Friday, September 19, 2025

पाठ्यक्रम विकास का व्यावसायिक/प्रशिक्षण मॉडल (Vocational/Training Model of Curriculum Development)

 

पाठ्यक्रम विकास का व्यावसायिक/प्रशिक्षण मॉडल (Vocational/Training Model of Curriculum Development)


पाठ्यक्रम विकास का व्यावसायिक/प्रशिक्षण मॉडल एक व्यावहारिक, करियर-उन्मुख दृष्टिकोण है जो शिक्षार्थियों को विशिष्ट व्यवसायों या उद्योगों के लिए आवश्यक विशिष्ट कौशल और ज्ञान से लैस करने पर केंद्रित है। यह मॉडल व्यावहारिक प्रशिक्षण (Hands-on training), वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोगों (Real-world Applications), नियोक्ताओं और उद्योग विशेषज्ञों (Collaboration with Employers and Industry experts) के साथ सहयोग पर ज़ोर देता है ताकि प्रासंगिकता और नौकरी की तत्परता सुनिश्चित हो सके। यह अक्सर तकनीकी कौशल को संचार और टीमवर्क जैसे आवश्यक सॉफ्ट स्किल्स के साथ एकीकृत करता है और इसमें लचीली कार्यक्रम संरचनाएँ और इंटर्नशिप या नौकरी के अवसर शामिल हो सकते हैं।

इस मॉडल का आधार नौकरी विश्लेषण और कार्यस्थल की आवश्यकताओं पर आधारित है। पाठ्यक्रम योजनाकार (Curriculum planners)  विभिन्न व्यवसायों और उद्योगों में आवश्यक कौशलों का अध्ययन करते हैं, फिर संरचित शिक्षण अनुभव तैयार करते हैं जो शिक्षार्थियों को वे दक्षताएँ प्रदान करते हैं। सीखने की प्रक्रिया अक्सर दक्षता-आधारित होती है, जहाँ प्रगति मानकीकृत परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने के बजाय विशिष्ट कौशल में निपुणता प्रदर्शित करने पर निर्भर करती है।


Wednesday, September 17, 2025

पाठ्यक्रम विकास का भविष्योन्मुखी मॉडल (Futuristic Model of curriculum Development)

 

पाठ्यक्रम विकास का भविष्योन्मुखी मॉडल 

(Futuristic Model of curriculum Development)

पाठ्यक्रम विकास का एक भविष्योन्मुखी मॉडल, शिक्षार्थियों को एक अप्रत्याशित (unexpected), प्रौद्योगिकी-संचालित (Technology-driven) और वैश्वीकृत (Globalized) दुनिया में फलने-फूलने के लिए तैयार करने पर केंद्रित है। यह मॉडल कौशल-केंद्रित, प्रौद्योगिकी-एकीकृत और लचीला है, जो अनुकूलनशीलता (adaptability), वास्तविक दुनिया में अनुप्रयोग और आजीवन सीखने पर ज़ोर देता है। 


एक भविष्योन्मुखी पाठ्यक्रम लचीला और मॉड्यूलर होता है, जो शिक्षार्थियों को अपनी रुचियों के अनुरूप मार्ग चुनने की अनुमति देता है, चाहे वे शैक्षणिक, व्यावसायिक, उद्यमशीलता (entrepreneurship) या कलात्मक हों। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म व्यक्तिगत, अनुकूली शिक्षण अनुभव प्रदान करके एक प्रमुख भूमिका निभाते हैं। उदाहरण के लिए, AI शिक्षार्थी की क्षमताओं का विश्लेषण कर सकता है और उसके अनुरूप संसाधन प्रदान कर सकता है, जबकि आभासी और संवर्धित वास्तविकता आभासी विज्ञान प्रयोगशालाओं (Virtual Science Labs) या ऐतिहासिक पुनर्निर्माण जैसे आकर्षक वातावरण का निर्माण करती है।

यह शिक्षार्थी की आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता, समस्या-समाधान, सहयोग, डिजिटल साक्षरता और भावनात्मक बुद्धिमत्ता विकसित करते हैं। कोडिंग, डेटा साक्षरता, डिज़ाइन थिंकिंग और स्थिरता प्रथाओं जैसे भविष्य के लिए तैयार कौशल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। मूल्यांकन भी रटने पर आधारित परीक्षाओं से विकसित होकर योग्यता-आधारित मूल्यांकन में बदल जाता है, जिसमें परियोजनाओं, पोर्टफोलियो, सिमुलेशन और AI-संचालित रीयल-टाइम फीडबैक का उपयोग किया जाता है। छात्र स्थानीय विरासत, समुदाय और भाषा से जुड़े रहते हुए वैश्विक मुद्दों—जलवायु परिवर्तन, प्रौद्योगिकी, सांस्कृतिक विविधता से जुड़ते हैं। पाठ्यक्रम को डेटा विश्लेषण और भविष्य के पूर्वानुमान के माध्यम से निरंतर अद्यतन किया जाता है, जिससे बदलती दुनिया में इसकी प्रासंगिकता सुनिश्चित होती है।

इस मॉडल के गुणों में भविष्य की नौकरियों के साथ बेहतर तालमेल, आजीवन सीखने को प्रोत्साहन और नैतिक एवं वैश्विक रूप से ज़िम्मेदार नागरिकों का पोषण शामिल है। हालाँकि, लागत, डिजिटल असमानता और पारंपरिक प्रणालियों के प्रतिरोध जैसी चुनौतियों का समाधान किया जाना आवश्यक है।

 

पाठ्यक्रम का आवश्यकता मूल्यांकन मॉडल (Need assessment Model of Curriculum)

पाठ्यक्रम का आवश्यकता मूल्यांकन मॉडल

(Need assessment Model of Curriculum)


पाठ्यक्रम विकास में आवश्यकता मूल्यांकन मॉडल मौजूदा शैक्षिक प्रावधानों और वांछित परिणामों के बीच अंतराल की पहचान करने के लिए एक व्यवस्थित, डेटा-संचालित प्रक्रिया है, जो फिर पाठ्यक्रम के डिजाइन या संशोधन का मार्गदर्शन करती है।


Tuesday, September 16, 2025

शिक्षक शिक्षा के संदर्भ में एनईपी 2020 (NEP 2020 with reference to Teacher Education)


शिक्षक शिक्षा के संदर्भ में एनईपी 2020 

(NEP 2020 with reference to Teacher Education)


राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 भारत में शिक्षक शिक्षा पर केंद्रित महत्वपूर्ण सुधार लाती है, जिसमें शिक्षकों को शिक्षा प्रणाली की सफलता के लिए केंद्रीय माना जाता है और उनके निरंतर विकास और समर्थन पर जोर दिया जाता है।

  • अगली पीढ़ी के लिए शिक्षकों को तैयार करना (Preparing teachers for the next generation): 

अगली पीढ़ी को आकार देने वाले शिक्षकों की एक टीम के निर्माण में अध्यापक शिक्षा की भूमिका महत्वपूर्ण है। शिक्षकों को तैयार करना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके लिए बहु-विषयक दृष्टिकोण (Multi-disciplinary Approach) और ज्ञान की आवश्यकता के साथ ही साथ, बेहतरीन मेंटरों के निर्देशन में मान्यताओं और मूल्यों के निर्माण के साथ ही साथ उनके अभ्यास की भी आवश्यकता होती है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अध्यापक शिक्षा और शिक्षण प्रक्रियाओं से संबंधित अद्यतन प्रगति के साथ ही साथ भारतीय मूल्यों, भाषाओं, ज्ञान, लोकाचार (Ethos) और परंपराओं जनजातीय परंपराओं सहित के प्रति भी जागरूक रहें।
  •  गुणवत्ता के उच्चतर मानक निर्धारित करना (Setting higher standards of quality):

न्यायमूर्ति जे. एस. वर्मा आयोग (2012) के अनुसार, स्टैंड- अलोन टीईआई, जिनकी संख्या 10,000 से अधिक है, अध्यापक शिक्षा के प्रति लेशमात्र गंभीरता से प्रयास नहीं कर रहे हैं, बल्कि इसके स्थान पर ऊंचे दामों पर डिग्रियों को बेच रहे हैं। इस दिशा में अब तक किए गए विनियामक (Regulatory) प्रयास न तो सिस्टम में बड़े पैमाने पर व्याप्त भ्रष्टाचार को रोक पाए हैं, और न ही गुणवत्ता के लिए निर्धारित बुनियादी मानकों को ही लागू कर पाए हैं, बल्कि इन प्रयासों का इस क्षेत्र में उत्कृष्टता और नवाचार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। अतः इस सेक्टर और इसकी नियामक प्रणालियों में महत्वपूर्ण कार्यवाहियों के द्वारा पुनरुद्धार (Revival) की तात्कालिक आवश्यकता है जिससे कि गुणवत्ता के उच्चतर मानकों को निर्धारित किया जा सके और शिक्षक शिक्षा प्रणाली में अखंडता, विश्वसनीयता, प्रभाविता और उच्चतर गुणवत्ता को बहाल किया जा सके। 

  • निम्न स्तरीय और बेकार अध्यापक शिक्षा संस्थानों पर कार्यवाही करना (To take action against low quality and useless teacher education institutions): 

शिक्षण पेशे की प्रतिष्ठा को बहाल करने के लिए आवश्यक नैतिकता और विश्वसनीयता के स्तरों में सुधार को सुनिश्चित करने और फिर इसके द्वारा एक सफल विद्यालयी प्रणाली सुनिश्चित करने के लिए, नियामक प्रणाली को उन निम्न स्तरीय और बेकार अध्यापक शिक्षा संस्थानों (TEI) के खिलाफ उल्लंघन के लिए एक वर्ष का समय दिये जाने के पश्चात, कठोर कार्यवाही करने का अधिकार होगा जो बुनियादी शैक्षिक मानदंडों को पूरा नहीं कर पा रहे हैं । वर्ष 2030 तक, केवल शैक्षिक रूप से सुदृढ़ (very strong), बहु-विषयक (Multi disciplinary) और एकीकृत अध्यापक शिक्षा कार्यक्रम ही कार्यान्वित होंगे।

  • संस्थानों को बहु विषयक बनाना (Making institutions multidisciplinary): 

अध्यापक शिक्षा के लिए बहु-विषयक / बहु-विषयक इनपुट के साथ ही साथ उच्चतर गुणवत्तायुक्त विषयवस्तु और शैक्षणिक प्रक्रियाओं की आवश्यकता होती है, अतः इसे ध्यान में रखते हुए सभी अध्यापक शिक्षा कार्यक्रमों को समग्र बहु-विषयी संस्थानों में ही आयोजित किया जाना चाहिए। इसके लिए, सभी बड़े बहु-विषयक विश्वविद्यालयों के साथ-साथ सभी सार्वजनिक विश्वविद्यालय और बड़े बहु- विषयक महाविद्यालय का लक्ष्य होगा कि वे अपने यहाँ ऐसे उत्कृष्ट शिक्षा विभागों की स्थापना और विकास करें, जो कि शिक्षा में अत्याधुनिक अनुसंधानों को अंजाम देने के साथ ही साथ मनोविज्ञान, दर्शनशास्त्र, समाजशास्त्र, तंत्रिकाविज्ञान, भारतीय भाषाओं, कला, संगीत, इतिहास और साहित्य के साथ-साथ विज्ञान और गणित जैसे अन्य विशिष्ट विषयों से संबंधित विभागों के सहयोग से भविष्य के शिक्षकों को शिक्षित करने के लिए बी.एड. कार्यक्रम भी संचालित करेंगे। इसके साथ ही साथ वर्ष 2030 तक सभी एकल शिक्षक शिक्षा के संस्थानों को बहु-विषयक संस्थानों के रूप में बदलने की आवश्यकता होगी क्योंकि उन्हें भी 4-वर्षीय एकीकृत शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों को संचालित करना होगा।

  • 4-वर्षीय एकीकृत बी.एड. कार्यक्रम  के साथ अन्य विषयों में डिग्री को सम्मिलित करना (Incorporating degrees in other subjects with the 4-year integrated B.Ed. programme): 

वर्ष 2030 तक बहु-विषयक उच्चतर शिक्षण संस्थानों द्वारा प्रदान किया जाने वाला यह 4-वर्षीय एकीकृत बी.एड. कार्यक्रम स्कूली शिक्षकों के लिए न्यूनतम डिग्री योग्यता बन जाएगा । यह 4-वर्षीय एकीकृत बी.एड. शिक्षा और इसके साथ ही एक अन्य विशेष विषय जैसे भाषा, इतिहास, संगीत, गणित, कंप्यूटर विज्ञान, रसायनविज्ञान, अर्थशास्त्र, आदि में एक समग्र ड्युअल मेजर स्नातक डिग्री होगी। अत्याधुनिक शिक्षा शास्त्र के शिक्षण के साथ ही साथ शिक्षक-शिक्षा में समाजशास्त्र, इतिहास, विज्ञान, मनोविज्ञान, प्रारंभिक बाल्यावस्था शिक्षा, बुनियादी साक्षरता और संख्याज्ञान, भारत से जुड़े ज्ञान और इसके मूल्यों / लोकाचार / कला / परंपराएं और भी बहुत कुछ शामिल होगा । 4-वर्षीय एकीकृत बी.एड. प्रदान करने वाला प्रत्येक उच्चतर शिक्षण संस्थान, किसी एक विषय विशेष में पहले से ही स्नातक की डिग्री हासिल कर चुके ऐसे उत्कृष्ट विद्यार्थी जो आगे चलकर शिक्षण करना चाहते हैं, के लिए अपने परिसर में 2- वर्षीय बी.एड. कार्यक्रम भी डिजाइन कर सकते हैं। विशेष रूप से ऐसे उत्कृष्ट विद्यार्थी जिन्होंने किसी विशेष विषय में 4 वर्ष की स्नातक की डिग्री प्राप्त की है, के लिए 1-वर्षीय बी.एड. कार्यक्रम भी ऑफर किया जा सकता है। इन 4-वर्षीय, 2-वर्षीय और 1-वर्षीय बी.एड. कार्यक्रमों के लिए उत्कृष्ट उम्मीदवारों को आकर्षित करने के उद्देश्य से मेधावी विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्तियों की स्थापना की जाएगी।

  • विशेष विषयों में विशेषज्ञों की उपलब्धता कराना (Availability of experts in specific subjects): 

अध्यापक शिक्षा प्रदान करने वाले उच्चतर शिक्षण संस्थान, शिक्षा और इससे संबंधित विषयों के साथ ही साथ विशेष विषयों में विशेषज्ञों की उपलब्धता को सुनिश्चित करेंगे। प्रत्येक उच्चतर शिक्षा संस्थान के पास सघन जुड़ाव के साथ काम करने के लिए सार्वजनिक और निजी स्कूलों और स्कूल परिसरों का एक नेटवर्क होगा, जहाँ भावी शिक्षक अन्य सहायक गतिविधियों जैसे सामुदायिक सेवा, वयस्क और व्यावसायिक शिक्षा, आदि में सहभागिता के साथ शिक्षण का कार्य करेंगे।
  • एकसमान मानकों को बनाए रखना (Maintaining uniform standards):

शिक्षक शिक्षा के लिए एकसमान मानकों को बनाए रखने के लिए, पूर्व-सेवा शिक्षक तैयारी कार्यक्रमों में प्रवेश राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी द्वारा आयोजित उपयुक्त विषय और योग्यता परीक्षणों के माध्यम से होगा, और देश की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखते हुए मानकीकृत किया जाएगा।
  • शिक्षा विभाग में संकाय सदस्यों की प्रोफ़ाइल में विविधता होना एक आवश्यक लक्ष्य होगा। लेकिन शिक्षण/फील्ड / शोध के अनुभवों को महत्ता प्रदान की जाएगी। सीधे सीधे विद्यालयी शिक्षा से जुड़ने वाले सामाजिक विज्ञान के क्षेत्रों (जैसे, मनोविज्ञान, बालविकास, भाषा विज्ञान, समाजशास्त्र, दर्शन, अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान) के साथ ही साथ विज्ञान शिक्षा, गणित शिक्षा, सामाजिक विज्ञान शिक्षा और भाषा शिक्षा जैसे कार्यक्रमों से संबंधित विषयों में प्रशिक्षण प्राप्त संकाय सदस्यों को शिक्षक शिक्षा संस्थानों मेंआकर्षित और नियुक्त किया जाएगा, जिससे कि शिक्षकों की बहु-विषयी शिक्षा को और उनके अवधारणात्मक विकास को मज़बूती प्रदान की जा सके।
  • सभी नए पीएच-डी. प्रवेशकर्ताओं, चाहे वे किसी भी विषय में प्रवेश लें, से अपेक्षित होगा कि वे अपनी डोक्टोरल प्रशिक्षण अवधि के दौरान उनके द्वारा चुने गए पीएच-डी विषय से संबंधित शिक्षण/ शिक्षा/ अध्यापन/लेखन में क्रेडिट आधारित पाठ्यक्रम लें। उनकी डॉक्टरेट प्रशिक्षण अवधि के दौरान उन्हें शैक्षणिक प्रक्रियाओं, पाठ्यक्रम निर्माण, विश्वसनीय मूल्यांकन प्रणाली और संचार जैसे क्षेत्रों का अनुभव प्रदान किया जाएगा, क्योंकि संभव है कि इनमें से कई शोध विद्वान अपने चुने हुए विषयों के संकाय सदस्य या सार्वजनिक प्रतिनिधि / संचारक बनेंगे। पीएच-डी. छात्रों के लिए शिक्षण सहायक और अन्य साधनों के माध्यम से अर्जित किए गए वास्तविक शिक्षण अनुभव के न्यूनतम घंटे भी तय होंगे। देशभर के विश्वविद्यालयों में संचालित पीएच-डी. कार्यक्रमों का इस उद्देश्य के लिए पुनरुन्मुखीकरण (reorientation) किया जाएगा।
  • कॉलेज और विश्वविद्यालय के शिक्षकों के लिए सेवारत सतत व्यावसायिक विकास का प्रशिक्षण मौजूदा संस्थागत व्यवस्था और जारी पहलों के माध्यम से ही जारी रहेगा; हालांकि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए आवश्यक समृद्ध शिक्षण-अधिगम प्रक्रियाओं की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए इनका सुदृढ़ीकरण और विस्तार किया जाएगा। शिक्षकों के ऑनलाइन प्रशिक्षण के लिए स्वयम/दीक्षा जैसे प्रौद्योगिकी प्लेटफार्मों के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाएगा, ताकि मानकीकृत प्रशिक्षण कार्यक्रमों को कम समय के भीतर अधिक शिक्षकों को मुहैया कराया जा सके।
  • सलाह (मेंटरिंग) के लिए एक राष्ट्रीय मिशन को स्थापित किया जाएगा जिसमें बड़ी संख्या में वरिष्ठ /सेवानिवृत्त उत्कृष्ट संकाय सदस्यों को जोड़ा जाएगा। इनमें वे संकाय सदस्य भी शामिल होंगे जिनमें भारतीय भाषाओं में पढ़ाने की क्षमता है और जो विश्वविद्यालय / कॉलेज शिक्षकों को लघु और दीर्घकालिक परामर्श / व्यावसायिक सहायता प्रदान करने के लिए तैयार होंगे।
  • शिक्षक शिक्षा का पाठ्यक्रम अब विषय विशेषज्ञता और शिक्षणशास्त्र दोनों पर ज़ोर देता है, जिसमें वास्तविक कक्षा में इंटर्नशिप और मार्गदर्शन सहित पर्याप्त व्यावहारिक और अनुभवात्मक शिक्षा शामिल है।
  • NEP शिक्षकों के लिए राष्ट्रीय व्यावसायिक मानक (NPST) प्रस्तुत करता है, जो करियर उन्नति, व्यावसायिक मूल्यांकन और वेतन वृद्धि का मार्गदर्शन करते हैं, साथ ही निरंतर व्यावसायिक कौशल उन्नयन और चिंतनशील अभ्यास को बढ़ावा देते हैं।
  • शिक्षकों के लिए सतत व्यावसायिक विकास (CPD) अनिवार्य होगा, जिसमें स्कूल-आधारित और आवश्यकता-विशिष्ट मॉडलों पर ध्यान केंद्रित करते हुए लगातार कौशल उन्नयन, मार्गदर्शन, व्यावसायिक नेटवर्क और नेतृत्व प्रशिक्षण शामिल होगा।
  • CTET जैसी शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) उत्तीर्ण करना एक महत्वपूर्ण योग्यता बनी हुई है, जो यह सुनिश्चित करती है कि सरकारी और निजी दोनों स्कूलों के शिक्षक राष्ट्रीय मानकों को पूरा करें।

Monday, September 15, 2025

अध्यापक शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (National Curriculum Framework for Teacher Education)

अध्यापक शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 
 (National Curriculum Framework for Teacher Education)


अध्यापक शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCFTE) भारत में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) द्वारा विकसित एक नीति दस्तावेज है, जिसे पहली बार 2009 में जारी किया गया था, जो समकालीन (Contemporary) शैक्षिक आवश्यकताओं और सुधारों के साथ शिक्षकों की तैयारी और व्यावसायिक विकास के लिए एक व्यापक रूपरेखा प्रदान करता है। NCFTE 2009 भारत सरकार का एक मसौदा (Draft) है, जो राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद में आवश्यक परिवर्तन और अद्यतन (Update) प्रस्तावित करने के लिए बनाया गया है। इसकी स्थापना राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद अधिनियम, 1993 (73, 1993) के तहत 1995 में की गई थी।

यह रूपरेखा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) का एक प्रयास है जिसका उद्देश्य इच्छुक पक्षों और हितधारकों (Stakeholders) को स्कूल, स्नातक, स्नातकोत्तर, डॉक्टरेट और पोस्ट-डॉक्टरेट स्तरों पर शिक्षकों की शिक्षा में प्राप्त किए जा सकने वाले गुणात्मक और मात्रात्मक सुधारों पर अपने विचार देने के लिए प्रोत्साहित करना है। इससे पहले 1978 में परिषद द्वारा ही एक "पाठ्यचर्या रूपरेखा (Curriculum Framework)" विकसित की गई थी (जो उस समय एक स्वतंत्र निकाय न होकर केवल एक विभाग था), जिसके बाद 1988 में शिक्षक शिक्षा के लिए एनसीईआरटी (NCERT) रूपरेखा तैयार की गई, जिसके परिणामस्वरूप 1998 में एनसीटीई द्वारा "गुणवत्तापूर्ण शिक्षक शिक्षा के लिए पहला पाठ्यक्रम रूपरेखा" तैयार की गई। इसके बाद 2005 में मुकेश देवनाथ ने इसे आगे बढ़ाया। इसे भारतीय शिक्षा में समकालीन चुनौतियों, जैसे कि निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 की शुरुआत, को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया था।

NCFTE न केवल व्यक्तिगत शिक्षार्थियों, बल्कि राष्ट्र के भविष्य को आकार देने में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका को मान्यता देता है। यह दस्तावेज़ शिक्षक शिक्षा और स्कूली शिक्षा के बीच सहजीवी संबंध को रेखांकित करता है, और इस बात पर ज़ोर देता है कि दोनों क्षेत्र एक-दूसरे की गुणवत्ता और उद्देश्य को सुदृढ़ करते हैं। इसे व्यापक परामर्श के माध्यम से विकसित किया गया है, जिसमें पिछले पाठ्यक्रम ढाँचों, शिक्षा नीति अनुशंसाओं और देश भर के विशेषज्ञों से प्राप्त प्रतिक्रिया से अंतर्दृष्टि प्राप्त की गई है।


मुख्य विशेषताएँ (Main Characteristics)


  • चिंतनशील अभ्यास पर ध्यान (Reflective Practice Focus): एनसीएफटीई शिक्षकों को चिंतनशील अभ्यासकर्ता के रूप में तैयार करने पर केंद्रित है, जिससे उन्हें अपनी शिक्षण विधियों का आलोचनात्मक विश्लेषण और नवाचार करने का अधिकार मिलता है।
  • सिद्धांत और व्यवहार का एकीकरण (Integration of Theory and Practice): यह प्रशिक्षण कार्यक्रमों में विस्तारित, मार्गदर्शन प्राप्त स्कूल इंटर्नशिप को शामिल करके शैक्षिक सिद्धांत और वास्तविक कक्षा अनुभव के बीच की खाई को पाटने पर ज़ोर देता है।
  • आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र और रचनावाद (Critical Pedagogy and Constructivism): यह रूपरेखा एक रचनावादी दृष्टिकोण को बढ़ावा देती है, शिक्षार्थी-केंद्रित और सहभागी शिक्षण को प्रोत्साहित करती है जो आलोचनात्मक जाँच और समस्या-समाधान के कौशल का निर्माण करती है।
  • विस्तारित अवधि और व्यापक पाठ्यक्रम (Extended Duration and Comprehensive Curriculum): शिक्षक शिक्षा, विशेष रूप से बी.एड. जैसे प्रारंभिक (सेवा-पूर्व) कार्यक्रमों को एक वर्ष से दो वर्ष में बदलने की सिफारिश की गई थी, जिसमें आधारभूत अध्ययन, पाठ्यक्रम और शिक्षण पद्धति, और पर्याप्त स्कूल इंटर्नशिप शामिल हों।
  • सतत व्यावसायिक विकास (Continuous Professional Development):  एनसीएफटीई सेवा-पूर्व और सेवाकालीन शिक्षक शिक्षा, दोनों को एकीकृत करता है, निरंतर व्यावसायिक शिक्षा और नवाचार एवं समर्थन के लिए शिक्षण-अधिगम केंद्रों की स्थापना का समर्थन करता है।
  • मूल्यांकन और मूल्यांकन सुधार (Assessment and Evaluation Reforms): यह प्रशिक्षणरत शिक्षकों के निरंतर और व्यापक मूल्यांकन की वकालत करता है, जिसमें पोर्टफोलियो और अवलोकन जैसे उपकरणों के माध्यम से कौशल, दृष्टिकोण और चिंतनशील क्षमताओं का मूल्यांकन किया जाता है।
  • समावेश और समानता (Inclusion and Equity): यह ढांचा समावेशी शिक्षा को दृढ़ता से बढ़ावा देता है, लिंग, विविधता और सभी शिक्षार्थियों की आवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित करता है, साथ ही डिजिटल साक्षरता के लिए आईसीटी को भी एकीकृत करता है।
  • शिक्षक प्रशिक्षकों का सुदृढ़ीकरण (Strengthening Teacher Educators): शिक्षकों के सतत व्यावसायिक विकास पर प्रशिक्षण, सहयोगात्मक अनुसंधान और नई पद्धतियों से परिचित कराने के माध्यम से ज़ोर दिया जाता है।
  • समुदाय और जीवन की प्रासंगिकता (Community and Life Relevance): ज्ञान के संबंधों को पाठ्यपुस्तकों से परे स्कूल के बाहर के जीवन से जोड़ा जाता है, जिससे सार्थक शिक्षा के लिए सामुदायिक ज्ञान और अनुभवों का लाभ उठाया जाता है।



मुख्य उद्देश्य (Main Objectives)

शिक्षक शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCFTE) 2009 के उद्देश्य भारत में शिक्षक शिक्षा को पुनर्जीवित और आधुनिक बनाना है, ताकि यह समकालीन विद्यालयों और समाज की आवश्यकताओं के प्रति उत्तरदायी बन सके।

  • चिंतनशील अभ्यास को बढ़ावा देना (Promote Reflective Practice): शिक्षकों को चिंतनशील अभ्यासकर्ता के रूप में तैयार करना जो अपने शिक्षण विश्वासों का आलोचनात्मक विश्लेषण करें और अपनी कक्षा रणनीतियों में निरंतर सुधार करें।
  • सिद्धांत और व्यवहार के बीच सेतु का निर्माण (Bridge Theory and Practice): यह सुनिश्चित करना कि शिक्षक शिक्षा, विशेष रूप से विस्तारित इंटर्नशिप और स्कूल सहभागिता के माध्यम से, शैक्षणिक सिद्धांत को व्यावहारिक कक्षा अनुभव के साथ घनिष्ठ रूप से एकीकृत करें।
  • बाल-केंद्रित और समावेशी दृष्टिकोण अपनाना (Adopt Child-Centered and Inclusive Approaches): शैक्षणिक प्रथाओं को अधिक छात्र-केंद्रित और समावेशी बनाने की ओर मोड़ना, विविध शिक्षण आवश्यकताओं को समायोजित करना  और सक्रिय छात्र भागीदारी को प्रोत्साहित करना ।
  • पेशेवर और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देना (Foster Professional and Ethical Values): ऐसे शिक्षकों का विकास करना जो न केवल पेशेवर रूप से सक्षम हों, बल्कि मानवीय, नैतिक और समानता, लिंग और सामाजिक न्याय के मुद्दों के प्रति संवेदनशील भी हों।
  • सतत व्यावसायिक विकास सुनिश्चित करना (Ensure Continuous Professional Development): शिक्षकों के संपूर्ण करियर में उनके निरंतर सीखने और विकास में सहायता करना, प्रारंभिक प्रशिक्षण से आगे बढ़कर आजीवन सीखने और सेवाकालीन शिक्षा की ओर बढ़ाना ।
  • प्रौद्योगिकी और समुदाय का लाभ उठाना (Leverage Technology and Community): शिक्षक शिक्षा में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) को एकीकृत करना और कक्षा के ज्ञान और वास्तविक दुनिया के सामुदायिक जीवन के बीच संबंधों को प्रोत्साहित करना।
  • शिक्षक प्रशिक्षकों को सशक्त बनाना (Empower Teacher Educators): शिक्षक प्रशिक्षकों को उन्नत कौशल से सुसज्जित करना और शिक्षक प्रशिक्षण की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए उनके व्यावसायिक विकास में सहायता करना ।
  • छात्र-केंद्रित शिक्षा को बढ़ावा देना (Promote Student-Centered Learning): शिक्षकों को ऐसे शिक्षण को सुगम बनाने के लिए प्रोत्साहित करना जहाँ छात्र सक्रिय रूप से भाग लें और शिक्षण को निष्क्रिय के बजाय अंतःक्रियात्मक (interactive) बनाएँ।
  • समावेशी कक्षाएँ (Inclusive Classrooms): ऐसा शिक्षण वातावरण बनाना, जो सभी छात्रों को शामिल करे, विशेष आवश्यकता वाले छात्रों सहित, यह सुनिश्चित करते हुए कि प्रत्येक बच्चे को स्वागत और समर्थन (welcomed and supported) का अनुभव हो।
  • नैतिक और मानवीय शिक्षण (Ethical and Humane Teaching): ऐसे शिक्षकों का विकास करना जो उच्च नैतिक मानकों का पालन करें और विविधता के प्रति सम्मान को बढ़ावा दें, जिससे कक्षा में सकारात्मक और सम्मानजनक संस्कृति का निर्माण हो।
  • हितधारकों के साथ सहयोग (Collaboration with Stakeholders): शिक्षा की समग्र गुणवत्ता और प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए शिक्षकों, विद्यालयों और नीति निर्माताओं के बीच टीम वर्क को प्रोत्साहित करना ।

आवश्यकता और महत्व (Need and Importance)

शिक्षक शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCFTE) 2009 की आवश्यकता और महत्व भारत में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उभरती चुनौतियों और माँगों से उत्पन्न होता है, जो छात्रों के सीखने और सामाजिक प्रगति को आकार देने में शिक्षकों की आधारभूत भूमिका पर ज़ोर देता है।

 आवश्यकता (Need):

  • सिद्धांत और व्यवहार के बीच की खाई को पाटना (Bridging Theory and Practice Gap):  पहले के शिक्षक शिक्षा कार्यक्रमों की आलोचना इस बात के लिए की जाती थी कि वे सिद्धांत पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करते थे और पर्याप्त व्यावहारिक कक्षा अनुभव प्रदान करने में विफल रहते थे। NCFTE शिक्षक तैयारी को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए चिंतनशील अभ्यास और स्कूल इंटर्नशिप को एकीकृत करके इस समस्या का समाधान करता है।
  • शैक्षिक सुधारों पर प्रतिक्रिया (Responding to Educational Reforms): राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 और शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के कार्यान्वयन के साथ, शिक्षक शिक्षा को तदनुसार संरेखित (Aligned) करने की तत्काल आवश्यकता थी, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि शिक्षक समावेशी, बाल-केंद्रित और न्यायसंगत कक्षाओं में काम करने के लिए सुसज्जित हों।
  • शिक्षण का व्यवसायीकरण (Professionalization of Teaching): शिक्षण के लिए अन्य व्यवसायों की तरह गहन तैयारी की आवश्यकता होती है। इस ढाँचे का उद्देश्य शिक्षक शिक्षा को गहन, शोध-आधारित और नैतिकता-केंद्रित बनाकर शिक्षण की स्थिति को ऊँचा उठाना है।
  • विविधता और समावेशन पर ध्यान (Addressing Diversity and Inclusion): भारतीय कक्षाएँ विविध हैं, और उन्हें ऐसे शिक्षकों की आवश्यकता है जो हाशिए पर पड़े समूहों सहित विभिन्न शिक्षार्थियों की आवश्यकताओं को पूरा कर सकें, जिस पर NCFTE समावेशी शिक्षाशास्त्र और समानता के माध्यम से ज़ोर देता है।
  • प्रौद्योगिकी का समावेश (Incorporation of Technology): शिक्षा में डिजिटल उपकरणों की बढ़ती भूमिका को स्वीकार करते हुए, NCFTE आधुनिक कक्षाओं के लिए शिक्षकों को तैयार करने हेतु शिक्षक प्रशिक्षण में आईसीटी कौशल को एकीकृत करने की वकालत करता है।


 महत्व (Importance):

  • शिक्षक गुणवत्ता में सुधार (Improving Teacher Quality):  यह एक व्यापक पाठ्यक्रम ढाँचा (Curriculum Stucture) प्रदान करता है जो यह सुनिश्चित करता है कि शिक्षकों के पास छात्रों के सीखने के परिणामों को बेहतर बनाने के लिए प्रासंगिक ज्ञान, कौशल और दृष्टिकोण हों।
  • चिंतनशील और आलोचनात्मक अभ्यास को बढ़ावा देना (Enhancing Reflective and Critical Practice):  यह शिक्षकों को चिंतनशील अभ्यासकर्ता के रूप में विकसित करता है जो अपने शिक्षण के बारे में गंभीरता से सोचते हैं और निरंतर सुधार की तलाश करते हैं।
  • व्यावसायिक विकास (Professional Development): प्रारंभिक प्रशिक्षण के बाद निरंतर सीखने और शिक्षक कौशल के उन्नयन पर ज़ोर देता है, जिससे आजीवन व्यावसायिक विकास की संस्कृति को बढ़ावा मिलता है।
  • व्यवस्थित शैक्षिक सुधार (Systemic Educational Improvement): शिक्षक शिक्षा सुधार को स्कूली शिक्षा सुधार से जोड़कर, इस ढाँचे का उद्देश्य पूरे भारत में शिक्षा की गुणवत्ता में व्यवस्थित सुधार लाना है।
  • पाठ्यचर्या और शिक्षणशास्त्र को नया रूप देना (Reshaping Curriculum and Pedagogy): यह शिक्षार्थी-केंद्रित, गतिविधि-आधारित, समावेशी शिक्षण विधियों की वकालत करता है जो समकालीन शैक्षिक आदर्शों के अनुरूप हों।


  • (https://teachers.institute/contemporary-india-education/redefining-teacher-education-ncfte-2009/)
  • (https://www.scribd.com/document/693557408/Ncf-2005-and-Ncfte-2009)
  • (https://www.slideshare.net/slideshow/national-curriculum-framework-for-teacher-education/274425469)
  • (https://ncte.gov.in/website/PDF/NCFTE_2009.pdf)
  • (http://ijmsrr.com/downloads/020520177.pdf)
  • (https://www.iitms.co.in/blog/national-curriculum-framework-for-teacher-education.html)
  • (https://en.wikipedia.org/wiki/National_Curriculum_Framework_for_Teacher_Education)
  • (https://www.youtube.com/watch?v=kLTBlg1H3Lc)
  • (https://sprcemoocs.in/mod/resource/view.php?id=88)

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