Sunday, June 6, 2021

स्मृति को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Influencing Memory)

 स्मृति को प्रभावित करने वाले कारक (Factors Influencing Memory)


स्मृति को अनेक तत्व प्रभावित करते हैं जिनमें निम्नलिखित मुख्य हैं -

1. शारीरिक स्वास्थ्य (Physical Health) - शारीरिक स्वास्थ्य का प्रभाव स्मृति पर पड़ता है। जो बच्चे अस्वस्थ रहते हैं उनकी स्मृति कमजोर होती है। 

2. मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health)-   मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति की स्मृति अच्छी होती है। जो बच्चे मानसिक बीमारी (Mental Disease), भय, चिन्ता एवं अन्य मानसिक विकारों से ग्रस्त होते हैं उनकी स्मृति अच्छी नहीं होती है।

3. प्रेरणा ( Motivation)-  अभिप्रेरित व्यक्ति जल्दी सीखता है, सीखी हुई सामग्री को लम्बे समय तक धारण करता है और आवश्यकता पड़ने पर उसका शीघ्र प्रत्यास्मरण करता है। 

4. अधिगम सामग्री की प्रकृति (Nature of Learning Material)- व्यवस्थित (Arranged) एवं बोधगम्य (Understandable) सामग्री होने से बालक उन्हे जल्दी स्मरण कर लेता है।  

5. सीखने वाले की इच्छा शक्ति (Learner's Willingness)- सीखने वाला यदि सीखना चाहता है तो ही पाठ्य-सामग्री को याद कर सकेगा अन्यथा नहीं। जितनी सीखने की प्रबल इच्छा शक्ति (Strong Desire Power)  होती है उतना ही जल्दी स्मरण होता है।

6. रुचि एवं अवधान (Interest and Attention)- रुचि एवं ध्यान आकृष्ट (Attracted) होने से व्यक्ति जल्दी सीखता है। 

7. स्मरण विधि (Memory Method) -   बालक स्मरण करने के लिए जिस विधि का उपयोग करता है उसका उसकी स्मरण करने की प्रक्रिया पर असर होता है। व्यवस्थित एवं सरल पाठ्य सामग्री को पूर्ण विधि से जल्दी याद किया जा सकता है, कठिन सामग्री के लिए आंशिक विधि उत्तम होती है।

8. अभ्यास एवं दोहराना (Practice and Repetition)- पाठ्य-वस्तु का जितना अधिक अभ्यास एवं दोहराना होता है उसे उतना ही अधिक स्थायी रूप से स्मृति में अंकित किया जा सकता है। 

9. शिक्षण विधि (Teaching Method)- शिक्षक द्वारा अपनाई जाने वाली शिक्षण विधि का याद करने पर प्रभाव होता है।

10. शिक्षक का व्यवहार (Teacher's Behaviour)- शिक्षक का प्रेम एवं स्नेहमय व्यवहार बालक को याद करने में अनुकूल प्रभाव डालता है।

11.परीक्षण (Testing) परीक्षणों के द्वारा बालकों की स्मरण शक्ति का विकास किया जा सकता है। इसलिये स्मृति को गति देने के लिये परीक्षण और मूल्यांकन (Testing & Evaluation) होते रहना चाहिये। चूंकि नकारात्मक परीक्षण स्मृति को सुस्त बना देते हैं, अतः शिक्षक को परिणामों की व्याख्या में निराशा व्यक्त न करके चेतावनी देते हुये उनका उत्साहवर्धन (Encouragement) करना चाहिये ।

12. वातावरण (Environment)- अच्छी स्मृति के लिए उपयुक्त वातावरण का होना भी महत्व रखता है। किसी विषय को याद करने या सीखने के लिए शांतिपूर्ण व स्वस्थ वातावरण तथा उपयुक्त समय की आवश्यकता होती है, जैसे- प्रातःकाल शांतिपूर्ण वातावरण में शरीर और मस्तिष्क दोनों ताजे रहते हैं और जो कुछ भी पढ़ा जाता है वह शीघ्र याद हो जाता है। अतः अभिभावकों और शिक्षकों को इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए।



अच्छी स्मृति की विशेषताएँ (Characteristics of Good Memory)

 अच्छी स्मृति की विशेषताएँ (Characteristics of Good Memory)


 अच्छी स्मृति के प्रमुख लक्षण या विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

1. शीघ्र याद होना या अधिगम (Quick Learning)- 

अच्छी स्मृति का प्रथम लक्षण है जल्दी याद होना। जो बालक किसी बात को एक बार पढ़ लेने या सुन लेने से याद कर लेता है तो उसकी स्मृति अच्छी कही जाती है।

2. उत्तम धारण-शक्ति (Good Retention)- 

यदि कोई बालक सीखी या याद की हुई बातों को अधिक दिनों तक स्मरण रख सकता है तो उसकी स्मृति अधिक स्थायी होती है। यह अच्छी स्मृति का लक्षण है।

3. शीघ्र पुनः स्मरण (Quick Recall)- 

अच्छी स्मृति में यह गुण भी होता है कि व्यक्ति सीखी गई बात का तुरंत प्रत्यास्मरण (Recall) कर लेता है। अच्छी स्मृति वाला व्यक्ति धारण (Retention) की गई विषय सामग्री को आवश्यकता पड़ने पर बिना किसी विलंब के तुरंत प्रस्तुत कर देता है।

4. शीघ्र एवं स्पष्ट पहचानना (Quick and Accurate of Recognition)- 

अच्छी स्मृति के लिए शीघ्र पुनः स्मरण ही नहीं बल्कि किसी विषय को शीघ्र एवं स्पष्ट रूप से पहचानना भी आवश्यक है। बालक ने विषय से सम्बन्धित बहुत-सी बातों को पढ़ा, सीखा और याद किया है, परीक्षा के समय वह उन बातों को पुनः स्मरण करता है किन्तु बिना शीघ्र एवं स्पष्ट रूप से पहचाने हुए वह वांछित प्रश्न का उत्तर देने में समर्थ नहीं हो सकता।

5. अनावश्यक बातों को भूलना (Forgetting of Meaningless Things)- 

अच्छी स्मृति का एक आवश्यक लक्षण यह भी है कि बालक व्यर्थ की बातों को भूल जाय और उपयोगी बातें ही याद रखे। अनावश्यक बातें याद रहने से उपयोगी बातों के पुनः स्मरण (Recall), धारण (Attention) एवं पहचान (Recognition) में बाधा पड़ती है।

6. सीखी गई विषय वस्तु को व्यवस्थित करना (Organization of the learned information)- 

सीखी गई सामग्री का हम ठीक प्रकार से प्रत्यास्मरण (Recall) तभी कर सकते हैं जबकि वह मस्तिष्क में व्यवस्थित रूप से संचित की गई हो। अच्छी स्मृति वाला व्यक्ति सूचनाओं को क्रमबद्ध (Systematic) ढंग से मस्तिष्क में संचित (Store) करता है और आवश्यकता पड़ने पर उसका आसानी से प्रत्यास्मरण कर लेता है।

7.  अच्छी सूझ एवं समझ (Good insight and Understanding)-

अच्छी स्मृति वाला व्यक्ति सूझ तथा समझ के द्वारा जल्दी सीख लेता है । यह प्रयत्न तथा भूल के द्वारा सीखने में समय नष्ट नही करता है।

8. व्यवहार्य (Serviceable)- 

स्मृति की व्यवहार्यता से तात्पर्य है व्यक्ति उचित समय, उचित स्थान पर तथा उचित ढंग से प्रत्यास्मरण (Recall) करें। यदि कोई छात्र जिन चीजों को घर पर याद करके जाता है तथा परीक्षा भवन में उनका प्रत्यास्मरण (Recall) करने में असमर्थ रहता है तो यही कहा जायेगा कि उसकी स्मृति व्यवहार्य (Serviceable) नही है।















Lesson Plan of Mathematics


 




Tuesday, June 1, 2021

स्मृति के प्रकार (Types of Memory)

 स्मृति के प्रकार (Types of Memory)


मनोवैज्ञानिकों ने स्मृति के अनेक प्रकार बताये हैं। याद की गयी सामग्री के समय अन्तराल (Time Interval) के आधार पर स्मरण करने की दृष्टि से स्मृति के चार प्रकार बताये हैं।

1. संवेदी स्मृति (Sensory Memory) -

संवेदी स्मृति को संवेदी संचयन (Sensory Storage) के नाम से भी जाना जाता है। सांवेदिक स्मृति ज्ञानेन्द्रियों (Sense Organs) के अनुसार रहती है। जितनी ज्ञानेन्द्रियां हैं उतनी प्रकार की सांवेदिक स्मृतियों की कल्पना की जा सकती है। ज्ञानेन्द्रियां (Sense Organs) अपने स्तर पर किसी उद्दीपन या उत्तेजना की सूचनाओं को प्राप्त करती है और ये सूचनाएं कुछ क्षणों के लिए ही बनी रहती हैं। जैसे आँखों  से देखे गये कुछ दृश्यों के संवेदना की स्मृति, नाक से ली गई गंध के संवेदना की स्मृति, जिह्वा  से प्राप्त रस संवेदना की स्मृति और त्वचा से स्पर्श संवेदना की स्मृति। इस स्मृति में प्राप्त सूचनाओं को बिना किसी बदलाव के ज्यों-का-त्यों एक सेकण्ड अथवा उससे भी कम समय के लिए संचित किया जाता है। यह संचयन (Storage) दो प्रकार से होता है। 
(A) प्रतिमा स्मृति (Iconic memory) - जब व्यक्ति किसी वस्तु अथवा व्यक्ति की प्रतिमा का एक सेकण्ड तक दृष्टिचिन्ह (visual trace) के रूप में संचय कर पाता है। इस प्रकार की स्मृति को प्रतिमा स्मृति (Iconic memory) कहते हैं। 
(B) प्रतिध्वनि स्मृति (Echoic memory)- जब व्यक्ति किसी सुनी गयी ध्वनि अथवा शब्दों को एक सेकण्ड की अवधि तक ध्वनि चिन्ह (Auditory trace) के रूप में संचय कर पाता है। इस प्रकार की स्मृति को प्रतिध्वनि स्मृति (Echoic memory) कहते हैं।


 2. लघु कालिक स्मृति (Short Term Memory) -

इस स्मृति में किसी सूचना को 20 से 30 सेकण्ड तक की अवधि के लिए धारण किया जाता है। इस स्मृति को विलियम जेम्स ने प्राथमिक स्मृति (Primary Memory) का नाम दिया है। इस स्मृति में धारण करने वाली सामग्री  को व्यक्ति एक- दो प्रयासों में ही याद कर लेता है। संवेदी स्मृति से आने वाली सूचनाएँ कुछ समय तक S.T.M. में रहती हैं फिर वे या तो विस्मरण (Forgetting) के गर्त में चली जाती हैं या फिर उनको दीर्घकालिक स्मृति में स्थानान्तरित कर दिया जाता है।


3. चलन स्मृति  (Working Memory)-  

इस स्मृति का प्रतिपादन बैडेली (Baddely) ने 1993 में किया था। इस स्मृति में सूचनाओं को संचय (Storage) करने तथा उनको संसाधित (Processing) करने की दोनों क्षमताएं होती हैं। इसमें सूचनाओं को 25-30 सेकण्ड तक संचय करने के साथ-साथ संसाधित (Processing) भी किया जाता है। 
Ex. - यदि हम Mathematics की स्पेलिंग को देखकर 30 सेकण्ड तक इसका संचय (Storage) करते हैं तो यह लघु कालिक स्मृति (S.T.M.) का कार्य कहलायेगा और अगर हम इस तरह से संसाधित करके संचय करते हैं कि ma, ma बीच में दी (the) s से पहले tic तो यह चलन स्मृति के अन्तर्गत आयेगा अर्थात् चलन स्मृति में सूचनाओं को जोड़-तोड़ कर संसाधित किया जाता है। इसी कारण बैडेली ने इसे मानसिक वर्क बेंच (Mental work banch) का नाम दिया है। चलन स्मृति में सूचनाएं तीन रूप में संचित (Storage) तथा संसाधित (Processing) की जाती हैं। 

(i) स्वरग्रामी लूप (Phonological loop)-   शब्दों की ध्वनि के रूप में।  
(ii)  दृष्टि स्थानिक स्केच पैड (Visual Spatial Sketch Pad)-  दृष्टि (Visual) तथा स्थान (Space) से सम्बन्धित सूचनाएं  (वस्तुओं के रंग, रूप, आकार और उनकी स्थिति) ।  
(iii)केन्द्रीय कार्यकारी(Central executive)-
स्वरगामी लूप  (Phonological loop) तथा दृष्टि स्थानिक स्कैच पैड (Visual Spatial Sketch Pad) की सूचनाओं पर ध्यान केंद्रित करके उनको नियोजित (Planned) तथा संगठित (Organized) करता है।  यह इस बात को निर्धारित करता है कि किस सूचना को महत्व देना है तथा किस सूचना की उपेक्षा करनी है एवं किसी समस्या के समाधान में कौन से उपायों से सूचनाओं को संसाधित करना है। चलन स्मृति के तीनों अंगों की क्षमताएँ बहुत सीमित होती हैं।


4. दीर्घकालीन स्मृति (Long Term Memory)- 

जब किसी तथ्य या अनुभव को लम्बे समय तक धारण किया जाता है। तो उसे दीर्घकालीन स्मृति कहते हैं। इस स्मृति की क्षमता बहुत अधिक होती है। विलियम जेम्स ने इसे गौण स्मृति (Secondary Memory) कहा है। इस स्मृति में सूचनाओं को 30 सेकण्ड से लेकर जीवन पर्यन्त तक संचित रखा जा सकता है। जिस विषय वस्तु (Subject matter)  की अति अधिगम (over learning) हो जाती है उसको कुछ व्यक्ति जीवन पर्यन्त याद रखते हैं; जैसे-  बचपन में सीखी गयी कविता अथवा राष्ट्रगान आदि।

टुलविंग ने घटनाओं और अनुभवों के आधार पर दीर्घकालीन स्मृति को दो भागों में विभक्त किया है।

(i) प्रासंगिक स्मृति (Episodic Memory)-  इस स्मृति में व्यक्ति के अपने पूर्व अनुभवों  (Prior Experiences) तथा घटनाओं का लेखा-जोखा रहता है। अर्थात् प्रासंगिक स्मृति में व्यक्ति के जीवन में 'कब' तथा कहाँ 'क्या' घटित हुआ से सम्बन्धित सूचनाएं संचित रहती हैं। 

(ii) अर्थगत  स्मृति (Semantic Memory)-  अर्थगत स्मृति में शब्दों (Words), संकेतों (Signals), विचारों (Thoughts) तथा नियमों (laws) से सम्बन्धित अमूर्त ज्ञान (Abstract Knowledge) का संचय रहता है; 
जैसे—आप किसी सुनामी अथवा भूकम्प से सम्बन्धित कोई लेख पढ़ते हैं जिसमें बहुत से लोग मारे जाते हैं। कुछ समय बाद आप इस घटना के प्रसंग को पूरी तरह याद नहीं रख पाते लेकिन ये याद रहता है कि इस घटना में बहुत से लोगों की जान गयी थी। लोगों के मारे जाने की जानकारी याद रखने में अर्थगत स्मृति का ही मुख्य योगदान रहता है। 

इनके अतिरिक्त भी मनोवैज्ञानिकों ने कई प्रकार की स्मृतियां बताई हैं। जो कि  निम्न हैं -
1. तात्कालिक स्मृति (Immediate Memory)- किसी तथ्य या विषय को याद करके पुनः तुरन्त ज्यों-का-त्यों सुना देना तात्कालिक स्मृति कहलाती है। इस प्रकार की स्मृति में भूलने की सम्भावना अधिक  रहती है।

2. रटन्त स्मृति (Rote Memory)- किसी तथ्य को बिना समझे ही याद कर लेना और आवश्यकता पड़ने पर उसे ज्यों की त्यों प्रस्तुत कर देना रटन्त स्मृति कहलाती है। छोटे बच्चे बिना अर्थ समझे कई कविताएँ रट लेते हैं और जब उन्हें कहा जाता है तो वे उन्हें पुनः ज्यों-की-त्यों सुना देते हैं।

3. तार्किक स्मृति (Logical Memory)- किसी तथ्य को सोच- विचार कर एवं तर्क के आधार पर याद करना और आवश्यकता होने पर उसे सुना देना तार्किक स्मृति कहलाती है। इसेेे बौद्धिक स्मृति (Intellectual Memory) भी कहते हैं इस प्रकार की स्मृति बालक की शिक्षा में अधिक उपयोगी होती है। 

4. सक्रिय स्मृति (Active Memory)-  अनुभवों को इच्छा पूर्वक प्रयास करके पुनःस्मरण करना तथा उनको भली-भाँति प्रस्तुत करने की क्षमता (Ability) को सक्रिय स्मृति कहते हैं। छात्र परीक्षा भवन में सक्रिय स्मृति द्वारा ही प्रश्नों के उत्तर कापियों पर लिखते हैं।

5. निष्क्रिय स्मृति (Passive Memory) - जब पूर्व अनुभवों को बिना किसी सक्रिय प्रयास के पुनःस्मरण कर लेते हैं तो उसे निष्क्रिय स्मृति कहते हैं। इस प्रकार की स्मृति सोद्देश्य नहीं होती है; 
जैसे— हाथी नाम लेते ही उसके कालेपन तथा विशालकाय आकार की याद आ जाती है।

6. यांत्रिक स्मृति (Mechanical Memory)- इस स्मृति को शारीरिक तथा आदतजन्य (Physical & Habit Memory) के नाम से भी जाना जाता है। किसी कार्य को बार-बार करते हुए शरीर के अंगों को वह कार्य करने की आदत पड़ जाती हैं तथा उस कार्य को करने के लिए व्यक्ति को कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता। इस प्रकार की स्मृति को यांत्रिक स्मृति कहते हैं। जैसे किसी सवारी गाड़ी की गति नियंत्रित करने के लिए उसके हाथ -पैर बिना मस्तिष्क पर जो डाले स्वतः ही कार्य करने लगते हैं।


7. वास्तविक स्मृति (True Memory)-  जब किसी सीखी गई विषय वस्तु (Subject-matter) को स्वतंत्र रूप से पुनः स्मरण किया जाता है तो उसे वास्तविक स्मृति कहते हैं। यह स्मृति रुचि तथा साहचर्य के नियमों से अभिप्रेरित (Motivate) रहती है इस प्रकार की स्मृति में विषय वस्तु को क्रमबद्ध (Well organized) रूप से धारण किया जाता है जिससे पुनः स्मरण करने में आसानी होती है। शिक्षा के क्षेत्र में इस स्मृति को सर्वोत्तम माना जाता है।






Monday, May 31, 2021

स्मृति प्रक्रिया के पद (Steps of Memory Process)

 स्मृति प्रक्रिया के पद (Steps of Memory Process)

वुडवर्थ ने स्मृति प्रक्रिया के चार पद बताये हैं - 


1. सीखना/अधिगम (Learning) – 

हम किसी विषय-वस्तु  को तभी स्मरण कर पाते हैं जबकि हमने उसे पहले से सीखा हो। किसी विषय-वस्तु (Subject-Matter) को सीखे बिना उसका स्मरण करना संभव नहीं है। स्मृति सीखने पर निर्भर करती है । गिलफोर्ड ने  कहा है– “किसी विषय-वस्तु को अच्छी तरह से स्मरण करने के लिए उसे अच्छी तरह से सीख लेना आधी से  अधिक लड़ाई जीत लेना है।" स्मरण (Remembering) क्षमता को बढ़ाने के लिए व्यक्ति को पाठ्य-वस्तु, अधिगम के नियमों तथा सिद्धान्तों का उचित प्रयोग करके सीखना  तथा याद करना  चाहिये। उसे नवीन ज्ञान तथा पूर्व ज्ञान में सम्बन्ध स्थापित करना चाहिये। 


2. धारण (Retention)- 

स्मृति प्रक्रिया का दूसरा महत्त्वपूर्ण पद  सीखी गयी विषय-वस्तु को धारण करना है। धारण से तात्पर्य है – विषय-वस्तु (Subject-Matter) को लम्बे समय तक मस्तिष्क में संचित रखना। जब हम किसी विषय-सामग्री का अधिगम (Learning) करते हैं तो मस्तिष्क क्रियाशील हो जाता है और उस पर कुछ चिन्ह (engrams) अंकित हो जाते हैं जिन्हें स्मृति चिन्ह (Memory trace) कहते हैं। कुछ समय तक ये चिन्ह चेतन मस्तिष्क (Conscious Mind) में रहते हैं तथा फिर अचेतन मस्तिष्क (Unconscious mind) में चले जाते हैं। जब कभी विषय-वस्तु को स्मरण करने की आवश्यकता होती है तो ये चिन्ह चेतन मस्तिष्क में उभर आते हैं तथा व्यक्ति सीखे गये ज्ञान को पुनः प्रस्तुत करने में सक्षम होता है।  अतः पुनः स्मरण धारण पर तथा धारण सीखने पर निर्भर करता है 

रायबर्न का कहना है कि “ अधिकांश व्यक्तियों की धारण शक्ति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं होता है।” किसी विषय-वस्तु को धारण करना निम्न कारकों पर निर्भर करता है ।

सीखने  वाले की आयु तथा परिपक्वता (Age & Maturity of Learner)), शारीरिक तथा मानसिक स्वस्थ (Physical & Mental Health) , मानसिक क्षमता (Mental Ability), संवेगात्मक स्थिति (Emotional State), अभिरुचि तथा अभिक्षमता (Interest & Aptitude), अभिवृति (Attitude), अवधान (Attention), विषय सामग्री की प्रकृति (Nature of subject matter), सामग्री की उपयोगिता (Utility of the Material) , सीखने की विधि  (Methods of Learning) आदि ।


3. प्रत्यास्मरण/पुनः स्मरण  (Recall)—

पूर्व अनुभवों को अचेतन मन से पुनः चेतन मन  में लाना प्रत्यास्मरण (Recall) कहलाता है। यह क्रिया स्मृति चिह्न (Memory Trace) के सक्रिय होने से होती है। पुनः स्मरण वह मानसिक क्रिया है जिससे हम  पूर्वानुभवों को मौलिक उद्दीपकों (Original Stimuli) की अनुपस्थिति में चेतन मन (Conscious Mind) पर लाया जाता है। यदि पूर्व अनुभवों को अच्छी प्रकार से धारण (Retention) नहीं किया गया हो तो उनका प्रत्यास्मरण (Recall) करना कठिन होता है।  प्रत्यास्मरण (Recall) व्यक्ति की धारण शक्ति के अतिरिक्त उसकी संवेगात्मक अवस्था (Emotional Stage)  पर भी निर्भर करता है, घबराहट (Nervousness) तथा भय (Fear) की अवस्था में अच्छी प्रकार से सीखी गई विषय-वस्तु को भी व्यक्ति स्मरण नहीं कर पाता। 

Ex.- प्रायः देखने में आता है कि कुछ व्यक्ति बड़ी तैयारी के साथ Interview में आते हैं लेकिन बाहर आकर कहते हैं कि सब याद होते हुए भी मैं घबराहट में सब कुछ भूल गया। 

पुनः स्मरण प्रमुख रूप से दो प्रकार का होता है - (i) स्वाभाविक पुनः स्मरण (Spontaneous)  (ii) सप्रयास पुनः स्मरण (Deliberate)

4. पहचान/प्रतिभिज्ञान (Recognition)– 

वुडवर्थ के अनुसार - पूर्व अनुभवों को जानना ही पहचान है, या वर्तमान काल  में उस वस्तु से परिचित होना जिससे अतीत काल में परिचित (Known)  हो चुके हैं।     

पहचान  वह योग्यता (Ability) है जिसके द्वारा पूर्व अनुभवों (Prior Experiences)  अथवा सीखे हुए तथ्यों (Facts) को अन्य तथ्यों के साथ जोड़कर या उनसे अलग करके उसे स्पष्ट रूप में समझा जाता है। 

Ex.- जब हम किसी व्यक्ति से प्रथम बार मिलते हैं तो हमारे मस्तिष्क में स्मृति चिन्हों द्वारा उसका प्रतिबिम्ब बन जाता है, जब वह व्यक्ति हमें वर्षों बाद फिर मिलता है तो ये स्मृति चिन्ह पुनः उभर आते हैं तथा हम उसे दूसरे व्यक्तियों के बीच पहचानने में समर्थ होते हैं। यद्यपि प्रतिभिज्ञान एक सामान्य अनुभव है लेकिन यह एक जटिल तथा रहस्यमय प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया स्वतः (Automatically) घटित होती है।

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