Friday, July 23, 2021

माध्यमिक शिक्षा की समस्या- तीन भाषाओं का अध्ययन (Study three Language)

 तीन भाषाओं का अध्ययन ( Study of three Language) 

सरकार की भाषा-संबंधी नीति  ने माध्यमिक शिक्षा में एक अवांछनीय समस्या उत्पन्न कर दी है। कुछ सीमा तब उस नीति का सूत्रपात मुदालियर आयोग ने किया। उसने यह सुझाव दिया कि निम्न और उच्च माध्यमिक स्तरों पर छात्रों द्वारा दो भाषाओं का अध्ययन किया जाय। कोठारी आयोग ने इस सुझाव में संशोधन करके यह विचार दिया कि निम्न माध्यमिक स्तर पर तीन भाषाओं का और उच्च माध्यमिक स्तर पर दो भाषाओं का अध्ययन किया जाय। भारत सरकार ने इन दोनों आयोगों के विचारों के आधार पर त्रिभाषा सूत्र प्रतिपादित किया है। उसने अपनी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में  स्पष्ट कर दिया है कि माध्यमिक स्तर पर छात्रों के लिये तीन भाषाओं का अध्ययन अनिवार्य है. ये भाषाएं इस प्रकार है-

1. हिंदी भाषी राज्यों में-  हिंदी, अंग्रेजी और एक आधुनिक भारतीय भाषा जिसमें दक्षिण की कोई  भी भाषा होनी चाहिए। 

2. अहिंदी भाषी राज्यों में-   हिंदी, क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी।

समाधान-

माध्यमिक शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों की आयु एवं आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उचित तो यही जान पड़ता है कि उनके लिए दो भाषाओं का अध्ययन बहुत काफी है।  तीन भाषाओं के अध्ययन से दुष्परिणाम हो सकते हैं। या तो वह इन तीन भाषाओं का  अध्ययन करें या इनका पूर्ण अध्ययन करने के लिए अन्य विषयों का अधूरा अध्ययन करें। यह दोनों बातें स्पष्ट रूप से उसकी हित के प्रतिकूल हैं। दो भाषाओं का अध्ययन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है-

1. हिंदी भाषी राज्यों में-  हिंदी और एक आधुनिक भारतीय भाषा। 

2. अहिंदी भाषी राज्यों में- मातृभाषा और हिंदी। 

महात्मा गांधी जी की विचार के अनुसार आज अंग्रेजी निसंदेह रूप से विश्व की भाषा है। अतः मैं इसे विद्यालय के पाठ्यक्रम में नहीं बल्कि विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में द्वितीय वैकल्पिक भाषा का स्थान दूंगा।










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