पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत (Piaget’s Theory of Cognitive Development)
जीन पियाजे (1896-1980) स्विट्जरलैंड के एक सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक और जीव विज्ञानी थे। उन्होंने मात्र 22 वर्ष की अल्पायु में जंतु विज्ञान (Zoology) में पीएच.डी. की डिग्री हासिल की और कई महत्वपूर्ण शोध पत्र प्रकाशित किए। अल्फ्रेड बिने की प्रयोगशाला में बुद्धि परीक्षणों (Intelligence tests) पर काम करने के दौरान ही, पियाजे का ध्यान बच्चों के संज्ञानात्मक विकास (Cognitive development) की ओर आकर्षित हुआ। बच्चों में बुद्धि और समझ का विकास कैसे होता है, इसके वास्तविक अनुभव के लिए उन्होंने अपने ही बच्चों को अपने शोध का आधार बनाया। उन्होंने अपने बच्चों के बड़े होने की प्रक्रिया और उनके मानसिक बदलावों का बहुत गहराई से विश्लेषण किया। इसी गहन अध्ययन के निष्कर्षों को आज 'पियाजे के मानसिक या संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत (Piaget's Theory of Mental or Cognitive Development)' के रूप में जाना जाता है। मूल रूप से, संज्ञानात्मक विकास का अर्थ उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा बच्चे सीखते हैं, जानकारी ग्रहण करते हैं और अपने परिवेश को समझते हैं; जिसमें उनकी एकाग्रता, प्रत्यक्षीकरण, भाषा, चिंतन, स्मृति और तर्क करने की क्षमता (concentration, perception, language, thinking, memory, and reasoning) शामिल होती है।
सिद्धान्त के उपनाम - विकासात्मक सिद्धान्त (Developmental Theory), अवस्था का सिद्धान्त (Stage Theory), संज्ञानात्मक विकास का सिद्धान्त (Theory of Cognitive Development)।
प्रयोग - लाॅरेन्ट, ल्यूसीन व जैकलीन।
सिद्धान्त की मान्यताएं :
- इस सिद्धान्त के अनुसार संज्ञानात्मक विकास निम्न से उच्चत्तर की ओर होता है और यह मानसिक क्रियाओं पर बल देता है।
- विकास सतत् या असतत् रूप से होता है। (Development occurs continuously or discontinuously.)
- संज्ञानात्मक विकास की दो मुख्य विशेषतायें होती हैं - अनुकूलन व संगठन (Adaptation and Organization)
- अनुकूलन (Adaptation) - पूर्व ज्ञान व नवीन ज्ञान के मध्य संबंध/संतुलन बनाना। यह जन्मजात प्रक्रिया है। इसके अंतर्गत तीन क्रियायें समावेशीकरण/आत्मीकरण/सात्मीकरण, समायोजन, संतुलीकरण (assimilation, adjustment, balancing) आती है।
- संगठन (Organization) - प्रत्यक्षीकृत एवं बौद्धिक सूचनाओं को व्यवस्थित करना। (Organizing perceived and intellectual information.)
- अनुकूलन दो तरह से होता है- आत्मसातीकरण एवं विशिष्टीकरण (assimilation and specialization)
- आत्मसातीकरण (Assimilation)- पूर्व ज्ञान के साथ नवीन ज्ञान को जोड़ने की प्रक्रिया।
- विशिष्टीकरण (Specialization)- नवीन ज्ञान के आधार पर पूर्व ज्ञान या अनुभवों में सुधार, परिवर्तन एवं विस्तार करना।
स्कीमा (Schema)- व्यक्ति का वस्तु के प्रति व्यवहार करने का तरीका स्कीमा है। यह मानसिक संरचनाओं का रूप होता है। यह सूचना का पैकेट, सूचनाओं की संगठित संरचना एवं समस्याओं का समाधान करने की संरचना है। यह दो प्रकार का होता है-
- व्यवहारात्मक स्कीमा (Behavioral Schema) - शारीरिक क्रियायें (Physical Actions)।
- ज्ञानात्मक/मानसिक स्कीमा (Cognitive/Mental Schema) – मानसिक क्रियायें (Mental Operations)
विकासात्मक अवस्थायें (Developmental Stages)
पियाजे ने संज्ञानात्मक विकास की चार अवस्थायें बताई हैं-
1. संवेदी-पेशीय अवस्था (Sensorimotor Stage) - जन्म से 2 वर्ष।
2. पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (Preoperational Stage)- 2 से 7 वर्ष।
3. मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Concrete Operational Stage) - 7 से 11 वर्ष।
4. औपचारिक संक्रियात्मक अवस्था (Formal Operational Stage)- 11 से परिपक्वता की अवस्था तक।
(1) संवेदी-पेशीय अवस्था/संवेदी गामक अवस्था/ज्ञानात्मक/ क्रियात्मक अवस्था (Sensorimotor Stage)
यह प्रारंभिक चरण बच्चे के जन्म से लेकर दो साल की उम्र तक चलता है। इस दौरान बच्चा अपने शरीर और इंद्रियों के माध्यम से अपने आस-पास की दुनिया को समझना शुरू करता है। इस उम्र में उसकी मुख्य गतिविधियों में चीजों को खिसकाना या उलटना-पलटना, नई वस्तुओं को पहचानने का प्रयास करना, उन्हें अपने हाथों से पकड़ना और सबसे प्रमुख— अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए अक्सर चीजों को मुँह में डालकर उनका अनुभव लेना शामिल होता है। पियाजे ने यह बताया है कि इस अवस्था में शिशुओं का बौद्धिक विकास (intellectual development) या संज्ञानात्मक विकास निम्न 6 उप-अवस्थाओं (Sub-stages) से होकर गुजरता है-
- प्रतिवर्त/सहज क्रियाओं की अवस्था (Stage
of reflex activities):-
- जन्म से 30 दिन तक।
- इस अवस्था में बालक मात्र सहज क्रियाएँ करता है। रोना, चिल्लाना, चूसना तथा अन्य इंद्रिय जनित क्रियाएं।
- बच्चे की हथेली पर उंगली रखने पर उसका अचानक से मुट्ठी बंद कर लेना।
- प्रमुख वृत्तीय प्रतिक्रियाओं की अवस्था Stage of primary circular
reactions) :-
- 1 से 4 माह तक।
- इस अवस्था में बालक की प्रतिवृर्त क्रिया (Reflex action) उसकी अनुभूति द्वारा परिवर्तित होती है और दुहराई जाती है। दोहराने के कारण इसे वृतीय अवस्था कहा जाता है।
- हाथ और मुंह की क्रियाओं में समन्वय प्रारंभ हो जाता है, साथ ही कान और आवाज में भी समन्वय प्रारंभ हो जाता है।
- गौण वृत्तीय प्रतिक्रियाओं की अवस्था (Stage of secondary
circular reactions):-
- 4 से 8 माह तक ।
- इस अवस्था में शिशु वस्तुओं को उलट-पुलटने (manipulation) तथा छूने पर अपना अधिक ध्यान देता है।
- इस अवस्था में बालक अनुक्रियाओं को दुहराता है और उसे सुनना रोचक एवं मनोरंजक लगता है।
- दोहराव की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है, दिशात्मक पहचान प्रारम्भ हो जाती है, आँख हाथ की क्रियाओं मे समन्वय स्थापित होने लगता है।
- गौण स्कीमैटा के समन्वय की अवस्था (Stage of coordination of
secondary schemata):-
- 8 से 12 माह तक।
- इस अवस्था में बच्चा जानबूझकर और सोच-समझकर कोई कार्य करता है। उसका व्यवहार किसी न किसी लक्ष्य की प्राप्ति पर केंद्रित होता है।
- बच्चा अपनी पुरानी सीखी हुई दो या दो से अधिक क्रियाओं को जोड़कर नई समस्या का समाधान करता है। जैसे - खिलौने तक पहुँचने के लिए रास्ते में रखी किसी दूसरी वस्तु को हटाना।
- बच्चे को यह समझ में आने लगता है कि जो वस्तु आँखों से ओझल हो गई है (छिपा दी गई है), उसका अस्तित्व खत्म नहीं हुआ है। इसीलिए वह छिपी हुई चीजों को खोजने का प्रयास करता है।
- वयस्कों द्वारा किए जाने वाले कार्यों का अनुकरण भी प्रारंभ कर देता है।
- बच्चा परिचित संकेतों को देखकर घटनाओं का अनुमान लगाने लगता है। जैसे - दूध की बोतल देखकर मुँह चलाना या पापा को चाबियां उठाते देख बाहर जाने के लिए खुश होना।
- तृतीय वृत्तीय प्रतिक्रियाओं की अवस्था (Stage of tertiary circular
reactions):-
- 12 से 18 माह तक।
- इस अवस्था में बालक वस्तुओं के गुणों को प्रयास एवं त्रुटि विधि से सीखने की कोशिश करता है।
- इस अवस्था में बच्चे का व्यवहार एक खोजकर्ता जैसा हो जाता है। वह चीजों के साथ नए-नए प्रयोग करता है।
- इस अवस्था में बालक की शारीरिक क्रियाओं में अभिरुचि कम हो जाती है और वे स्वयं कुछ वस्तुओं को लेकर प्रयोग करते हैं।
- हर नई चीज को छूने, मोड़ने या तोड़ने-जोड़ने की तीव्र इच्छा होती है ताकि वे समझ सकें कि चीजें कैसे काम करती हैं। जैसे - पानी के टब में अलग-अलग चीजें डालकर देखना कि क्या होता है, किसी गेंद को अलग-अलग दिशाओं में या अलग-अलग ताकत से फेंक कर देखना।
- बालकों में उत्सुकता अभिप्रेरक (curiosity motive) अधिक प्रबल हो जाता है।
- बालक वास्तव में उनके गुणों के आधार पर अंतर करना प्रारंभ कर देता है। उदा0- सभी चार पैर वाले जानवर कुत्ता नहीं है सभी साड़ी पहनने वाली मां नहीं है।
- मानसिक क्रियाओं द्वारा नए साधनों की खोज की अवस्था (Stage of
the invention of new means through mental combination):-
- 18 से 24 महीने तक।
- बच्चा अब केवल क्रियाओं पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि वस्तुओं और घटनाओं की छवि अपने दिमाग में बनाने लगता है (प्रतीकात्मक चिंतन की शुरुआत)।
- अब बच्चा बार-बार शारीरिक गलतियाँ करके सीखने के बजाय, समस्या का समाधान अपने दिमाग में ही सोच लेता है (सूझ-बूझ द्वारा सीखना)।
- बच्चे को पक्के तौर पर समझ आ जाता है कि चीजें आँखों से दूर होने पर भी अस्तित्व में रहती हैं, और वह उन्हें खोजने के लिए मानसिक योजना बना सकता है। वस्तु स्थायित्व (object permanence) की प्रवृत्ति प्रारंभ हो जाती है।
- इस उम्र के बच्चे उन कार्यों की नकल कर सकते हैं जो उन्होंने कुछ घंटे या कुछ दिन पहले देखे हों । जैसे - मम्मी को फोन पर बात करते देख, अगले दिन खिलौने वाले फोन से वैसे ही बात करने का नाटक करना)।
- बालक का चिंतन अधिक वास्तविक हो जाता है।
विशेषता-
- स्थान और दूरी का ज्ञान (Spatial Awareness): बच्चा समय, दूरी, गहराई और ऊंचाई जैसी अवधारणाओं को समझने लगता है और अपनी गति को उसी के अनुसार नियंत्रित करता है।
- अंतर करने की क्षमता (Discriminatory Ability): बालक अब अलग-अलग व्यक्तियों, जानवरों, जगहों और वस्तुओं की पहचान करके उनके बीच आसानी से भेद (अंतर) कर सकता है।
- वस्तु स्थायित्व (Object Permanence): बच्चे की मानसिक याददाश्त विकसित हो जाती है। वह यह जान जाता है कि जो वस्तु आँखों के सामने नहीं है, उसका वजूद खत्म नहीं हुआ है।
- शारीरिक कौशल (Motor Control): बच्चे का अपने शरीर की गतिविधियों पर पूरा नियंत्रण स्थापित हो जाता है । जैसे- स्वतंत्र रूप से चलना और दौड़ना)।
- आत्म-केंद्रित व्यवहार (Egocentric Behavior) : इस उम्र में बच्चा अपनी ही दुनिया में रहता है और हर चीज को केवल अपने नजरिए से देखता है।
- कारण और परिणाम की समझ (Understanding of Cause and Effect): वह यह जानने लगता है कि उसकी किस क्रिया (Action) का क्या परिणाम (Reaction) होगा।
- स्वतंत्र अस्तित्व का अहसास (Sense of Independent Existence): वह खुद को बाहरी वातावरण से जोड़कर नहीं, बल्कि एक अलग अस्तित्व के रूप में महसूस करने लगता है।
- बौद्धिक शक्तियों का विकास (Development of Intellectual strength): इस अवस्था में बच्चे के अंदर चीजों को याद रखने (Memory), बड़ों को देखकर वैसा ही करने (अनुकरण) और हर चीज के बारे में सवाल पूछने (जिज्ञासा) की क्षमता काफी हद तक विकसित हो जाती है।
(2) पूर्व संक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational stage)
यह अवस्था 2 वर्ष की आयु से शुरू होकर 7 वर्ष तक चलती है, जिसे 'प्रारंभिक बाल्यावस्था' (Early childhood) का समय भी माना जाता है। इस चरण में आते-आते बच्चा अपने आस-पास के वातावरण को बेहतर ढंग से समझने लगता है; वह विभिन्न वस्तुओं की न केवल पहचान करता है, बल्कि उनके बीच आसानी से अंतर भी कर लेता है। इसी उम्र में बच्चे के अंदर भाषा सीखने और बोलने की क्षमता का तेजी से विकास होता है। वह अपने परिवेश से लगातार नई जानकारियाँ और अनुभव बटोरता रहता है। पहली अवस्था (संवेदी-पेशीय) की तुलना में, अब उसकी समझ इतनी विकसित हो जाती है कि वह छोटी-मोटी समस्याओं को खुद सुलझाने का प्रयास करने लगता है। इसके साथ ही, उसमें 'वस्तु स्थायित्व' (Object permanence) का गुण भी अच्छी तरह से मजबूत हो जाता है। इस महत्वपूर्ण अवस्था को और अधिक गहराई से समझने के लिए, जीन पियाजे ने इसे दो उप-भागों में विभाजित किया है-
- पूर्व संप्रत्ययात्मक अवधि (Pre-conceptual Period):-
- 2-4 वर्ष तक ।
- बच्चा चीजों को दर्शाने के लिए प्रतीकों, शब्दों या चित्रों (Symbols, words or images) का इस्तेमाल करने लगता है (जैसे- लकड़ी के डंडे को घोड़ा मानकर खेलना)।
- बच्चे निर्जीव वस्तुओं को सजीव (जीवित) समझने लगते हैं। जैसे - मेज से चोट लगने पर मेज को मारना, या अपनी गुड़िया को खाना खिलाना और सुलाना।
- इस उम्र में बच्चा स्वार्थी (Selfish) नहीं होता, बल्कि 'आत्मकेंद्रित (autism)' होता है। वह मानता है कि पूरी दुनिया उसी के इर्द-गिर्द घूमती है और जो उसे पसंद है, वही सबको पसंद होना चाहिए। वह दूसरों के नजरिए को नहीं समझ पाता
- इस अवस्था में बच्चों का तर्क (debate) पूरी तरह से सही नहीं होता है। वे दो अलग-अलग घटनाओं को बिना किसी वैज्ञानिक कारण के जोड़ लेते हैं (जैसे- "सूरज इसलिए छिप गया क्योंकि मुझे नींद आ रही है")।
- हाव-भाव से अभिनय, चित्र व रंगीन तस्वीर बनाना (Acting through gestures, and creating drawings and colored pictures.)।
- मौखिक भाषा का सर्वाधिक विकास।
- अंतर्दर्शी अवधि (Intuitive period):-
- यह अवधि 4 से 7 वर्ष की होती है।
- बच्चे अपने आस-पास की दुनिया को लेकर बहुत जिज्ञासु हो जाते हैं और लगातार "ऐसा क्यों है?" और "यह कैसे होता है?" जैसे सवाल पूछते हैं।
- बच्चे बिना किसी ठोस तर्क या सबूत के किसी बात को सच मान लेते हैं (उन्हें लगता है कि जो वे सोच रहे हैं, वही सही है)।
- बच्चे किसी भी वस्तु या स्थिति के केवल एक ही पहलू पर ध्यान केंद्रित कर पाते हैं और अन्य पहलुओं को नजरअंदाज कर देते हैं (जैसे- वस्तु की सिर्फ लम्बाई देखना, उसकी चौड़ाई नहीं)।
- इस अवधि में बालकों का चिंतन एवं तर्कणा पहले से अधिक परिपक्व हो जाते हैं जिसके परिणामस्वरूप वह साधारण मानसिक प्रक्रियाएँ जोड़, घटाव, गुणा तथा भाग (Addition, Subtraction, Multiplication and Division) आदि को कर पाता है।
- क्रमबद्ध तर्क नहीं होता है, चिंतन सहज होता है, भाषा सीख लेते हैं, सामाजिक रूचियों का विकास होता है।
- बच्चे मानसिक रूप से क्रियाओं को उलटना नहीं जानते। (उदाहरण: वे समझ सकते हैं कि 3 + 2 = 5 होता है, लेकिन अगर पूछा जाए कि 5 - 2 क्या होगा, तो वे उलझ जाते हैं)।
(3) मूर्त/ठोस संक्रियात्मक अवस्था (Concrete Operation Stage)
- 7 से 11 वर्ष तक।
- पूर्व संक्रियात्मक अवस्था में सीखे गए गुणों में निपुणता प्राप्त कर लेता है। इस अवस्था की विशेषता यह है कि बालक ठोस वस्तुओं के आधार पर आसानी से मानसिक संक्रियाएं (Mental Activities) करके समस्या का समाधान कर लेता है।
- बच्चे तार्किक रूप से सोचना शुरू कर देते हैं, लेकिन वे केवल उन्हीं चीजों के बारे में तर्क कर सकते हैं जो उनके सामने मौजूद हों (मूर्त वस्तुएं)।
- उन्हें यह समझ आ जाता है कि वस्तु का बाहरी रूप या आकार बदलने पर भी उसकी मात्रा समान रहती है (जैसे - एक लीटर पानी चाहे चौड़े बर्तन में हो या लंबे जग में, वह एक लीटर ही रहेगा)।
- बच्चे अब क्रियाओं को मानसिक रूप से उलटना सीख जाते हैं। (वे गणित में समझ जाते हैं कि यदि 4+3=7 है, तो 7-3=4 होगा)।
- अब बच्चे किसी वस्तु या समस्या के केवल एक पहलू पर नहीं, बल्कि एक ही समय में कई पहलुओं पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।
- वे वस्तुओं को उनकी समानताओं के आधार पर वर्गों में बाँट सकते हैं और उन्हें लंबाई, वजन या आकार के अनुसार सही क्रम (जैसे- छोटे से बड़ा) में लगा सकते हैं।
- इस अवस्था में बच्चों का स्वार्थीपन या आत्मकेंद्रित व्यवहार कम होने लगता है। वे यह समझने लगते हैं कि दूसरों की सोच और दृष्टिकोण उनसे अलग हो सकता है।
- भाषा का पूर्ण विकास हो जाता है।
- दिशाओं, लंबाई, चैड़ाई एवं क्षेत्रफल का ज्ञान समझने लगता है।
- बालक अपने पर्यावरण के साथ अनुकूलन (Adaptation) करने के लिए अनेक नियमों को सीख लेता है।
(4) अमूर्त संक्रियात्मक/रूपात्मक अवस्था (Formal Operation Stage)
- 11 से 15 वर्ष/परिपक्वता (Maturity) की अवस्था तक।
- इस अवस्था मे भाषात्मक विकास (linguistic development) पूर्ण होने लग जाता है। बालक की सम्प्रेषणशीलता (communication diminish) में व्याकरणीय अशुद्धियां (Grammatical errors) घटती जाती है और भाषा पूर्ण हो जाती है।
- अब किशोर उन विचारों, भावनाओं और अवधारणाओं (thoughts, emotions and concepts) पर भी तर्क कर सकते हैं जिन्हें देखा या छुआ नहीं जा सकता (जैसे- ईमानदारी, दर्शन, जटिल गणितीय समीकरण)।
- वे किसी समस्या के समाधान के लिए मन में संभावित अनुमान (hypotheses) बनाते हैं और फिर तार्किक रूप से सोचकर सही उत्तर खोज निकालते हैं। जैसे- कागज की नाव बनाना, हवाई जहाज बनाना, कार्टून बनाना आदि।
- बच्चों का सोचने का तरीका अधिक क्रमबद्ध, वैज्ञानिक और विश्लेषणात्मक (systematic, scientific and analytical) हो जाता है।
- इस उम्र में बच्चे अपने भविष्य, करियर, समाज और दुनिया (future, careers, society, and world) के बारे में सोचने लगते हैं और योजनाएं बनाते हैं।
- वे एक ही समस्या के कई अलग-अलग और रचनात्मक समाधान (multiple distinct and creative solutions) सोचने में सक्षम हो जाते हैं (Out of the box thinking)।
- किशोर अक्सर यह सोचने लगते हैं कि एक आदर्श दुनिया या समाज कैसा होना चाहिए, और वे वर्तमान स्थिति की तुलना उस आदर्श स्थिति से करते हैं।
- बालक के भीतर अमूर्त चिन्तन (Abstract Thinking) की अवस्था विकसित हो जाती है।
- अधिगम क्षमता प्रयास एवं त्रुटि के स्थान पर बौद्धिक क्षमता पर आधारित हो जाती है।
- अन्वेषणशीलता, मौलिकता, रचनात्मकता (Inquisitiveness, Originality, Creativity) आदि के सृजन में सहायक आवश्यक बौद्धिक क्षमताओं का विकास हो जाता है।
- निगमन तर्क (Deductive Reasoning) का विकास हो जाता है।
पियाजे के सिद्धांत की शैक्षिक उपयोगिताएँ (Educational Utilities of Piaget’s Theory)
पियाजे के सिद्धान्त की शैक्षिक उपयोगितायें निम्न हैं-
- करके सीखना (Learning by Doing): शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिसमें बच्चे खुद से गतिविधियाँ (activities) करके सीखें। उन पर केवल किताबी ज्ञान न थोपा जाए।
- खेल और अनुकरण विधि (Play and Imitation Methods) : शिक्षकों को बच्चों को पढ़ाने के लिए खेल-कूद और बड़ों की नकल (imitation) करने जैसी आसान विधियों का इस्तेमाल करना चाहिए।
- दंड का निषेध (Prohibition of Punishment): यदि कोई बच्चा सीखने में धीमा है या गलती करता है, तो उसे सजा (punishment) नहीं मिलनी चाहिए। उसे अपनी गति से सीखने का समय देना चाहिए।
- व्यावहारिक बुद्धि का महत्व (Importance of Practical Intelligence) : बच्चे की बुद्धिमानी केवल रटने में नहीं, बल्कि सीखी हुई बातों को असल जिंदगी में लागू करने में है। इसलिए बुद्धि मापने के लिए व्यावहारिक कार्यों (practical tasks) का उपयोग किया जाना चाहिए।
- प्रेरणा (Motivation) की भूमिका: सीखने के लिए बच्चे के अंदर की लगन (inner urge) और उसे मिलने वाली प्रेरणा बहुत जरूरी है। शिक्षकों को हमेशा बच्चों को प्रेरित करते रहना चाहिए।
- वातावरण से सीखना (Learning from the Environment): बच्चा अपने आस-पास के माहौल से जुड़कर सीखता है। शिक्षक और अभिभावक का काम यह है कि वे बच्चे को सही वातावरण दें और उनका सही मार्गदर्शन (guidance) करें।
- क्षमताओं की पहचान (Identification of Capabilities): यह सिद्धांत माता-पिता और शिक्षकों को यह समझने में मदद करता है कि किस उम्र में बच्चे की सोचने और तर्क करने की क्षमता (Reasoning power) कितनी विकसित हो चुकी है।
- समूह चर्चा और स्व-सुधार (Group Discussion and Self-Correction): एक जैसी पसंद वाले बच्चों के छोटे गुट (Groups) बनाकर उन्हें आपस में चर्चा करने देनी चाहिए। बच्चों को गलतियां करने और अपनी गलतियों को खुद सुधारने के पर्याप्त मौके मिलने चाहिए।
- प्रायोगिक शिक्षा पर जोर (Emphasis on Experimental Learning): बच्चों को रटने के बजाय प्रयोग (Experiments) और व्यावहारिक शिक्षा देनी चाहिए। प्रयोग करने से उनके अंदर नई सोच और खुद खोज (Discovery) करने की क्षमता पैदा होती है।
- सर्वांगीण अनुभव (Holistic Experience): दिमागी विकास के लिए केवल मानसिक मेहनत ही नहीं, बल्कि शारीरिक गतिविधियाँ और समाज के साथ घुलना-मिलना (physical activities and social interaction) भी बहुत जरूरी है।
- मूर्त उदाहरणों का प्रयोग (Use of Concrete Examples): छोटे बच्चे (नर्सरी या प्राइमरी के) केवल सामने दिखने वाली चीजों को ही समझ पाते हैं। इसलिए उन्हें पढ़ाते समय असली चीजों (real-world objects) का इस्तेमाल करना चाहिए (जैसे - 1/4 भिन्न समझाने के लिए सेब के 4 टुकड़े करके दिखाना)।
- विविध प्रकार की प्रतीकात्मक सोच (Diverse Forms of Symbolic Thinking): बच्चे केवल शब्दों (language) से ही नहीं सीखते। कई बच्चे अपने दिमाग में चित्रों, आकृतियों और संबंधों (images, shapes and relationships) का उपयोग करके ज्यादा बेहतर सोचते हैं। शिक्षा प्रणाली को बच्चों के इस 'चित्रमय' या प्रतीकात्मक सोचने (pictorial' or symbolic mode of thinking) के तरीके को बढ़ावा देना चाहिए।
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