिक्षार्थी (सीखने के लिए सीखना) होना चाहिए। जिसे बाद में कई स्थितियों में स्थानांतरित किया जा सकता है। विशेष रूप से शिक्षा से बच्चों में प्रतीकात्मक सोच भी विकसित होनी चाहिए।
  • ब्रूनर के मानसिक अवस्थाओं के चरणों के अनुसार शिक्षण में योग्यता व प्रविधियों का प्रयोग करना चाहिए।
  • इस सिद्धान्त के माध्यम से छात्रों द्वारा समस्या समाधान की क्षमता का विकास किया जा सकता है।
  • ब्रूनर ने सम्प्रत्यय को समझने पर बल दिया। जिससे शिक्षक वर्तमान संचार को पूर्व ज्ञान एवं अनुभवों से जोड़ सकता है। इससे छात्रों के ज्ञान को समृद्ध बनाया जा सकता है।
  • शिक्षाविदों, शिक्षकों और माता-पिता को बालक के विचारों को बुनर द्वारा दिये तीनों चरणों के माध्यम से जानकर उसकी क्षमता का विकास करना चाहिये।


शैक्षिक मनोविज्ञान की विधियाँ (Methods of Educational Psychology)

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